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यमुना एक्सप्रेसवे बस अग्निकांड पर हाईकोर्ट सख्त,

यमुना एक्सप्रेसवे बस अग्निकांड पर हाईकोर्ट सख्त, 9 यात्रियों की मौत के बाद पूछा- स्लीपर बसों की फिटनेस और सुरक्षा की जांच कैसे होती है?

        यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत के मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने इस घटना का स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश में संचालित हो रही स्लीपर बसों के परमिट, फिटनेस, सुरक्षा मानकों और नियमित निरीक्षण की पूरी व्यवस्था का ब्योरा राज्य सरकार से मांगा है।

मामले का नाम “In Re: Nine Dead As Bus Erupts In Flames On Yamuna E-Way” रखा गया है। कोर्ट ने कहा कि राज्य में पहले भी इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसलिए केवल एक दुर्घटना की जांच तक मामला सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह देखना जरूरी है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था जमीन पर किस तरह काम कर रही है।

हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अपर मुख्य सचिव परिवहन को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा। अधिकारियों की ओर से अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी दी गई, लेकिन कोर्ट ने नियमित जांच व्यवस्था में अभी और सुधार की गुंजाइश बताई तथा स्लीपर बसों की चेकिंग तेज करने के निर्देश दिए।

नौ यात्रियों की मौत के बाद अदालत ने लिया स्वतः संज्ञान

यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने की घटना ने यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े किए। हादसे में नौ लोगों की जान चली गई। घटना के बाद पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई के साथ-साथ यह सवाल भी सामने आया कि क्या बस निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप थी और क्या उसका नियमित निरीक्षण किया गया था।

हाईकोर्ट ने इन्हीं सवालों को व्यापक रूप से देखने का फैसला किया। अदालत ने केवल दुर्घटना के कारणों की जानकारी मांगने के बजाय पूरे प्रदेश में स्लीपर बसों के संचालन की व्यवस्था पर रिपोर्ट तलब की।

कोर्ट यह जानना चाहता है कि कितनी स्लीपर बसों को परमिट जारी किए गए, परमिट देने से पहले किन सुरक्षा मानकों की जांच की गई और बसों की सड़क पर चलने के दौरान कितनी बार जांच की जाती है।

मुख्य सचिव, डीजीपी और परिवहन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी हुए पेश

अदालत के निर्देश के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अपर मुख्य सचिव परिवहन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट के समक्ष अपनी बात रखी।

अधिकारियों ने हादसे के बाद की गई कार्रवाई और स्लीपर बसों की जांच के संबंध में उठाए गए कदमों की जानकारी दी। परिवहन विभाग की ओर से यह भी बताया गया कि राज्य में ऐसी बसों की जांच के लिए कार्रवाई की जा रही है।

हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि व्यवस्था में अभी सुधार की गुंजाइश है। अदालत ने नियमित चेकिंग को और प्रभावी बनाने तथा खास तौर पर रात के समय भी स्लीपर बसों की जांच करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसका कारण यह है कि ज्यादातर sleeper buses रात के समय लंबी दूरी की यात्रा करती हैं।

केवल चालक और परिचालक तक सीमित नहीं होगी जवाबदेही

हाईकोर्ट की सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू बस के लाइसेंसधारी की जवाबदेही से जुड़ा रहा।

अदालत ने कहा कि यदि जांच में यह सामने आता है कि बस निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं थी और आवश्यक सुरक्षा उपकरण या अन्य अनिवार्य व्यवस्था मौजूद नहीं थी तो कार्रवाई केवल चालक और परिचालक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

ऐसी स्थिति में बस के licensee के खिलाफ भी उचित कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने परिस्थितियों के आधार पर संबंधित लाइसेंसधारी की बसों पर प्रतिबंध लगाने की संभावना पर भी विचार करने की बात कही।

इस टिप्पणी का महत्व इसलिए है क्योंकि यात्री बस संचालन में केवल चालक की भूमिका नहीं होती। वाहन को परमिट दिलाना, उसका संचालन करना, फिटनेस बनाए रखना और निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना भी संबंधित ऑपरेटर या लाइसेंसधारी की जिम्मेदारी के दायरे में आता है।

हालांकि किसी व्यक्ति या संस्था की वास्तविक कानूनी जिम्मेदारी जांच के निष्कर्ष और लागू कानून के आधार पर ही तय होगी।

कोर्ट ने पूछा- बसों की फिटनेस वास्तव में कैसे जांची जा रही है?

