उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ता मानसिक दबाव: दो-तिहाई संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य की व्यवस्था नहीं, रैगिंग और आर्थिक तंगी भी बड़ी चुनौती
देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने गंभीर तस्वीर पेश की है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के बड़ी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से निपटने के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 65 प्रतिशत संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि 73 प्रतिशत संस्थानों में पूर्णकालिक परामर्शदाता उपलब्ध नहीं हैं।
उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना लेकर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में पहुंचने वाले विद्यार्थी पढ़ाई के साथ कई तरह के दबावों से गुजरते हैं। प्रतिस्पर्धा, परीक्षा का तनाव, परिवार की आर्थिक स्थिति, भेदभाव, अकेलापन, भविष्य को लेकर चिंता और कई जगहों पर रैगिंग जैसी समस्याएं उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं।
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब किसी विद्यार्थी को अपनी परेशानी साझा करने के लिए भरोसेमंद व्यक्ति या विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध नहीं होती। नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट में ऐसे ही हालात की ओर ध्यान दिलाया गया है। रिपोर्ट में उद्धृत अध्ययनों के मुताबिक, कुछ विद्यार्थियों में तनाव से निपटने के लिए नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति भी सामने आई है।
मानसिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव बड़ी चिंता
उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं नई बात नहीं हैं, लेकिन विद्यार्थियों की संख्या और उनकी बदलती सामाजिक परिस्थितियों के साथ यह विषय लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
टास्क फोर्स की रिपोर्ट में वर्ष 2023 के एक अध्ययन का हवाला दिया गया है। यह अध्ययन उन आईआईटी से संबंधित था, जहां आत्महत्या की घटनाएं सामने आई थीं। अध्ययन में विद्यार्थियों के अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि परिसर में मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में कुछ विद्यार्थी तनाव से निपटने के लिए नशीले पदार्थों का सहारा लेने लगते हैं।
यह स्थिति बताती है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत केवल संकट की स्थिति में नहीं होती। विद्यार्थियों को शुरुआती स्तर पर भी ऐसी सहायता उपलब्ध होनी चाहिए, जहां वे अपनी परेशानी बिना डर और झिझक के साझा कर सकें।
रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 65 प्रतिशत उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य से निपटने की कोई व्यवस्था नहीं पाई गई। वहीं, 73 प्रतिशत संस्थानों के पास पूर्णकालिक काउंसलर नहीं हैं। लगभग 20 प्रतिशत संस्थानों ने बाहरी एजेंसियों के माध्यम से काउंसलिंग की व्यवस्था के लिए करार किया है।
इससे साफ होता है कि कई संस्थानों में विद्यार्थियों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए या तो सीमित संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर बाहरी सेवाओं का सहारा लेना पड़ता है।
पहले वर्ष में ही दिखाई देने लगते हैं कई संकेत
विश्व स्तर पर हुए अध्ययनों ने भी कॉलेज जीवन के शुरुआती दौर को मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया है।
रिपोर्ट में शामिल जानकारी के अनुसार, आठ देशों के 19 विश्वविद्यालयों में किए गए एक अध्ययन में पहले वर्ष के दौरान करीब एक-तिहाई विद्यार्थियों में बेचैनी, मनोदशा संबंधी समस्याओं या नशे से जुड़े विकारों के लक्षण पाए गए।
एक अन्य अध्ययन में 12 देशों के स्नातक विद्यार्थियों को शामिल किया गया था। इसमें करीब 48 प्रतिशत विद्यार्थियों में अवसाद के लक्षण पाए जाने की बात सामने आई।
भारत में विद्यार्थियों में मनोवैज्ञानिक परेशानियों का अनुमान अलग-अलग अध्ययनों में करीब 25 से 50 प्रतिशत के बीच लगाया गया है। हालांकि, ऐसे आंकड़ों को उनके अध्ययन की पद्धति और आबादी के संदर्भ में समझना जरूरी है। सभी विद्यार्थियों में मानसिक बीमारी होने का अर्थ इन आंकड़ों से निकालना सही नहीं होगा। फिर भी ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना विद्यार्थियों और संस्थानों दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
24 साल की उम्र से पहले शुरू हो सकती हैं मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं
टास्क फोर्स की रिपोर्ट में विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़े शोध का हवाला देते हुए बताया गया है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी लगभग 75 प्रतिशत समस्याएं 24 वर्ष की उम्र से पहले शुरू हो जाती हैं।
