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परिषदीय स्कूलों में बदलेगा पढ़ाई का अंदाज, शॉर्ट्स और रील्स से आसान होंगे कठिन अध्याय

परिषदीय स्कूलों में बदलेगा पढ़ाई का अंदाज, शॉर्ट्स और रील्स से आसान होंगे कठिन अध्याय

        बदलती तकनीक और बच्चों की सीखने की आदतों को देखते हुए उत्तर प्रदेश के परिषदीय स्कूलों में पढ़ाई के तरीके में बदलाव की तैयारी है। अब कठिन अध्यायों और जटिल अवधारणाओं को केवल किताब, ब्लैकबोर्ड और मौखिक व्याख्या तक सीमित रखने के बजाय छोटे वीडियो, शॉर्ट्स, रील्स और एनीमेशन के माध्यम से भी समझाया जाएगा। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए मुश्किल विषयों को आसान, रोचक और अधिक समझने योग्य बनाना है।

नई व्यवस्था में डिजिटल सामग्री को कक्षा में पढ़ाई का विकल्प नहीं, बल्कि शिक्षक के सहयोगी माध्यम के रूप में इस्तेमाल करने की योजना है। स्मार्ट क्लास वाले स्कूलों में शिक्षक किसी कठिन टॉपिक को समझाने के बाद उसी विषय से संबंधित छोटा वीडियो विद्यार्थियों को दिखा सकेंगे। इसके बाद विद्यार्थी जरूरत पड़ने पर उस वीडियो को दोबारा देखकर पाठ की पुनरावृत्ति भी कर सकेंगे।

बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग की ओर से डिजिटल शैक्षिक सामग्री तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान यानी एसआईईटी कक्षा एक से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए विषयवार डिजिटल कंटेंट तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। आने वाले समय में इस सामग्री को छोटे और आकर्षक प्रारूप में उपलब्ध कराने पर जोर रहेगा।

बच्चों की बदलती सीखने की शैली को ध्यान में रखकर तैयारी

आज के बच्चे मोबाइल फोन, वीडियो प्लेटफॉर्म और डिजिटल सामग्री के बीच बड़े हो रहे हैं। किसी विषय को लंबे समय तक केवल पढ़कर या सुनकर समझने के बजाय वे चित्र, एनीमेशन, वीडियो और उदाहरणों के माध्यम से चीजों को जल्दी समझने की कोशिश करते हैं।

इसी बदलाव को ध्यान में रखते हुए परिषदीय स्कूलों में डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। खासकर जेन जी और जेन अल्फा पीढ़ी के विद्यार्थियों के लिए सीखने की प्रक्रिया को अधिक दृश्य और संवादात्मक बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि किताबों और पारंपरिक शिक्षण पद्धति को पूरी तरह हटा दिया जाएगा। पाठ्यपुस्तक, शिक्षक की व्याख्या, लिखित अभ्यास और कक्षा में चर्चा पहले की तरह महत्वपूर्ण रहेंगे। डिजिटल सामग्री इन माध्यमों के साथ अतिरिक्त सहायता के रूप में इस्तेमाल की जाएगी।

कठिन टॉपिक को छोटे वीडियो में समझाने की कोशिश

कई बार विद्यार्थियों को किसी पूरे अध्याय की बजाय उसके एक छोटे हिस्से को समझने में परेशानी होती है। उदाहरण के लिए गणित में किसी विशेष सूत्र का इस्तेमाल, विज्ञान में किसी प्रक्रिया की कार्यप्रणाली, सामाजिक विज्ञान में किसी ऐतिहासिक घटना का क्रम या भाषा विषय में व्याकरण की कोई जटिल अवधारणा बच्चों के लिए कठिन हो सकती है।

ऐसे विषयों के लिए तैयार किए जाने वाले छोटे वीडियो में एक समय में एक ही अवधारणा पर ध्यान दिया जाएगा। वीडियो को अनावश्यक रूप से लंबा रखने के बजाय विषय की जरूरत के अनुसार संक्षिप्त रखा जाएगा।

सरल भाषा, रोजमर्रा के उदाहरण, चित्र, ग्राफिक्स और एनीमेशन के माध्यम से विषय को समझाने का प्रयास होगा। इससे बच्चे किसी कठिन अवधारणा को केवल परिभाषा के रूप में याद करने के बजाय उसे देखकर और उदाहरण के माध्यम से समझ सकेंगे।

