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मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी भी नाबालिग पत्नी से संबंध पर POCSO और BNS से नहीं दे सकती छूट,

मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी भी नाबालिग पत्नी से संबंध पर POCSO और BNS से नहीं दे सकती छूट, दिल्ली हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

        दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग पत्नी से यौन संबंध के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत किसी विवाह को वैध माने जाने का अर्थ यह नहीं है कि पति को 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने पर POCSO Act और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आपराधिक कार्रवाई से सुरक्षा मिल जाएगी। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कानून उन वैधानिक प्रावधानों से ऊपर नहीं हो सकता, जो बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए संसद ने बनाए हैं।

न्यायमूर्ति संजीनव नरूला ने 23 सितंबर 2026 को Bilal & Anr. v. The State Govt. of NCT of Delhi & Ors. मामले में यह टिप्पणी की। अदालत के सामने एक ऐसी याचिका थी, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई शादी का हवाला देते हुए पति-पत्नी ने आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार कर दिया और साथ ही पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तथा मुआवजे की मांग भी खारिज कर दी।

मामला क्या था?

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता नंबर-2 का जन्म 19 सितंबर 2008 को हुआ था। उसकी शादी 20 दिसंबर 2024 को याचिकाकर्ता नंबर-1 से हुई थी। उस समय लड़की की उम्र लगभग 16 साल और तीन महीने थी, जबकि पुरुष की उम्र करीब 28 वर्ष थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि शादी दोनों परिवारों की सहमति से हुई थी और लड़की की अपनी इच्छा भी इसमें शामिल थी। शादी के बाद दोनों साथ रहने लगे। बाद में महिला गर्भवती हुई और गर्भावस्था के दौरान सरकारी अस्पताल जाने पर उसके स्कूल रिकॉर्ड से उसकी उम्र का पता चला।

इसके बाद पुलिस ने BNS की धारा 64(1) और POCSO Act की धारा 6 के तहत FIR दर्ज की। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए FIR को रद्द करने की मांग की। उनका यह भी कहना था कि महिला ने किसी प्रकार के बल, दबाव या जबरदस्ती का आरोप नहीं लगाया है और वह स्वयं अपने पति के समर्थन में है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ का दिया गया हवाला

याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य तर्क यह था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार यदि लड़की ने puberty यानी यौवन की अवस्था प्राप्त कर ली है, तो कुछ परिस्थितियों में वह विवाह करने के योग्य मानी जा सकती है। इसी आधार पर यह तर्क दिया गया कि यदि विवाह व्यक्तिगत कानून के अनुसार वैध है, तो विवाह के बाद पति-पत्नी के बीच बने यौन संबंध को आपराधिक अपराध नहीं माना जाना चाहिए।

याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया कि महिला स्वयं संबंध और विवाह के समर्थन में है। इसलिए उसके पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को जारी रखना उचित नहीं है।

लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने विवाह की civil validity और नाबालिग के साथ यौन संबंध के criminal consequences को अलग-अलग कानूनी प्रश्न माना।

यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

शादी वैध हो सकती है, लेकिन आपराधिक कानून अलग सवाल है

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी विवाह की वैधता का प्रश्न और उस विवाह के दौरान नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने का प्रश्न एक ही नहीं है।

अर्थात किसी व्यक्तिगत कानून के तहत यदि विवाह को वैध माना जाता है, तो इससे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उस विवाह के बाद नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध पर POCSO Act या BNS लागू नहीं होगा।

अदालत के अनुसार, यदि ऐसा अपवाद न्यायिक आदेश के माध्यम से बना दिया जाए, तो यह ऐसा अपवाद होगा जिसे संसद ने कानून में स्पष्ट रूप से नहीं रखा है। अदालत ने इस संदर्भ में यह मूल सिद्धांत रेखांकित किया कि न्यायालय किसी मौजूदा वैधानिक सुरक्षा को केवल व्यक्तिगत कानून के आधार पर निष्प्रभावी नहीं कर सकता।

POCSO में 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति बच्चा

POCSO Act का पूरा ढांचा इस आधार पर तैयार किया गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को यौन अपराधों से विशेष कानूनी सुरक्षा दी जाए।

POCSO की धारा 2 में “child” का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम है। वहीं धारा 3 penetrative sexual assault को परिभाषित करती है और धारा 6 aggravated penetrative sexual assault के लिए कठोर दंड का प्रावधान करती है।