कॉलेज और विश्वविद्यालय का समय इसी आयु वर्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ऐसे में उच्च शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की पहचान और सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यदि विद्यार्थी के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दे, वह लगातार अलग-थलग रहने लगे, पढ़ाई या सामान्य गतिविधियों में रुचि कम हो जाए, नींद और खान-पान में बड़ा बदलाव आए या वह लगातार निराशा और बेचैनी की बात करे, तो इन संकेतों को केवल पढ़ाई का दबाव मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
समय रहते किसी प्रशिक्षित काउंसलर, मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या अन्य योग्य स्वास्थ्य पेशेवर से संपर्क करना मददगार हो सकता है।
कॉलेज जाने वाले युवाओं में मानसिक विकारों पर वैश्विक अध्ययन
रिपोर्ट में 21 देशों में किए गए विश्व मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण का भी उल्लेख है। इसके अनुसार, कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों में करीब 20.3 प्रतिशत विद्यार्थियों में पिछले 12 महीनों के दौरान पहचाने जा सकने वाले मानसिक विकार पाए गए थे।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद दुनिया के कई देशों में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है।
अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और चीन सहित कई देशों में विश्वविद्यालय परिसरों में काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन, मनोवैज्ञानिक सहायता और संकट प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया जा रहा है।
भारत में भी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता को मजबूत करना अब महत्वपूर्ण आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है।
रैगिंग भी विद्यार्थियों के तनाव की बड़ी वजह
कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में मानसिक दबाव का एक कारण रैगिंग भी है। खासकर मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में रैगिंग से संबंधित शिकायतें सामने आती रही हैं।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2025 में यूजीसी ने रैगिंग रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाने वाले 107 संस्थानों को कारण बताओ नोटिस जारी किए थे। इनमें 18 मेडिकल कॉलेज भी शामिल थे।
रैगिंग की सबसे ज्यादा 135 शिकायतें उत्तर प्रदेश से सामने आईं। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 75, मध्य प्रदेश में 63, महाराष्ट्र में 53 और बिहार में 50 शिकायतें दर्ज हुईं।
मेडिकल, इंजीनियरिंग और फार्मेसी कॉलेजों की बड़ी संख्या वाले राज्यों में भी शिकायतें दर्ज की गईं। तमिलनाडु में 26 और कर्नाटक में 41 शिकायतें सामने आईं।
रैगिंग को केवल कॉलेज की अनुशासन संबंधी समस्या के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यदि किसी नए विद्यार्थी को लगातार अपमान, धमकी, सामाजिक अलगाव या शारीरिक अथवा मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़े तो इसका असर उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
आठ महीनों में 210 विद्यार्थियों की आत्महत्या
रिपोर्ट में जनवरी से अगस्त 2025 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों से संबंधित आत्महत्या के 210 मामले दर्ज होने की जानकारी दी गई है। इनमें 117 छात्र और 93 छात्राएं थीं।
इन आंकड़ों में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 33 मामले दर्ज होने की बात कही गई है। हरियाणा में नौ, उत्तराखंड में सात, दिल्ली और पंजाब में पांच-पांच, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश में दो-दो तथा जम्मू-कश्मीर में एक मामला दर्ज किया गया।
संस्थान और विषय के आधार पर देखें तो इंजीनियरिंग क्षेत्र से जुड़े विद्यार्थियों में 63 मामले दर्ज हुए। चिकित्सा क्षेत्र में 47, विज्ञान में 19, कला में 18 और नर्सिंग में 16 मामले सामने आए।
हालांकि आत्महत्या के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक परिस्थितियां, आर्थिक कठिनाइयां, शैक्षणिक दबाव, सामाजिक परिस्थितियां और व्यक्तिगत अनुभव कई मामलों में अलग-अलग भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए ऐसे आंकड़ों को केवल परीक्षा या पढ़ाई के दबाव से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं देता।
आर्थिक तंगी भी बढ़ा सकती है तनाव
उच्च शिक्षा में प्रवेश के बाद विद्यार्थियों के सामने आर्थिक चुनौतियां भी बड़ी समस्या बन सकती हैं। फीस, हॉस्टल, किताबें, यात्रा, भोजन और अन्य खर्चों का दबाव कई परिवारों के लिए आसान नहीं होता।
जब आर्थिक स्थिति कमजोर होती है तो विद्यार्थी अपने साथ पढ़ने वाले दूसरे छात्रों की जीवनशैली से तुलना करने लगते हैं। इससे हीनभावना, तनाव या सामाजिक दूरी जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
रिपोर्ट में इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी भी आर्थिक परेशानियों से मुक्त नहीं होते। केवल अच्छे संस्थान में प्रवेश मिल जाना यह सुनिश्चित नहीं करता कि विद्यार्थी मानसिक रूप से हर चुनौती का सामना आसानी से कर पाएगा।
