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सूचना के बिना पुलिस अधिकारी को लापरवाही का दोषी नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रतिकूल प्रविष्टि रद्द की

सूचना के बिना पुलिस अधिकारी को लापरवाही का दोषी नहीं ठहराया जा सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रतिकूल प्रविष्टि रद्द की

       इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी पुलिस अधिकारी को महज इस आधार पर लापरवाह नहीं ठहराया जा सकता कि उसने किसी संभावित घटना को रोकने के लिए कार्रवाई नहीं की, जबकि उसके पास ऐसी कार्रवाई की आवश्यकता बताने वाली कोई सूचना या खुफिया जानकारी ही उपलब्ध नहीं थी।

       न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने यह टिप्पणी पुलिस अधिकारी नरेश सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए की। अदालत ने उनके खिलाफ की गई दंडात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया। मामले में पुलिस अधिकारी पर आरोप था कि वह विस्फोटकों के दोबारा जमा किए जाने और बाद में हुए घातक विस्फोट को रोकने में विफल रहे थे।

हाई कोर्ट ने मार्च 2026 में अधिकरण द्वारा पारित निर्णय और आदेश के साथ-साथ याची को दी गई सजा को भी निरस्त कर दिया। अदालत के निर्णय का महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि पुलिस अधिकारी की जिम्मेदारी तय करने के लिए यह देखना आवश्यक है कि संबंधित अधिकारी के पास उस समय कार्रवाई करने के लिए कोई वास्तविक सूचना या आधार मौजूद था या नहीं।

क्या था पूरा मामला?

मामला उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के खतौली थाना क्षेत्र से जुड़ा है। याची नरेश सिंह उस समय थाना खतौली के अंतर्गत एक पुलिस चौकी के प्रभारी के पद पर तैनात थे।

मामले के अनुसार, 7 नवंबर 2023 को शादाब नामक व्यक्ति के घर से बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री बरामद की गई थी। इस बरामदगी के बाद संबंधित मामले में पुलिस कार्रवाई की गई थी।

बाद में 22 जनवरी 2024 को शादाब के घर में एक विस्फोट हुआ। इस घटना में दो नाबालिग बच्चों की मौत हो गई। घटना के बाद यह सवाल उठा कि घर में दोबारा विस्फोटक सामग्री कैसे पहुंची और क्या पुलिस की ओर से उसे रोकने के लिए पर्याप्त निगरानी की गई थी।

इसी संदर्भ में पुलिस चौकी प्रभारी नरेश सिंह के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई। उन पर आरोप लगाया गया कि पहले विस्फोटक बरामद होने के बावजूद उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को इस संबंध में कोई सूचना नहीं दी कि शादाब के घर में फिर से विस्फोटक सामग्री जमा की जा रही है।

विभाग ने इसे पुलिस अधिकारी की लापरवाही माना और उन्हें दंडस्वरूप प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई।

पुलिस अधिकारी ने हाई कोर्ट में क्या दलील दी?

नरेश सिंह की ओर से अदालत के समक्ष मुख्य रूप से यह कहा गया कि जिस घटना के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया, उसके संबंध में उनके पास आवश्यक सूचना ही उपलब्ध नहीं थी।

याची का कहना था कि वह केवल पुलिस चौकी प्रभारी के रूप में कार्यरत थे। वह उस मामले के विवेचक नहीं थे, जिसमें 7 नवंबर 2023 को विस्फोटक बरामद किए गए थे।

उनकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पहली बरामदगी के बाद शादाब के घर में दोबारा विस्फोटक सामग्री जमा किए जाने की कोई जानकारी उन्हें नहीं दी गई थी। न तो उन्हें ऐसी कोई सूचना प्राप्त हुई और न ही रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य था, जिससे यह साबित हो सके कि उन्हें दोबारा विस्फोटक जमा किए जाने की जानकारी थी।

ऐसे में याची ने कहा कि जिस घटना की जानकारी ही पुलिस अधिकारी को नहीं थी, उसे रोकने में विफलता के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

राज्य सरकार की ओर से क्या कहा गया?

राज्य सरकार ने याची के तर्क का विरोध किया।

सरकार की ओर से कहा गया कि नरेश सिंह को क्षेत्र में अवैध पटाखा निर्माण और विस्फोटक सामग्री के इस्तेमाल की जानकारी थी। इसलिए उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियों पर नजर रखें।

सरकार का पक्ष था कि पहले विस्फोटक बरामद होने की घटना अपने आप में ऐसी परिस्थिति थी, जिसके बाद संबंधित पुलिस अधिकारी को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए थी।

राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि चौकी प्रभारी होने के कारण क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा था और उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि पहले जिस स्थान से विस्फोटक बरामद हुए थे, वहां दोबारा ऐसी सामग्री जमा न हो।

इस आधार पर विभागीय कार्रवाई को उचित ठहराने का प्रयास किया गया।

हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद क्या पाया?

खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण किया। अदालत का ध्यान इस बात पर केंद्रित रहा कि क्या नरेश सिंह के पास 22 जनवरी 2024 के विस्फोट से पहले ऐसी कोई सूचना थी, जिसके आधार पर वह शादाब के घर में दोबारा विस्फोटक सामग्री जमा किए जाने के खिलाफ कार्रवाई कर सकते थे।

अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि संबंधित पुलिस चौकी को शादाब के घर में विस्फोटक सामग्री दोबारा लाए जाने या जमा किए जाने की सूचना मिली थी।

यानी पुलिस अधिकारी के पास उस समय कार्रवाई करने के लिए कोई विशिष्ट सूचना या खुफिया जानकारी उपलब्ध होने का प्रमाण नहीं था।

यही तथ्य मामले में महत्वपूर्ण साबित हुआ।

सूचना के अभाव में कार्रवाई न करना लापरवाही नहीं

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी के खिलाफ लापरवाही का निष्कर्ष निकालने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उसने कोई कार्रवाई नहीं की।

यह भी देखना आवश्यक है कि क्या उस अधिकारी के पास कार्रवाई करने के लिए आवश्यक सूचना उपलब्ध थी?

यदि अधिकारी को किसी संभावित अपराध या खतरे के संबंध में कोई सूचना ही प्राप्त नहीं हुई थी, तो केवल घटना हो जाने के बाद पीछे मुड़कर यह कहना कि अधिकारी को पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी, अपने आप में लापरवाही साबित नहीं करता।

अदालत की reasoning का मूल आधार यही था कि किसी अधिकारी की जिम्मेदारी उस समय उपलब्ध परिस्थितियों और सूचना के आधार पर तय की जानी चाहिए, न कि केवल बाद में घटित घटना के परिणाम को देखकर।

दूसरे शब्दों में, किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना का घटित होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उससे पहले संबंधित पुलिस अधिकारी ने कर्तव्य में लापरवाही की थी।

बाद में हुई घटना के आधार पर पिछली कार्रवाई का आकलन

इस मामले में 22 जनवरी 2024 को विस्फोट हुआ और दो बच्चों की जान चली गई। घटना गंभीर थी और स्वाभाविक रूप से पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे।

लेकिन हाई कोर्ट ने पुलिस अधिकारी की विभागीय जिम्मेदारी निर्धारित करते समय घटना के परिणाम और अधिकारी के पास उपलब्ध जानकारी के बीच अंतर किया।

यदि किसी अधिकारी के पास पहले से कोई विश्वसनीय सूचना हो कि किसी स्थान पर विस्फोटक सामग्री जमा की जा रही है और इसके बावजूद वह कार्रवाई नहीं करता, तो परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।

लेकिन यहां अदालत को रिकॉर्ड में ऐसी सूचना का प्रमाण नहीं मिला।

इसलिए केवल यह तथ्य कि पहले उसी व्यक्ति के घर से विस्फोटक बरामद हुए थे, अपने आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं था कि बाद में उसी घर में दोबारा विस्फोटक जमा किए जाने की जानकारी भी चौकी प्रभारी को थी।

विस्फोट के बाद पुलिस अधिकारी की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण

हाई कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि विस्फोट की घटना के बाद याची ने तत्काल कार्रवाई की थी।

यह तथ्य भी विभागीय आरोप के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण था। अदालत ने रिकॉर्ड में उपलब्ध परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए पाया कि याची के खिलाफ लगाए गए आरोप उस स्तर तक प्रमाणित नहीं थे, जिससे उन्हें दंडित किया जा सके।

इस प्रकार अदालत ने केवल घटना की गंभीरता को आधार बनाकर पुलिस अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने से इनकार किया।

पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी का मतलब क्या है?

