जब्त वाहन को पुलिस ने ही निकाला और तीन दिन बाद हुआ हादसा, महिला की मौत पर हाईकोर्ट ने जताई हैरानी; DGP को गोपनीय जांच के आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आबकारी मामले में जब्त किए गए एक वाहन को पुलिस द्वारा थाने से बाहर निकालकर इस्तेमाल किए जाने और कुछ दिन बाद उसके दुर्घटनाग्रस्त होने के मामले को गंभीरता से लिया है। हादसे में एक महिला की मौत होने के बाद कोर्ट ने प्रथम दृष्टया पूरे घटनाक्रम को केवल विभागीय या प्रक्रियात्मक चूक मानने से इनकार करते हुए पुलिस की भूमिका की स्वतंत्र और गोपनीय जांच कराने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए और इसकी रिपोर्ट आठ सप्ताह के भीतर अदालत में दाखिल की जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार की एकल पीठ ने राहुल उर्फ धर्मदेव की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामला बुलंदशहर जिले के रामघाट थाना क्षेत्र से जुड़ा है। मूल रूप से वाहन को आबकारी अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमे में जब्त किया गया था। बाद में उसी वाहन को पुलिसकर्मियों द्वारा थाने से बाहर निकाले जाने की बात सामने आई। कुछ ही दिन बाद वाहन मथुरा जिले के राया थाना क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस दुर्घटना में एक महिला की जान चली गई।
हाईकोर्ट ने अब यह पता लगाने के लिए विस्तृत जांच का आदेश दिया है कि जब वाहन पुलिस की हिरासत में था, तब उसे थाने से बाहर निकालने का अधिकार किसके पास था और उसे बाहर ले जाने की अनुमति किस परिस्थिति में दी गई।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता राहुल उर्फ धर्मदेव पर आरोप था कि वह 19 पेटी देशी शराब लेकर जा रहा था। इस मामले में उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
मामले की कार्रवाई के दौरान पुलिस ने संबंधित वाहन को जब्त कर लिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 72 के तहत वाहन की कुर्की की कार्रवाई शुरू की गई।
जिला मजिस्ट्रेट के स्तर से आगे की कार्रवाई करते हुए वाहन को कुर्क किया गया और उसका बाजार मूल्य करीब 6.45 लाख रुपये आंका गया।
याचिकाकर्ता ने जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देते हुए अपीलीय अदालत का रुख किया, लेकिन वहां से भी उसे राहत नहीं मिली। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने वाहन की जब्ती और कुर्की के साथ-साथ उसके बाद घटे घटनाक्रम की जानकारी भी आई। यहीं से मामला एक अलग गंभीर सवाल से जुड़ गया।
चार जून को थाने से बाहर निकला था वाहन
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि जब्त वाहन को 4 जून 2021 को रामघाट थाने से बाहर निकाला गया था।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि उस समय थाने में तैनात तत्कालीन हेड मुहर्रिर सीताराम ने दो पुलिसकर्मियों—पंकज राणा और नरेंद्र सिंह—को वांछित आरोपी की तलाश के लिए वाहन उपलब्ध कराया था।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि वाहन को बाहर निकालने की कार्रवाई तत्कालीन थाना प्रभारी वीरेंद्र सिंह की जानकारी के बिना की गई थी।
यही तथ्य हाईकोर्ट के सामने मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। क्योंकि वाहन कोई सामान्य सरकारी वाहन नहीं था, बल्कि वह आबकारी मामले में पहले से जब्त किया जा चुका था और पुलिस की अभिरक्षा में था।
ऐसे में सवाल यह उठा कि जब्त संपत्ति को थाने से बाहर निकालने का अधिकार किसके पास था और उसे किसी अन्य कार्य के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति किस आधार पर दी गई।
तीन दिन बाद मथुरा में हुआ हादसा
थाने से वाहन निकलने के तीन दिन बाद यानी 7 जून 2021 को वाहन मथुरा जिले के राया थाना क्षेत्र में दुर्घटना का शिकार हो गया।
हादसे में मनोज कुमार के माता-पिता गंभीर रूप से घायल हुए। दुर्घटना के बाद घायलों को उपचार के लिए ले जाया गया, लेकिन बाद में मनोज कुमार की मां की मौत हो गई।
घटना के संबंध में अलग से प्राथमिकी दर्ज की गई और दुर्घटनाग्रस्त वाहन को फिर से जब्त कर लिया गया।
इस प्रकार एक आबकारी मामले में जब्त किए गए वाहन का मामला बाद में एक सड़क दुर्घटना और उसमें हुई मौत से भी जुड़ गया।
अदालत के सामने जब वाहन को थाने से बाहर निकालने और उसके बाद हुई दुर्घटना की पूरी कड़ी आई तो कोर्ट ने पुलिस की भूमिका की जांच को आवश्यक माना।
कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को पर्याप्त क्यों नहीं माना?
