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डॉक्टरों पर कथित हमले के मामले में शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे की जमानत रद्द, सुप्रीम कोर्ट

डॉक्टरों पर कथित हमले के मामले में शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे की जमानत रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने 3 दिन में सरेंडर का दिया आदेश

       महाराष्ट्र के ठाणे जिले में नगर निगम अस्पताल के डॉक्टरों पर कथित हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे को मिली जमानत रद्द कर दी है। शीर्ष अदालत ने म्हात्रे को तीन दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। मामला ठाणे के शास्त्री नगर अस्पताल में डॉक्टरों के साथ कथित मारपीट से जुड़ा है। इस घटना के बाद चिकित्सा समुदाय में नाराजगी और विरोध की स्थिति बनी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया। अदालत ने कहा कि मेडिकल बिरादरी के लोगों के साथ किसी भी तरह की हिंसा स्वीकार नहीं की जा सकती। डॉक्टर मरीजों की सेवा करते हैं और उनके खिलाफ हमला नहीं होना चाहिए।

यह मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जब महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा रमेश म्हात्रे को दी गई जमानत को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने 7 अगस्त को म्हात्रे को जमानत दी थी। इसके साथ ही मुकदमे को तेजी से चलाने और निर्धारित समय सीमा में पूरा करने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अब हाई कोर्ट के जमानत आदेश को रद्द कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद 6 जुलाई को ठाणे के शास्त्री नगर अस्पताल में हुई घटना से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, एक गर्भवती महिला के इलाज में कथित देरी को लेकर उसके परिवार और अस्पताल के कर्मचारियों के बीच विवाद हुआ था।

इसी विवाद के बाद रमेश म्हात्रे और अन्य आरोपी अस्पताल पहुंचे। आरोप है कि वहां मौजूद डॉक्टरों के साथ मारपीट की गई। घटना के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू हुई।

घटना सामने आने के बाद डॉक्टरों और मेडिकल संगठनों की ओर से विरोध भी किया गया। अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ होने वाली हिंसा को लेकर एक बार फिर सवाल उठे।

मामले में रमेश म्हात्रे के अलावा चार अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया गया था। बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने म्हात्रे समेत इन आरोपियों को जमानत दे दी थी।

महाराष्ट्र सरकार ने हाई कोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत क्यों रद्द की?

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की।

पीठ ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए रमेश म्हात्रे को दी गई जमानत रद्द कर दी। अदालत ने उन्हें तीन दिन के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान पीठ ने डॉक्टरों पर हमले के मामले को गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा कि समाज में यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि मेडिकल बिरादरी के लोगों के साथ हिंसा नहीं की जा सकती।

अदालत की टिप्पणी केवल इस मामले तक सीमित नहीं थी। पीठ ने इस बात का भी उल्लेख किया कि म्हात्रे से जुड़ी घटना के बाद उसी राजनीतिक दल से संबंधित ऐसी ही एक अन्य घटना सामने आई थी।

इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल पेशेवरों की सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाया।

‘मेडिकल बिरादरी को छुआ नहीं जा सकता’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि मेडिकल बिरादरी लोगों की सेवा करती है और इस वजह से उन पर हमला नहीं किया जा सकता।

अदालत का यह संदेश खास तौर पर स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवाल के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अस्पतालों में मरीजों के इलाज, आपातकालीन सेवाओं और चिकित्सकीय निर्णयों को लेकर विवाद कई बार हिंसक रूप ले लेते हैं।

ऐसे मामलों में डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी भीड़ या मरीज के परिजनों के आक्रोश का सामना करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में इस तरह की हिंसा को लेकर सख्त रुख दिखाई दिया।

हालांकि किसी मरीज या उसके परिवार को इलाज में देरी या अन्य चिकित्सकीय शिकायत हो तो उसके समाधान के लिए कानूनी और प्रशासनिक रास्ते उपलब्ध होते हैं। डॉक्टरों के साथ मारपीट को उस शिकायत के समाधान का तरीका नहीं माना जा सकता।

रमेश म्हात्रे की ओर से क्या दलील दी गई?