ऐसे विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, फीस में सहायता, हॉस्टल सहायता और संस्थागत काउंसलिंग जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
गांव की छात्राओं के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच अभी भी चुनौती
रिपोर्ट में उच्च शिक्षा में लैंगिक और ग्रामीण-शहरी अंतर का भी उल्लेख किया गया है।
2022 के एक अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कों की तुलना में लड़कियों के कॉलेज पहुंचने की संभावना करीब 25 प्रतिशत कम थी।
आर्थिक तंगी की स्थिति में कुछ परिवारों में बेटे की शिक्षा को प्राथमिकता दिए जाने की बात भी अध्ययन में सामने आई है। इसका सीधा असर लड़कियों की उच्च शिक्षा तक पहुंच पर पड़ सकता है।
विषयवार हिस्सेदारी में भी अंतर दिखाई देता है। कला और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में छात्राओं की हिस्सेदारी करीब 51 प्रतिशत बताई गई है, जबकि इंजीनियरिंग में यह करीब 29 प्रतिशत है।
यह अंतर केवल शिक्षा तक पहुंच का सवाल नहीं है। उच्च शिक्षा में अवसरों की असमानता भविष्य में रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक भागीदारी पर भी असर डाल सकती है।
संस्थानों को केवल पढ़ाई पर नहीं, विद्यार्थी पर भी ध्यान देना होगा
उच्च शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी केवल विद्यार्थियों को डिग्री और परीक्षा की तैयारी कराने तक सीमित नहीं रह सकती। विश्वविद्यालय और कॉलेज ऐसे स्थान होते हैं जहां विद्यार्थी पहली बार लंबे समय तक परिवार से दूर रहते हैं और कई नए सामाजिक तथा शैक्षणिक अनुभवों से गुजरते हैं।
इसलिए संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता की मजबूत व्यवस्था जरूरी है। प्रत्येक बड़े संस्थान में प्रशिक्षित काउंसलर की उपलब्धता, गोपनीय काउंसलिंग, आपातकालीन सहायता, रैगिंग विरोधी तंत्र और विद्यार्थियों के लिए शिकायत दर्ज करने की सुरक्षित व्यवस्था होनी चाहिए।
काउंसलिंग को केवल उन विद्यार्थियों के लिए नहीं रखा जाना चाहिए जिनकी समस्या गंभीर हो चुकी है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, तनाव प्रबंधन और समय रहते सहायता लेने की संस्कृति भी विकसित करनी होगी।
विद्यार्थियों को भी संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
मानसिक परेशानी हमेशा किसी बड़े संकट के रूप में सामने नहीं आती। कई बार शुरुआत नींद खराब होने, लगातार चिंता, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई से मन हटने या दोस्तों और परिवार से दूरी बनाने से होती है।
ऐसे संकेत लगातार बने रहें या बढ़ते जाएं तो विद्यार्थी को मदद लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। काउंसलर, मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, शिक्षक, अभिभावक या भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना पहला कदम हो सकता है।
यदि किसी विद्यार्थी में खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या के विचार दिखाई दें, तो उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए और तत्काल स्थानीय आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा या योग्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से संपर्क करना चाहिए।
निष्कर्ष
नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल सामने रखती है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कमी, रैगिंग, आर्थिक दबाव, सामाजिक भेदभाव और शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा जैसी परिस्थितियां विद्यार्थियों के अनुभव को प्रभावित कर सकती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल संकट आने के बाद की व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जाए। विद्यार्थियों को शुरुआत से ही ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जहां वे अपनी परेशानी खुलकर बता सकें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता प्राप्त कर सकें।
कॉलेज और विश्वविद्यालय केवल डिग्री हासिल करने की जगह नहीं हैं। यही वह समय है जब युवा अपने करियर के साथ-साथ अपनी सामाजिक और व्यक्तिगत पहचान भी बनाते हैं। इसलिए सुरक्षित परिसर, रैगिंग-मुक्त वातावरण, आर्थिक सहायता और आसानी से उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उच्च शिक्षा व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा बननी चाहिए।
समय पर पहचाने गए तनाव के संकेत और सही समय पर मिली सहायता किसी विद्यार्थी को गंभीर संकट से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसलिए विद्यार्थियों की मानसिक सेहत को शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं में शामिल करना अब केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय भी है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।