कक्षा में समझ न आए तो दोबारा देखने का अवसर

परंपरागत कक्षा में शिक्षक एक बार किसी विषय को समझाते हैं और इसके बाद विद्यार्थी को स्वयं उसका अभ्यास करना होता है। यदि किसी बच्चे को उसी समय बात समझ नहीं आई तो कई बार वह अपनी परेशानी बताने में संकोच करता है।

डिजिटल सामग्री इस स्थिति में एक अतिरिक्त अवसर दे सकती है। यदि कक्षा में किसी विषय को समझने में कठिनाई हुई तो विद्यार्थी संबंधित वीडियो को दोबारा देख सकता है। इस तरह एक ही विषय को दो या तीन बार अलग-अलग गति से समझने का अवसर मिल सकता है।

विशेष रूप से ऐसे विद्यार्थी जिन्हें किसी विषय को समझने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है, उनके लिए यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। शिक्षक भी कमजोर विद्यार्थियों को किसी विशेष वीडियो को दोबारा देखने और उससे जुड़े अभ्यास करने के लिए कह सकते हैं।

स्मार्ट क्लास बनेगी डिजिटल पढ़ाई का आधार

परिषदीय स्कूलों में स्मार्ट क्लास की व्यवस्था बढ़ने के साथ डिजिटल सामग्री के इस्तेमाल की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। स्मार्ट क्लास में उपलब्ध स्क्रीन या अन्य डिजिटल उपकरणों के माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों को पाठ से संबंधित वीडियो दिखा सकते हैं।

मान लीजिए किसी विज्ञान के अध्याय में जलचक्र पढ़ाया जा रहा है। शिक्षक पहले बोर्ड पर इसकी प्रक्रिया समझा सकते हैं। इसके बाद छोटा एनीमेशन दिखाकर वाष्पीकरण, संघनन और वर्षा की प्रक्रिया को दृश्य रूप में समझाया जा सकता है। इससे बच्चों को एक ही विषय दो अलग तरीकों से समझने का मौका मिलेगा।

इसी तरह गणित में ज्यामिति की आकृतियां, विज्ञान में मानव शरीर की संरचना, भूगोल में भौगोलिक प्रक्रियाएं और इतिहास में घटनाओं का क्रम वीडियो के माध्यम से अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।

शिक्षक की भूमिका खत्म नहीं होगी, बल्कि बदल सकती है

डिजिटल शिक्षा को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि यदि हर विषय का वीडियो उपलब्ध हो जाएगा तो शिक्षक की भूमिका क्या रह जाएगी। प्रस्तावित व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका समाप्त करने की बात नहीं है। इसके उलट शिक्षक डिजिटल सामग्री को कक्षा की जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करने वाले प्रमुख व्यक्ति होंगे।

शिक्षक यह तय कर सकेंगे कि किस विषय पर वीडियो दिखाना उपयोगी होगा और किस विषय को बोर्ड, किताब या चर्चा के माध्यम से समझाना बेहतर रहेगा।

उदाहरण के लिए शिक्षक किसी कठिन अध्याय को पहले स्वयं समझा सकते हैं। इसके बाद संबंधित शॉर्ट वीडियो दिखाकर बच्चों से सवाल पूछ सकते हैं। वीडियो देखने के बाद विद्यार्थियों से चर्चा कराई जा सकती है और यह पता लगाया जा सकता है कि उन्हें विषय का कौन सा हिस्सा समझ में आया और कौन सा अभी भी कठिन है।

इस तरह तकनीक शिक्षक का स्थान लेने के बजाय शिक्षक के काम को आसान बनाने का माध्यम बन सकती है।

शिक्षकों के लिए भी तैयार हो रही सामग्री

नई डिजिटल पहल केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं होगी। शिक्षकों को भी कठिन विषयों को पढ़ाने में मदद करने के लिए डिजिटल सामग्री उपलब्ध कराने की तैयारी है।

एसआईईटी की ओर से शिक्षकों के वीडियो तैयार कर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराने का काम किया जा रहा है। आगे विषयवार शॉर्ट्स और रील्स तैयार किए जाने की योजना है।

इन वीडियो में किसी विषय को पढ़ाने की बेहतर पद्धति, कठिन अवधारणा को सरल बनाने के तरीके और विद्यार्थियों की संभावित जिज्ञासाओं को ध्यान में रखा जा सकता है।

इससे शिक्षक किसी कठिन विषय को पढ़ाने से पहले संबंधित डिजिटल सामग्री का उपयोग अपनी तैयारी में भी कर सकेंगे।

