सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में 10 साल की सजा रद्द कर आरोपी को किया बरी, कहा- नैतिकता नहीं, ठोस सबूत से साबित होना चाहिए अपराध
पीड़िता के बयान को एक आरोप में खारिज और दूसरे में स्वीकार नहीं किया जा सकता, विरोधाभासी साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के करीब 17 साल पुराने मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी परमजीत सिंह बेदी को बरी कर दिया है। आरोपी को वर्ष 2012 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी सितंबर 2013 में इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंद्रकुड़कर की पीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की दोबारा विस्तृत जांच की और निचली अदालत तथा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि किसी व्यक्ति का आचरण नैतिक दृष्टि से गलत या गैर-जिम्मेदार प्रतीत होना अपने आप में दुष्कर्म जैसे गंभीर आपराधिक आरोप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता। आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोप को विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों के आधार पर साबित करना जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि अभियोजन की मुख्य गवाह का बयान पूरी तरह विश्वसनीय है तो उसे समग्र रूप से स्वीकार करना होगा। उसी बयान के एक हिस्से को अस्वीकार और दूसरे हिस्से को स्वीकार करके दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
2009 में सामने आया था मामला
यह मामला जून 2009 की घटना से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार उस समय कथित पीड़िता लुधियाना के एक सरकारी हाईस्कूल में कक्षा आठ में पढ़ती थी। 19 जून 2009 की शाम वह घर से किराना सामान लेने निकली थी। अभियोजन का आरोप था कि इसी दौरान आरोपी उसे अपनी बेटी से मिलाने के बहाने अपने साथ ले गया।
रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी उसे पहले लुधियाना स्थित एक फ्लैट में ले गया, जहां वह करीब दो दिन रही। इसके बाद आरोपी उसे स्कूटर से मालेरकोटला ले गया। अभियोजन का आरोप था कि वहां एक सुनसान फैक्ट्री के कमरे में उसे रखा गया और उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाए गए।
कुछ दिनों बाद कथित पीड़िता को आरोपी के साथ बरामद किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच आगे बढ़ी। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई और अंततः मामला धारा 366 तथा 376 IPC के आरोपों तक पहुंचा।
ट्रायल कोर्ट ने धारा 366 में किया बरी, लेकिन रेप में सुनाई सजा
मामले की सुनवाई लुधियाना की अदालत में हुई। अभियोजन ने अपने आरोपों के समर्थन में कई गवाह पेश किए। ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद आरोपी को धारा 366 IPC के आरोप से बरी कर दिया।
हालांकि दुष्कर्म के आरोप यानी धारा 376 IPC के मामले में अदालत ने अभियोजन के पक्ष को स्वीकार किया और आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास तथा 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।
1 जून 2012 के इस फैसले को आरोपी ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी। लेकिन हाईकोर्ट ने 12 सितंबर 2013 को अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या था मुख्य सवाल?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मामले का एक महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या अभियोजन की उसी गवाही को किसी एक आरोप के लिए अविश्वसनीय मानकर खारिज किया जा सकता है और फिर उसी गवाही के दूसरे हिस्से को स्वीकार करके दुष्कर्म की दोषसिद्धि की जा सकती है।
पीठ ने इस पहलू को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना।
अदालत ने कहा कि यदि किसी पीड़िता की गवाही ऐसी है जिसे अदालत पूरी तरह विश्वसनीय और संदेह से परे मानती है, तो उस गवाही को समग्र रूप से स्वीकार करना होगा। लेकिन यदि बयान में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं और अदालत खुद उसके एक हिस्से को स्वीकार नहीं करती, तो उसी बयान के दूसरे हिस्से को अलग करके दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पीड़िता के बयान में विरोधाभास पर कोर्ट की नजर
