15 साल पुराने अवैध गर्भपात मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तीन डॉक्टर MTP एक्ट और IPC की धारा 315 के तहत दोषी
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा जिले के दीपका स्थित लाइफकेयर अस्पताल से जुड़े करीब 15 साल पुराने गर्भपात मामले में निचली अदालत के फैसले में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अदालत ने तीन चिकित्सकों को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971 के तहत दोषी ठहराया है। इसके साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 315 से संबंधित आरोप में भी निचली अदालत के बरी करने के आदेश को पलट दिया गया है। हालांकि, PC-PNDT Act के तहत आरोपों में निचली अदालत से मिली राहत को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है।
यह मामला वर्ष 2011 में दीपका के लाइफकेयर अस्पताल में हुई प्रशासनिक जांच के दौरान सामने आया था। जांच टीम को अस्पताल परिसर में अलग-अलग बोतलों में संरक्षित कई भ्रूण मिले थे। उनकी गर्भावस्था की अवधि लगभग 16 से 32 सप्ताह बताई गई। इसके अलावा गर्भपात से जुड़े उपकरण और एक्सपायर्ड दवाएं भी बरामद होने की बात रिकॉर्ड में सामने आई। करीब डेढ़ दशक तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील पर निचली अदालत के फैसले की दोबारा समीक्षा करते हुए तीनों चिकित्सकों को दोषी माना है।
हाईकोर्ट का फैसला 24 सितंबर 2026 को आया। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने राज्य सरकार की अपील पर फैसला सुनाया। दोषी ठहराए गए चिकित्सकों में डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डॉ. मिथिलेश प्रसाद और डॉ. रेणु श्रीवास्तव शामिल हैं। अदालत ने मामले को सजा के प्रश्न पर सुनवाई के लिए आगे सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
2011 में अस्पताल पर हुई थी कार्रवाई
पूरा मामला 5 से 7 अगस्त 2011 के दौरान लाइफकेयर अस्पताल में हुई प्रशासनिक जांच से जुड़ा है। उस समय स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की टीम ने अस्पताल का निरीक्षण किया था। रिकॉर्ड के अनुसार, निरीक्षण के दौरान अस्पताल में कई भ्रूण संरक्षित अवस्था में मिले।
रिपोर्टों के अनुसार, ये भ्रूण अलग-अलग बोतलों में रखे हुए थे और उनकी गर्भावस्था की अवधि लगभग 16 से 32 सप्ताह के बीच बताई गई थी। निरीक्षण के दौरान गर्भपात से जुड़े उपकरण और कुछ ऐसी दवाएं भी मिलीं जिनकी उपयोग अवधि समाप्त हो चुकी थी।
जांच टीम द्वारा तैयार रिपोर्ट के आधार पर आगे कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। बाद में अस्पताल से जुड़े चिकित्सकों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और मुकदमा अदालत तक पहुंचा।
किन धाराओं में शुरू हुआ था मुकदमा?
