सोहराबुद्दीन शेख कथित फेक एनकाउंटर मामला: 22 आरोपियों के बरी होने पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, 92 गवाहों के मुकरने पर उठे गंभीर सवाल
करीब दो दशक पुराने सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और साथी तुलसीराम प्रजापति से जुड़े कथित फेक एनकाउंटर मामले में अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई शुरू होती दिखाई दे रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के 7 मई 2026 के फैसले को चुनौती दी गई है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में 22 आरोपियों को बरी किए जाने के 2018 के विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए 210 गवाहों में से 92 गवाह अपने पहले के कथित बयानों से मुकर गए थे। अब सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह यह देखना चाहता है कि इन परिस्थितियों में निचली अदालत की कार्यवाही और उसके बाद बरी किए जाने के फैसले की न्यायिक समीक्षा किस सीमा तक की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं। पीठ ने सोहराबुद्दीन शेख के भाई नयाबुद्दीन शेख की याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।
याचिका में 7 मई 2026 को दिए गए बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। हाई कोर्ट ने सोहराबुद्दीन के भाइयों रुबाबुद्दीन शेख और नयाबुद्दीन शेख की अपीलों को खारिज करते हुए दिसंबर 2018 में विशेष सीबीआई अदालत द्वारा 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया है और न ही हाई कोर्ट के फैसले को रद्द किया है। फिलहाल अदालत ने याचिका पर आगे सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया है। यानी मामला अभी न्यायिक परीक्षण के अगले चरण में है।
92 गवाहों के मुकरने का मुद्दा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 92 अभियोजन गवाहों के मुकरने से जुड़ा रहा।
बॉम्बे हाई कोर्ट के 7 मई 2026 के फैसले में दर्ज है कि मुकदमे के दौरान अभियोजन ने कुल 210 गवाहों की गवाही कराई थी। इनमें से 92 गवाह ऐसे थे जिन्होंने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया। हाई कोर्ट ने इस तथ्य को मामले के साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय महत्वपूर्ण माना था।
अब सुप्रीम कोर्ट यह देखना चाहता है कि जिन परिस्थितियों में इतने बड़ी संख्या में गवाह अभियोजन के समर्थन में नहीं रहे, उनमें ट्रायल की निष्पक्षता और न्यायपूर्ण प्रक्रिया के संबंध में क्या सवाल उठते हैं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने 92 गवाहों के मुकरने को चिंता का विषय बताया और इस पहलू पर विचार की आवश्यकता जताई। अदालत ने इस मामले में पूरे रिकॉर्ड को तत्काल तलब करने के बजाय याचिकाकर्ता से कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के बयान उपलब्ध कराने की बात कही।
मुख्य न्यायाधीश की ओर से यह भी कहा गया कि अदालत कुछ गवाहों के बयान देखना चाहेगी। याचिकाकर्ता को ऐसे तीन-चार महत्वपूर्ण बयान देने को कहा गया, जिनके आधार पर बरी किए जाने के फैसले की जांच में सहायता मिल सके।
2018 में विशेष अदालत ने किया था बरी
इस मामले की सुनवाई मुंबई की विशेष अदालत में हुई थी। 21 दिसंबर 2018 को विशेष अदालत ने 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। बाद में इस फैसले को सोहराबुद्दीन के भाइयों ने बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7 मई 2026 को इन अपीलों को खारिज कर दिया और विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट की पीठ में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्रीयुत चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अंखड़ शामिल थे।
हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार, अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की संलिप्तता को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। अदालत ने अपहरण, कथित अवैध हिरासत और कथित फर्जी मुठभेड़ की अभियोजन कहानी से जुड़े साक्ष्यों का भी विश्लेषण किया था।
क्या है सोहराबुद्दीन शेख मामला?
सोहराबुद्दीन शेख का मामला वर्ष 2005 में सामने आया था। अभियोजन के अनुसार, सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली की ओर बस से यात्रा कर रहे थे।
आरोप लगाया गया कि नवंबर 2005 में गुजरात और राजस्थान पुलिस से जुड़े अधिकारियों ने उन्हें रास्ते में हिरासत में लिया। अभियोजन की कहानी के मुताबिक तीनों को अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया।
इसके बाद 26 नवंबर 2005 को सोहराबुद्दीन शेख की गुजरात के अहमदाबाद के पास पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई। अभियोजन ने इसे कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ बताया था।
इसके कुछ दिनों बाद उनकी पत्नी कौसर बी की भी हत्या किए जाने का आरोप लगाया गया।
हालांकि, मुकदमे में अभियोजन को इन आरोपों को अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि के आवश्यक स्तर तक साबित करना था। विशेष अदालत ने 2018 में आरोपियों को बरी कर दिया था और बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा।
तुलसीराम प्रजापति की मौत भी मामले का अहम हिस्सा
इस पूरे प्रकरण में तुलसीराम प्रजापति की मौत भी महत्वपूर्ण कड़ी रही।
प्रजापति उस समय उदयपुर सेंट्रल जेल में बंद था। अभियोजन की कहानी में उसे सोहराबुद्दीन की कथित मुठभेड़ का महत्वपूर्ण गवाह माना गया था। दिसंबर 2006 में गुजरात-राजस्थान सीमा के पास एक पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई।
बाद की जांच में सोहराबुद्दीन और कौसर बी की मौत के साथ प्रजापति की मौत को भी उसी व्यापक मामले के हिस्से के रूप में देखा गया।
यही वजह रही कि जांच और मुकदमे में तीनों घटनाओं—सोहराबुद्दीन की मौत, कौसर बी की मौत और तुलसीराम प्रजापति की मौत—से जुड़े घटनाक्रम और कथित आपराधिक साजिश की जांच की गई।
जांच गुजरात पुलिस से सीबीआई तक कैसे पहुंची?
