कलकत्ता हाई कोर्ट में दुर्गा पूजा की अनुमति मांगने वाली PIL खारिज, चीफ जस्टिस बोले- जनहित के नाम पर निजी हित और प्रचार के मामले नहीं
कलकत्ता हाई कोर्ट की छत पर दुर्गा पूजा आयोजित करने और भारत माता का मंदिर बनाने की अनुमति मांगने वाली जनहित याचिका (PIL) को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश रविंद्र विठ्ठलराव घुगे और न्यायमूर्ति ओम नारायण राय की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिका को जनहित का मामला नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर भी टिप्पणी की कि जनहित याचिका के नाम पर ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें निजी हित अथवा प्रचार का उद्देश्य दिखाई देता है।
यह मामला अधिवक्ता संजय घोष की ओर से दायर किया गया था। याचिका में संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट परिसर की छत पर दुर्गा पूजा आयोजित करने की अनुमति देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि यदि किसी धर्म के लोगों को न्यायालय परिसर की छत पर धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन की अनुमति है, तो समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के तहत अन्य समुदायों को भी धार्मिक गतिविधि की अनुमति मिलनी चाहिए।
क्या था पूरा मामला?
रिपोर्ट के अनुसार, अधिवक्ता संजय घोष ने हाई कोर्ट के समक्ष जनहित याचिका दाखिल कर न्यायालय की छत पर दुर्गा पूजा आयोजित करने की अनुमति मांगी थी। याचिका में केवल पूजा आयोजन की बात ही नहीं थी, बल्कि भारत माता का मंदिर बनाने का अनुरोध भी किया गया था।
याचिकाकर्ता की दलील का आधार संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत था। उनका कहना था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और संविधान सभी धर्मों के लोगों को अपने धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। ऐसे में सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक गतिविधियों को लेकर समानता का सिद्धांत लागू होना चाहिए।
याचिका में कथित तौर पर यह भी कहा गया कि हाई कोर्ट की छत पर एक संप्रदाय के लोगों को प्रत्येक शुक्रवार को धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने की अनुमति दी जाती है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यदि एक समुदाय को धार्मिक गतिविधि की अनुमति है तो समान संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर दुर्गा पूजा की अनुमति भी दी जानी चाहिए।
भारत माता का मंदिर बनाने की भी मांग
याचिका में हाई कोर्ट की छत पर भारत माता का मंदिर बनाए जाने की अनुमति देने की मांग भी की गई थी। इसके साथ दुर्गा पूजा आयोजित करने की अनुमति मांगी गई।
याचिकाकर्ता की ओर से धार्मिक स्वतंत्रता तथा धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों को इसका आधार बताया गया। उनका तर्क था कि किसी धार्मिक आस्था को केवल इस आधार पर अलग नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी विशेष समुदाय से जुड़ी है।
हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को PIL के दायरे में स्वीकार नहीं किया। खंडपीठ ने माना कि याचिका ऐसा कोई व्यापक जनहित सामने नहीं रखती जिसके आधार पर इसे जनहित याचिका के रूप में आगे बढ़ाया जा सके।
चीफ जस्टिस ने PIL को लेकर क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश रविंद्र विठ्ठलराव घुगे ने जनहित याचिकाओं के उद्देश्य को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि PIL के नाम पर ऐसे मामले दाखिल किए जा रहे हैं जिनमें पब्लिसिटी इंटरेस्ट और पर्सनल इंटरेस्ट शामिल होता है।
चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि इस तरह की याचिका को जनहित का मामला नहीं माना जा सकता। कोर्ट के अनुसार, यह किसी वर्ग विशेष के निजी हित से जुड़ा मामला हो सकता है, लेकिन इसे व्यापक जनता के हित का प्रश्न नहीं कहा जा सकता।
इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया।
जनहित याचिका आखिर होती क्या है?
