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काले हिरण के शिकार और तस्करी मामले में हाईकोर्ट सख्त, 22 महीने से जेल में बंद मुख्य तस्कर को जमानत नहीं

काले हिरण के शिकार और तस्करी मामले में हाईकोर्ट सख्त, 22 महीने से जेल में बंद मुख्य तस्कर को जमानत नहीं

रोजाना होगी सुनवाई, गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश

       काले हिरण और अन्य वन्यजीवों के कथित शिकार तथा उनके मांस और अंगों की तस्करी से जुड़े मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आरोपितों को फिलहाल राहत नहीं दी है। मामले में लंबे समय से जेल में बंद मुख्य आरोपित को जमानत देने से इनकार करते हुए न्यायालय ने मुकदमे की धीमी गति पर भी गंभीरता दिखाई है। कोर्ट ने ट्रायल में अनावश्यक देरी रोकने के लिए रोजाना सुनवाई किए जाने के निर्देश दिए हैं।

मामले की जांच कर रही स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स (STSF) अब सिर्फ काले हिरण के मांस की बरामदगी तक जांच सीमित नहीं रख रही है। जांच एजेंसी इस बात की कड़ियां जोड़ने में जुटी है कि कथित शिकार के बाद वन्यजीवों की खाल, सींग, सिर यानी ट्रॉफी और अन्य अंगों को किस नेटवर्क के जरिए आगे पहुंचाया जाता था।

इस मामले में जांच का दायरा मध्य प्रदेश से बाहर महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश तक भी पहुंचने की बात सामने आई है। जांचकर्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि शिकार से लेकर अंतिम खरीदार तक कथित नेटवर्क कैसे काम करता था।

65 किलो काले हिरण का मांस मिलने के बाद खुला मामला

मामला दिसंबर 2024 में सामने आया था। महू क्षेत्र के पास आगरा-मुंबई मार्ग पर वन विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई के दौरान एक वाहन से बड़ी मात्रा में काले हिरण का मांस बरामद किया गया था।

रिपोर्टों के मुताबिक कार्रवाई में करीब 65 किलो काले हिरण का मांस, मोबाइल फोन, कारतूस, एक देसी पिस्टल और वाहन जब्त किया गया था। शुरुआती कार्रवाई के बाद जांच आगे बढ़ी तो आरोपितों के मोबाइल फोन से मिले डिजिटल साक्ष्यों ने मामले को और गंभीर बना दिया।

जांच के दौरान एक आरोपित के मोबाइल से हिरण, चिंकारा और बारहसिंगा के कथित शिकार से संबंधित तस्वीरें और वीडियो मिलने की जानकारी सामने आई। इसके बाद जांचकर्ताओं को आशंका हुई कि मामला किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा वन्यजीव शिकार और तस्करी नेटवर्क हो सकता है।

पहले गिरफ्तार किए गए आरोपितों से पूछताछ के बाद जांच का दायरा बढ़ा और शाजापुर तथा मुंबई से जुड़े अन्य लोगों को भी प्रकरण में आरोपित बनाया गया।

मोबाइल फोन में मिले फोटो और वीडियो बने जांच का अहम आधार

वन्यजीव अपराधों में डिजिटल साक्ष्य की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इस मामले में भी मोबाइल फोन की जांच महत्वपूर्ण साबित हुई। रिपोर्टों के अनुसार, आरोपितों के फोन में कथित रूप से शिकार किए गए वन्यजीवों से संबंधित तस्वीरें और वीडियो मिले।

जांच एजेंसी के लिए ये सामग्री केवल घटनाओं की जानकारी जुटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे कथित नेटवर्क के सदस्यों, उनके संपर्कों और शिकार के तरीके के बारे में भी सुराग मिल सकते हैं।

पहले की जांच में यह भी सामने आया था कि आरोपितों से पूछताछ के दौरान मध्य प्रदेश के जंगलों में शिकार और वन्यजीवों के मांस तथा अन्य अंगों को अलग-अलग माध्यमों से आगे पहुंचाए जाने की जानकारी मिली थी। हालांकि जांच के दौरान सामने आई ऐसी जानकारियां अभी आरोपों और विवेचना का हिस्सा हैं और अंतिम रूप से उनकी पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में होनी है।

सबसे बड़ा सवाल—खाल और ट्रॉफी कहां जाती थी?

