जब्त SUV को पुलिस रेड में ले गई, तीन दिन बाद हादसे में महिला की मौत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP को स्वतंत्र जांच के दिए आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर में पुलिस की हिरासत में रखे गए एक जब्त वाहन के कथित तौर पर बिना अनुमति इस्तेमाल किए जाने के मामले को गंभीरता से लिया है। मामला एक महिंद्रा XUV से जुड़ा है, जिसे आबकारी मामले में जब्त किया गया था। आरोप है कि बाद में इसी वाहन को पुलिसकर्मियों द्वारा थाने से निकालकर एक वांछित आरोपी की गिरफ्तारी के लिए की गई रेड में इस्तेमाल किया गया। वाहन थाने से निकलने के तीन दिन बाद मथुरा में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें एक महिला की मौत हो गई।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग की ओर से की गई पिछली विभागीय कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। कोर्ट के सामने आया कि संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही समाप्त करते हुए केवल सर्विस रिकॉर्ड में ‘सेंसर एंट्री’ की गई थी।
हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया इस कार्रवाई को मामले की गंभीरता के अनुपात में अपर्याप्त माना और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को मामले की स्वतंत्र एवं गोपनीय जांच कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने जांच पूरी कर आठ सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।
क्या है पूरा मामला?
मामला बुलंदशहर जिले के रामघाट थाना क्षेत्र से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार 16 अप्रैल 2021 को पुलिस ने एक महिंद्रा XUV को जब्त किया था।
पुलिस के अनुसार, वाहन से अवैध शराब के 19 कार्टन बरामद हुए थे। इसके बाद आबकारी मामले में वाहन को कब्जे में लिया गया और उसके संबंध में कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
किसी आपराधिक या आबकारी मामले में जब्त वाहन पुलिस के कब्जे में रहता है। ऐसे वाहन की सुरक्षित अभिरक्षा और उसका रिकॉर्ड बनाए रखना संबंधित पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है।
इसी वाहन को कुछ समय बाद 4 जून 2021 को थाने से बाहर ले जाने का मामला सामने आया।
पुलिस रेड के लिए थाने से निकाली गई SUV
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि तत्कालीन हेड मोहर्रिर सीताराम ने कांस्टेबल पंकज राणा और नरेंद्र सिंह के साथ मिलकर वाहन को थाने से बाहर निकाला था।
बताया गया कि वाहन का इस्तेमाल एक वांछित आरोपी को पकड़ने के लिए की गई पुलिस रेड में किया गया।
सरकार की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि वाहन को इस कार्रवाई के लिए तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) बीरेंद्र सिंह की जानकारी के बिना निकाला गया था।
यही तथ्य मामले में महत्वपूर्ण बन गया, क्योंकि वाहन पहले से ही पुलिस के कब्जे में जब्त संपत्ति के रूप में दर्ज था।
ऐसे वाहन को किस अधिकार के तहत थाने से बाहर ले जाया गया और उसके इस्तेमाल की अनुमति किसने दी, यह अब DGP की जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
तीन दिन बाद मथुरा में हुआ हादसा
SUV को 4 जून 2021 को थाने से बाहर ले जाने के बाद 7 जून 2021 को मथुरा के राया इलाके में दुर्घटना हो गई।
हादसे में मनोज कुमार के माता-पिता गंभीर रूप से घायल हुए। बाद में मनोज कुमार की मां की मौत हो गई।
घटना के बाद मथुरा पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और दुर्घटनाग्रस्त SUV को दोबारा अपने कब्जे में ले लिया।
इस दुर्घटना के बाद वाहन के थाने से बाहर जाने और पुलिसकर्मियों द्वारा उसके कथित इस्तेमाल का मामला गंभीर रूप से सामने आया।
यही वह बिंदु था, जिसके बाद अदालत के समक्ष यह प्रश्न उठा कि जब्त वाहन को पुलिस हिरासत से बाहर ले जाने के लिए किस स्तर पर अनुमति थी और घटना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट के सवाल पर सामने आई ‘सेंसर एंट्री’
जब हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई के बारे में जानकारी मांगी तो अदालत के सामने बताया गया कि तत्कालीन बुलंदशहर SSP ने विभागीय कार्यवाही समाप्त कर दी थी।
हेड मोहर्रिर सीताराम तथा दोनों कांस्टेबलों पंकज राणा और नरेंद्र सिंह को केवल ‘सेंसर एंट्री’ दी गई थी।