भारतीय न्याय व्यवस्था में Public Interest Litigation यानी जनहित याचिका का उद्देश्य ऐसे मामलों को अदालत के सामने लाना है जिनका संबंध व्यापक सार्वजनिक हित से हो। इसका उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत विवाद का समाधान कराना नहीं है।
समय के साथ PIL ने उन लोगों के लिए न्याय तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम विकसित किया जो स्वयं अदालत तक पहुंचने की स्थिति में नहीं होते। सामाजिक न्याय, पर्यावरण, मानवाधिकार, सार्वजनिक प्रशासन और कमजोर वर्गों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में जनहित याचिकाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
लेकिन इसके साथ अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि PIL का इस्तेमाल व्यक्तिगत विवाद, निजी लाभ या प्रचार प्राप्त करने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
इसी व्यापक सिद्धांत के संदर्भ में इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट की टिप्पणी को देखा जा सकता है। अदालत ने यह नहीं कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार मौजूद नहीं है। बल्कि मामला इस बात से जुड़ा था कि जिस राहत की मांग की गई, उसे जनहित याचिका के माध्यम से अदालत के सामने लाना उचित है या नहीं।
धार्मिक स्वतंत्रता और PIL में अंतर
भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित कई महत्वपूर्ण प्रावधान करता है। अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य सहित संविधान में निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
इसी तरह अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए संस्थाओं की स्थापना और प्रबंधन से संबंधित अधिकार प्रदान करता है, जो संवैधानिक सीमाओं के अधीन हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति या समुदाय को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होना और किसी विशेष सरकारी अथवा न्यायिक परिसर में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने का अधिकार मिलना एक ही प्रश्न नहीं है। किसी परिसर के उपयोग से संबंधित प्रशासनिक, सुरक्षा, संस्थागत और अन्य नियम भी लागू हो सकते हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने धार्मिक समानता और धर्मनिरपेक्षता के आधार पर राहत मांगी, लेकिन कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि इस मांग को PIL के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
क्या कोर्ट ने दुर्गा पूजा के खिलाफ कोई फैसला दिया?
इस मामले को समझते समय एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान में रखना जरूरी है। कोर्ट का आदेश किसी सामान्य धार्मिक त्योहार या दुर्गा पूजा पर प्रतिबंध लगाने वाला आदेश नहीं बताया गया है।
मामला विशेष रूप से हाई कोर्ट की छत पर दुर्गा पूजा आयोजित करने और भारत माता का मंदिर स्थापित करने की अनुमति मांगने वाली PIL से संबंधित था। अदालत ने इस याचिका को जनहित के मानदंड पर अस्वीकार किया।
इसलिए इस फैसले को पूरे पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा पर किसी प्रकार के प्रतिबंध के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह आदेश उस विशेष याचिका और उसमें मांगी गई राहत से संबंधित है।
हाई कोर्ट परिसर और धार्मिक गतिविधियों का सवाल
न्यायालय केवल न्यायिक विवादों की सुनवाई करने वाला स्थान नहीं है, बल्कि वह एक संवैधानिक संस्था भी है। ऐसे संस्थानों में परिसर के इस्तेमाल, सुरक्षा, प्रशासनिक व्यवस्था और सभी पक्षों के लिए समान अवसर जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
यदि किसी न्यायालय परिसर में किसी धार्मिक गतिविधि की अनुमति होने का दावा किया जाता है और उसके आधार पर किसी दूसरे धार्मिक आयोजन की मांग की जाती है, तो अदालत के सामने कई प्रश्न उठ सकते हैं। उदाहरण के लिए, संबंधित गतिविधि की प्रकृति क्या है? उसे किस नियम या प्रशासनिक अनुमति के आधार पर किया जाता है? क्या वह धार्मिक आयोजन है या कर्मचारियों/व्यक्तियों की निजी प्रार्थना से संबंधित गतिविधि? क्या दोनों गतिविधियों की तुलना कानूनी रूप से उचित है?
