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दिल्ली हाई कोर्ट की जेल वार्डन को कड़ी चेतावनी: स्थिति नियंत्रित होने के बाद कैदियों की पिटाई पूरी तरह अनावश्यक

दिल्ली हाई कोर्ट की जेल वार्डन को कड़ी चेतावनी: स्थिति नियंत्रित होने के बाद कैदियों की पिटाई पूरी तरह अनावश्यक

         दिल्ली हाई कोर्ट ने जेल परिसर में कैदियों के साथ अनावश्यक मारपीट और हिंसा के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए एक जेल वार्डन को कड़ी चेतावनी दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल में कानून-व्यवस्था बनाए रखना जेल प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन किसी स्थिति के नियंत्रण में आने के बाद कैदियों के खिलाफ बल प्रयोग करना उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत ने विशेष रूप से उस घटना का जिक्र किया जिसमें कैदियों के बीच हुए झगड़े को शुरुआती स्तर पर नियंत्रित किए जाने के बावजूद बाद में कुछ कैदियों को उनकी कोठरियों से बाहर निकालकर डंडे से पीटा गया। हाई कोर्ट ने इस कार्रवाई को अनावश्यक और अस्वीकार्य बताया।

पीठ ने जेल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग देखने के बाद घटना के क्रम को समझा और पाया कि शुरुआत में स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वार्डन द्वारा किया गया हस्तक्षेप अलग परिस्थिति में था, लेकिन जब कैदी अलग होकर अपनी-अपनी कोठरियों या कमरों में वापस चले गए, तब उनके खिलाफ दोबारा बल प्रयोग करने की आवश्यकता दिखाई नहीं देती थी।

जेल के खुले हिस्से में हुआ था कैदियों के बीच झगड़ा

मामला 26 जून को जेल परिसर में हुई एक घटना से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार जेल के खुले हिस्से में करीब 10 से 12 कैदियों के बीच किसी बात को लेकर विवाद और झगड़ा हो गया था। स्थिति बिगड़ने पर जेल वार्डन ने मौके पर पहुंचकर डंडे की मदद से कैदियों को एक-दूसरे से अलग किया।

झगड़े के दौरान जेल प्रशासन द्वारा स्थिति को नियंत्रित करना आवश्यक था, क्योंकि कई कैदी आपस में भिड़ रहे थे। शुरुआती कार्रवाई के बाद कैदी अलग हो गए और अपनी-अपनी कोठरियों अथवा कमरों में वापस चले गए।

यहीं से मामले का दूसरा पहलू सामने आया, जिस पर हाई कोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताई।

अदालत द्वारा देखे गए सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, कुछ समय बाद वार्डन अतिरिक्त कर्मचारियों के साथ फिर से वहां पहुंचा। इसके बाद कुछ कैदियों को उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया और उनके साथ डंडे से मारपीट की गई।

कैदियों के वापस जाने के बाद दोबारा बल प्रयोग पर सवाल

हाई कोर्ट ने इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाया कि जब कैदी पहले ही अलग हो चुके थे और अपनी-अपनी कोठरियों में वापस लौट गए थे, तो उन्हें दोबारा बाहर निकालकर पीटने की जरूरत क्यों पड़ी।

अदालत के सामने सीसीटीवी फुटेज महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में सामने आया। फुटेज देखने के बाद पीठ ने टिप्पणी की कि दूसरी बार जब कैदियों को उनकी कोठरियों से बाहर लाया गया, तब ऐसी कोई तत्काल परिस्थिति दिखाई नहीं दे रही थी जिससे यह कहा जा सके कि जेल कर्मचारियों के सामने कोई गंभीर खतरा मौजूद था और उससे निपटने के लिए डंडे से मारपीट आवश्यक थी।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि कैदी उस समय हथियारों से लैस दिखाई नहीं दे रहे थे। ऐसे में स्थिति को नियंत्रित करने के बाद दंडात्मक तरीके से बल प्रयोग करना अदालत को उचित नहीं लगा।

वार्डन ने गाली-गलौज का दिया हवाला

जेल वार्डन की ओर से अदालत के सामने यह दलील रखी गई कि कैदियों ने उसके साथ गाली-गलौज की थी। वार्डन की ओर से यह भी संकेत दिया गया कि जेल परिसर में सुरक्षा संबंधी स्थिति को देखते हुए उसके सामने कठिन परिस्थिति थी।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कैदी द्वारा कथित रूप से गाली-गलौज किया जाना अपने आप में उस कैदी को डंडे से पीटने का आधार नहीं बन सकता। जेल प्रशासन को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए।

