लखनऊ के स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष अभियान, POCSO कानून और गुड टच-बैड टच की दी जाएगी जानकारी
बच्चों को यौन अपराधों से बचाने, उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी देने और किसी असहज या खतरनाक स्थिति में आवाज उठाने के लिए तैयार करने की दिशा में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ की ओर से विशेष विधिक जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देशों के अनुपालन में 25 सितंबर से 1 अक्टूबर 2026 तक जिले के अलग-अलग सरकारी और निजी विद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
अभियान में न्यायिक अधिकारी स्कूलों में पहुंचकर विद्यार्थियों से सीधे संवाद करेंगे। उन्हें पॉक्सो अधिनियम, 2012, बच्चों के अधिकार, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, शिकायत करने के तरीके तथा उपलब्ध सहायता सेवाओं के बारे में सरल भाषा में समझाया जाएगा। इसी क्रम में बच्चों को यह भी बताया जाएगा कि किसी गलत व्यवहार को छिपाने या डरकर चुप रहने के बजाय भरोसेमंद व्यक्ति तक बात पहुंचाना क्यों जरूरी है।
ऐसे अभियान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बाल यौन शोषण के मामलों में बच्चे कई बार घटना को समझ नहीं पाते या परिवार, शिक्षक अथवा समाज के डर से उसे किसी के सामने नहीं रखते। कानून की जानकारी और सुरक्षित वातावरण बच्चे को अपनी समस्या बताने का आत्मविश्वास दे सकते हैं।
25 सितंबर से शुरू होगा विशेष जागरूकता अभियान
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ की ओर से तैयार कार्यक्रम के तहत 25 सितंबर से 1 अक्टूबर तक विभिन्न विद्यालयों को चरणबद्ध तरीके से अभियान में शामिल किया जाएगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देश पर इसी अवधि में विद्यालयों में POCSO कानून को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर न्यायिक अधिकारी सुबह की प्रार्थना सभा में विद्यार्थियों को कानून और सुरक्षा उपायों की जानकारी दे रहे हैं।
लखनऊ में भी अभियान का मुख्य उद्देश्य कानूनी प्रावधानों को केवल किताबों या न्यायालय तक सीमित रखने के बजाय बच्चों तक उनकी समझ के अनुसार पहुंचाना है। इसके लिए स्कूलों के सहयोग से कार्यक्रमों का कैलेंडर तैयार किया गया है।
विद्यालय बच्चों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन की भूमिका केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी समस्याओं को समझना भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
POCSO Act क्या है और बच्चों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012, जिसे सामान्य तौर पर POCSO Act कहा जाता है, बच्चों को लैंगिक अपराधों से कानूनी सुरक्षा प्रदान करने वाला विशेष कानून है। कानून में बच्चों से संबंधित यौन अपराधों, रिपोर्टिंग, जांच, बयान दर्ज करने और विशेष न्यायालयों से संबंधित अलग-अलग प्रावधान किए गए हैं।
POCSO कानून का दायरा केवल गंभीर यौन हमले तक सीमित नहीं है। इसमें अलग-अलग प्रकार के sexual assault, sexual harassment और बच्चे को अश्लील गतिविधियों या सामग्री से जोड़ने जैसे अपराधों के लिए प्रावधान हैं।
इस कानून की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें बच्चे की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उसकी गरिमा को विशेष महत्व दिया गया है। यही वजह है कि स्कूलों में कानून की जानकारी देते समय केवल अपराध और सजा की बात करना पर्याप्त नहीं है। बच्चों को यह भी समझाना जरूरी है कि उनके साथ कोई गलत व्यवहार हो तो वे मदद कहां से प्राप्त कर सकते हैं।
गुड टच और बैड टच की समझ क्यों जरूरी?
अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा Good Touch और Bad Touch की जानकारी देना है। बच्चों को उनकी उम्र और समझ के अनुरूप यह बताया जाएगा कि शरीर से संबंधित कौन-सा व्यवहार उन्हें सुरक्षित महसूस कराता है और कौन-सा व्यवहार उन्हें असहज, भयभीत या परेशान कर सकता है।
बच्चों को यह संदेश दिया जाना जरूरी है कि यदि किसी व्यक्ति का व्यवहार उन्हें गलत या असहज लगता है, तो वे उस स्थिति से दूर जाने की कोशिश कर सकते हैं और तुरंत किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति को इसकी जानकारी दे सकते हैं।
यह जानकारी केवल छोटी उम्र के बच्चों के लिए ही उपयोगी नहीं है। किशोर विद्यार्थियों को भी यह समझना जरूरी है कि किसी परिचित व्यक्ति, रिश्तेदार, शिक्षक, पड़ोसी या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया अनुचित व्यवहार भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
जागरूकता का उद्देश्य बच्चों में डर पैदा करना नहीं बल्कि उन्हें सुरक्षित निर्णय लेने का आत्मविश्वास देना है।
डर और संकोच की जगह जागरूकता पर जोर
बच्चों से जुड़े मामलों में एक बड़ी चुनौती यह रहती है कि पीड़ित बच्चा घटना के बारे में बोलने से डर सकता है। कभी उसे धमकी दी जाती है, कभी शर्मिंदगी का डर होता है और कई बार बच्चा यह मान लेता है कि शायद गलती उसी की है।
ऐसी परिस्थितियों में परिवार और विद्यालय का व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। बच्चे की बात सुनना, उसे दोषी न ठहराना और आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता तक पहुंचाना जरूरी है।
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की प्रभारी सचिव शोभा भाटी के अनुसार, बच्चों को कानून की बुनियादी जानकारी होना आवश्यक है। जागरूकता की कमी के कारण कई बच्चे परेशानी का सामना करने के बावजूद किसी को इसकी जानकारी नहीं दे पाते। अभियान का उद्देश्य बच्चों के मन से डर और संकोच कम कर उनमें आत्मविश्वास पैदा करना है।
प्रार्थना सभा में भी पहुंचेगी कानूनी जानकारी
अभियान की खास बात यह है कि जागरूकता कार्यक्रम केवल अलग से आयोजित होने वाले शिविरों तक सीमित नहीं रहेंगे। न्यायिक अधिकारी विद्यालयों की प्रातःकालीन प्रार्थना सभाओं में भी विद्यार्थियों से संवाद करेंगे।
इस दौरान POCSO Act के प्रमुख प्रावधानों, बच्चों के अधिकारों और महिला एवं बाल संरक्षण से संबंधित कानूनी व्यवस्थाओं की जानकारी दी जाएगी।
प्रार्थना सभा में बड़ी संख्या में विद्यार्थी एक साथ उपस्थित होते हैं। इसलिए कम समय में बड़ी संख्या में बच्चों तक महत्वपूर्ण संदेश पहुंचाने का यह प्रभावी माध्यम बन सकता है।
साथ ही, बच्चों को यह समझाने का प्रयास किया जाएगा कि कानून केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने का माध्यम नहीं है। कानून की जानकारी व्यक्ति को अपने अधिकार समझने और समय रहते सहायता लेने में भी मदद करती है।
शिकायत करने में नहीं करें देरी
POCSO कानून में अपराध की जानकारी मिलने पर रिपोर्टिंग से संबंधित विशेष प्रावधान हैं। अधिनियम की धारा 19 अपराध की रिपोर्टिंग से संबंधित है, जबकि धारा 21 रिपोर्ट न करने या मामले को रिकॉर्ड न करने पर दंड का प्रावधान करती है।
इसलिए स्कूलों में जागरूकता अभियान के दौरान शिक्षकों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों को भी यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी बच्चे से संबंधित यौन अपराध की जानकारी मिलने पर उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
POCSO से संबंधित मॉडल गाइडलाइंस में भी अनिवार्य रिपोर्टिंग की व्यवस्था को रेखांकित किया गया है और स्कूल कर्मियों सहित संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी पर जोर दिया गया है।
बच्चों को उनकी भाषा में यह समझाना जरूरी है कि यदि उनके साथ कोई गलत घटना होती है तो वे माता-पिता, शिक्षक, स्कूल के भरोसेमंद अधिकारी या अन्य विश्वसनीय व्यक्ति से तुरंत बात कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर पुलिस और बाल संरक्षण तंत्र से भी सहायता ली जा सकती है।
बच्चे की पहचान की सुरक्षा भी कानून का महत्वपूर्ण हिस्सा
POCSO कानून में पीड़ित बच्चे की पहचान और उसकी निजता की सुरक्षा के लिए भी विशेष प्रावधान हैं। अधिनियम की धारा 23 मीडिया में बच्चे की पहचान उजागर करने पर रोक से संबंधित है। नाम, पता, फोटो, परिवार, स्कूल या ऐसी अन्य जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सके, जब तक कानून के अनुसार सक्षम विशेष न्यायालय इसकी अनुमति न दे।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि अपराध का सामना कर रहे बच्चे को घटना के बाद सामाजिक दबाव, शर्मिंदगी या पहचान उजागर होने के अतिरिक्त नुकसान से बचाया जा सके।
इसलिए बच्चों से संबंधित मामलों की रिपोर्टिंग में मीडिया, स्कूल और समाज सभी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
पुलिस के सामने बयान दर्ज करने में भी विशेष व्यवस्था