जांच में अब सबसे महत्वपूर्ण कड़ी वन्यजीवों के दूसरे अंगों की कथित तस्करी को लेकर है।

काले हिरण या अन्य वन्यजीव का शिकार होने के बाद सिर्फ मांस ही नहीं, बल्कि खाल, सींग, सिर और अन्य हिस्सों का भी अवैध कारोबार हो सकता है। इसलिए STSF यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित तौर पर शिकार किए गए जानवरों के अलग-अलग हिस्सों को कौन लोग लेते थे और उन्हें किस स्थान तक पहुंचाया जाता था।

पहले सामने आई जांच संबंधी रिपोर्टों में यह दावा किया गया था कि कथित नेटवर्क में मांस, खाल और सींग को अलग-अलग लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था थी। कुछ रिपोर्टों में मध्य प्रदेश से मुंबई और विदेशों तक संभावित कड़ियों का भी उल्लेख हुआ है।

यही वजह है कि जांच एजेंसी के लिए अब केवल बरामद 65 किलो मांस का मामला ही महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। यदि कथित नेटवर्क की अन्य कड़ियां सामने आती हैं तो इससे यह पता चल सकता है कि वन्यजीवों के शिकार के पीछे आर्थिक लाभ का पूरा तंत्र किस तरह संचालित हो रहा था।

मुख्य आरोपित लंबे समय से जेल में

मामले में मुख्य तस्कर के लंबे समय से जेल में होने के बावजूद जमानत नहीं मिलने का पहलू भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध रिपोर्टों में मुख्य आरोपित सबाह अंतुले के संबंध में बताया गया है कि वह जेल में बंद है और हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट से भी उसे जमानत नहीं मिली। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार वह 27 अक्टूबर 2025 से केंद्रीय जेल इंदौर में बंद था।

वहीं, आपके द्वारा उपलब्ध कराई गई हालिया जानकारी में मुख्य आरोपित के करीब 22 महीने से जेल में होने और ट्रायल में देरी को लेकर हाईकोर्ट की चिंता का उल्लेख है। इसलिए इस प्रकरण में अलग-अलग आरोपितों और अलग-अलग मामलों की प्रक्रियात्मक स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है।

जमानत का फैसला केवल जेल में बिताई गई अवधि के आधार पर नहीं होता। न्यायालय मामले की गंभीरता, आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध सामग्री, जांच की स्थिति, गवाहों की स्थिति और अन्य परिस्थितियों को भी देखता है। इस मामले में भी न्यायालय ने परिस्थितियों को देखते हुए जमानत देने से इनकार किया है।

ट्रायल में देरी पर हाईकोर्ट ने दिखाई गंभीरता

इस प्रकरण में हाईकोर्ट की ओर से रोजाना सुनवाई के निर्देश को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आपराधिक मुकदमों में लंबे समय तक चलने वाला ट्रायल स्वयं एक गंभीर न्यायिक मुद्दा होता है। एक तरफ आरोपित को कानून के अनुसार शीघ्र सुनवाई का अधिकार है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर अपराधों के मामलों में अभियोजन पक्ष के गवाहों और साक्ष्यों को समय पर न्यायालय के सामने पेश करना भी जरूरी होता है।

इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने मामले की सुनवाई को गति देने के लिए दैनिक सुनवाई का रास्ता अपनाया है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपितों को दोषी मान लिया है। किसी भी आपराधिक मामले में दोष सिद्धि का अंतिम निर्णय साक्ष्यों और ट्रायल के बाद ही होता है। फिलहाल न्यायालय के सामने सवाल यह है कि मुकदमे की प्रक्रिया बिना अनावश्यक विलंब के आगे बढ़े।

गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित करना होगी बड़ी चुनौती

रोजाना सुनवाई का आदेश तभी प्रभावी हो सकता है जब अभियोजन पक्ष के गवाह समय पर न्यायालय में उपस्थित हों और उनकी गवाही तथा जिरह की प्रक्रिया लगातार आगे बढ़े।

इसी कारण गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) से नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा गया है।

यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वन्यजीव अपराधों की जांच में कई विभाग और अधिकारी शामिल हो सकते हैं। वन विभाग, पुलिस, STSF और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय की जरूरत पड़ती है। गवाह अलग-अलग स्थानों से संबंधित हो सकते हैं और कई बार जांच अधिकारी, जब्ती अधिकारी, विशेषज्ञ तथा तकनीकी साक्ष्य से जुड़े लोग भी अदालत में पेश किए जाते हैं।

ऐसे में एक नोडल अधिकारी के माध्यम से समन्वय होने से सुनवाई की तारीख पर संबंधित गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।

काले हिरण को कानून में विशेष संरक्षण

काले हिरण यानी Blackbuck (Antilope cervicapra) को वर्तमान वन्यजीव संरक्षण कानून में विशेष संरक्षण प्राप्त है। भारत सरकार के India Code पर उपलब्ध मौजूदा Wild Life (Protection) Act, 1972 की Schedule I में Blackbuck को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है।

अधिनियम की धारा 9 के तहत Schedule I और Schedule II में निर्दिष्ट जंगली जानवरों के शिकार पर रोक है, सिवाय उन परिस्थितियों के जो कानून की धारा 11 और 12 में निर्धारित हैं।

इसका मतलब यह है कि काले हिरण का कथित अवैध शिकार सामान्य वन अपराध की तरह नहीं देखा जाता। जिस प्रजाति को कानून की Schedule I में रखा गया है, उसके संबंध में कानून अपेक्षाकृत कड़े दंड का प्रावधान करता है।

