दिल्ली हाईकोर्ट ने 2013 की रेप सजा की रद्द, पीड़िता के बयान और वैज्ञानिक सबूतों में अहम विरोधाभास को माना निर्णायक
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक अपील पर फैसला सुनाते हुए वर्ष 2013 में सुनाई गई एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और सात वर्ष की कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया। मामला बलात्कार, अपहरण, गलत तरीके से बंधक बनाए जाने और आपराधिक धमकी के आरोपों से जुड़ा था। अदालत ने साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले में कई महत्वपूर्ण विसंगतियां थीं और पीड़िता के बयान के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से मेडिकल, फोरेंसिक तथा अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों से मेल नहीं खाते थे।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने की। अदालत के समक्ष दोषसिद्ध व्यक्ति की ओर से वर्ष 2013 में ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय और सजा को चुनौती देते हुए अपील दाखिल की गई थी।
बाजार से जबरन ले जाने और चार दिनों तक बंधक बनाने का आरोप
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी ने पीड़िता को दिल्ली के एक बाजार से कथित तौर पर जबरदस्ती अपने साथ ले लिया था। इसके बाद उसे उत्तर प्रदेश ले जाया गया, जहां उसे लगभग चार दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया और उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया।
आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 368, 366, 376 और 506 के तहत आरोप लगाए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया और सात वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हालांकि, दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील में हाईकोर्ट ने पूरे मामले के साक्ष्यों को अलग-अलग पहलुओं से देखा। अदालत ने विशेष रूप से पीड़िता के बयानों, मेडिकल रिकॉर्ड, फोरेंसिक रिपोर्ट और अभियोजन पक्ष के अन्य गवाहों के बयानों के बीच सामंजस्य की जांच की।
अभियोजन का मामला मुख्य रूप से पीड़िता के बयान पर निर्भर
हाईकोर्ट ने माना कि कथित यौन अपराध के संबंध में अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से पीड़िता के बयान पर आधारित था। कानून में यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी बलात्कार के मामले में केवल पीड़िता की विश्वसनीय और भरोसेमंद गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है। हर मामले में पीड़िता के बयान की स्वतंत्र पुष्टि अनिवार्य नहीं होती।
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता की न्यायिक जांच ही न की जाए।
अदालत के अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत को सही तरीके से लागू नहीं किया। केवल यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि पीड़िता का बयान होने के कारण उसके प्रत्येक हिस्से को बिना जांचे स्वीकार कर लिया जाए। यदि बयान में महत्वपूर्ण विरोधाभास हों और उसके महत्वपूर्ण हिस्से मेडिकल या वैज्ञानिक साक्ष्यों से सीधे टकराते हों, तो अदालत को उन परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
यही पहलू इस मामले में हाईकोर्ट के विचार का महत्वपूर्ण आधार बना।
अपहरण की घटना को लेकर भी सामने आया विरोधाभास
हाईकोर्ट ने कथित अपहरण की घटना के संबंध में पीड़िता के बयान और अभियोजन पक्ष के अन्य साक्ष्य में भी महत्वपूर्ण अंतर पाया।
पीड़िता ने घटना के संबंध में कहा था कि जिस स्थान से उसे कथित रूप से आरोपी अपने साथ ले गया, वहां कोई भीड़ नहीं थी। दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष के एक अन्य गवाह ने बाजार में भीड़ होने की बात कही।
अदालत ने इस विरोधाभास को मामले के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना। इसका कारण यह था कि कथित घटना सार्वजनिक बाजार में होने की बात कही गई थी और बाजार में मौजूद लोगों की स्थिति तथा घटना की परिस्थितियां अभियोजन के घटनाक्रम को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती थीं।
अदालत ने केवल मामूली या सामान्य विरोधाभासों पर निर्भर करते हुए फैसला नहीं किया, बल्कि उन विसंगतियों को देखा जो अभियोजन के घटनाक्रम के महत्वपूर्ण हिस्सों से संबंधित थीं।
पीड़िता का सबसे शुरुआती बयान भी अदालत के सामने महत्वपूर्ण रहा
