HMA धारा 9 की कार्यवाही रद्द कराने के लिए अनुच्छेद 227 की याचिका सुनवाई योग्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत फैमिली कोर्ट में शुरू की गई कार्यवाही को रद्द कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सीधे हाईकोर्ट का रुख करना सुनवाई योग्य नहीं है।
जस्टिस अमित सेठ की पीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट अधिनियम के तहत वैवाहिक कार्यवाही के संबंध में फैमिली कोर्ट एक सिविल कोर्ट के रूप में कार्य करता है। इसलिए उसके समक्ष धारा 9 HMA के तहत शुरू की गई कार्यवाही सिविल कार्यवाही है। ऐसी कार्यवाही को केवल इस आधार पर अनुच्छेद 227 की याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती कि याचिकाकर्ता के अनुसार मुकदमा प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अदालत ने पति की ओर से दायर विविध याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना और उसके पक्ष में उठाए गए मुद्दे का उत्तर उसके खिलाफ दिया।
यह मामला 2026 LiveLaw (MP) 387 के रूप में रिपोर्ट किया गया है।
क्या था मामला?
मामले में एक पति ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में विविध याचिका दाखिल की थी। पति की मांग थी कि उसकी पत्नी द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत फैमिली कोर्ट, ग्वालियर में शुरू की गई कार्यवाही को रद्द किया जाए।
धारा 9 हिंदू विवाह अधिनियम में वैवाहिक अधिकारों की बहाली से संबंधित प्रावधान है। जब पति या पत्नी में से कोई एक बिना उचित कारण दूसरे की संगति से अलग हो जाता है, तो पीड़ित पक्ष निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का रुख कर सकता है।
वर्तमान मामले में पति का आरोप था कि पत्नी द्वारा धारा 9 के तहत शुरू की गई कार्यवाही वास्तविक वैवाहिक जीवन बहाल करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि उसे परेशान करने के लिए शुरू की गई है।
पति ने हाईकोर्ट से इस कार्यवाही को ही समाप्त करने की मांग की थी।
पति की ओर से क्या तर्क दिया गया?
पति की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि पत्नी की ओर से शुरू की गई धारा 9 की कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।
पति के अधिवक्ता ने यह भी बताया कि पहले स्वयं पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत आवेदन दाखिल किया था।
उस समय पत्नी ने कथित रूप से पति के साथ रहने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था।
पति की ओर से इसी परिस्थिति को आधार बनाकर यह तर्क दिया गया कि बाद में पत्नी द्वारा उसी धारा के तहत कार्यवाही शुरू करना विरोधाभासी है और इसका उद्देश्य वास्तविक रूप से वैवाहिक संबंध बहाल करना नहीं है।
इसी आधार पर पति की ओर से हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की गई।
हालांकि अदालत के सामने पहला और महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि ऐसी कार्यवाही को चुनौती देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका स्वयं सुनवाई योग्य है या नहीं।
पत्नी की ओर से याचिका की Maintainability पर सवाल
पत्नी की ओर से पति की याचिका की सुनवाई योग्यता पर प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई।
पत्नी के अधिवक्ता ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 227 हाईकोर्ट को अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति प्रदान करता है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल वैधानिक उपायों को दरकिनार करने या अधीनस्थ अदालत के मूल क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं किया जा सकता।
दूसरे शब्दों में, केवल यह कह देना कि फैमिली कोर्ट में मामला गलत तरीके से दायर किया गया है, अनुच्छेद 227 के तहत सीधे हाईकोर्ट आने का स्वतः अधिकार नहीं देता।
पत्नी की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि धारा 9 HMA के तहत कार्यवाही सिविल प्रकृति की है और फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश या डिक्री के लिए कानून में निर्धारित उपाय उपलब्ध हैं।
हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल
अदालत ने मामले में सबसे पहले यह निर्धारित किया कि क्या संविधान के अनुच्छेद 227 का इस्तेमाल करके हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत फैमिली कोर्ट में लंबित कार्यवाही को रद्द कराया जा सकता है।
यही इस मामले का केंद्रीय प्रश्न बन गया।
अदालत ने फैमिली कोर्ट की प्रकृति, वैवाहिक कार्यवाही की कानूनी स्थिति और संविधान के अनुच्छेद 227 के दायरे पर विचार किया।
पीठ ने पाया कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 10 के तहत वैवाहिक कार्यवाही के संबंध में फैमिली कोर्ट एक सिविल कोर्ट के रूप में कार्य करता है।
इसलिए धारा 9 HMA के तहत शुरू की गई कार्यवाही को सिविल कार्यवाही माना जाएगा।