अदालत ने राज्य सरकार से यह जानकारी मांगी है कि पिछले तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश में स्लीपर बसों को कितने परमिट जारी किए गए।

इसके साथ यह भी पूछा गया है कि परमिट जारी करने से पहले निर्धारित मानकों की जांच की गई थी या नहीं। यदि जांच की गई थी तो उसके समर्थन में कौन से दस्तावेज मौजूद हैं।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी वाहन की फिटनेस केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सड़क पर चलने वाले वाहन की वास्तविक स्थिति भी यात्रियों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

अदालत ने राज्य सरकार से निरीक्षण की प्रक्रिया और निरीक्षण के दौरान किन-किन बिंदुओं की जांच की जाती है, उसका विवरण भी मांगा है।

रात में भी होगी स्लीपर बसों की जांच

स्लीपर बसों को लेकर हाईकोर्ट ने रात के समय निरीक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया है। अदालत के समक्ष बताया गया कि sleeper buses सामान्य तौर पर रात में चलती हैं।

ऐसे में केवल दिन के समय चेकिंग करने से पूरी व्यवस्था प्रभावी नहीं हो सकती। कोर्ट ने रात में विशेष निरीक्षण किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

साथ ही यह भी देखने को कहा गया है कि क्या ये बसें निर्धारित अथवा designated स्थानों पर ही रुकती हैं। यात्रियों को बीच रास्ते में अनधिकृत स्थानों पर उतारना या चढ़ाना भी सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए अदालत ने बस संचालन की वास्तविक स्थिति की जानकारी मांगी है, न कि केवल कागजी रिकॉर्ड की।

बसों में फायर सेफ्टी की व्यवस्था पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने बसों में आग से बचाव की व्यवस्था को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए।

अदालत ने जानना चाहा कि दुर्घटनाग्रस्त बस में अग्निशमन उपकरण मौजूद थे या नहीं। यात्रियों को emergency gates के बारे में जानकारी दी गई थी या नहीं। इसके अलावा यह भी पूछा गया कि चालक और परिचालक किसी आपात स्थिति में यात्रियों को सुरक्षित निकालने के लिए आवश्यक सावधानियों और प्रक्रिया से परिचित थे या नहीं।

बस में आग लगने की स्थिति में कुछ ही मिनट यात्रियों की जान बचाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। खासतौर पर स्लीपर बसों में यात्री सीट पर बैठे होने के बजाय sleeping berths में लेटे होते हैं। रात के समय अचानक आग लगने पर उन्हें खतरे का पता चलने और बस से बाहर निकलने में अतिरिक्त कठिनाई हो सकती है।

इसी वजह से emergency exits, fire detection और suppression systems जैसी व्यवस्थाओं का सही होना महत्वपूर्ण हो जाता है।

AIS मानकों का भी लिया गया संज्ञान

सुनवाई के दौरान अमिकस क्यूरी और रिसर्च एसोसिएट्स की ओर से Automotive Industry Standard यानी AIS से संबंधित सामग्री अदालत के सामने रखी गई।

कोर्ट ने बसों से जुड़े अलग-अलग AIS standards का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के अनुसार, AIS-052 सामान्य bus body design से संबंधित है, जबकि AIS-119 sleeper coach specifications और AIS-135 fire detection and suppression से संबंधित है।

अदालत ने इन मानकों में दिए गए emergency exits और sleeper coach की संरचना से जुड़े प्रावधानों पर भी ध्यान दिया।

रिपोर्ट के अनुसार, बस की लंबाई के आधार पर sleeper coaches में चार या पांच emergency exits की आवश्यकता से संबंधित मानकों का भी उल्लेख सुनवाई के दौरान हुआ।