मांस और ट्रॉफी भी कानून के दायरे में

वन्यजीव संरक्षण कानून केवल जीवित जानवर के शिकार तक सीमित नहीं है। किसी संरक्षित वन्यजीव से प्राप्त मांस, animal article, trophy या uncured trophy से संबंधित अपराधों पर भी कानून लागू होता है।

वर्तमान धारा 51 के अनुसार Schedule I के किसी जानवर या उसके मांस, animal article अथवा trophy से संबंधित अपराध के लिए दोषसिद्धि होने पर कम से कम तीन वर्ष से लेकर सात वर्ष तक के कारावास और निर्धारित न्यूनतम जुर्माने का प्रावधान है। दूसरी या बाद की ऐसी दोषसिद्धि पर भी कानून में कठोर दंड का प्रावधान है।

यही कानूनी पृष्ठभूमि इस मामले में बरामद मांस, कथित शिकार के वीडियो और वन्यजीवों की खाल या ट्रॉफी की संभावित तस्करी की जांच को महत्वपूर्ण बनाती है।

जांच अब केवल इंदौर तक सीमित नहीं

मामले में सामने आए सुरागों के बाद जांच का भौगोलिक दायरा भी बढ़ा है। शुरुआती कार्रवाई महू-इंदौर क्षेत्र में हुई थी, लेकिन आरोपितों के संपर्क और कथित तस्करी नेटवर्क की जांच में मुंबई सहित अन्य राज्यों के संभावित लिंक सामने आने की जानकारी पहले की रिपोर्टों में दी गई थी।

STSF अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित शिकार के पीछे कौन लोग थे, शिकार के लिए हथियार कहां से आए, जानवरों को कहां ले जाया गया, मांस और अन्य अंगों की पैकिंग तथा परिवहन किसने किया और अंतिम खरीदार तक सामग्री किस माध्यम से पहुंचाई गई।

यदि इन सवालों के जवाब मिलते हैं तो जांच केवल स्थानीय शिकार की घटना से आगे बढ़कर संभावित अंतरराज्यीय वन्यजीव अपराध नेटवर्क तक पहुंच सकती है।

पहले भी सामने आए हैं गंभीर सुराग

इस मामले की जांच के दौरान पहले सामने आई रिपोर्टों में आरोपितों से पूछताछ के आधार पर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व और कान्हा नेशनल पार्क जैसे क्षेत्रों में कथित शिकार की जानकारी मिलने का भी उल्लेख किया गया था। कुछ रिपोर्टों में मुंबई के अलग-अलग इलाकों में कथित नेटवर्क के सक्रिय होने और वन्यजीवों की खाल तथा मांस को अलग-अलग चैनलों से आगे भेजने की बात कही गई थी।

जांच में कथित रूप से शिकार में इस्तेमाल हथियारों की बरामदगी की बात भी सामने आई थी। हालांकि इन सभी तथ्यों का अंतिम मूल्यांकन ट्रायल के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

अदालत की निगरानी में अब तेजी से बढ़ेगा मामला

इस पूरे प्रकरण में हाईकोर्ट के हालिया निर्देशों के बाद अब दो मोर्चों पर तेजी दिखाई देने की उम्मीद है। पहला, ट्रायल को रोजाना चलाकर गवाहों की गवाही और अन्य न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाना। दूसरा, जांच एजेंसी द्वारा वन्यजीवों की खाल, ट्रॉफी और दूसरे अंगों की कथित तस्करी से जुड़े नेटवर्क की शेष कड़ियां तलाशना।

जांच एजेंसी के लिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि डिजिटल साक्ष्यों, मोबाइल डेटा, जब्ती और गवाहों के बयानों को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप मजबूत तरीके से प्रस्तुत किया जाए।

दूसरी ओर, आरोपितों को भी निष्पक्ष सुनवाई और कानून के तहत अपने बचाव का पूरा अधिकार है। इसलिए जांच में सामने आने वाले आरोपों और अदालत में अंततः सिद्ध होने वाले तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

वन्यजीव अपराध के खिलाफ बड़ा संदेश

काले हिरण के शिकार और कथित तस्करी का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जांच केवल एक जानवर के मांस की बरामदगी पर रुकती दिखाई नहीं दे रही है। मोबाइल फोन से मिले कथित फोटो-वीडियो, हथियारों की बरामदगी, अलग-अलग शहरों से जुड़े आरोपित और खाल तथा ट्रॉफी की संभावित तस्करी ने जांच को व्यापक बना दिया है।

हाईकोर्ट का रोजाना सुनवाई का निर्देश इस मामले में लंबित न्यायिक प्रक्रिया को गति देने की दिशा में अहम कदम है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अभियोजन पक्ष गवाहों और साक्ष्यों को कितनी तेजी से अदालत के सामने प्रस्तुत कर पाता है और STSF जांच की बची हुई कड़ियों को किस तरह जोड़ती है।

अंततः मामले में आरोपितों की आपराधिक जिम्मेदारी का फैसला अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत काले हिरण जैसी Schedule I प्रजाति के शिकार, उसके मांस या उसके अंगों की कथित तस्करी को कानून गंभीर अपराध के रूप में देखता है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।