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि घटना के बाद संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई थी।
हेड मुहर्रिर सीताराम तथा दोनों सिपाहियों के खिलाफ विभागीय स्तर पर कार्रवाई की गई और उनके सेवा अभिलेख में निंदा प्रविष्टि किए जाने की जानकारी अदालत को दी गई।
लेकिन हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इस कार्रवाई को पर्याप्त नहीं माना।
कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि यदि कोई वाहन किसी आपराधिक या आबकारी मामले में जब्त होकर पुलिस की अभिरक्षा में है, तो उसे बिना वैध अधिकार के थाने से बाहर कैसे निकाला जा सकता है?
अदालत ने संकेत दिया कि ऐसी स्थिति को केवल रिकॉर्ड संबंधी गलती या साधारण प्रशासनिक चूक के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
यदि जांच में यह साबित होता है कि जब्त वाहन को वैध अनुमति या अधिकार के बिना पुलिस हिरासत से बाहर निकाला गया था, तो यह सौंपी गई अभिरक्षा के गंभीर उल्लंघन का मामला हो सकता है।
हाईकोर्ट ने DGP को क्यों सौंपी जांच?
अदालत ने मामले की जांच स्थानीय स्तर पर उसी व्यवस्था के भीतर कराने के बजाय पुलिस महानिदेशक को स्वतंत्र और गोपनीय जांच कराने का निर्देश दिया।
इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि जब्त वाहन को थाने से बाहर निकालने की पूरी प्रक्रिया क्या थी और इसमें किस-किस अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका रही।
कोर्ट ने जांच का दायरा भी स्पष्ट किया है।
DGP की ओर से कराई जाने वाली जांच में यह देखा जाएगा कि—
- जब्त वाहन को थाने से बाहर निकालने का निर्णय किसने लिया?
- वाहन को बाहर ले जाने की अनुमति किस आधार पर दी गई?
- हेड मुहर्रिर की इसमें क्या भूमिका थी?
- वाहन लेकर जाने वाले दोनों सिपाहियों की भूमिका क्या रही?
- तत्कालीन थाना प्रभारी को वाहन के बाहर जाने की जानकारी थी या नहीं?
- तत्कालीन SSP की इस पूरे घटनाक्रम में क्या भूमिका रही?
- वाहन को बाहर निकालने की कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी या नहीं?
- संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई पर्याप्त और निष्पक्ष थी या नहीं?
- पूरे घटनाक्रम में किसी आपराधिक अपराध का प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है या नहीं?
इन सभी पहलुओं की जांच के बाद रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल की जानी है।
सिर्फ निंदा प्रविष्टि से मामला खत्म नहीं होगा
इस आदेश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई और संभावित आपराधिक जिम्मेदारी के बीच अंतर पर ध्यान दिया है।
किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होना एक अलग प्रक्रिया है। दूसरी ओर, यदि जांच में ऐसे तथ्य सामने आते हैं जिनसे किसी आपराधिक कृत्य का प्रथम दृष्टया पता चलता है, तो उसके संबंध में कानून के तहत अलग कार्रवाई की आवश्यकता हो सकती है।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने DGP की जांच में यह बिंदु भी शामिल किया है कि घटनाक्रम से किसी आपराधिक अपराध का प्रथम दृष्टया पता चलता है या नहीं।
इसका अंतिम निर्णय जांच के तथ्यों के आधार पर ही होगा।
तत्कालीन थाना प्रभारी की भूमिका भी जांच के दायरे में
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया था कि वाहन को हेड मुहर्रिर ने दो सिपाहियों को दिया था और यह कार्रवाई तत्कालीन थाना प्रभारी की जानकारी के बिना हुई।
लेकिन कोर्ट ने इस पहलू को भी स्वतंत्र जांच के दायरे में रखने का निर्देश दिया है।
जांच में यह पता लगाया जाएगा कि थाना प्रभारी को वास्तव में वाहन के थाने से बाहर जाने की जानकारी थी या नहीं। यदि जानकारी नहीं थी तो थाने की जब्त संपत्ति को बाहर निकालने की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई और संबंधित रिकॉर्ड में क्या दर्ज किया गया, इसकी भी जांच हो सकती है।
इसी तरह तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी जांच की जाएगी।
जब्त संपत्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?