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू पीड़िता द्वारा दिया गया शुरुआती बयान था।
अदालत ने उस बयान पर विशेष ध्यान दिया जो पीड़िता ने पुलिस सुरक्षा में रहते हुए और आरोपी की अनुपस्थिति में एक स्वतंत्र मेडिकल अधिकारी के समक्ष दिया था।
इस बयान में पीड़िता ने कथित तौर पर कहा था कि वह अपने माता-पिता के दबाव के कारण घर से निकली थी। उसने उस समय यह भी कहा था कि उसके साथ किसी प्रकार का शारीरिक या यौन उत्पीड़न नहीं हुआ और वह स्वयं वापस आई थी।
हाईकोर्ट ने इस शुरुआती बयान को इसलिए महत्वपूर्ण माना क्योंकि यह उस समय दर्ज किया गया था जब आरोपी उसके साथ मौजूद नहीं था। इसलिए अदालत को यह देखना था कि बाद में सामने आए आरोपों और उसके शुरुआती बयान के बीच क्या संबंध है तथा क्या इस अंतर को अभियोजन पक्ष ने पर्याप्त रूप से समझाया है।
आपराधिक मुकदमों में किसी गवाह के शुरुआती बयान और बाद में अदालत में दिए गए बयान के बीच गंभीर अंतर होने पर अदालत को यह जांचना होता है कि ऐसा अंतर सामान्य स्मृति संबंधी कारणों से है या फिर वह मामले की मूल कहानी को प्रभावित करता है।
कपड़ों पर खून होने का दावा और फोरेंसिक रिपोर्ट में अंतर
मामले में फोरेंसिक साक्ष्य भी हाईकोर्ट के सामने महत्वपूर्ण रहे।
पीड़िता ने कथित यौन उत्पीड़न की घटना के संबंध में कहा था कि उस दौरान उसके कपड़ों पर खून लगा था। लेकिन फोरेंसिक जांच की रिपोर्ट में उसके कपड़ों पर खून पाए जाने की पुष्टि नहीं हुई।
अदालत ने इस अंतर को महज ऐसी परिस्थिति नहीं माना जिसमें किसी अतिरिक्त पुष्टि का अभाव हो। अदालत ने इसे पीड़िता के बयान के एक महत्वपूर्ण हिस्से और वैज्ञानिक साक्ष्य के बीच सीधा विरोधाभास माना।
यही कारण था कि हाईकोर्ट ने कहा कि मामला केवल इस बात का नहीं था कि अभियोजन के पास पीड़िता के बयान की पुष्टि करने वाला अतिरिक्त सबूत नहीं था। बल्कि यहां वैज्ञानिक साक्ष्य कथित घटना के एक महत्वपूर्ण पहलू पर बयान से विपरीत स्थिति दिखा रहे थे।
वैज्ञानिक साक्ष्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
आपराधिक मामलों में प्रत्यक्षदर्शी या पीड़ित के बयान को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है, लेकिन जब उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य किसी महत्वपूर्ण तथ्य के संबंध में उस बयान के विपरीत हों, तो अदालत को दोनों को साथ रखकर देखना होता है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी दृष्टिकोण को अपनाया। अदालत ने साक्ष्यों को अलग-अलग देखने के बजाय उनके बीच आपसी संबंध की जांच की।
पीड़िता का बयान, उसका शुरुआती मेडिकल बयान, मेडिकल रिकॉर्ड, फोरेंसिक रिपोर्ट और अन्य गवाहों के बयान—इन सभी को एक साथ देखने पर अभियोजन के घटनाक्रम को लेकर संदेह पैदा होने की स्थिति सामने आई।
अदालत ने यह भी देखा कि अभियोजन पक्ष जिन तथ्यों को आरोपी के खिलाफ महत्वपूर्ण आधार के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, उनमें से कुछ तथ्य उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य से समर्थित नहीं थे।
केवल पुष्टि न होना और प्रत्यक्ष विरोधाभास अलग बातें
हाईकोर्ट की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अदालत ने दो स्थितियों के बीच अंतर स्पष्ट किया।
पहली स्थिति वह होती है जब पीड़िता का बयान विश्वसनीय हो, लेकिन उसके समर्थन में कोई स्वतंत्र या वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध न हो। ऐसी स्थिति में केवल पुष्टि के अभाव को आधार बनाकर पीड़िता की गवाही को अस्वीकार करना उचित नहीं होगा।
दूसरी स्थिति वह है जिसमें पीड़िता के बयान का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य से सीधे विपरीत हो। ऐसे मामले में अदालत को उस विरोधाभास का मूल्यांकन करना आवश्यक है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने दूसरी स्थिति पाई। अदालत ने इसे केवल corroboration यानी पुष्टि के अभाव का मामला नहीं माना।
अदालत ने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि यहां वैज्ञानिक साक्ष्य द्वारा बयान के एक महत्वपूर्ण हिस्से का प्रत्यक्ष खंडन किया जा रहा था।
ट्रायल कोर्ट के मूल्यांकन में स्पष्ट गलती
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद माना कि ट्रायल कोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों को समझने और उनका मूल्यांकन करने में स्पष्ट गलती की।