सेंसर एंट्री को सामान्य तौर पर किसी सरकारी कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड में प्रतिकूल टिप्पणी या चेतावनी के रूप में देखा जाता है। लेकिन वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने सवाल किया कि क्या इतनी कार्रवाई मामले की गंभीरता के अनुरूप थी।
अदालत ने प्रथमदृष्टया माना कि केवल सेंसर एंट्री देकर विभागीय कार्रवाई समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं दिखाई देता।
हाईकोर्ट ने जताई गंभीर आपत्ति
जस्टिस अनिल कुमार ने 22 सितंबर के आदेश में मामले की परिस्थितियों पर गंभीर टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि जब्त वाहन को बिना अनुमति थाने से बाहर ले जाना और उसका इस्तेमाल करना महज सामान्य प्रक्रियागत गलती के रूप में नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने वाहन की सुरक्षित हिरासत की जिम्मेदारी और उसके बाद हुए जानलेवा हादसे को भी मामले की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना।
हाईकोर्ट के अनुसार, मामले की गंभीरता, जब्त वाहन के कथित अनधिकृत इस्तेमाल के परिणाम और संभावित आपराधिक जिम्मेदारी पर विचार किए बिना केवल सेंसर एंट्री किया जाना प्रथमदृष्टया अपर्याप्त प्रतीत होता है।
हालांकि अदालत ने इस स्तर पर किसी पुलिसकर्मी को किसी अपराध का दोषी घोषित नहीं किया है।
DGP को स्वतंत्र और गोपनीय जांच के आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के DGP को स्वतंत्र और गोपनीय जांच कराने का निर्देश दिया।
अदालत ने जांच पूरी करने के लिए आठ सप्ताह की समय सीमा निर्धारित की है।
जांच के बाद DGP को अदालत में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना होगा कि वास्तव में वाहन को किस परिस्थिति में थाने से बाहर ले जाया गया, किसने इसकी अनुमति दी या नहीं दी, वाहन का इस्तेमाल किस उद्देश्य से हुआ और संबंधित पुलिस अधिकारियों की इसमें क्या भूमिका थी।
जांच में पहले की गई विभागीय कार्रवाई की पर्याप्तता पर भी विचार किया जाना है।
पुलिसकर्मियों की आपराधिक जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में
हाईकोर्ट ने जांच का दायरा केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा है।
अदालत ने DGP से यह भी जांच करने को कहा है कि संबंधित पुलिसकर्मियों का कथित आचरण चोरी, आपराधिक गबन या आपराधिक विश्वासघात जैसे अपराधों के दायरे में आता है या नहीं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अदालत ने अभी यह नहीं कहा है कि संबंधित पुलिसकर्मियों ने इनमें से कोई अपराध किया है।
कोर्ट ने केवल यह जांचने का निर्देश दिया है कि उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर क्या उनका आचरण किसी आपराधिक प्रावधान के अंतर्गत आता है।
अंतिम निष्कर्ष जांच और उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकलेगा।
तत्कालीन SHO की भूमिका भी जांची जाएगी
मामले में तत्कालीन SHO बीरेंद्र सिंह की भूमिका भी जांच के दायरे में रखी गई है।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया था कि वाहन को थाने से बाहर ले जाने की कार्रवाई तत्कालीन SHO की जानकारी के बिना हुई थी।
ऐसे में जांच का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या SHO को वास्तव में इसकी जानकारी नहीं थी और यदि नहीं थी तो थाने में जब्त संपत्ति की निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था कैसी थी।
DGP की जांच में पुलिस थाने के स्तर पर वाहन की सुरक्षा, रिकॉर्ड और उसके बाहर जाने की प्रक्रिया की भी पड़ताल हो सकती है।
तत्कालीन SSP की भूमिका पर भी सवाल
हाईकोर्ट ने केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों की भूमिका तक जांच सीमित नहीं रखी है।
अदालत ने तत्कालीन बुलंदशहर SSP की भूमिका की भी जांच का निर्देश दिया है, विशेष रूप से उस विभागीय कार्रवाई के संदर्भ में जिसमें संबंधित पुलिसकर्मियों को केवल सेंसर एंट्री देकर कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी।
अदालत यह देखना चाहती है कि विभागीय कार्रवाई उचित प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के अनुरूप थी या नहीं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि SSP को किसी अपराध का दोषी माना गया है। जांच का उद्देश्य प्रशासनिक निर्णय और उसकी पर्याप्तता की भी पड़ताल करना है।
जब्त संपत्ति की सुरक्षित हिरासत क्यों महत्वपूर्ण?