किसी आपराधिक मामले में जब्त किए गए वाहन या अन्य संपत्ति की सुरक्षा महज औपचारिक जिम्मेदारी नहीं होती। ऐसी संपत्ति आगे चलकर न्यायिक कार्यवाही में साक्ष्य या मामले से संबंधित महत्वपूर्ण वस्तु हो सकती है।
यदि जब्त वाहन को बिना उचित अनुमति के बाहर ले जाया जाता है और उसके बाद वह दुर्घटना का शिकार हो जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वाहन की अभिरक्षा और उसके इस्तेमाल की जिम्मेदारी किसकी थी।
इसी बिंदु पर हाईकोर्ट ने स्वतंत्र जांच को जरूरी माना है।
अदालत यह देखना चाहती है कि वाहन किस स्थिति में जब्त किया गया था, थाने में उसके संबंध में क्या रिकॉर्ड था, उसे बाहर ले जाने के लिए क्या अनुमति ली गई और दुर्घटना के समय वाहन किन परिस्थितियों में इस्तेमाल हो रहा था।
हादसे में महिला की मौत ने मामले को और गंभीर बनाया
वाहन के बाहर निकाले जाने के बाद हुई दुर्घटना में एक महिला की मौत हो गई। इस वजह से मामला केवल जब्त संपत्ति की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया।
दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के कारण यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वाहन उस समय किसके कब्जे में था, उसे किस उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा था और वाहन को थाने से बाहर निकालने की प्रक्रिया वैध थी या नहीं।
अदालत ने इसी कारण जांच को व्यापक रखने का निर्देश दिया है।
हालांकि, दुर्घटना में हुई मौत और वाहन को थाने से बाहर निकालने की प्रक्रिया के बीच कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण जांच के बाद ही किया जा सकेगा। केवल घटनाओं के क्रम के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
आठ सप्ताह में देनी होगी रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने DGP को निर्देश दिया है कि स्वतंत्र और गोपनीय जांच कराकर उसकी रिपोर्ट आठ सप्ताह के भीतर अदालत में दाखिल की जाए।
इससे अब मामले में अगली महत्वपूर्ण स्थिति जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद बनेगी।
रिपोर्ट में यदि पुलिसकर्मियों की भूमिका, प्रक्रिया का उल्लंघन या किसी अन्य अधिकारी की जिम्मेदारी सामने आती है तो उसके आधार पर आगे की कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
यदि जांच में यह पाया जाता है कि वाहन को नियमों के तहत ही बाहर निकाला गया था और संबंधित पुलिसकर्मियों की कोई आपराधिक भूमिका नहीं थी, तो उस तथ्य को भी रिपोर्ट में स्पष्ट किया जाना होगा।
न्यायालय ने क्या तय नहीं किया?
यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि हाईकोर्ट ने इस चरण पर किसी पुलिसकर्मी को दोषी घोषित नहीं किया है।
अदालत ने प्रथम दृष्टया सामने आए तथ्यों और जब्त वाहन की स्थिति को देखते हुए स्वतंत्र जांच की आवश्यकता महसूस की है। जांच का उद्देश्य ही यह पता लगाना है कि वास्तविक घटनाक्रम क्या था और किस स्तर पर जिम्मेदारी बनती है।
इसलिए विभागीय कार्रवाई, पुलिसकर्मियों की भूमिका या संभावित आपराधिक अपराध के संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट और उसके बाद की कानूनी कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
आबकारी मामले की मूल कार्रवाई भी जारी
मूल मामला याचिकाकर्ता के खिलाफ आबकारी अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमे से संबंधित है। उस मामले में वाहन की जब्ती और बाद में कुर्की की कार्रवाई की गई थी।
जिला मजिस्ट्रेट ने वाहन का बाजार मूल्य 6.45 लाख रुपये आंका था। याचिकाकर्ता ने कुर्की के आदेश को चुनौती दी, लेकिन अपीलीय स्तर पर राहत नहीं मिलने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया।
सुनवाई के दौरान वाहन को लेकर सामने आए नए तथ्यों ने मामले को पुलिस अभिरक्षा और उसके बाद हुई दुर्घटना से जुड़े एक अलग महत्वपूर्ण प्रश्न तक पहुंचा दिया।
यही कारण है कि हाईकोर्ट ने केवल वाहन की कुर्की के सवाल तक सीमित रहने के बजाय पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच का निर्देश दिया।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश जब्त संपत्ति की पुलिस अभिरक्षा और उसके इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। किसी मामले में जब्त वाहन पुलिस की जिम्मेदारी में रहता है तो उसके रखरखाव, सुरक्षा और किसी भी प्रकार के इस्तेमाल की प्रक्रिया नियमों के अनुसार होना जरूरी है।
रामघाट थाने में जब्त वाहन को 4 जून 2021 को बाहर निकाला गया और तीन दिन बाद मथुरा के राया क्षेत्र में वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे में एक महिला की मौत हुई। राज्य सरकार ने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और निंदा प्रविष्टि की जानकारी अदालत को दी, लेकिन हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया इसे पूरे मामले के लिए पर्याप्त नहीं माना।
अब DGP की स्वतंत्र और गोपनीय जांच यह तय करेगी कि वाहन थाने से किस अधिकार के तहत बाहर निकला, इसमें पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की क्या भूमिका थी, विभागीय कार्रवाई कितनी उचित थी और क्या घटनाक्रम में किसी आपराधिक कृत्य की प्रथम दृष्टया संभावना बनती है।
आठ सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल की जानी है। इसके बाद ही मामले में जिम्मेदारी और आगे की कार्रवाई को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।