इस्तीफे से खाली हुई पोस्ट पर वेटिंग लिस्ट से नियुक्ति का अधिकार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
भर्ती प्रक्रिया में चयन सूची और वेटिंग लिस्ट को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अभ्यर्थी का चयन हो जाता है, उसे नियुक्ति मिल जाती है और वह संबंधित पद पर कार्यभार भी ग्रहण कर लेता है, लेकिन बाद में वह नौकरी से इस्तीफा दे देता है, तो उसके इस्तीफे से खाली हुए पद पर पिछली भर्ती प्रक्रिया की वेटिंग लिस्ट में शामिल अभ्यर्थी नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट के अनुसार, ऐसी रिक्ति मूल भर्ती प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध रिक्ति नहीं मानी जाएगी। यह बाद में उत्पन्न हुई नई रिक्ति होगी और इसे भरने के लिए संबंधित विभाग को लागू भर्ती नियमों के अनुसार आगे की प्रक्रिया अपनानी होगी। केवल इसलिए कि किसी चयनित अभ्यर्थी के इस्तीफा देने के बाद पद खाली हो गया है, पुरानी चयन सूची या वेटिंग लिस्ट को दोबारा सक्रिय करके उस पद को भरने का अधिकार अभ्यर्थियों को नहीं मिल जाता।
यह फैसला जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की पीठ ने भूपेश वर्मा एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ शासन एवं अन्य से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला जूनियर इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल) के पदों पर हुई भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा था। याचिकाकर्ता भूपेश वर्मा और विकाश कुमार गुप्ता ने संबंधित पदों पर नियुक्ति के लिए आयोजित चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया था।
भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 2024 में चयन सूची जारी की गई। हालांकि, दोनों याचिकाकर्ताओं के नाम चयनित अभ्यर्थियों की सूची में शामिल नहीं थे। इसके बाद भर्ती प्रक्रिया के तहत चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई और उन्होंने संबंधित पदों पर कार्यभार ग्रहण कर लिया।
बाद में चयनित कुछ अभ्यर्थियों ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के कारण संबंधित पद रिक्त हो गए। इन रिक्त पदों को देखते हुए याचिकाकर्ताओं ने विभाग के समक्ष अपनी नियुक्ति का दावा किया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से मांग की गई कि इन बाद में खाली हुए पदों को भरने के लिए फर्स्ट वेटिंग लिस्ट अथवा फेज-II लिस्ट जारी की जाए और उसमें उनका नाम शामिल करते हुए नियुक्ति पर विचार किया जाए।
याचिकाकर्ताओं का मूल तर्क यह था कि भर्ती प्रक्रिया में प्रतीक्षा सूची की व्यवस्था रही है और चयनित उम्मीदवारों में से कुछ के पद छोड़ने के कारण अब पद खाली हो गए हैं। इसलिए उपलब्ध रिक्तियों के विरुद्ध प्रतीक्षा सूची में शामिल अभ्यर्थियों को अवसर दिया जाना चाहिए।
लेकिन विभाग ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। मामला अंततः हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिक्तियों की प्रकृति पर विशेष रूप से विचार किया। कोर्ट ने यह देखा कि जिन पदों को लेकर याचिकाकर्ता नियुक्ति की मांग कर रहे थे, वे भर्ती प्रक्रिया के समय मौजूद रिक्तियां नहीं थीं।
इन पदों पर पहले ही अभ्यर्थियों का चयन हो चुका था। चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति भी दी गई और उन्होंने अपने पदों पर कार्यभार भी संभाल लिया था। बाद में उनके इस्तीफे के कारण पद रिक्त हुए।
कोर्ट ने इसी अंतर को महत्वपूर्ण माना।
अर्थात, किसी उम्मीदवार का नियुक्ति पत्र मिलने के बावजूद जॉइन न करना और नियुक्ति लेकर सेवा में शामिल होने के बाद इस्तीफा देना—दोनों परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं।
यदि चयनित अभ्यर्थी नियुक्ति के बावजूद कार्यभार ग्रहण नहीं करता है, तो परिस्थितियां अलग हो सकती हैं और संबंधित भर्ती नियम यह निर्धारित कर सकते हैं कि उस रिक्ति को उसी चयन प्रक्रिया में उपलब्ध उम्मीदवारों से भरा जा सकता है या नहीं।
लेकिन जब कोई उम्मीदवार नियुक्त होकर सेवा में शामिल हो चुका हो और उसके बाद अपनी इच्छा से इस्तीफा दे दे, तो उसके कारण पैदा हुई रिक्ति को मूल चयन प्रक्रिया की रिक्ति मानकर पुरानी वेटिंग लिस्ट से भरना सामान्य नियम के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस्तीफे से बनी रिक्ति को नई रिक्ति माना जाएगा