रमेश म्हात्रे की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे पेश हुए।

उन्होंने अदालत के सामने जमानत जारी रहने के पक्ष में कई बातें रखीं। उन्होंने बताया कि मामले में दो गवाहों के बयान पहले ही दर्ज किए जा चुके हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि शिकायतकर्ता महिला डॉक्टर की गवाही 3 अक्टूबर को निर्धारित है और मुकदमे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

म्हात्रे के वकील की ओर से यह तर्क दिया गया कि मुकदमे की सुनवाई में किसी प्रकार की बाधा नहीं आ रही है। इसलिए जमानत रद्द करने का आधार नहीं बनता।

बचाव पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि हाई कोर्ट पहले ही मुकदमे को तेजी से पूरा करने का निर्देश दे चुका है।

19 आपराधिक मामलों का भी हुआ जिक्र

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने म्हात्रे के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया।

पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले सहित उनके खिलाफ कुल 19 आपराधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आती है।

इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने अदालत को बताया कि ये मामले राजनीतिक कारणों से दर्ज किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि इनमें से 18 मामलों में म्हात्रे को बरी किया जा चुका है।

इस दलील के जरिए बचाव पक्ष ने यह बताने की कोशिश की कि पुराने मामलों की संख्या को अकेले आधार बनाकर वर्तमान मामले में जमानत रद्द नहीं की जानी चाहिए।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और डॉक्टरों पर कथित हमले के पहलू को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट से मिली जमानत को रद्द कर दिया।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की संख्या और उन मामलों में अंतिम दोषसिद्धि अलग-अलग कानूनी तथ्य होते हैं। किसी मामले में आरोप दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के समान नहीं है।

हाई कोर्ट ने 7 अगस्त को दी थी जमानत

इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7 अगस्त को रमेश म्हात्रे को जमानत दी थी।

हाई कोर्ट ने जमानत देते समय मुकदमे को फास्ट ट्रैक तरीके से आगे बढ़ाने और निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया था।

म्हात्रे के अलावा घटना में गिरफ्तार चार अन्य आरोपियों को भी हाई कोर्ट से जमानत मिल गई थी।

इस आदेश के बाद महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सरकार की ओर से दाखिल अपील पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई स्वीकार कर ली है और म्हात्रे की जमानत रद्द कर दी है।

घटना के बाद हुआ था विरोध

6 जुलाई की घटना के बाद डॉक्टरों और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों में नाराजगी देखने को मिली थी।

अस्पताल में हुई कथित मारपीट ने डॉक्टरों की सुरक्षा के सवाल को फिर चर्चा में ला दिया। चिकित्सा पेशेवरों का कहना रहा है कि मरीजों के इलाज में होने वाली किसी भी समस्या को लेकर शिकायत का समाधान बातचीत और कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि अस्पताल में हिंसा के जरिए।

मरीज के परिजनों और अस्पताल प्रशासन के बीच विवाद कई कारणों से उत्पन्न हो सकता है। इलाज में देरी, गंभीर बीमारी, मरीज की स्थिति और चिकित्सा निर्णयों को लेकर परिवार के सदस्यों में चिंता होना स्वाभाविक है। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हिंसा होने पर मामला आपराधिक कार्रवाई तक पहुंच सकता है।

गर्भवती महिला के इलाज में देरी का आरोप

घटना की शुरुआत कथित तौर पर एक गर्भवती महिला के इलाज को लेकर हुए विवाद से हुई थी।

महिला के परिवार के सदस्यों ने अस्पताल के कर्मचारियों पर इलाज में देरी करने का आरोप लगाया था। इसी बात को लेकर अस्पताल में विवाद बढ़ा।