अदालत के अनुसार, पीड़िता की गवाही को महत्व देना कानूनी रूप से सही हो सकता है, लेकिन उस गवाही के भीतर मौजूद महत्वपूर्ण विरोधाभासों तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ उसके संबंध की अनदेखी नहीं की जा सकती।
ट्रायल कोर्ट को यह देखना चाहिए था कि क्या अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत पूरी कहानी साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के बाद भरोसेमंद रूप से स्थापित होती है।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस प्रक्रिया में आवश्यक सावधानी नहीं बरती गई थी।
आपराधिक मामलों में संदेह का लाभ आरोपी को
आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ आरोपों को निर्धारित कानूनी मानक के अनुसार साबित करना होता है। आरोपी को अपनी निर्दोषता साबित करने की जिम्मेदारी सामान्यतः उसी तरीके से नहीं उठानी होती जिस तरह अभियोजन को अपराध सिद्ध करना होता है।
यदि अभियोजन के महत्वपूर्ण साक्ष्यों में ऐसी गंभीर विसंगतियां सामने आती हैं जो मामले की मूल कहानी को प्रभावित करती हैं और उन विसंगतियों को विश्वसनीय तरीके से दूर नहीं किया जाता, तो अदालत को दोषसिद्धि कायम रखने में सावधानी बरतनी होती है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान को महज इसलिए खारिज नहीं किया कि उसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं थी। बल्कि अदालत ने बयान की विश्वसनीयता का मूल्यांकन उसके शुरुआती बयान और वैज्ञानिक साक्ष्यों सहित पूरे रिकॉर्ड के संदर्भ में किया।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा रद्द की
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा वर्ष 2013 में दर्ज की गई दोषसिद्धि को कायम नहीं रखा।
अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में मौजूद महत्वपूर्ण विरोधाभास और पीड़िता के बयान तथा वैज्ञानिक साक्ष्यों के बीच असंगति ऐसी थी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसके परिणामस्वरूप आरोपी की दोषसिद्धि और सात वर्ष की कठोर कारावास की सजा रद्द कर दी गई।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़िता की गवाही का विशेष महत्व होने के बावजूद अदालत को पूरे साक्ष्य रिकॉर्ड का निष्पक्ष और समग्र मूल्यांकन करना होता है। किसी एक बयान को बाकी साक्ष्यों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, खासकर तब जब मेडिकल या फोरेंसिक साक्ष्य उसी घटना के किसी महत्वपूर्ण पहलू पर अलग तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हों।
फैसले से निकलने वाली प्रमुख कानूनी बातें
इस मामले में हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से कुछ महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु सामने आते हैं—
पहला, बलात्कार के मामले में विश्वसनीय पीड़िता की गवाही अकेले दोषसिद्धि का आधार बन सकती है; कानून हर मामले में स्वतंत्र पुष्टि को अनिवार्य नहीं बनाता।
दूसरा, इसका अर्थ यह नहीं है कि पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता की न्यायिक जांच नहीं की जाएगी।
तीसरा, यदि बयान के महत्वपूर्ण हिस्से का मेडिकल या फोरेंसिक साक्ष्य से गंभीर विरोधाभास हो, तो अदालत को उस विरोधाभास का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना होगा।
चौथा, घटना के शुरुआती बयान और बाद में अदालत में दिए गए बयान के बीच महत्वपूर्ण अंतर होने पर अदालत को उसके कारण और प्रभाव का मूल्यांकन करना चाहिए।
पांचवां, अभियोजन पक्ष के अलग-अलग गवाहों के बयानों में यदि घटना की मूल परिस्थितियों को लेकर महत्वपूर्ण अंतर हो, तो उसका असर अभियोजन की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।
छठा, ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के गलत मूल्यांकन की स्थिति में अपीलीय अदालत दोषसिद्धि की दोबारा जांच कर सकती है।
इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने अंततः यही पाया कि उपलब्ध साक्ष्यों को समग्र रूप से देखने पर अभियोजन की कहानी को उस स्तर की विश्वसनीयता नहीं मिलती जो दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए आवश्यक थी। इसलिए वर्ष 2013 की दोषसिद्धि और सात वर्ष की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को राहत प्रदान की गई।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
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यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।