मामले की शुरुआत में आरोपों में MTP Act की धारा 5, PC-PNDT Act की धारा 22(3) और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता की धारा 315 शामिल थी।
MTP कानून गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की परिस्थितियों और उससे संबंधित चिकित्सकीय प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। कानून के तहत निर्धारित परिस्थितियों और शर्तों के बाहर गर्भावस्था समाप्त करना कानूनी संरक्षण के दायरे में नहीं आता।
वहीं IPC की धारा 315 ऐसे कृत्य से संबंधित थी जिसका उद्देश्य बच्चे को जीवित पैदा होने से रोकना या उसके जन्म के बाद उसकी मृत्यु का कारण बनना हो, हालांकि कानून में मां का जीवन बचाने के लिए सद्भावना से किए गए कृत्य के संबंध में अपवाद भी था।
मामले में PC-PNDT कानून भी लागू किया गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस हिस्से पर एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक सवाल उठाया।
निचली अदालत ने तीनों डॉक्टरों को कर दिया था बरी
मामले की सुनवाई कटघोरा के अपर सत्र न्यायालय में हुई। लंबी सुनवाई और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद निचली अदालत ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया था।
निचली अदालत के इस फैसले से राज्य सरकार संतुष्ट नहीं थी। राज्य ने बरी किए जाने के आदेश को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अपील पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निचली अदालत के रिकॉर्ड, निरीक्षण टीम के बयान, बरामद सामग्री और लागू कानूनों का परीक्षण किया।
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते समय ऐसी स्थिति अपनाई थी जिसमें उपलब्ध सामग्री का सही कानूनी मूल्यांकन नहीं हुआ। इसी आधार पर अदालत ने राज्य की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
भ्रूण मिलने का तथ्य बना महत्वपूर्ण आधार
हाईकोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों में अस्पताल परिसर से मिले संरक्षित भ्रूण शामिल थे।
अदालत ने निरीक्षण टीम के चिकित्सकों द्वारा दिए गए साक्ष्यों का परीक्षण किया। रिकॉर्ड में भ्रूणों की संख्या और उनकी गर्भावस्था की अवधि से संबंधित जानकारी सामने आई।
कोर्ट ने यह भी देखा कि अस्पताल से गर्भपात से संबंधित उपकरण बरामद हुए थे। इन परिस्थितियों को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था कि छापे के समय किसी महिला का गर्भपात होते हुए प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा गया था।
हाईकोर्ट के अनुसार, इस तरह की प्रत्यक्ष घटना का मौके पर दिखाई देना ही पूरे मामले को साबित करने का एकमात्र तरीका नहीं है। उपलब्ध परिस्थितिजन्य और दस्तावेजी साक्ष्यों का भी समग्र रूप से मूल्यांकन करना आवश्यक है।
डॉक्टर वैध चिकित्सीय प्रक्रिया का पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दे सके
फैसले में एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि आरोपियों की ओर से अस्पताल में मिले भ्रूणों के संबंध में ऐसा संतोषजनक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित गर्भसमापन कानून में निर्धारित परिस्थितियों के अनुसार किया गया था।
हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी यह स्थापित नहीं कर सके कि अस्पताल में मिले भ्रूण किसी वैध चिकित्सीय प्रक्रिया के परिणाम थे या किसी महिला की जान बचाने के लिए कानून में उपलब्ध आपातकालीन अपवाद के तहत गर्भपात किया गया था।
यही पहलू MTP Act के तहत दोषसिद्धि का महत्वपूर्ण आधार बना।
MTP Act के तहत क्यों हुई दोषसिद्धि?
MTP Act का उद्देश्य उन परिस्थितियों को निर्धारित करना है जिनमें गर्भावस्था को कानूनी रूप से समाप्त किया जा सकता है। कानून में चिकित्सकीय आवश्यकता, गर्भावस्था की अवधि और अन्य निर्धारित शर्तों को महत्व दिया गया है।
ऐसे मामलों में डॉक्टरों को यह सुनिश्चित करना होता है कि गर्भसमापन कानून में निर्धारित परिस्थितियों के अनुरूप हो।
हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में आरोपियों की ओर से ऐसा पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे अस्पताल में मिले 16 से 32 सप्ताह के भ्रूणों को वैध चिकित्सीय गर्भसमापन से जोड़कर समझाया जा सके।