इसके बाद रमेश म्हात्रे और अन्य लोगों के अस्पताल पहुंचने तथा डॉक्टरों के साथ कथित मारपीट की घटना सामने आई।

मामले में आरोप और बचाव पक्ष की दलीलें न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। अंतिम रूप से घटना में किसकी क्या भूमिका थी, इसका निर्धारण मुकदमे में उपलब्ध साक्ष्यों और अदालत के अंतिम निर्णय से होगा।

मुकदमा शुरू हो चुका है

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने खास तौर पर यह बताया कि मुकदमा शुरू हो चुका है।

दो गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं और शिकायतकर्ता महिला डॉक्टर की गवाही 3 अक्टूबर को होनी है।

बचाव पक्ष ने इसी आधार पर यह दलील दी कि अब आरोपी के बाहर रहने से मुकदमे की प्रक्रिया प्रभावित नहीं हो रही है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करने का आदेश दिया और म्हात्रे को तीन दिन के भीतर आत्मसमर्पण करने को कहा।

पीठ ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग के संदर्भ में यह भी कहा कि हाई कोर्ट पहले ही तेज सुनवाई का निर्देश दे चुका है और सुप्रीम कोर्ट उस निर्देश पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है।

डॉक्टरों की सुरक्षा का मुद्दा फिर सामने

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का एक व्यापक पहलू डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा से जुड़ा है।

अस्पतालों में डॉक्टरों पर हमले की घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं। इनका असर अस्पताल की कार्यप्रणाली और मरीजों के इलाज पर भी पड़ सकता है।

यदि डॉक्टर या अस्पताल का कर्मचारी हिंसा की आशंका में काम करे, तो इससे चिकित्सकीय निर्णय लेने की परिस्थितियां प्रभावित हो सकती हैं। वहीं मरीजों और उनके परिवारों की शिकायतों को सुनना भी अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी है।

इसलिए अस्पतालों में विवाद की स्थिति से निपटने के लिए सुरक्षा व्यवस्था, शिकायत निवारण और संवाद की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है।

सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा टिप्पणी इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट का संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों पर कथित हमले के मामले में जमानत रद्द करके यह स्पष्ट किया है कि अदालत मेडिकल पेशेवरों के खिलाफ हिंसा को गंभीरता से देख रही है।

पीठ ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि डॉक्टर समाज के लोगों की सेवा करते हैं और उनके खिलाफ हमला स्वीकार्य नहीं है।

हालांकि मामले में आरोपों का अंतिम परीक्षण अभी ट्रायल कोर्ट में होना बाकी है। जमानत रद्द होना भी अपने आप में आरोपी को दोषी ठहराने के समान नहीं है। मुकदमे में अभियोजन पक्ष को अपने आरोप साक्ष्यों के आधार पर साबित करने होंगे और आरोपी को अपना बचाव प्रस्तुत करने का पूरा कानूनी अधिकार रहेगा।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रमेश म्हात्रे को तीन दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा। इसके बाद मामले की आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी।

शिकायतकर्ता महिला डॉक्टर की गवाही 3 अक्टूबर को निर्धारित है। चूंकि मुकदमा पहले ही शुरू हो चुका है, आने वाले समय में गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों की रिकॉर्डिंग महत्वपूर्ण होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे को तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत को भी ध्यान में रखा है। हाई कोर्ट द्वारा पहले दिए गए फास्ट ट्रैक निर्देश के अनुसार मामले को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने की प्रक्रिया जारी रह सकती है।

फिलहाल इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश है। अदालत ने साफ किया है कि मरीजों के इलाज को लेकर शिकायत या विवाद का समाधान हिंसा के जरिए नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, मामले में आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम फैसला न्यायिक सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

मामले की आगे की सुनवाई में गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य महत्वपूर्ण रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब रमेश म्हात्रे की जमानत समाप्त हो गई है और उन्हें अदालत के निर्देश के अनुसार तीन दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।