पीठ का जोर इस बात पर था कि जेल कर्मचारियों को सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग के लिए नहीं किया जा सकता।

स्थिति नियंत्रण में आने के बाद हिंसा स्वीकार्य नहीं

हाई कोर्ट ने अपने अवलोकन में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। यदि जेल में कैदी आपस में लड़ रहे हों और स्थिति को रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत हो, तो जेल कर्मचारियों द्वारा आवश्यक और आनुपातिक बल का इस्तेमाल अलग परिस्थिति है।

लेकिन जब विवाद समाप्त हो चुका हो, कैदी अलग हो चुके हों और अपने कमरों या कोठरियों में वापस जा चुके हों, तब उन्हें दोबारा बाहर निकालकर मारपीट करना अलग तरह की कार्रवाई है।

अदालत ने इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए वार्डन की कार्रवाई को अनावश्यक बताया।

पीठ ने कहा कि जेल में बंद व्यक्ति भी कानून के संरक्षण में हैं। जेल की चारदीवारी के भीतर होने का अर्थ यह नहीं है कि उनके साथ किसी भी परिस्थिति में मनमाना शारीरिक बल प्रयोग किया जा सकता है।

चाकू और सुआ बरामद होने की बात भी सामने आई

सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष की ओर से यह भी बताया गया कि वार्डन के निर्देश पर जेल परिसर से एक चाकू और सुआ बरामद किया गया था। सरकारी वकील की ओर से इस बरामदगी का उल्लेख करते हुए जेल प्रशासन की कार्रवाई के संदर्भ में परिस्थितियों को अदालत के सामने रखा गया।

हालांकि, इस दलील के बावजूद अदालत ने मुख्य सवाल को अलग रखा। अदालत का ध्यान इस बात पर था कि जिस समय कैदियों को उनकी कोठरियों से बाहर निकालकर पीटा गया, उस समय सीसीटीवी फुटेज में तत्काल ऐसा कोई खतरा दिखाई नहीं देता था जिससे इस प्रकार के बल प्रयोग को उचित ठहराया जा सके।

यानी यदि किसी जेल में हथियार बरामद होने की स्थिति सामने आती भी है, तो उससे यह स्वतः साबित नहीं होता कि हर कैदी के खिलाफ शारीरिक बल का इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रत्येक कार्रवाई परिस्थितियों के अनुरूप और आवश्यक सीमा में होनी चाहिए।

जेल कर्मचारियों की जिम्मेदारी पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाई कोर्ट की टिप्पणी केवल एक वार्डन की कार्रवाई तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक संबंध जेलों में अनुशासन, सुरक्षा और कैदियों के साथ व्यवहार के तरीके से भी है।

जेल प्रशासन का प्राथमिक दायित्व जेल के भीतर सुरक्षा बनाए रखना, कैदियों के बीच संघर्ष को रोकना और किसी भी हिंसक स्थिति को नियंत्रित करना है। लेकिन इसके साथ ही जेल कर्मचारियों से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वे कैदियों के साथ कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार व्यवहार करें।

अदालत की टिप्पणी इसी संतुलन की ओर संकेत करती है। जेल में अनुशासन बनाए रखने के नाम पर ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती, जो तत्काल सुरक्षा आवश्यकता से आगे निकल जाए।

वार्डन को भविष्य के लिए कड़ी चेतावनी

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने जेल वार्डन को भविष्य के लिए स्पष्ट चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि यदि इस प्रकार का व्यवहार दोबारा दोहराया गया और स्थिति नियंत्रित होने के बाद कैदियों के खिलाफ अनावश्यक हिंसा का इस्तेमाल किया गया, तो अदालत इस मामले में कड़ी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी।

अदालत की इस टिप्पणी को जेल प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा सकता है। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि जेल कर्मचारियों को सुरक्षा संबंधी अधिकार प्राप्त होने के बावजूद उन अधिकारों का इस्तेमाल निर्धारित सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए।

वार्डन ने सुनवाई के दौरान अपने व्यवहार के लिए बिना शर्त माफी मांगी और अदालत के समक्ष खेद व्यक्त किया।

मामला आशीष उर्फ विक्की की आपराधिक अपील से जुड़ा

यह पूरा मामला आशीष उर्फ विक्की द्वारा दायर आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया। उसके वकील ने अदालत को बताया कि अपीलकर्ता उसी दिन आत्मसमर्पण करने वाला है।