किसी आपराधिक मामले में जब कोई वाहन या अन्य संपत्ति पुलिस द्वारा जब्त की जाती है तो वह केवल सामान्य सरकारी संपत्ति नहीं रह जाती। वह मामले से संबंधित सामग्री या संपत्ति के रूप में पुलिस की अभिरक्षा में रहती है।
उसकी सुरक्षा, रिकॉर्ड और अदालत या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उसकी उपलब्धता बनाए रखना जांच प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
यदि ऐसी संपत्ति को बिना उचित अनुमति बाहर ले जाया जाता है तो इससे कई कानूनी और प्रशासनिक सवाल पैदा हो सकते हैं।
वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने इसी पहलू को गंभीरता से लिया है।
अदालत के सामने सवाल यह भी है कि यदि जब्त वाहन को पुलिसकर्मियों ने किसी आधिकारिक कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किया, तो उस इस्तेमाल का कानूनी आधार क्या था और उसकी अनुमति किस स्तर पर दी गई थी।
वाहन मालिक की याचिका पर भी कोर्ट का फैसला
मामले में वाहन मालिक ने अपनी SUV को जब्त किए जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।
हाईकोर्ट ने वाहन मालिक की इस याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने माना कि वाहन की मूल जब्ती का आदेश अपने आप में ऐसी कानूनी खामी से ग्रस्त नहीं था जिसके आधार पर उसे रद्द किया जाए।
हालांकि अदालत ने इसके साथ ही जब्त वाहन को संभालने के तरीके को लेकर पुलिस अधिकारियों के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए।
इस प्रकार वाहन की जब्ती और उसके बाद पुलिस हिरासत में उसके कथित इस्तेमाल को अदालत ने दो अलग-अलग पहलुओं के रूप में देखा।
जब्ती वैध, लेकिन हिरासत में इस्तेमाल पर सवाल
मामले का यह पहलू विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
एक तरफ हाईकोर्ट ने वाहन मालिक की जब्ती संबंधी चुनौती को स्वीकार नहीं किया। दूसरी तरफ पुलिस के कब्जे में आने के बाद वाहन के इस्तेमाल की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठाए।
इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी संपत्ति की जब्ती कानूनी होने का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस उसे अपनी सुविधा के अनुसार किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर सकती है।
जब्त संपत्ति के संबंध में आगे की प्रत्येक कार्रवाई लागू कानून, रिकॉर्ड और सक्षम प्राधिकारी के निर्देशों के अनुसार होनी चाहिए।
हादसे में महिला की मौत ने मामले को और गंभीर बनाया
SUV के थाने से बाहर जाने के तीन दिन बाद उसका मथुरा में दुर्घटनाग्रस्त होना और इस हादसे में एक महिला की मृत्यु होना मामले को और गंभीर बनाता है।
हालांकि यह भी जांच का विषय है कि दुर्घटना के लिए सीधे तौर पर कौन जिम्मेदार था और वाहन के इस्तेमाल तथा दुर्घटना के बीच कानूनी रूप से किस प्रकार का संबंध स्थापित होता है।
हाईकोर्ट ने फिलहाल इस संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
DGP की जांच में घटना की परिस्थितियों, वाहन के इस्तेमाल और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का परीक्षण किया जाएगा।
केवल मामूली विभागीय कार्रवाई पर भरोसा नहीं
हाईकोर्ट की टिप्पणी का एक व्यापक पहलू यह है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों में विभागीय कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर नहीं रहनी चाहिए।
यदि जांच में किसी अधिकारी के खिलाफ गंभीर अनियमितता के पर्याप्त तथ्य सामने आते हैं, तो संबंधित कानून और सेवा नियमों के अनुसार उचित कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए।
वर्तमान मामले में अदालत ने इसी संदर्भ में केवल सेंसर एंट्री किए जाने पर सवाल उठाया है।