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा में नियुक्ति और जॉइनिंग के बाद इस्तीफा देने से जो पद खाली होता है, वह मूल भर्ती प्रक्रिया के समय मौजूद पद नहीं था।
इसलिए ऐसी रिक्ति को बाद में उत्पन्न हुई रिक्ति माना जाएगा।
इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कोई विभाग भविष्य में इस पद को भरना चाहता है तो उसे संबंधित सेवा नियमों, भर्ती नियमों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। विभाग चाहे तो लागू नियमों के अनुसार नई भर्ती प्रक्रिया शुरू कर सकता है या नियमों में उपलब्ध किसी अन्य वैधानिक व्यवस्था के तहत पद भर सकता है।
लेकिन पिछली भर्ती प्रक्रिया की समाप्ति के बाद उसी चयन सूची या वेटिंग लिस्ट को केवल इसलिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि कुछ समय बाद पद खाली हो गए हैं।
वेटिंग लिस्ट में नाम होना नियुक्ति की गारंटी नहीं
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वेटिंग लिस्ट में नाम आ जाना अपने आप में नियुक्ति का अधिकार पैदा नहीं करता।
प्रतीक्षा सूची का उद्देश्य सामान्यतः उन परिस्थितियों से जुड़ा होता है जिनमें मूल चयन प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध रिक्तियों के संबंध में नियमों के अनुसार अगला योग्य अभ्यर्थी नियुक्ति के लिए विचाराधीन हो सकता है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रतीक्षा सूची में शामिल हर व्यक्ति को भविष्य में कभी भी पैदा होने वाली रिक्ति पर नियुक्ति मांगने का कानूनी अधिकार मिल जाता है।
हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी पूर्व चयन प्रक्रिया में वेटिंग लिस्ट जारी करने की पुरानी प्रथा मात्र से अभ्यर्थियों को भविष्य में उत्पन्न होने वाली रिक्तियों पर नियुक्ति का कोई वैधानिक या प्रवर्तनीय अधिकार हासिल नहीं हो जाता।
इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पहले भी फर्स्ट वेटिंग लिस्ट या फेज-II लिस्ट जारी की गई थी। हर भर्ती प्रक्रिया में यह देखना होगा कि संबंधित भर्ती नियम क्या कहते हैं और जिस रिक्ति पर नियुक्ति की मांग की जा रही है, उसकी कानूनी प्रकृति क्या है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के सुदेश कुमार गोयल बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य, (2023) 10 SCC 54 के निर्णय का भी उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय में चयनित अभ्यर्थी के सेवा में शामिल होने के बाद इस्तीफा देने से उत्पन्न रिक्ति और पुरानी चयन सूची के संबंध में सिद्धांतों पर विचार किया गया था।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को वर्तमान मामले में लागू करते हुए कहा कि सेवा में शामिल हो चुके चयनित उम्मीदवार के बाद में इस्तीफा देने से पैदा हुई रिक्ति को पुरानी चयन या प्रतीक्षा सूची के आधार पर भरने का दावा नहीं किया जा सकता।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होने वाली रिक्तियों और भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद सेवा में आने वाली नई रिक्तियों का कानूनी उपचार अलग हो सकता है।
पुरानी वेटिंग लिस्ट को दोबारा सक्रिय नहीं किया जा सकता
कोर्ट के फैसले का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि एक बार चयन प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद उसकी वेटिंग लिस्ट को अनिश्चित समय तक खुला नहीं रखा जा सकता।
यदि ऐसा होने लगे तो एक भर्ती प्रक्रिया के आधार पर वर्षों बाद उत्पन्न होने वाली अलग-अलग रिक्तियों को भरने का रास्ता खुल सकता है। इससे नई भर्ती प्रक्रिया और समान अवसर के सिद्धांत पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
सरकारी पदों पर भर्ती में यह महत्वपूर्ण है कि सभी पात्र अभ्यर्थियों को निर्धारित नियमों के अनुसार अवसर मिले। किसी पुरानी चयन प्रक्रिया की सूची को बाद में पैदा हुई हर रिक्ति के लिए इस्तेमाल करने से भर्ती प्रक्रिया की समय-सीमा और उसका उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
इसी कारण हाईकोर्ट ने कहा कि समाप्त हो चुकी भर्ती प्रक्रिया की वेटिंग लिस्ट को बाद में उत्पन्न रिक्तियों को भरने के लिए पुनर्जीवित या संचालित नहीं किया जा सकता, जब तक कि लागू भर्ती नियम ऐसी अनुमति न देते हों।
याचिकाकर्ताओं का दावा क्यों स्वीकार नहीं हुआ?
याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से इस आधार पर राहत मांगी थी कि चयनित उम्मीदवारों के इस्तीफा देने से पद खाली हुए हैं और इन पदों पर उन्हें वेटिंग लिस्ट के माध्यम से नियुक्त किया जा सकता है।
लेकिन कोर्ट ने पाया कि इन रिक्तियों का मूल भर्ती प्रक्रिया से सीधा संबंध नहीं था। जिन अभ्यर्थियों ने इस्तीफा दिया, वे पहले ही नियुक्त हो चुके थे और सेवा में योगदान कर चुके थे।
इसलिए केवल बाद में पद खाली होने के आधार पर याचिकाकर्ताओं को पुरानी चयन प्रक्रिया में नियुक्ति का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा अभ्यर्थी जिसका नाम मूल चयन सूची में नहीं था, केवल बाद में किसी पद के रिक्त हो जाने के आधार पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।
भर्ती नियमों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि किसी भी भर्ती में केवल चयन सूची या वेटिंग लिस्ट देखना पर्याप्त नहीं है। यह देखना आवश्यक है कि संबंधित विभाग के भर्ती नियम रिक्त पदों को भरने के संबंध में क्या व्यवस्था करते हैं।
यदि भर्ती नियम यह कहते हैं कि चयनित अभ्यर्थी के जॉइन न करने पर प्रतीक्षा सूची से अगला उम्मीदवार लिया जाएगा, तो उस स्थिति में नियम लागू होंगे।
लेकिन यदि अभ्यर्थी पहले ही नियुक्त होकर सेवा में शामिल हो गया और बाद में इस्तीफा दे दिया, तो उस इस्तीफे से पैदा हुई रिक्ति को उसी पुरानी चयन प्रक्रिया से भरने का स्वतः अधिकार नहीं बन जाता।
इसलिए प्रत्येक मामले में संबंधित सेवा नियम, भर्ती विज्ञापन, चयन प्रक्रिया और रिक्ति की वास्तविक स्थिति को देखना जरूरी है।
दोनों रिट याचिकाएं खारिज
सभी तथ्यों और कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने माना कि भूपेश वर्मा और विकाश कुमार गुप्ता के पास फर्स्ट वेटिंग लिस्ट अथवा फेज-II लिस्ट जारी कराने का कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं है।
इसी तरह, चयनित अभ्यर्थियों के सेवा में शामिल होने के बाद उनके इस्तीफे से उत्पन्न रिक्तियों के विरुद्ध पुरानी चयन प्रक्रिया के आधार पर नियुक्ति का दावा भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इसके आधार पर कोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।
अभ्यर्थियों के लिए फैसले का क्या मतलब?
यह फैसला सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। इससे यह समझना जरूरी है कि वेटिंग लिस्ट में नाम होना और नियुक्ति का कानूनी अधिकार होना दो अलग-अलग बातें हैं।
किसी भर्ती प्रक्रिया में चयन सूची में नाम नहीं आने के बाद यदि कुछ चयनित उम्मीदवार नौकरी छोड़ देते हैं, तो इससे वेटिंग लिस्ट में शामिल प्रत्येक उम्मीदवार को स्वतः नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता।
विशेष रूप से तब, जब संबंधित चयनित अभ्यर्थी पहले ही नियुक्त होकर सेवा में शामिल हो चुका हो और उसके बाद उसने इस्तीफा दिया हो।
ऐसी स्थिति में खाली हुए पद को भरने के लिए विभाग को लागू भर्ती नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी होगी। यदि नियम नई भर्ती की मांग करते हैं, तो नई भर्ती प्रक्रिया अपनानी होगी।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले ने चयन सूची, वेटिंग लिस्ट और बाद में उत्पन्न होने वाली रिक्तियों के बीच अंतर को स्पष्ट किया है। कोर्ट ने कहा कि किसी चयनित अभ्यर्थी के नियुक्त होकर सेवा में शामिल होने के बाद उसके इस्तीफे से उत्पन्न पद को केवल पुरानी वेटिंग लिस्ट के आधार पर भरने का दावा नहीं किया जा सकता।
ऐसी रिक्ति बाद में उत्पन्न हुई रिक्ति होगी और उसे भरने के लिए लागू भर्ती नियमों का पालन करना आवश्यक होगा। किसी पिछली भर्ती में वेटिंग लिस्ट जारी किए जाने की परंपरा भी अभ्यर्थियों को भविष्य की रिक्तियों पर नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं देती।
इस फैसले का मूल सिद्धांत यही है कि भर्ती प्रक्रिया की समाप्ति के बाद उत्पन्न होने वाली नई रिक्तियों को उसी पुरानी चयन प्रक्रिया से भरने का अधिकार तभी हो सकता है, जब संबंधित भर्ती नियम इसकी स्पष्ट अनुमति देते हों। केवल किसी चयनित अभ्यर्थी के बाद में इस्तीफा देने से वेटिंग लिस्ट में शामिल अभ्यर्थी को नियुक्ति का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।