फैमिली कोर्ट एक सिविल कोर्ट के रूप में कार्य करता है
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 10 के प्रावधानों पर ध्यान दिया।
फैमिली कोर्ट में विवाह और पारिवारिक संबंधों से जुड़े विभिन्न विवादों की सुनवाई की जाती है। इनमें वैवाहिक अधिकारों की बहाली, तलाक, विवाह की वैधता, भरण-पोषण तथा अन्य वैवाहिक विवाद शामिल हो सकते हैं।
अदालत ने कहा कि धारा 9 HMA के तहत होने वाली कार्यवाही सिविल प्रकृति की है।
इसका एक महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश और डिक्री कानून में उपलब्ध वैधानिक उपायों के अधीन रहते हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को पति की अनुच्छेद 227 याचिका की सुनवाई योग्यता तय करने में महत्वपूर्ण माना।
अनुच्छेद 227 की शक्ति का दायरा
संविधान का अनुच्छेद 227 हाईकोर्ट को अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायाधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति देता है।
यह शक्ति न्यायिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रत्येक सिविल विवाद को सीधे हाईकोर्ट में लाने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने वर्तमान मामले में इसी पहलू पर जोर दिया।
यदि अधीनस्थ सिविल न्यायालय के समक्ष कोई मामला लंबित है और पक्षकार उस कार्यवाही के तथ्यात्मक आधार या आरोपों पर विवाद करता है, तो केवल उस आधार पर अनुच्छेद 227 का सहारा लेकर मामले को शुरुआत में ही समाप्त कराने की मांग नहीं की जा सकती।
विशेष रूप से तब, जब कथित दुरुपयोग का आरोप स्वयं ऐसे तथ्यों से संबंधित हो जिन्हें साक्ष्य के माध्यम से साबित किया जाना आवश्यक है।
पत्नी ने मुकदमा परेशान करने के लिए किया—इस आरोप पर कोर्ट ने क्या कहा?
पति की ओर से यह महत्वपूर्ण आरोप लगाया गया था कि पत्नी ने धारा 9 के तहत मुकदमा उसे परेशान करने के उद्देश्य से दायर किया है।
हाईकोर्ट ने इस आरोप को सीधे स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि यदि किसी पक्ष का दावा है कि दूसरे पक्ष ने कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हुए केवल परेशान करने के उद्देश्य से मुकदमा दायर किया है, तो ऐसे आरोप को प्रमुख साक्ष्यों के आधार पर स्थापित करना होगा।
अर्थात केवल आरोप लगा देने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि धारा 9 की कार्यवाही वास्तव में दुर्भावनापूर्ण है।
इस तरह के तथ्यात्मक विवाद का परीक्षण उस अदालत में साक्ष्य और रिकॉर्ड के आधार पर किया जाना चाहिए जहां मूल कार्यवाही लंबित है।
हाईकोर्ट इस स्तर पर मामले के गुण-दोष में नहीं जाएगा
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट धारा 9 की कार्यवाही के मूल गुण-दोष की जांच नहीं कर सकता।
पति का दावा था कि पत्नी की कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। लेकिन इस दावे की सच्चाई तय करने के लिए मामले के तथ्य, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य देखना आवश्यक होगा।
यदि पति और पत्नी के बीच इस बात को लेकर विवाद है कि किसने किसे छोड़ दिया, किसने साथ रहने से इनकार किया या किसका आचरण क्या रहा, तो इन प्रश्नों का समाधान तथ्यात्मक जांच के बाद किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने वर्तमान अनुच्छेद 227 याचिका के स्तर पर इस तरह की विस्तृत तथ्यात्मक जांच से परहेज किया।
जैकी बनाम टिनी उर्फ एंटनी मामले का उल्लेख
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने Jacky v. Tiny alias Antony (2014) के निर्णय का भी उल्लेख किया।
इस मामले का संदर्भ देते हुए अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों की प्रकृति पर विचार किया।
अदालत ने माना कि हाईकोर्ट के पास उचित मामलों में सिविल या निजी विवादों में हस्तक्षेप करने की शक्ति हो सकती है, लेकिन इस शक्ति का प्रयोग निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया और उपलब्ध कानूनी उपायों को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता।
इसलिए अनुच्छेद 227 को ऐसा सामान्य माध्यम नहीं माना जा सकता जिसके जरिए सिविल कार्यवाही को उसकी शुरुआत में ही समाप्त कराने की मांग की जाए।
सिविल कोर्ट के आदेश और रिट क्षेत्राधिकार
हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष में दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर जोर दिया।
पहला, पति द्वारा वर्तमान याचिका संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर की गई थी।
दूसरा, जिस कार्यवाही को चुनौती दी गई थी, वह फैमिली कोर्ट के समक्ष चल रही सिविल प्रकृति की कार्यवाही थी।
अदालत ने इस संदर्भ में कहा कि सिविल कोर्ट के न्यायिक आदेश सामान्यतः रिट क्षेत्राधिकार के तहत इस प्रकार चुनौती देने के लिए उपलब्ध नहीं होते।
ऐसे मामलों में कानून द्वारा निर्धारित अपीलीय या अन्य वैधानिक उपायों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
धारा 9 HMA क्या है?