यह निर्णय पुलिस अधिकारियों को जिम्मेदारी से मुक्त करने वाला सामान्य सिद्धांत नहीं है। बल्कि इसमें यह बात सामने आती है कि विभागीय जिम्मेदारी तय करते समय वास्तविक परिस्थितियों को देखना आवश्यक है।

पुलिस अधिकारी का कर्तव्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अपराधों की रोकथाम करना है। लेकिन हर अधिकारी से ऐसी घटना की पूर्व जानकारी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जिसकी कोई सूचना उसके पास उपलब्ध ही न हो।

पुलिस व्यवस्था में अलग-अलग अधिकारियों की अलग-अलग भूमिकाएं होती हैं। विवेचक, थाना प्रभारी, चौकी प्रभारी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के कर्तव्य और अधिकार भी परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकते हैं।

इसलिए किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय यह निर्धारित करना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी की वास्तविक भूमिका क्या थी, उसके पास कौन-सी सूचना उपलब्ध थी और उस सूचना के आधार पर उससे क्या कार्रवाई अपेक्षित थी।

‘पहले की घटना’ और ‘नई जानकारी’ में अंतर

इस मामले से एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी सामने आता है कि किसी स्थान पर पहले अपराध या अवैध गतिविधि पाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस अधिकारी को उस स्थान पर भविष्य में होने वाली प्रत्येक गतिविधि की जानकारी स्वतः हो जाएगी।

यदि किसी व्यक्ति के घर से पहले विस्फोटक बरामद हुए थे, तो निश्चित रूप से पुलिस के लिए वह घटना महत्वपूर्ण थी। लेकिन बाद में उसी व्यक्ति द्वारा फिर से विस्फोटक जमा किए जाने की जानकारी अधिकारी तक पहुंची थी या नहीं, यह अलग तथ्य है।

यदि दूसरी घटना के संबंध में कोई सूचना उपलब्ध नहीं थी, तो केवल पहली घटना के आधार पर अधिकारी को दूसरी घटना के लिए दोषी ठहराने के लिए अतिरिक्त आधार की आवश्यकता होगी।

हाई कोर्ट को इस मामले में ऐसा पर्याप्त आधार नहीं मिला।

अधिकरण का आदेश भी रद्द

याची ने विभागीय कार्रवाई के खिलाफ न्यायिक मंच का दरवाजा खटखटाया था। मार्च 2026 में अधिकरण ने उनके पक्ष में राहत नहीं दी थी।

इसके बाद नरेश सिंह ने हाई कोर्ट का रुख किया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अधिकरण के मार्च 2026 के निर्णय और आदेश को रद्द कर दिया।

इसके साथ ही याची को दी गई दंडात्मक सजा और प्रतिकूल प्रविष्टि भी निरस्त कर दी गई।

इस तरह याची को विभागीय कार्रवाई से राहत मिली।

फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

यह फैसला इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इसमें पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही और उपलब्ध सूचना के बीच संबंध को रेखांकित किया गया है।

किसी घटना के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसे पहले क्यों नहीं रोका गया। लेकिन विभागीय या कानूनी जिम्मेदारी तय करने के लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी के पास घटना से पहले ऐसी जानकारी थी या नहीं, जिससे वह उचित कार्रवाई कर सकता था।

यदि सूचना उपलब्ध थी और अधिकारी ने जानबूझकर या लापरवाही से कार्रवाई नहीं की, तो उस स्थिति में जिम्मेदारी का प्रश्न अलग तरीके से उठ सकता है।

इसके विपरीत, यदि कोई सूचना ही उपलब्ध नहीं थी और अधिकारी के खिलाफ केवल घटना हो जाने के आधार पर कार्रवाई की जाती है, तो ऐसी कार्रवाई के लिए ठोस आधार आवश्यक होगा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय इसी अंतर को रेखांकित करता है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नरेश सिंह के मामले में यह स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारी की लापरवाही तय करते समय केवल बाद में हुई गंभीर घटना को आधार नहीं बनाया जा सकता। यह देखना आवश्यक है कि घटना से पहले संबंधित अधिकारी के पास कार्रवाई करने के लिए कोई सूचना, खुफिया जानकारी या अन्य ठोस आधार मौजूद था या नहीं।

मामले में अदालत को रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि नरेश सिंह को शादाब के घर में दोबारा विस्फोटक जमा किए जाने की जानकारी थी। ऐसे में केवल कार्रवाई न करने के आधार पर उन्हें लापरवाह ठहराना उचित नहीं माना गया।

अदालत ने मार्च 2026 के अधिकरण के आदेश के साथ-साथ याची के खिलाफ की गई सजा को रद्द कर दिया।

यह निर्णय इस सिद्धांत को सामने रखता है कि किसी अधिकारी की जवाबदेही निर्धारित करते समय उस समय उपलब्ध सूचना, अधिकारी की वास्तविक भूमिका और उससे अपेक्षित कर्तव्य को ध्यान में रखना आवश्यक है। केवल घटना के गंभीर परिणाम के आधार पर किसी अधिकारी को पूर्व की कथित लापरवाही का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।