इस कानूनी व्यवस्था में नाबालिग की व्यक्तिगत सहमति को वयस्क व्यक्ति की सहमति के समान दर्जा नहीं दिया गया है। यही कारण है कि केवल यह कहना कि नाबालिग लड़की ने संबंध के लिए सहमति दी थी, अपने आप POCSO के तहत अपराध को समाप्त नहीं करता।

दिल्ली हाईकोर्ट इससे पहले भी कई मामलों में यह कह चुका है कि POCSO के संदर्भ में पीड़िता की उम्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। फरवरी 2025 में न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने एक अन्य मामले में कहा था कि POCSO के तहत पीड़िता 18 वर्ष से कम है तो उसकी कानूनी सहमति को वैध सहमति नहीं माना जा सकता।

BNS की धारा 63 में भी 18 वर्ष की सीमा

मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 भी महत्वपूर्ण है। BNS में rape की परिभाषा के संदर्भ में 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध को उसकी सहमति की परवाह किए बिना अपराध की श्रेणी में रखा गया है।

वहीं BNS में marital exception भी मौजूद है, लेकिन उसकी भाषा में यह स्पष्ट किया गया है कि यह अपवाद ऐसी पत्नी के मामले में है जो 18 वर्ष से कम उम्र की न हो।

इसका सीधा मतलब यह है कि विवाह अपने आप 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को कानूनी संरक्षण नहीं देता।

इसी अंतर को हाईकोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना। अदालत ने व्यक्तिगत कानून में विवाह की उम्र और आपराधिक कानून में यौन संबंध के लिए कानूनी उम्र को अलग-अलग विषय माना।

“शादी से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ जाती”

फैसले की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणियों में से एक अदालत का यह तर्क है कि शादी किसी बच्चे की उम्र नहीं बढ़ा देती।

अदालत ने उदाहरण के तौर पर समझाया कि यदि कोई व्यक्ति विवाह से पहले 16 वर्ष का है, तो विवाह के बाद भी उसकी उम्र 16 वर्ष ही रहेगी। विवाह की रस्म या सामाजिक स्थिति उस व्यक्ति की कानूनी उम्र को नहीं बदलती।

POCSO और BNS के संदर्भ में यही उम्र यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है कि संबंधित व्यक्ति यौन संबंध के लिए कानूनन सहमति देने की स्थिति में था या नहीं।

इसलिए यदि घटना के समय लड़की 18 वर्ष से कम थी, तो बाद में विवाह हो जाना या परिवारों की सहमति होना उस समय की कानूनी स्थिति को बदल नहीं सकता।

महिला की सहमति भी FIR रद्द करने का आधार नहीं बनी

इस मामले में महिला ने कथित तौर पर अपने पति का समर्थन किया था। उसने कहा था कि विवाह उसकी इच्छा से हुआ और उस पर कोई दबाव नहीं था। उसने पति की जमानत का भी समर्थन किया और गर्भावस्था के दौरान उसकी मौजूदगी चाही थी।

इसके बावजूद हाईकोर्ट ने FIR को रद्द करने से इनकार किया।

अदालत ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि POCSO के तहत किसी नाबालिग की सहमति को ऐसा कानूनी अपवाद नहीं बनाया गया है जिसके आधार पर गंभीर यौन अपराध की कार्यवाही शुरुआती स्तर पर समाप्त कर दी जाए।

हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अदालत ने आरोपी को दोषी ठहरा दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि FIR रद्द करने से इनकार करना दोषसिद्धि (conviction) का निष्कर्ष नहीं है। आरोपी के खिलाफ आरोपों का अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

अस्पताल से मिली जानकारी के बाद शुरू हुई कार्रवाई

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि महिला की उम्र का पता गर्भावस्था के दौरान सरकारी अस्पताल में उपचार के समय चला।

उसकी उम्र से संबंधित रिकॉर्ड सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की। याचिकाकर्ताओं ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और मुआवजे की मांग भी की थी।

लेकिन हाईकोर्ट ने इन मांगों को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि POCSO कानून में ऐसी परिस्थितियों में रिपोर्टिंग की वैधानिक व्यवस्था है। इसलिए केवल यह तथ्य कि महिला या उसके परिवार ने निजी शिकायत नहीं की थी, FIR को अवैध नहीं बना देता।