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 Restitution of Conjugal Rights, यानी वैवाहिक अधिकारों की बहाली से संबंधित है।
जब पति या पत्नी में से कोई एक बिना उचित कारण दूसरे की संगति से अलग हो जाता है, तो दूसरा पक्ष अदालत के समक्ष वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका प्रस्तुत कर सकता है।
अदालत मामले के तथ्यों और कानून के अनुसार यह तय करती है कि वैधानिक शर्तें पूरी होती हैं या नहीं।
वर्तमान मामले में विवाद इस बात पर नहीं था कि धारा 9 क्या है, बल्कि मुख्य प्रश्न यह था कि फैमिली कोर्ट में लंबित ऐसी कार्यवाही को अनुच्छेद 227 के तहत सीधे हाईकोर्ट में चुनौती देकर समाप्त कराया जा सकता है या नहीं।
हाईकोर्ट ने पति की याचिका क्यों स्वीकार नहीं की?
अदालत ने पति की याचिका को उसके गुण-दोष के आधार पर खारिज करने के बजाय उसकी सुनवाई योग्यता के प्रश्न पर विचार किया।
पीठ ने पाया कि जिस कार्यवाही को चुनौती दी गई है वह फैमिली कोर्ट के समक्ष सिविल प्रकृति की कार्यवाही है।
साथ ही पति द्वारा लगाए गए आरोप—कि पत्नी ने मुकदमा परेशान करने के लिए दायर किया—ऐसे तथ्यात्मक आरोप हैं जिन्हें साक्ष्य के माध्यम से स्थापित किया जाना आवश्यक है।
इस स्तर पर हाईकोर्ट के समक्ष उन तथ्यों की विस्तृत जांच संभव नहीं थी।
इसलिए अदालत ने तैयार किए गए कानूनी मुद्दे का उत्तर पति के खिलाफ दिया।
फैसले का वैवाहिक मामलों पर प्रभाव
यह निर्णय वैवाहिक विवादों में सीधे हाईकोर्ट का रुख करने वाले पक्षकारों के लिए महत्वपूर्ण है।
पति या पत्नी यदि फैमिली कोर्ट में चल रही कार्यवाही से असहमत हैं, तो केवल यह आरोप लगाकर कि मामला दुर्भावनापूर्ण है या दूसरे पक्ष ने कानून का दुरुपयोग किया है, हर मामले में अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में कार्यवाही समाप्त कराने की मांग नहीं की जा सकती।
यदि विवाद तथ्यात्मक है तो उसे साक्ष्य के माध्यम से स्थापित करना होगा।
साथ ही संबंधित वैधानिक अपील या अन्य उपलब्ध कानूनी उपायों की प्रकृति को भी ध्यान में रखना होगा।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इस फैसले में मुख्य जोर Maintainability यानी याचिका की सुनवाई योग्यता पर रहा।
जस्टिस अमित सेठ की पीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 10 के संदर्भ में धारा 9 HMA के तहत होने वाली वैवाहिक कार्यवाही सिविल कार्यवाही है। ऐसे में उसे रद्द कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सीधे हाईकोर्ट में दायर याचिका को इस रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पति का आरोप था कि पत्नी ने उसे परेशान करने के लिए धारा 9 के तहत कार्यवाही शुरू की है। लेकिन अदालत ने माना कि इस तरह के आरोपों को साक्ष्य के आधार पर स्थापित करना होगा और इस याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट उस तथ्यात्मक विवाद की विस्तृत जांच नहीं कर सकता।
अदालत ने दो आधारों पर पति की दलीलों को स्वीकार नहीं किया—पहला, याचिका अनुच्छेद 227 के तहत दायर की गई थी और दूसरा, विवाद फैमिली कोर्ट के समक्ष चल रही सिविल प्रकृति की न्यायिक कार्यवाही से संबंधित था।
इस निर्णय से यह सिद्धांत सामने आता है कि संविधान के अनुच्छेद 227 में हाईकोर्ट की अधीक्षण शक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल हर सिविल या वैवाहिक कार्यवाही को सीधे हाईकोर्ट में चुनौती देकर समाप्त कराने के सामान्य माध्यम के रूप में नहीं किया जा सकता। संबंधित पक्ष को उपलब्ध वैधानिक उपायों और प्रक्रिया का पालन करना होगा।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।