इस मामले में याचिकाकर्ता ने एक समुदाय द्वारा शुक्रवार को छत पर धार्मिक रीति-रिवाज किए जाने का हवाला दिया। इसके आधार पर उन्होंने दुर्गा पूजा और भारत माता मंदिर की अनुमति मांगी। अदालत ने हालांकि याचिका को जनहित का मामला नहीं माना।
PIL के दुरुपयोग पर अदालतों की चिंता
भारतीय न्यायपालिका ने अलग-अलग अवसरों पर जनहित याचिका की मूल भावना को बनाए रखने पर जोर दिया है। PIL का उद्देश्य ऐसे प्रश्नों को अदालत तक पहुंचाना है जिनका प्रभाव समाज के बड़े हिस्से पर पड़ता हो।
यदि कोई व्यक्ति अपने निजी विवाद को जनहित का नाम देकर अदालत के सामने रखता है, तो इससे न्यायिक समय और संसाधनों पर असर पड़ सकता है। इसी तरह यदि किसी मामले में मुख्य उद्देश्य प्रचार प्राप्त करना हो, तो PIL की मूल भावना प्रभावित हो सकती है।
कलकत्ता हाई कोर्ट की इस टिप्पणी का महत्व इसी संदर्भ में है। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान PIL के नाम पर निजी हित और प्रचार से जुड़े मामलों के दाखिल होने पर चिंता व्यक्त की।
संविधान का धर्मनिरपेक्ष चरित्र
भारत का संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करता है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य द्वारा सभी नागरिकों के साथ धर्म के आधार पर समान व्यवहार और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी से जुड़ा है।
हालांकि, धर्मनिरपेक्षता का संवैधानिक सिद्धांत किसी भी व्यक्ति को प्रत्येक सार्वजनिक या सरकारी परिसर में अपनी पसंद का धार्मिक आयोजन करने का स्वतः अधिकार नहीं देता। किसी स्थान के इस्तेमाल के संबंध में लागू कानून, नियम और प्रशासनिक व्यवस्था भी देखी जाती है।
यही कारण है कि धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल को किसी विशेष परिसर में धार्मिक आयोजन की अनुमति के सवाल से अलग करके समझना जरूरी है।
कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश
इस मामले में अदालत की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी PIL की प्रकृति को लेकर रही। कोर्ट ने कहा कि याचिका व्यापक जनहित से संबंधित नहीं है और इसलिए इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इससे यह संदेश मिलता है कि PIL दाखिल करते समय केवल संवैधानिक या सार्वजनिक महत्व के शब्दों का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। याचिका में वास्तविक और व्यापक सार्वजनिक हित का प्रश्न होना जरूरी है।
किसी धार्मिक समुदाय, संगठन या व्यक्ति की अपनी मांग महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन हर व्यक्तिगत या सामुदायिक मांग स्वतः PIL नहीं बन जाती। अदालत को यह देखना होता है कि उठाया गया प्रश्न वास्तव में व्यापक जनहित से जुड़ा है या नहीं।
याचिका क्यों हुई खारिज?
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट ने याचिका को मुख्य रूप से इसलिए खारिज किया क्योंकि अदालत के सामने रखी गई मांग को जनहित का मामला नहीं माना गया। मुख्य न्यायाधीश ने इसे किसी वर्ग विशेष के हित से जुड़ा हुआ माना और PIL के नाम पर निजी हित तथा प्रचार के मामलों पर चिंता व्यक्त की।
इस तरह इस मामले का केंद्र दुर्गा पूजा की धार्मिक वैधता नहीं बल्कि PIL के माध्यम से हाई कोर्ट परिसर में विशेष धार्मिक आयोजन की अनुमति मांगने का प्रश्न रहा।
निष्कर्ष
कलकत्ता हाई कोर्ट का यह फैसला PIL की संस्था और उसके उद्देश्य से जुड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण है। अधिवक्ता संजय घोष ने संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट की छत पर दुर्गा पूजा आयोजित करने तथा भारत माता का मंदिर बनाने की अनुमति मांगी थी। उनका तर्क था कि यदि किसी अन्य समुदाय को हाई कोर्ट की छत पर धार्मिक गतिविधि करने की अनुमति दी जा रही है तो समानता के आधार पर दुर्गा पूजा की अनुमति भी मिलनी चाहिए।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश रविंद्र विठ्ठलराव घुगे और न्यायमूर्ति ओम नारायण राय की खंडपीठ ने इस मांग को जनहित का मामला नहीं माना और PIL खारिज कर दी। कोर्ट ने PIL के नाम पर निजी हित अथवा प्रचार से जुड़े मामलों के दाखिल होने पर भी टिप्पणी की।
फैसले का मूल बिंदु यही है कि जनहित याचिका का इस्तेमाल व्यापक सार्वजनिक हित के प्रश्नों के लिए होना चाहिए। किसी विशेष वर्ग या समूह की मांग को PIL के रूप में अदालत के सामने रखने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि मामला वास्तव में व्यापक जनहित से जुड़ा है। धार्मिक स्वतंत्रता और समानता जैसे संवैधानिक सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी विशेष संस्थागत परिसर में धार्मिक आयोजन की अनुमति का प्रश्न अलग कानूनी और प्रशासनिक संदर्भ में देखा जा सकता है।
इस मामले में हाई कोर्ट ने इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए याचिका को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करने से इनकार किया और उसे खारिज कर दिया।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।