मामले की सुनवाई के दौरान जेल में उसके साथ हुए व्यवहार और उसकी स्वास्थ्य स्थिति से संबंधित जानकारी भी अदालत के सामने आई। अदालत ने उपलब्ध स्टेटस रिपोर्ट पर विचार करते हुए अपीलकर्ता की आर्थिक स्थिति का भी संज्ञान लिया।

रिपोर्ट से अदालत को पता चला कि अपीलकर्ता के पास फ्रैक्चर की सर्जरी कराने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं हैं।

फ्रैक्चर की सर्जरी के लिए सरकारी अस्पताल में इलाज का निर्देश

हाई कोर्ट ने इस पहलू को भी गंभीरता से लिया। अदालत ने निर्देश दिया कि जेल में संबंधित चिकित्साधिकारी द्वारा अपीलकर्ता की जांच कराई जाए।

यदि चिकित्सकीय जांच के बाद यह पाया जाता है कि उसे आगे उपचार या फ्रैक्चर की सर्जरी की आवश्यकता है, तो उसे आवश्यक इलाज सरकारी अस्पताल में उपलब्ध कराया जाए।

इस निर्देश के पीछे अदालत की चिंता यह थी कि आर्थिक स्थिति के कारण किसी बंदी को आवश्यक चिकित्सा उपचार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। जेल में बंद व्यक्ति होने के बावजूद उसकी आवश्यक चिकित्सकीय जरूरतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

अदालत ने चिकित्सा संबंधी पहलू को भी मामले की आगे की सुनवाई से जोड़ा है।

सीसीटीवी फुटेज बना अहम आधार

इस मामले में सीसीटीवी फुटेज की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। जेल जैसे संवेदनशील स्थानों पर होने वाली घटनाओं की जांच में वीडियो रिकॉर्डिंग घटनाक्रम को समझने में महत्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध करा सकती है।

अदालत ने फुटेज देखकर यह समझने का प्रयास किया कि झगड़ा किस परिस्थिति में शुरू हुआ, जेल कर्मचारियों ने शुरुआत में क्या कार्रवाई की और उसके बाद कैदियों के अलग होने पर क्या हुआ।

फुटेज के आधार पर अदालत ने शुरुआती हस्तक्षेप और बाद में की गई कार्रवाई के बीच अंतर किया। यही अंतर अदालत की नाराजगी का मुख्य कारण बना।

जेलों में बल प्रयोग को लेकर उठता महत्वपूर्ण सवाल

इस मामले ने जेलों में अनुशासन और कैदियों के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने रखा है। जेल प्रशासन के लिए कैदियों के बीच हिंसा रोकना आवश्यक है, लेकिन कार्रवाई का तरीका भी परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।

यदि दो या अधिक कैदी आपस में लड़ रहे हैं, तो उन्हें अलग करना और तत्काल हिंसा रोकना सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। लेकिन स्थिति खत्म होने के बाद वही कार्रवाई दंडात्मक मारपीट में बदल जाए, तो उसका अलग कानूनी और प्रशासनिक मूल्यांकन किया जाना जरूरी है।

दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी सिद्धांत को रेखांकित करती है कि जेल प्रशासन को अनुशासन बनाए रखने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ अनावश्यक शारीरिक हिंसा से भी बचना चाहिए।

अगली सुनवाई 15 दिसंबर को

हाई कोर्ट ने मामले में संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए हैं। अपीलकर्ता की चिकित्सा स्थिति को लेकर भी अदालत ने आवश्यक कदम उठाने को कहा है।

मामले की अगली सुनवाई 15 दिसंबर को होगी। उस समय अदालत के सामने मामले की आगे की स्थिति, अपीलकर्ता के उपचार तथा अन्य संबंधित पहलुओं पर जानकारी रखी जा सकती है।

फिलहाल इस सुनवाई में अदालत की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी यही रही कि जेल में किसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई और स्थिति नियंत्रित होने के बाद की जाने वाली अनावश्यक मारपीट को एक समान नहीं माना जा सकता।

अदालत ने साफ संकेत दिया कि जेल प्रशासन को अपने कर्मचारियों के आचरण पर भी नजर रखनी होगी। कैदियों की सुरक्षा और जेल की व्यवस्था बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि अनुशासन लागू करने के नाम पर अनावश्यक हिंसा न हो।

इस मामले में वार्डन की बिना शर्त माफी के बाद अदालत ने फिलहाल चेतावनी देकर आगे की सुनवाई जारी रखी है। लेकिन अदालत की सख्त टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा सामने आने पर संबंधित जेल कर्मचारी की कार्रवाई को गंभीरता से देखा जा सकता है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।