मामले की जांच को लेकर भी शुरुआत से विवाद रहा। बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार, सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ के संबंध में 26 नवंबर 2005 को गुजरात में एफआईआर दर्ज हुई थी।
बाद में गुजरात पुलिस की सीआईडी ने प्रारंभिक जांच की। सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने जांच से असंतुष्ट होकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2010 में सीबीआई को आगे की जांच करने का निर्देश दिया। सीबीआई ने इसके बाद मामले में आगे जांच की और आरोपपत्र दाखिल किए।
मामले की सुनवाई गुजरात से मुंबई स्थानांतरित करने का आदेश भी सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2012 में दिया था। इसके बाद संबंधित मामलों को मुंबई में एक साथ सुनवाई के लिए जोड़ा गया।
22 आरोपियों में कौन शामिल थे?
2018 में जिन 22 आरोपियों को बरी किया गया था, उनमें 21 पुलिस अधिकारी शामिल थे। ये अधिकारी गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश से जुड़े थे। एक अन्य आरोपी गुजरात स्थित एक फार्महाउस से संबंधित व्यक्ति था। अभियोजन के अनुसार, फार्महाउस का इस्तेमाल सोहराबुद्दीन और कौसर बी को कथित रूप से हिरासत में रखने के लिए किया गया था।
मुकदमे के दौरान कई अन्य आरोपियों को अलग-अलग चरणों में आरोपों से मुक्त किया जा चुका था। बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले में दर्ज है कि 13 आरोपियों को अलग-अलग आदेशों के जरिए डिस्चार्ज किया गया था और तीन अन्य के खिलाफ आरोप समाप्त किए गए थे।
हाई कोर्ट ने बरी करने के फैसले को क्यों बरकरार रखा?
बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या विशेष अदालत का 2018 का बरी करने का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सही था।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष कथित अपहरण, अवैध हिरासत और फर्जी मुठभेड़ की पूरी कड़ी को पर्याप्त साक्ष्यों से स्थापित नहीं कर सका।
अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन के महत्वपूर्ण गवाहों के समर्थन में नहीं रहने से मामले की परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित कहानी कमजोर हुई। हथियार, गोलियों, कथित घटनास्थल और आरोपियों की मौजूदगी से जुड़े साक्ष्यों पर भी हाई कोर्ट ने विस्तार से विचार किया।
आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। अभियोजन को आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक के अनुरूप साबित करना होता है। हाई कोर्ट ने बरी किए जाने के खिलाफ अपील में लागू उस सिद्धांत पर भी जोर दिया कि बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप सामान्य तरीके से नहीं किया जाना चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सवाल है?
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा कार्यवाही का अर्थ यह नहीं है कि 22 आरोपी दोषी पाए गए हैं या उनका बरी होना रद्द हो गया है। अदालत फिलहाल याचिका पर विचार कर रही है और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है।
इस स्तर पर कुछ प्रमुख प्रश्न सामने आते हैं—
- क्या 92 अभियोजन गवाहों के मुकरने की परिस्थितियों की पर्याप्त न्यायिक जांच हुई?
- क्या कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के मूल या संबंधित बयान बरी किए जाने के फैसले को समझने में मदद कर सकते हैं?
- क्या ट्रायल की प्रक्रिया निष्पक्ष और न्यायपूर्ण थी?
- क्या बॉम्बे हाई कोर्ट ने विशेष अदालत के फैसले की समीक्षा करते समय सभी महत्वपूर्ण परिस्थितियों पर उचित विचार किया?
- क्या बरी किए गए आरोपियों के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य आपराधिक कानून के निर्धारित मानक को पूरा करते हैं?
इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने पुराना फैसला रद्द कर दिया है?
नहीं। अभी ऐसा नहीं हुआ है।
28 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया है और मामले को आगे सुनवाई के लिए स्वीकार किया है। इसका मतलब यह है कि अदालत याचिकाकर्ता की चुनौती और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे विचार करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि वह चुनिंदा गवाहों के बयान देखना चाहता है। इसलिए अगली कार्यवाही में उन गवाहों की गवाही विशेष महत्व रख सकती है जिनकी भूमिका अभियोजन के मामले में महत्वपूर्ण रही थी।
लगभग दो दशक बाद फिर अदालत में मामला
सोहराबुद्दीन शेख मामला वर्ष 2005 से न्यायिक प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर बना हुआ है। गुजरात में प्रारंभिक जांच, सीबीआई जांच, मामले का मुंबई स्थानांतरण, विशेष अदालत में लंबी सुनवाई, 2018 में आरोपियों का बरी होना, 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उस फैसले की पुष्टि और अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती—यह पूरा घटनाक्रम लगभग दो दशक लंबी कानूनी प्रक्रिया को दर्शाता है।
अब सुप्रीम कोर्ट की निगाह मुख्य रूप से इस बात पर है कि क्या बरी किए जाने के फैसले की समीक्षा के लिए पर्याप्त आधार बनता है और क्या गवाहों के बयानों सहित रिकॉर्ड के कुछ हिस्से इस सवाल के समाधान में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
मामले में आगे की सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सुप्रीम कोर्ट बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करता है या उसे बरकरार रखता है। फिलहाल 22 आरोपियों का बरी होना प्रभावी है और उनके खिलाफ दोषसिद्धि का कोई अंतिम आदेश नहीं हुआ है।
नोट: इस लेख में “कथित फेक एनकाउंटर” शब्द का प्रयोग उस आरोप/अभियोजन की पृष्ठभूमि के संदर्भ में किया गया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7 मई 2026 को 22 आरोपियों के बरी किए जाने को बरकरार रखा था, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
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यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।