पहले के फैसलों से अलग दिखाई देता है वर्तमान रुख

इस विषय पर न्यायालयों में पहले अलग-अलग परिस्थितियों में अलग दृष्टिकोण देखने को मिले हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट की वर्ष 2022 की एक बेंच ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के संदर्भ में एक नाबालिग लड़की और उसके पति के बीच विवाह के बाद के संबंधों को लेकर अलग दृष्टिकोण अपनाया था। इसी तरह पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के कुछ फैसलों में मुस्लिम कानून के तहत puberty की अवधारणा और विवाह की वैधता पर चर्चा की गई थी।

एक पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट मामले में यह भी माना गया था कि मुस्लिम कानून के अनुसार puberty प्राप्त कर चुकी लड़की के विवाह की वैधता का प्रश्न अलग तरीके से देखा जा सकता है। ऐसे फैसलों में POCSO की वैधानिक व्यवस्था और व्यक्तिगत कानून के बीच टकराव का प्रश्न अलग-अलग परिस्थितियों में सामने आया है।

लेकिन वर्तमान मामले में न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने POCSO और BNS में मौजूद 18 वर्ष की सुरक्षा-सीमा को प्राथमिक कानूनी आधार माना है।

केरल हाईकोर्ट का रुख भी इसी दिशा में

दिल्ली हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण अकेला नहीं है। 2026 में केरल हाईकोर्ट ने भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग के साथ विवाह को POCSO के तहत अभियोजन से बचाव का आधार मानने से इनकार करने वाला दृष्टिकोण अपनाया था।

इससे यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है कि भारत में व्यक्तिगत कानूनों के तहत विवाह से जुड़े अधिकार और संसद द्वारा बनाए गए child-protection laws के बीच टकराव की स्थिति में आपराधिक कानून को किस प्रकार लागू किया जाए।

कोर्ट ने FIR रद्द करने से क्यों इनकार किया?

हाईकोर्ट के सामने मूल सवाल यह नहीं था कि आरोपी अंततः दोषी है या नहीं। सवाल यह था कि क्या उपलब्ध तथ्यों के आधार पर FIR को शुरुआती स्तर पर ही रद्द किया जा सकता है।

अदालत ने पाया कि लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम थी, विवाह और सहवास के तथ्य सामने थे तथा गर्भावस्था भी हुई थी। इसलिए प्रथम दृष्टया ऐसा आधार मौजूद था जिसके कारण आपराधिक जांच को केवल व्यक्तिगत कानून और कथित सहमति के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी माना कि पहले के कुछ ऐसे फैसले, जिनमें विशिष्ट परिस्थितियों में POCSO की कार्यवाही समाप्त की गई थी, उन्हें हर मामले में लागू होने वाला सामान्य marital exception नहीं माना जा सकता।

फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

इस निर्णय का महत्व केवल एक दंपती तक सीमित नहीं है। यह फैसला उस कानूनी प्रश्न को सामने लाता है जिसमें Personal Law, Child Protection Law और Criminal Law एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

अदालत ने मूल रूप से यह अंतर स्पष्ट किया है कि विवाह की वैधता और यौन अपराध से संबंधित आपराधिक जिम्मेदारी दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।

यदि कोई विवाह व्यक्तिगत कानून के अनुसार वैध माना जाता है, तो भी उससे POCSO Act की child-protection provisions स्वतः समाप्त नहीं हो जातीं। इसी प्रकार BNS की धारा 63 में 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के संबंध में marital exception उपलब्ध नहीं है।

इस फैसले से यह संदेश भी स्पष्ट होता है कि अदालतें POCSO के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सुरक्षा को व्यक्तिगत सहमति, पारिवारिक अनुमति या विवाह की स्थिति के आधार पर सामान्य रूप से कमजोर नहीं मान सकतीं।

अंतिम बात

दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी है, लेकिन अदालत ने आरोपी को दोषी घोषित नहीं किया है। मुकदमे के दौरान साक्ष्यों की जांच और आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट को करना होगा।

फिर भी फैसले की कानूनी टिप्पणी महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह की वैधता अपने आप 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को POCSO Act या BNS से प्रतिरक्षा नहीं देती।

अदालत के अनुसार, कानून द्वारा बच्चे के लिए तय की गई 18 वर्ष की सीमा विवाह के कारण नहीं बदलती। व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह का दर्जा अपने आप ऐसा अपवाद पैदा नहीं कर सकता जिसे संसद ने POCSO और BNS में मान्यता नहीं दी है।

इस प्रकार यह फैसला भारतीय आपराधिक कानून में child protection और personal law के बीच संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय के रूप में देखा जा सकता है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।