इसके अलावा fire detection और suppression से जुड़ी तकनीकी व्यवस्थाओं का भी संदर्भ दिया गया।

इंजन और यात्री हिस्से में आग बुझाने की तकनीक पर जोर

अदालत के समक्ष रखी गई सामग्री में engine bay में automated aerosol या foam-based fire suppression systems तथा passenger cabin में low-pressure water mist systems जैसी तकनीकी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख हुआ।

इसका उद्देश्य यह है कि आग लगने की स्थिति में उसे शुरुआती स्तर पर नियंत्रित करने का प्रयास किया जा सके और यात्रियों को बस से बाहर निकलने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

सुनवाई के दौरान Driver Drowsiness Alert System यानी ADAS से जुड़ी व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया। लंबे रूट पर चलने वाली बसों में चालक की थकान और नींद सड़क सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है।

हालांकि अदालत के सामने यह स्पष्ट नहीं हो सका कि जिस बस में हादसा हुआ, उसने संबंधित सभी निर्धारित मानकों का पालन किया था या नहीं। इसी कारण कोर्ट ने इस संबंध में विस्तृत जानकारी मांगी है।

क्या स्लीपर बसों में अतिरिक्त जगह बनाने के लिए डिजाइन बदला गया?

हाईकोर्ट ने स्लीपर बसों की डिजाइन में संभावित बदलाव को लेकर भी जानकारी मांगी है।

अदालत ने पूछा है कि क्या कुछ बसों में अतिरिक्त जगह बनाने के लिए मूल डिजाइन में बदलाव किया गया और क्या ऐसे बदलावों से सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

यह सवाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यात्री क्षमता बढ़ाने या अधिक berth उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किए गए अनधिकृत structural modifications वाहन की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

अदालत ने इस संबंध में राज्य सरकार से दस्तावेजों और निरीक्षण की जानकारी मांगी है।

बसों में पार्सल ढोने की भी होगी जांच

हाईकोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या स्लीपर बसों का इस्तेमाल यात्रियों के साथ-साथ commercial parcels ले जाने के लिए किया जा रहा है।

यात्री बस के भीतर अतिरिक्त सामान या पार्सल रखने से emergency evacuation की स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसलिए अदालत ने यह जानना जरूरी समझा कि क्या बसें यात्रियों के अलावा व्यावसायिक सामान भी लेकर चल रही थीं।

इस पहलू की जांच से यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि यात्रियों के लिए निर्धारित रास्ते, emergency exits और अन्य स्थान किसी अतिरिक्त सामान के कारण बाधित तो नहीं होते।

राज्य की सीमाओं पर चेकिंग की व्यवस्था भी जांच के दायरे में

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर मौजूद checking points और surprise inspections से संबंधित जानकारी भी मांगी है।

अदालत यह जानना चाहती है कि राज्य में प्रवेश करने वाली sleeper buses की जांच किस स्तर पर होती है और surprise checking के लिए क्या व्यवस्था है।

सिर्फ परमिट जारी कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। सड़क पर लगातार चलने के दौरान वाहन की स्थिति, चालक की योग्यता, fire safety equipment और दूसरे आवश्यक सुरक्षा मानकों की भी निगरानी जरूरी है।

इसीलिए कोर्ट ने प्रदेश के भीतर होने वाली inspections का भी पूरा विवरण मांगा है।

पहले भी हो चुके हैं ऐसे हादसे

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश में पहले हुई समान प्रकृति की दुर्घटनाओं का भी संदर्भ दिया।

रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने जुलाई 2023 में रायबरेली-प्रयागराज-लखनऊ हाईवे पर हुए हादसे, नवंबर 2024 में कन्नौज-लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे की घटना और दिसंबर 2025 में मथुरा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में यमुना एक्सप्रेसवे पर हुई घटना का उल्लेख किया।

इन घटनाओं का उल्लेख यह देखने के लिए महत्वपूर्ण है कि क्या पूर्व की दुर्घटनाओं के बाद सुरक्षा व्यवस्था में पर्याप्त सुधार हुआ या नहीं।