एसआईईटी का अपना डिजिटल प्लेटफॉर्म

डिजिटल सामग्री को विद्यार्थियों और शिक्षकों तक आसानी से पहुंचाने के लिए एसआईईटी की ओर से अपना यू-ट्यूब चैनल और फेसबुक पेज शुरू करने की तैयारी की जा रही है।

यदि विषयवार सामग्री एक व्यवस्थित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होती है तो शिक्षक अपनी कक्षा के अनुसार संबंधित वीडियो खोज सकेंगे। विद्यार्थियों के लिए भी पाठ्यक्रम से जुड़ी सामग्री तक पहुंच आसान हो सकती है।

हालांकि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री की गुणवत्ता और उसकी पाठ्यक्रम से संगति महत्वपूर्ण होगी। केवल वीडियो की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। यह जरूरी होगा कि सामग्री सही, आयु के अनुरूप, पाठ्यक्रम आधारित और बच्चों के स्तर के अनुसार तैयार की जाए।

शॉर्ट वीडियो का मतलब केवल मनोरंजन नहीं

रील्स और शॉर्ट्स शब्द आम तौर पर सोशल मीडिया मनोरंजन से जुड़े होते हैं। लेकिन शिक्षा में इन्हीं छोटे प्रारूपों का उद्देश्य अलग होगा।

शैक्षिक शॉर्ट वीडियो में मनोरंजन के बजाय विषय को जल्दी और स्पष्ट तरीके से समझाने पर जोर रहेगा। वीडियो में एक अवधारणा, एक सवाल या एक समस्या को केंद्र में रखा जा सकता है।

उदाहरण के लिए गणित के किसी कठिन सवाल को हल करने की पूरी प्रक्रिया कुछ मिनट के वीडियो में दिखाई जा सकती है। विज्ञान में किसी प्रयोग को सुरक्षित तरीके से दिखाया जा सकता है। भाषा में किसी व्याकरणिक नियम को उदाहरणों के साथ समझाया जा सकता है।

इस तरह छोटे वीडियो का उपयोग बच्चों का ध्यान आकर्षित करने के साथ-साथ सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए किया जा सकता है।

कमजोर विद्यार्थियों को मिल सकता है अतिरिक्त फायदा

हर कक्षा में विद्यार्थियों की सीखने की गति अलग होती है। कुछ बच्चे पहली बार में किसी विषय को समझ लेते हैं, जबकि कुछ को कई बार समझाने की जरूरत पड़ती है।

डिजिटल सामग्री ऐसे विद्यार्थियों को अतिरिक्त अभ्यास का अवसर दे सकती है। शिक्षक किसी कठिन विषय का वीडियो विद्यार्थियों को दोबारा देखने के लिए दे सकते हैं। इसके बाद उससे संबंधित प्रश्न या अभ्यास कराया जा सकता है।

इससे विद्यार्थी केवल कक्षा की निर्धारित अवधि पर निर्भर नहीं रहेगा। हालांकि इसके लिए यह भी जरूरी होगा कि बच्चों को डिजिटल सामग्री तक समान पहुंच मिले।

ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए घर पर मोबाइल या इंटरनेट उपलब्ध होना हमेशा आसान नहीं होता। इसलिए स्कूल में उपलब्ध स्मार्ट क्लास और डिजिटल संसाधनों का उपयोग इस पहल की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

डिजिटल शिक्षा के साथ कुछ चुनौतियां भी

डिजिटल सामग्री के कई फायदे हो सकते हैं, लेकिन इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। सबसे पहली चुनौती सभी स्कूलों में तकनीकी सुविधाओं की उपलब्धता है।

स्मार्ट क्लास होने के बावजूद बिजली, इंटरनेट, उपकरणों की कार्यशील स्थिति और तकनीकी सहायता जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। यदि किसी स्कूल में स्क्रीन या इंटरनेट काम नहीं कर रहा है तो शिक्षक के लिए डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल मुश्किल हो जाएगा।

इसके अलावा शिक्षकों को डिजिटल उपकरणों और सामग्री के उपयोग का पर्याप्त प्रशिक्षण भी देना होगा। केवल वीडियो उपलब्ध करा देने से डिजिटल शिक्षा प्रभावी नहीं हो जाती। शिक्षक को यह समझना जरूरी है कि किस टॉपिक पर किस तरह की सामग्री दिखानी है और वीडियो के बाद बच्चों की समझ को कैसे जांचना है।

बच्चों का स्क्रीन टाइम भी ध्यान में रखना होगा

डिजिटल शिक्षा के विस्तार के साथ बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर भी सावधानी जरूरी होगी। पढ़ाई के लिए वीडियो का इस्तेमाल और लगातार मनोरंजनात्मक वीडियो देखना एक जैसी चीजें नहीं हैं।