हालांकि अंतिम रूप से कौन जिम्मेदार है और किसके खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए, यह DGP की स्वतंत्र जांच के परिणाम और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
अदालत ने पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही पर दिया संदेश
यह मामला केवल एक SUV के थाने से बाहर जाने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए पुलिस हिरासत में रखी गई जब्त संपत्ति के प्रबंधन और अधिकारियों की जवाबदेही का प्रश्न भी सामने आया है।
यदि किसी मामले में जब्त वाहन को बिना स्पष्ट अनुमति के थाने से बाहर ले जाया जाता है, तो उसके रिकॉर्ड और सुरक्षा से संबंधित जिम्मेदारी तय करना आवश्यक हो जाता है।
हाईकोर्ट ने इसी कारण मामले की स्वतंत्र जांच कराने का निर्देश दिया है।
अदालत की चिंता यह भी है कि ऐसी घटनाओं में केवल हल्की विभागीय कार्रवाई करके मामले को समाप्त कर देने से जनता के बीच पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर सवाल पैदा हो सकते हैं।
आठ सप्ताह में सामने आएगी जांच की स्थिति
अब DGP द्वारा कराई जाने वाली स्वतंत्र जांच महत्वपूर्ण होगी।
आठ सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल करनी होगी।
जांच में यह देखा जाएगा कि वाहन को थाने से बाहर निकालने का निर्णय किसने लिया, क्या कोई अनुमति थी, वाहन किस उद्देश्य से इस्तेमाल हुआ, तत्कालीन SHO की भूमिका क्या थी और विभागीय कार्रवाई के स्तर पर तत्कालीन SSP का निर्णय उचित था या नहीं।
साथ ही यह भी देखा जाएगा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किसी पुलिसकर्मी का आचरण आपराधिक कानून के तहत जांच योग्य है या नहीं।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर के इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। आबकारी मामले में जब्त की गई महिंद्रा XUV को कथित तौर पर थाने से बाहर निकालकर एक वांछित आरोपी की गिरफ्तारी के लिए की गई पुलिस रेड में इस्तेमाल किया गया। इसके तीन दिन बाद मथुरा में वाहन दुर्घटनाग्रस्त हुआ और हादसे में एक महिला की मौत हो गई।
जब हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ हुई कार्रवाई के बारे में पूछा तो सामने आया कि तत्कालीन हेड मोहर्रिर और दो कांस्टेबलों को केवल सेंसर एंट्री दी गई थी।
कोर्ट ने प्रथमदृष्टया इस कार्रवाई को मामले की गंभीरता के अनुपात में अपर्याप्त माना और उत्तर प्रदेश के DGP को स्वतंत्र एवं गोपनीय जांच के आदेश दिए। जांच आठ सप्ताह में पूरी कर अनुपालन रिपोर्ट अदालत में दाखिल करनी होगी।
जांच में तत्कालीन SHO और SSP की भूमिका भी देखी जाएगी। साथ ही यह पता लगाया जाएगा कि संबंधित पुलिसकर्मियों का कथित आचरण चोरी, आपराधिक गबन या आपराधिक विश्वासघात जैसे अपराधों के दायरे में आता है या नहीं।
हालांकि हाईकोर्ट ने अभी किसी पुलिस अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की है। यह जांच के बाद उपलब्ध तथ्यों और लागू कानून के आधार पर तय होगा।
इस मामले में वाहन मालिक की जब्ती को चुनौती देने वाली याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया, लेकिन जब्त वाहन की पुलिस हिरासत और उसके कथित इस्तेमाल को लेकर उठे सवालों की स्वतंत्र जांच का रास्ता खोल दिया है।
अब सभी की नजर DGP की जांच और उसके बाद हाईकोर्ट के समक्ष दाखिल होने वाली अनुपालन रिपोर्ट पर रहेगी। जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि जब्त वाहन को थाने से बाहर ले जाने की पूरी प्रक्रिया क्या थी, इसमें किसकी भूमिका थी और पहले की गई विभागीय कार्रवाई पर्याप्त थी या नहीं।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।