सुप्रीम कोर्ट में हिंदी के इस्तेमाल की मांग वाली PIL खारिज, CJI सूर्यकांत ने कहा- भाषा संबंधी बदलाव धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होंगे
सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की कार्यवाही में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल किए जाने की मांग करने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिका में हिंदी के इस्तेमाल से जुड़े मुद्दे पर विचार करने के लिए एक आयोग गठित करने की मांग भी की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस तरह के बदलाव न्यायिक आदेश के माध्यम से नहीं किए जा सकते। ऐसे विषयों पर संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे तथा चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ा जाता है।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट की 25 सितंबर 2026 की सूची में भी यही पीठ दर्ज है।
हिंदी को सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग
जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में हिंदी के इस्तेमाल को लेकर संवैधानिक व्यवस्था पर विचार करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत के समक्ष यह आग्रह रखा कि इस विषय पर विचार करने के लिए कम से कम एक आयोग या समिति का गठन करने का निर्देश दिया जाए।
याचिकाकर्ता का कहना था कि हिंदी के इस्तेमाल के विषय को लेकर व्यापक स्तर पर विचार की आवश्यकता है। हालांकि, सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर सवाल उठाया कि यदि मांग का संबंध संविधान में निर्धारित भाषा संबंधी व्यवस्था में बदलाव से है, तो क्या अदालत अपने आदेश के जरिए ऐसा कर सकती है।
न्यायमूर्ति वी. मोहना ने इसी संदर्भ में पूछा कि यदि मांग संवैधानिक संशोधन की दिशा में जाती है तो अदालत ऐसा आदेश कैसे दे सकती है। इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने स्पष्ट किया कि उनकी तत्काल मांग केवल आयोग के गठन को लेकर है।
CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने भाषा संबंधी बदलावों की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के परिवर्तन अदालत के आदेश से नहीं होते, बल्कि सुधार धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से किए जाते हैं।
CJI ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं भारतीय और क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल से जुड़ी सुविधाओं को क्रमशः बढ़ा रहा है। उनके अनुसार, अदालत अब अपने फैसलों और रिपोर्टों की संक्षिप्त जानकारी हिंदी में उपलब्ध करा रही है तथा आगे अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी इस तरह की सुविधा शुरू करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
CJI की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान बनाए रखना भी आवश्यक है। यानी अदालत की ओर से भाषा के संबंध में अपनाया जा रहा दृष्टिकोण किसी एक भारतीय भाषा तक सीमित न होकर विभिन्न भाषाओं को स्थान देने की दिशा में है।
सुप्रीम कोर्ट ने PIL सुनने से क्यों इनकार किया?
याचिकाकर्ता के वकील ने जब आयोग गठित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया तो पीठ ने संवैधानिक व्यवस्था का संदर्भ लेते हुए सवाल उठाया कि क्या न्यायपालिका ऐसी प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दे सकती है।
न्यायमूर्ति वी. मोहना ने पूछा कि यदि मांग संवैधानिक प्रावधान में परिवर्तन से जुड़ी है तो अदालत की भूमिका क्या होगी। वकील ने जवाब में अपनी मांग को आयोग के गठन तक सीमित बताया, लेकिन पीठ PIL को सुनने के लिए तैयार नहीं हुई और याचिका खारिज कर दी।
यहां यह समझना जरूरी है कि याचिका खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल की आवश्यकता को नकार दिया है। अदालत की टिप्पणी मुख्य रूप से इस बात पर थी कि ऐसी व्यवस्था में बदलाव किस संवैधानिक और संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से किया जा सकता है।
संविधान में सुप्रीम कोर्ट की भाषा को लेकर क्या व्यवस्था है?