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद पीड़िता के बयान और घटनाक्रम को विस्तार से देखा। अदालत ने पाया कि उसके बयान में कई ऐसे पहलू थे जिन पर संदेह पैदा होता था।
पीठ ने विशेष रूप से इस बात पर गौर किया कि अभियोजन के अनुसार पीड़िता आरोपी के साथ पहले लुधियाना के फ्लैट और बाद में मालेरकोटला गई थी। दोनों स्थानों के बीच आने-जाने के दौरान वे व्यस्त सड़कों और चौराहों से गुजरे।
अदालत ने कहा कि इस दौरान पीड़िता द्वारा शोर मचाने या आरोपी से बचने के लिए कोई स्पष्ट प्रयास किए जाने की बात उसके बयान और उपलब्ध परिस्थितियों से विश्वसनीय रूप से स्थापित नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में उसके उस दावे को भी स्वीकार करने में कठिनाई बताई जिसमें उसने मालेरकोटला में कमरे के भीतर शोर मचाने की बात कही थी।
हालांकि, इस हिस्से को समझते समय यह महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि किसी यौन अपराध के मामले में पीड़िता का विरोध या शोर मचाना हर परिस्थिति में आवश्यक होता है। अदालत का निर्णय इस विशेष मामले में पूरे साक्ष्य, बयान में विरोधाभास और अभियोजन की समग्र कहानी के मूल्यांकन पर आधारित था।
एक ही बयान को दो तरह से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है।
अदालत ने कहा कि यदि अभियोजन की कहानी का कोई हिस्सा किसी आरोप को साबित करने के लिए विश्वसनीय नहीं पाया गया है, तो उसी कहानी के दूसरे हिस्से को अलग करके दोषसिद्धि के लिए इस्तेमाल करने में सावधानी बरतनी होगी।
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 366 IPC के आरोप से बरी किया था, लेकिन धारा 376 IPC के लिए उसी अभियोजन पक्ष की कहानी के एक हिस्से पर भरोसा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि पीड़िता का बयान यदि पूरी तरह भरोसेमंद है तो उसे संपूर्ण रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन बयान में महत्वपूर्ण विरोधाभास हों तो उसे सुविधानुसार अलग-अलग हिस्सों में बांटकर अभियोजन के पक्ष में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
मेडिकल रिपोर्ट भी अकेले पर्याप्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य पर भी विचार किया। रिकॉर्ड में पीड़िता के vaginal swab में spermatozoa की मौजूदगी का उल्लेख था। लेकिन अदालत ने कहा कि केवल spermatozoa की मौजूदगी अपने आप में दुष्कर्म साबित नहीं करती।
मेडिकल साक्ष्य को मामले की परिस्थितियों और अन्य मौखिक तथा दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ पढ़ना होता है। इस मामले में जब पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता पर ही गंभीर प्रश्न सामने आए, तो केवल मेडिकल साक्ष्य के आधार पर धारा 376 के तहत दोषसिद्धि कायम रखना पर्याप्त नहीं था।
नैतिकता और आपराधिक दोष में अंतर
फैसले में सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी विशेष रूप से चर्चा में है। पीठ ने कहा कि आरोपी का व्यवहार नैतिक या सामाजिक दृष्टि से गलत माना जा सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर उसे धारा 376 IPC के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्यायालय का काम किसी व्यक्ति के आचरण पर केवल नैतिक फैसला देना नहीं, बल्कि यह निर्धारित करना है कि अभियोजन ने जिस अपराध का आरोप लगाया है, उसके आवश्यक तत्वों को विश्वसनीय साक्ष्य से साबित किया है या नहीं।
यानी किसी घटना को समाज की सामान्य नैतिक कसौटी पर गलत मानना और उसे कानून के तहत अपराध साबित करना दो अलग-अलग बातें हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप को ठोस साक्ष्य के आधार पर साबित करना होगा। अनुमान, अटकल या किसी न्यायिक अधिकारी के व्यक्तिगत मूल्यांकन के आधार पर आपराधिक दोषसिद्धि नहीं हो सकती।
आरोपी को कब मिली थी जमानत?