यदि एक ही प्रकार की दुर्घटनाएं बार-बार अलग-अलग स्थानों पर होती हैं तो केवल प्रत्येक घटना की अलग-अलग जांच पर्याप्त नहीं होती। उससे जुड़े व्यापक नियामकीय और प्रशासनिक कारणों की भी समीक्षा आवश्यक हो सकती है।

तीन साल के पुराने मामलों की कार्रवाई भी बतानी होगी

हाईकोर्ट ने राज्य से पिछले तीन वर्षों में इसी प्रकार की दुर्घटनाओं में की गई आपराधिक कार्रवाई का विवरण भी मांगा है।

अदालत जानना चाहती है कि ऐसे मामलों में कितने मुकदमे दर्ज हुए, किन लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई और उन मामलों का परिणाम क्या रहा।

इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि दुर्घटनाओं के बाद की गई कार्रवाई केवल तत्काल गिरफ्तारी तक सीमित रही या फिर वाहन मालिक, ऑपरेटर और अन्य जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही भी निर्धारित हुई।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य की रिपोर्ट केवल अदालत द्वारा पूछे गए सवालों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए प्रस्तावित सामूहिक कदम भी रिपोर्ट में बताए जाने चाहिए।

बस यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

हाईकोर्ट की कार्यवाही का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यात्रियों की सुरक्षा को लेकर है। बस में यात्रा करने वाला व्यक्ति वाहन की तकनीकी स्थिति, फिटनेस या fire safety system की जांच खुद नहीं कर सकता। वह इन व्यवस्थाओं के लिए परिवहन प्रणाली और बस ऑपरेटर पर निर्भर रहता है।

यही कारण है कि परमिट और फिटनेस की प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। वाहन की वास्तविक स्थिति, emergency exits, fire extinguishers, चालक-परिचालक की तैयारी और निर्धारित safety standards का पालन नियमित रूप से जांचना आवश्यक है।

हाईकोर्ट का स्वतः संज्ञान इसी व्यापक सवाल की ओर ध्यान आकर्षित करता है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम वास्तव में सड़क पर कितने प्रभावी ढंग से लागू हो रहे हैं।

अब आगे क्या होगा?

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट और आवश्यक दस्तावेज मांगे हैं। इस रिपोर्ट में sleeper buses की संख्या, परमिट, सुरक्षा मानकों की जांच, निरीक्षण, रात की चेकिंग, emergency arrangements, पुराने हादसों में हुई कार्रवाई और भविष्य के लिए प्रस्तावित कदमों की जानकारी शामिल होगी।

मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध की गई है।

इस बीच परिवहन विभाग को स्लीपर बसों की जांच और तेज करने के निर्देश दिए गए हैं। खासकर रात में चलने वाली बसों की surprise checking पर ध्यान दिया जा रहा है।

निष्कर्ष

यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में लगी आग में नौ यात्रियों की मौत केवल एक सड़क दुर्घटना का मामला नहीं रह गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर इसे पूरे उत्तर प्रदेश में यात्री बसों की सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ दिया है।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने यह जानने की कोशिश की है कि स्लीपर बसों को परमिट देने से पहले किन मानकों की जांच होती है, सड़क पर चलने के दौरान उनका निरीक्षण कितनी बार किया जाता है और आग जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए बसों में वास्तविक रूप से कितनी सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि यदि किसी बस में अनिवार्य सुरक्षा मानकों का पालन नहीं पाया जाता है तो जिम्मेदारी केवल चालक और परिचालक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार लाइसेंसधारी के खिलाफ भी कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

अब सरकार की रिपोर्ट और आगे की न्यायिक कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि प्रदेश में sleeper buses के संचालन और निरीक्षण की मौजूदा व्यवस्था में क्या कमियां सामने आती हैं और उन्हें दूर करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यात्रियों को सुरक्षित यात्रा उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए नियम केवल कागजों में दर्ज हैं या सड़क पर भी उनका वास्तविक पालन हो रहा है। यमुना एक्सप्रेसवे की यह त्रासदी इसी सवाल को एक बार फिर सामने लेकर आई है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।