POCSO कानून बच्चों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया में भी संवेदनशीलता पर जोर देता है। कानून के अनुसार बच्चे का बयान उसके निवास स्थान या उसकी पसंद के स्थान पर, जहां तक संभव हो, महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाना चाहिए। बच्चे को रात में पुलिस स्टेशन में रखने की अनुमति नहीं है और जांच के दौरान बच्चे की पहचान की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
इन प्रावधानों की जानकारी बच्चों और उनके अभिभावकों को होने से यह समझने में मदद मिलती है कि कानून पीड़ित बच्चे की सुरक्षा और गरिमा को ध्यान में रखकर प्रक्रिया निर्धारित करता है।
1098 चाइल्ड हेल्पलाइन की भी दी जाएगी जानकारी
जागरूकता कार्यक्रमों में बच्चों को चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 के बारे में भी बताया जाएगा। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, Child Helpline 1098 को Mission Vatsalya के तहत राज्य और जिला स्तर की व्यवस्थाओं के साथ संचालित किया जा रहा है तथा इसे Emergency Response Support System 112 के साथ भी जोड़ा गया है।
बच्चों के लिए इसका महत्व इसलिए है क्योंकि संकट की स्थिति में सहायता तक पहुंच बनाने के लिए एक परिचित और याद रखने योग्य माध्यम उपलब्ध रहता है।
इसके अलावा आवश्यकता के अनुसार पुलिस सहायता, बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जैसी व्यवस्थाओं से भी संपर्क किया जा सकता है।
स्कूलों और शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
किसी भी जागरूकता अभियान की सफलता केवल एक सप्ताह के कार्यक्रम से तय नहीं होती। वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है जब स्कूलों में बच्चों के लिए लगातार सुरक्षित वातावरण बनाया जाए।
शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक आए बदलाव, भय, पढ़ाई से दूरी, किसी व्यक्ति से मिलने में असहजता या लगातार तनाव जैसे संकेतों को संवेदनशीलता से समझने की जरूरत हो सकती है। हालांकि किसी व्यवहार को देखकर अपने स्तर पर निष्कर्ष निकालने के बजाय उचित प्रक्रिया और विशेषज्ञ सहायता का सहारा लेना अधिक उचित है।
स्कूल प्रबंधन को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे बिना डर अपनी समस्या किसी भरोसेमंद व्यक्ति तक पहुंचा सकें। शिकायत करने वाले बच्चे को दोषी ठहराना या उसकी बात को दबाने की कोशिश करना समस्या को और गंभीर बना सकता है।
कानून की जानकारी बच्चों को बनाती है अधिक सजग
बच्चों को कानून पढ़ाने का अर्थ उन्हें कानूनी धाराएं याद कराना नहीं है। असल उद्देश्य यह है कि उन्हें अपने अधिकारों, सुरक्षित व्यवहार और मदद लेने के रास्तों की बुनियादी जानकारी हो।
उन्हें पता होना चाहिए कि उनकी सुरक्षा महत्वपूर्ण है, असहज व्यवहार को नजरअंदाज करना जरूरी नहीं है और परेशानी की स्थिति में मदद मांगना गलत नहीं है।
इसी सोच के साथ उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में भी POCSO जागरूकता कार्यक्रम विद्यालयों में आयोजित किए जा रहे हैं। कुछ जिलों में प्रार्थना सभा के अलावा नुक्कड़ नाटक, चित्रकला प्रतियोगिता, प्रभात फेरी और जागरूकता शिविर जैसे कार्यक्रमों को भी अभियान का हिस्सा बनाया गया है।
अभियान से क्या उम्मीद?
लखनऊ में 25 सितंबर से 1 अक्टूबर तक प्रस्तावित अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें न्यायिक अधिकारी सीधे विद्यालयों तक पहुंचकर विद्यार्थियों से संवाद करेंगे। इससे बच्चों को कानून के बारे में जानकारी सीधे न्यायिक व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों से प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।
यह पहल केवल POCSO कानून की जानकारी तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य बच्चों को यह समझाना है कि सुरक्षा, सम्मान और अपनी बात कहने का अधिकार उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस या अदालत की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। परिवार, स्कूल, शिक्षक, स्थानीय प्रशासन, बाल संरक्षण संस्थाएं और समाज—सभी की भूमिका इसमें जुड़ी हुई है। यदि बच्चा किसी समस्या को समय पर बता पाता है और आसपास के वयस्क उसकी बात को गंभीरता से लेते हैं, तो किसी गंभीर घटना को आगे बढ़ने से रोकने की संभावना भी बढ़ सकती है।
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने स्कूल प्रबंधकों और शिक्षकों से अभियान में सक्रिय सहयोग की अपील की है। उद्देश्य यही है कि कानूनी जानकारी कुछ विद्यार्थियों तक सीमित न रहे, बल्कि अधिक से अधिक बच्चों तक पहुंचे और उन्हें अपने अधिकारों तथा उपलब्ध सहायता व्यवस्था की जानकारी हो।
बच्चों की सुरक्षा केवल एक कानूनी विषय नहीं, बल्कि परिवार और समाज की साझा जिम्मेदारी है। कानून की जानकारी, संवेदनशील व्यवहार और समय पर सहायता—इन तीनों के बीच बेहतर समन्वय से बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है।
नोट: स्थानीय अभियान से जुड़े नाम, तिथियां और कार्यक्रम संबंधी विवरण उपलब्ध समाचार-सूचना के आधार पर दिए गए हैं। POCSO कानून के प्रावधानों का उल्लेख आधिकारिक India Code और सरकारी स्रोतों के आधार पर किया गया है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।