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान आरोपी को राहत मिली थी। रिकॉर्ड के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2015 में उसे जमानत पर रिहा किया था। उस समय वह करीब छह वर्ष की हिरासत पूरी कर चुका था, जबकि उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा मिली थी।
इसलिए हालिया फैसले को इस रूप में समझना उचित होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अब अंतिम रूप से धारा 376 IPC की दोषसिद्धि और सजा को ही रद्द कर दिया है। अदालत के 25 सितंबर 2026 के फैसले के बाद आरोपी को उस आरोप से बरी कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले किए रद्द
पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा करने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि धारा 376 IPC के तहत दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1 जून 2012 के लुधियाना सेशन कोर्ट के फैसले और 12 सितंबर 2013 के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जहां आरोपी को धारा 376 IPC के तहत दोषी ठहराया गया था।
क्रिमिनल अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को धारा 376 IPC के आरोप से मुक्त कर दिया।
फैसले का कानूनी महत्व क्या है?
यह फैसला मुख्य रूप से साक्ष्य के मूल्यांकन और आपराधिक दोषसिद्धि के मानक से जुड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता की गवाही के महत्व को कम कर दिया है।
भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में कई मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय और भरोसेमंद गवाही अकेले भी महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है। लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने समस्या यह थी कि जिस गवाही पर दोषसिद्धि आधारित थी, उसी गवाही के संबंध में अदालतों के निष्कर्ष आपस में पूरी तरह संगत नहीं थे।
पीठ ने इसलिए गवाही को पूरे संदर्भ में देखने पर जोर दिया।
पुराने मामले में IPC लागू, नए मामलों में कानूनी स्थिति अलग
यह मामला वर्ष 2009 की घटना से संबंधित है और मुकदमे में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएं लागू थीं। बाद में भारत में आपराधिक कानूनों में बड़ा बदलाव हुआ है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) ने IPC का स्थान लिया है और 1 जुलाई 2024 से नए आपराधिक कानून लागू हैं।
इसलिए इस फैसले को पढ़ते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का फैसला उस समय लागू IPC की धाराओं और उस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया है। पुराने अपराधों पर बाद में लागू हुए कानूनों को सीधे लागू करके निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
फैसला क्या संदेश देता है?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मूल संदेश यह है कि आपराधिक अदालत में आरोप की गंभीरता और दोषसिद्धि के लिए आवश्यक प्रमाण दो अलग-अलग चीजें हैं।
दुष्कर्म निश्चित रूप से गंभीर अपराध है, लेकिन किसी आरोप को गंभीर मानना और आरोपी को दोषी घोषित करना एक ही बात नहीं है। दोषसिद्धि तभी हो सकती है जब अभियोजन आवश्यक तत्वों को कानून के मुताबिक विश्वसनीय साक्ष्य से साबित करे।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही में ऐसे विरोधाभास थे जिन्हें नजरअंदाज करके धारा 376 IPC के तहत दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती थी। अदालत ने यह भी माना कि एक ही गवाही को एक आरोप के लिए अस्वीकार और दूसरे आरोप के लिए स्वीकार करने का तरीका इस मामले के तथ्यों में टिकाऊ नहीं था।
निष्कर्ष
Paramjit Singh Bedi v. State of Punjab का फैसला आपराधिक मामलों में साक्ष्य के निष्पक्ष और समग्र मूल्यांकन के महत्व को रेखांकित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अदालत का निर्णय सामाजिक या नैतिक धारणा पर नहीं, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।
इस मामले में आरोपी को 2012 में मिली 10 वर्ष की सजा और 2013 में हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई दोषसिद्धि को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि जब अभियोजन की मुख्य गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास हों और उसे एक आरोप के लिए अविश्वसनीय माना गया हो, तो उसी गवाही के दूसरे हिस्से के आधार पर दुष्कर्म की दोषसिद्धि कायम रखना सुरक्षित नहीं है।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को धारा 376 IPC के आरोप से बरी कर दिया। फैसला 25 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंद्रकुड़कर की पीठ ने सुनाया।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।