इसी कारण निचली अदालत द्वारा MTP Act से जुड़े आरोप में दी गई बरी की राहत को हाईकोर्ट ने उचित नहीं माना और उस हिस्से में दोषसिद्धि दर्ज की।
IPC की धारा 315 पर भी निचली अदालत का फैसला बदला
हाईकोर्ट ने केवल MTP Act तक मामला सीमित नहीं रखा। अदालत ने तत्कालीन IPC की धारा 315 से संबंधित आरोपों पर भी विचार किया।
इस प्रावधान में ऐसे कृत्य को दंडनीय बनाया गया था जिसका उद्देश्य बच्चे को जीवित पैदा होने से रोकना या उसके जन्म के बाद उसकी मृत्यु का कारण बनना हो, हालांकि मां की जान बचाने के लिए सद्भावना से किया गया कृत्य इसके अपवाद के रूप में कानून में मौजूद था।
कोर्ट के सामने यह सवाल भी था कि क्या आरोपी यह दिखा सके कि संबंधित कार्रवाई मां की जान बचाने के लिए सद्भावना से की गई थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी इस संबंध में आवश्यक स्पष्टीकरण और आधार प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके बाद धारा 315 IPC से संबंधित निचली अदालत के बरी करने के निष्कर्ष में भी हस्तक्षेप किया गया।
PC-PNDT Act में राहत बरकरार
फैसले का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने तीनों डॉक्टरों को हर आरोप में दोषी नहीं ठहराया।
PC-PNDT Act के तहत आरोपों में निचली अदालत की ओर से दी गई राहत को हाईकोर्ट ने बरकरार रखा, लेकिन इसका कारण साक्ष्यों की कमी मात्र नहीं बल्कि मुकदमा शुरू करने की कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा था।
PC-PNDT Act की धारा 28 के तहत इस कानून के अपराधों का संज्ञान लेने और शिकायत दाखिल करने की विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। हाईकोर्ट ने पाया कि इस हिस्से की कार्यवाही पुलिस FIR और पुलिस चार्जशीट के माध्यम से आगे बढ़ी थी, जबकि कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया अलग है।
इसलिए PC-PNDT Act के आरोपों में अभियोजन की प्रक्रिया को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना गया।
हाईकोर्ट ने कानून की प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण माना
यह फैसला केवल अवैध गर्भपात के आरोपों तक सीमित नहीं है। इसमें आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया और विशेष कानूनों के तहत अभियोजन की वैधता पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी विशेष अधिनियम के तहत अपराध दर्ज करते समय केवल आरोप गंभीर होना पर्याप्त नहीं है। उस अधिनियम में मुकदमा शुरू करने के लिए जो वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित की गई है, उसका पालन भी आवश्यक है।
इसी वजह से एक तरफ अदालत ने MTP Act और IPC की धारा 315 के संबंध में निचली अदालत के फैसले को बदला, वहीं दूसरी तरफ PC-PNDT Act के तहत अभियोजन की प्रक्रिया में कानूनी कमी पाए जाने पर उस हिस्से में बरी किए जाने के परिणाम को बरकरार रखा।
निचली अदालत के फैसले में हाईकोर्ट ने क्यों किया हस्तक्षेप?
आपराधिक मामलों में बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अपील पर हाईकोर्ट सामान्य रूप से साक्ष्यों और निचली अदालत के निष्कर्षों का सावधानी से परीक्षण करता है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने कुछ महत्वपूर्ण परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। विशेष रूप से अस्पताल में मिले भ्रूण, उनकी गर्भावस्था की अवधि और गर्भपात से जुड़े उपकरणों को लेकर अदालत ने साक्ष्यों का अलग मूल्यांकन किया।
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत का MTP Act और IPC की धारा 315 से संबंधित निष्कर्ष उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप नहीं था और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।
15 साल बाद बदली आरोपियों की कानूनी स्थिति
इस फैसले के बाद करीब 15 साल पुराने मामले में तीनों चिकित्सकों की कानूनी स्थिति बदल गई है।
जहां वर्ष 2016 में कटघोरा की अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था, वहीं अब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उन्हें MTP Act और IPC की धारा 315 से जुड़े अपराधों में दोषी माना है।
हालांकि, दोषसिद्धि के बाद अगला चरण सजा के प्रश्न पर सुनवाई का है। हाईकोर्ट ने मामले को आरोपियों को सजा के मुद्दे पर सुनने के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
फैसले का मेडिकल व्यवस्था पर क्या असर?