भारत के संविधान में न्यायपालिका की भाषा के संबंध में विशेष प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद 348 सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही तथा कुछ विधिक दस्तावेजों की authoritative text से संबंधित भाषा की व्यवस्था करता है।
अनुच्छेद 348(1)(a) के अनुसार, जब तक संसद कानून बनाकर अन्यथा व्यवस्था नहीं करती, तब तक सुप्रीम कोर्ट और प्रत्येक हाईकोर्ट की सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी में होंगी। भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा उपलब्ध संवैधानिक प्रावधानों में भी अनुच्छेद 348 के तहत यही व्यवस्था दर्ज है।
इस प्रावधान के कारण सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को कार्यवाही की भाषा के रूप में लागू करने का प्रश्न केवल प्रशासनिक निर्णय का विषय नहीं रह जाता। इसमें संवैधानिक व्यवस्था और उससे संबंधित विधायी पहलुओं का महत्व भी सामने आता है।
हाईकोर्ट में क्षेत्रीय भाषा के इस्तेमाल की अलग व्यवस्था
संविधान में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के संबंध में भाषा को लेकर पूरी तरह समान व्यवस्था नहीं है।
अनुच्छेद 348(2) के तहत किसी राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस राज्य के हाईकोर्ट की कार्यवाही में हिंदी या राज्य में इस्तेमाल होने वाली किसी अन्य भाषा के इस्तेमाल को अधिकृत करने की अनुमति है।
यही कारण है कि हाईकोर्ट के संदर्भ में क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल की संवैधानिक व्यवस्था अलग तरीके से मौजूद है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के लिए अनुच्छेद 348 में हाईकोर्ट जैसी भाषा संबंधी विशेष छूट नहीं दी गई है। इस अंतर का उल्लेख सुनवाई के दौरान भी किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में हिंदी की पहुंच पहले से बढ़ रही है
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर हिंदी भाषा का अलग संस्करण उपलब्ध है। अदालत की वेबसाइट पर हिंदी में वाद सूची, वाद प्रस्थिति, दैनिक आदेश, निर्णय और अन्य सेवाओं तक पहुंच उपलब्ध कराई गई है।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए सुलभ भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ी पहल भी समय-समय पर सामने आती रही है। अदालत की वेबसाइट पर हिंदी में निर्णय संबंधी सामग्री भी उपलब्ध है।
इससे यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है कि किसी निर्णय का हिंदी में उपलब्ध होना और सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक कार्यवाही की आधिकारिक भाषा हिंदी होना दो अलग-अलग बातें हैं। मौजूदा मामले में PIL की मांग मुख्य रूप से अदालत की कार्यवाही में हिंदी को आधिकारिक रूप से इस्तेमाल करने से जुड़ी थी।
अदालत की टिप्पणी में क्षेत्रीय भाषाओं का भी उल्लेख
CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान केवल हिंदी तक विषय को सीमित नहीं रखा। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट क्षेत्रीय भाषाओं से संबंधित सुविधाओं को भी आगे बढ़ा रहा है।
उन्होंने कहा कि अभी फैसलों और रिपोर्टों का संक्षिप्त विवरण हिंदी में उपलब्ध कराया जा रहा है और भविष्य में दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के लिए भी ऐसी व्यवस्था विकसित की जाएगी। उनका जोर इस बात पर था कि देश की सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखते हुए अलग-अलग भारतीय भाषाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
इस टिप्पणी से अदालत के मौजूदा दृष्टिकोण का एक पहलू सामने आता है—भाषाई सुविधा को बढ़ाने की प्रक्रिया को एक क्रमिक प्रशासनिक और संस्थागत सुधार के रूप में आगे बढ़ाना।
भाषा और न्याय तक पहुंच का सवाल
अदालतों में भाषा का सवाल केवल प्रशासनिक भाषा तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध आम नागरिकों की न्याय व्यवस्था तक पहुंच से भी है।
भारत में बड़ी संख्या में लोग अपनी दैनिक जिंदगी में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में न्यायिक फैसलों और अदालती प्रक्रियाओं को भारतीय भाषाओं में समझने की सुविधा नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में होने वाली न्यायिक कार्यवाही का स्वरूप अलग है। देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले मुकदमों में पक्षकार, वकील और कानून से जुड़े दस्तावेज शामिल होते हैं। इसलिए ऐसी व्यवस्था में किसी भाषा को शामिल करने का प्रश्न व्यापक संस्थागत तैयारी, कानूनी शब्दावली, अनुवाद, रिकॉर्डिंग, प्रामाणिक पाठ और न्यायिक प्रक्रिया जैसे कई पहलुओं से जुड़ता है।