शैक्षिक वीडियो छोटे, उद्देश्यपूर्ण और पाठ्यक्रम से जुड़े होने चाहिए। विद्यार्थियों को स्क्रीन पर लंबे समय तक निर्भर करने के बजाय किताब पढ़ने, लिखने, चर्चा करने, प्रयोग करने और खेल जैसी गतिविधियों से भी जोड़ा जाना जरूरी है।

डिजिटल सामग्री तभी अधिक प्रभावी होगी जब उसे कक्षा की पूरी शिक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए।

विषयवार कंटेंट से शिक्षकों को मिलेगी सुविधा

यदि कक्षा एक से 12 तक विषयवार डिजिटल सामग्री व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध होती है तो शिक्षकों को अपने स्तर पर हर बार सामग्री खोजने की जरूरत कम होगी।

उदाहरण के लिए किसी शिक्षक को कक्षा सात के विज्ञान के किसी अध्याय में कठिन अवधारणा समझानी है तो वह संबंधित डिजिटल सामग्री का चयन कर सकता है। इसी तरह भाषा, गणित, सामाजिक विज्ञान और अन्य विषयों के लिए भी सामग्री उपलब्ध हो सकती है।

आगे चलकर यदि इस सामग्री को कक्षा, विषय और अध्याय के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है तो शिक्षक के लिए उपयोग करना और आसान हो जाएगा।

पढ़ाई का तरीका बदलने की कोशिश

परिषदीय स्कूलों में शॉर्ट्स, रील्स और वीडियो के इस्तेमाल की योजना शिक्षा व्यवस्था में तकनीक की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है। इसका उद्देश्य बच्चों को केवल डिजिटल स्क्रीन से जोड़ना नहीं, बल्कि कठिन विषयों को उनके लिए अधिक सरल तरीके से प्रस्तुत करना है।

किसी बच्चे को यदि किताब में दी गई कोई अवधारणा समझने में परेशानी हो रही है, तो वही चीज चित्र, एनीमेशन या उदाहरण के माध्यम से दिखाई जाए तो उसके लिए समझना आसान हो सकता है। इसी तरह कक्षा में पढ़ाए गए विषय की पुनरावृत्ति के लिए छोटा वीडियो उपयोगी साबित हो सकता है।

लेकिन इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डिजिटल सामग्री कितनी गुणवत्तापूर्ण है, शिक्षक उसका इस्तेमाल किस तरीके से करते हैं और स्कूलों में जरूरी तकनीकी सुविधाएं कितनी नियमित रूप से उपलब्ध रहती हैं।

निष्कर्ष

परिषदीय स्कूलों में पढ़ाई के तरीके को बच्चों की बदलती सीखने की शैली के अनुरूप बनाने की तैयारी शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव की दिशा दिखाती है। कठिन अध्यायों को छोटे वीडियो, शॉर्ट्स, रील्स और एनीमेशन के माध्यम से समझाने से विद्यार्थियों को एक ही विषय को अलग-अलग तरीकों से सीखने का अवसर मिल सकता है।

स्मार्ट क्लास इस व्यवस्था का आधार बन सकती हैं, जबकि शिक्षक इसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बने रहेंगे। शिक्षक तय करेंगे कि डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल कब और कैसे करना है, विद्यार्थियों की समझ कितनी विकसित हुई और उन्हें किस विषय में अतिरिक्त सहायता की जरूरत है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि डिजिटल माध्यम को किताब और शिक्षक का विकल्प बनाने के बजाय शिक्षण प्रक्रिया का सहायक साधन बनाया जाए। यदि विषयवार सामग्री गुणवत्तापूर्ण हो, शिक्षक प्रशिक्षित हों और सभी स्कूलों में तकनीकी सुविधाएं ठीक से उपलब्ध रहें, तो कठिन अवधारणाओं को समझाने और विद्यार्थियों को दोहराव का अतिरिक्त अवसर देने में इस पहल की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

आने वाले समय में कक्षा में ब्लैकबोर्ड, किताब और शिक्षक के साथ स्क्रीन पर चलता छोटा शैक्षिक वीडियो भी पढ़ाई का हिस्सा दिखाई दे सकता है। इससे परिषदीय स्कूलों की कक्षाओं में पढ़ाने और सीखने का तरीका धीरे-धीरे अधिक डिजिटल और दृश्य आधारित होने की संभावना है। :::

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।