इस फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि चिकित्सकीय संस्थानों में गर्भसमापन की प्रक्रिया केवल डॉक्टर की पेशेवर राय पर निर्भर नहीं करती, बल्कि संबंधित कानून की शर्तों का पालन भी आवश्यक है।
अस्पतालों और पंजीकृत चिकित्सकों के लिए गर्भसमापन से जुड़े रिकॉर्ड, चिकित्सकीय कारण, निर्धारित प्रक्रियाएं और संबंधित दस्तावेजों को व्यवस्थित रखना महत्वपूर्ण होता है।
कानून द्वारा निर्धारित परिस्थितियों से बाहर की गई प्रक्रिया बाद में आपराधिक मुकदमे का आधार बन सकती है।
हालांकि हर गर्भसमापन को अवैध मानना सही नहीं होगा। MTP Act स्वयं निर्धारित परिस्थितियों में गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन को कानूनी संरक्षण देता है। इसलिए इस फैसले को कानूनी गर्भसमापन के खिलाफ सामान्य सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि इस विशेष मामले में अदालत द्वारा साक्ष्यों और वैधानिक शर्तों के परीक्षण के रूप में समझना चाहिए।
फैसला केवल आरोपों की गंभीरता पर नहीं, साक्ष्यों पर आधारित
इस मामले की एक खास बात यह भी है कि हाईकोर्ट ने आरोपों की गंभीरता के बावजूद हर कानून के तहत अभियोजन को स्वीकार नहीं किया।
PC-PNDT Act के तहत पुलिस FIR और चार्जशीट की प्रक्रिया को अदालत ने कानून की धारा 28 के अनुरूप नहीं पाया और इसलिए उस हिस्से में आरोपियों की बरी की स्थिति बरकरार रही।
दूसरी ओर MTP Act और IPC की धारा 315 से संबंधित साक्ष्यों को अदालत ने पर्याप्त माना और निचली अदालत के निष्कर्ष में हस्तक्षेप किया।
इससे स्पष्ट होता है कि अदालत ने मामले के प्रत्येक आरोप और प्रत्येक कानून की वैधानिक आवश्यकताओं को अलग-अलग देखा।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अगला महत्वपूर्ण चरण दोषसिद्ध तीनों डॉक्टरों के संबंध में सजा पर सुनवाई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की गई है।
सजा की अवधि और अन्य कानूनी परिणाम अदालत द्वारा लागू प्रावधानों तथा मामले की परिस्थितियों को सुनने के बाद तय किए जाएंगे।
इस बीच, फैसले में PC-PNDT Act से संबंधित आरोपों में राहत बरकरार रहने का कारण भी महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि वह मामला अभियोजन शुरू करने की वैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा है।
निष्कर्ष
दीपका के लाइफकेयर अस्पताल से जुड़ा यह मामला करीब 15 साल बाद एक महत्वपूर्ण न्यायिक मोड़ पर पहुंचा है। वर्ष 2011 में अस्पताल से 16 से 32 सप्ताह की गर्भावस्था से संबंधित संरक्षित भ्रूण मिलने और गर्भपात से जुड़े उपकरणों की बरामदगी के बाद मामला अदालत तक पहुंचा था। वर्ष 2016 में निचली अदालत ने तीनों डॉक्टरों को बरी कर दिया था।
राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अब उस फैसले में आंशिक बदलाव किया है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद रविदास, डॉ. मिथिलेश प्रसाद और डॉ. रेणु श्रीवास्तव को MTP Act की धारा 5 और IPC की धारा 315 से जुड़े अपराधों में दोषी ठहराया गया है। दूसरी ओर PC-PNDT Act के तहत बरी किए जाने का परिणाम बरकरार रखा गया, क्योंकि उस कानून के तहत अभियोजन शुरू करने की प्रक्रिया को अदालत ने वैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं पाया।
अब मामले की अगली कड़ी सजा पर होने वाली सुनवाई होगी। करीब डेढ़ दशक पुराने इस प्रकरण में हाईकोर्ट का फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि चिकित्सा क्षेत्र में गर्भसमापन से जुड़े कानूनों का पालन केवल औपचारिकता नहीं है। चिकित्सकीय आवश्यकता, कानूनी सीमा, निर्धारित प्रक्रिया और उचित रिकॉर्ड—इन सभी का पालन करना आवश्यक है। साथ ही किसी विशेष कानून के तहत मुकदमा चलाते समय उसकी वैधानिक प्रक्रिया का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।