इसी संदर्भ में CJI की ओर से सुधार को धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की बात महत्वपूर्ण हो जाती है।
हिंदी में फैसलों की जानकारी और आधिकारिक कार्यवाही में अंतर
इस मामले को समझने के लिए दो अलग-अलग पहलुओं में अंतर करना जरूरी है।
पहला, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और न्यायिक सूचनाओं को हिंदी अथवा दूसरी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना है। यह न्यायिक जानकारी को अधिक लोगों तक पहुंचाने की प्रक्रिया है।
दूसरा, अदालत के सामने होने वाली वास्तविक judicial proceedings को किसी अन्य भाषा में संचालित करना है। इसमें बहस, आदेश, रिकॉर्ड, कानूनी दस्तावेज और प्रामाणिक न्यायिक अभिलेख जैसे कई विषय शामिल होते हैं।
वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के संबंध में अंग्रेजी का प्रावधान अनुच्छेद 348(1)(a) में है। इसलिए हिंदी को आधिकारिक कार्यवाही की भाषा बनाने का सवाल केवल वेबसाइट पर हिंदी सामग्री उपलब्ध कराने से अलग संवैधानिक विषय है।
PIL खारिज होने के बाद क्या समझना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से फिलहाल हिंदी को सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक कार्यवाही की भाषा बनाने की कोई नई व्यवस्था लागू नहीं हुई है। अदालत ने PIL को सुनने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार के बड़े संस्थागत और संवैधानिक बदलाव न्यायिक आदेश के माध्यम से सीधे नहीं किए जाते।
साथ ही, CJI सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट भारतीय और क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर सुविधाओं के विस्तार की दिशा में काम कर रहा है। फैसलों और रिपोर्टों के संक्षिप्त विवरण हिंदी में उपलब्ध कराने तथा भविष्य में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी शामिल करने की बात इसी क्रमिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
आगे की राह संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया से जुड़ी
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि अदालत की कार्यवाही की भाषा में मूलभूत बदलाव के लिए केवल PIL के माध्यम से न्यायिक निर्देश प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 348 इस विषय में मौजूदा ढांचा निर्धारित करता है और किसी व्यापक बदलाव के लिए संवैधानिक तथा विधायी पहल की आवश्यकता पड़ सकती है।
इस मामले में अदालत ने हिंदी या भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल की मांग पर कोई व्यापक नीतिगत निर्णय नहीं दिया। उसने मुख्य रूप से यह कहा कि इस तरह के बदलाव किस प्रक्रिया से किए जा सकते हैं। इसलिए इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हिंदी के खिलाफ निर्णय के रूप में देखना उचित नहीं होगा। अदालत ने इसके बजाय मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था और सुधार की क्रमिक प्रक्रिया की ओर संकेत किया है।
निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट ने 25 सितंबर 2026 को हिंदी को अपनी आधिकारिक न्यायिक भाषा बनाने की मांग वाली PIL को स्वीकार नहीं किया। CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि भाषा संबंधी ऐसे बदलाव अदालत के आदेश से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होते हैं। वहीं संविधान का अनुच्छेद 348 फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के लिए अंग्रेजी की व्यवस्था करता है, जबकि हाईकोर्ट के संबंध में राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषा के इस्तेमाल की अलग संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है।
यह घटनाक्रम इस बात को भी रेखांकित करता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं की पहुंच बढ़ाने का मुद्दा अब केवल भाषा की पसंद का विषय नहीं है, बल्कि संवैधानिक प्रावधान, न्याय तक पहुंच, अनुवाद व्यवस्था और न्यायिक प्रशासन से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट तथा 25 सितंबर 2026 को प्रकाशित न्यायिक रिपोर्टें।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।