13 वर्षीय रेप पीड़िता के गर्भपात के आदेश के बावजूद हुआ C-Section, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच के दिए आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की गर्भावस्था समाप्त करने के अपने स्पष्ट आदेश के बावजूद अस्पताल में C-Section के जरिए बच्चे के जन्म कराए जाने के मामले को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना है कि संबंधित चिकित्सकों द्वारा हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया और इस मामले में “जानबूझकर लापरवाही” (deliberate negligence) का पहलू सामने आता है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को मामले की व्यक्तिगत रूप से जांच करने और दो सप्ताह के भीतर सीलबंद रिपोर्ट (sealed cover report) दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की इच्छा, उसके स्वास्थ्य, गर्भावस्था की अवधि तथा अदालत द्वारा दिए गए चिकित्सकीय निर्देश के पालन का प्रश्न सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात को गंभीरता से लिया कि जब अदालत ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी का निर्देश दिया था, तब अस्पताल में उसके स्थान पर C-Section कैसे और किसके निर्देश पर किया गया।
29 सप्ताह से अधिक की थी गर्भावस्था
मामले में गठित मेडिकल बोर्ड ने नाबालिग पीड़िता की गर्भावस्था लगभग 29 सप्ताह 2 दिन बताई थी। पीड़िता ने अदालत के समक्ष अपनी गर्भावस्था जारी नहीं रखने की इच्छा व्यक्त की थी।
पीड़िता की उम्र केवल 13 वर्ष होने के साथ-साथ गर्भावस्था दुष्कर्म के परिणामस्वरूप होने की बात सामने आई थी। कोर्ट के समक्ष उसकी आयु, परिस्थितियों तथा शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए गर्भावस्था समाप्त किए जाने का अनुरोध किया गया था।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने 21 सितंबर को S.R.N. अस्पताल, प्रयागराज को गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया कराने का निर्देश दिया था।
अदालत का उद्देश्य यह था कि नाबालिग पीड़िता की परिस्थितियों और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए न्यायालय के निर्देश के अनुसार चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी की जाए।
21 सितंबर के आदेश के बाद 22 सितंबर को शुरू हुई प्रक्रिया
हाईकोर्ट के आदेश के बाद 22 सितंबर को अस्पताल में गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह प्रक्रिया सफल नहीं हो सकी।
इसके बाद अस्पताल में स्थिति बदल गई और पीड़िता का C-Section (Caesarean Section) किया गया। C-Section के माध्यम से बच्चे का जन्म कराया गया।
यहीं से पूरा मामला हाईकोर्ट के सामने गंभीर प्रश्न के रूप में सामने आया। अदालत ने जानना चाहा कि जब उसने मेडिकल टर्मिनेशन का स्पष्ट आदेश दिया था, तो उसके बाद C-Section करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया और यह निर्णय किस डॉक्टर या अधिकारी के निर्देश पर हुआ।
सुनवाई के दौरान ऑपरेशन करने वाली डॉक्टर डॉ. ऐमन अब्बासी अदालत के समक्ष यह स्पष्ट नहीं कर सकीं कि C-Section कराने का निर्देश किस व्यक्ति ने दिया था।
यह स्थिति अदालत के लिए विशेष रूप से गंभीर थी, क्योंकि न्यायालय के आदेश के बाद अस्पताल में की गई चिकित्सा कार्रवाई के संबंध में स्पष्ट जिम्मेदारी तय होना आवश्यक था।
HOD उस समय शहर से बाहर थीं
मामले में स्त्री रोग विभाग की HOD डॉ. अमृता चौरसिया की भूमिका पर भी अदालत ने सवाल उठाया। सुनवाई के दौरान बताया गया कि जिस समय यह घटनाक्रम हुआ, उस समय HOD शहर से बाहर थीं।
अदालत ने संबंधित चिकित्सकों की भूमिका और अस्पताल की आंतरिक व्यवस्था को लेकर प्रथम दृष्टया गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट का सवाल यह था कि जब हाईकोर्ट ने विशेष रूप से मेडिकल टर्मिनेशन का निर्देश दिया था, तो उस आदेश के अनुपालन की जिम्मेदारी किसकी थी और उसके बावजूद उपचार की दिशा कैसे बदल गई।
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि डॉ. अमृता चौरसिया और संबंधित डॉक्टरों की ओर से आदेश के अनुपालन में लापरवाही का मामला बनता है और उनके विरुद्ध उचित कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि अंतिम जिम्मेदारी और दोष का निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही किया जाएगा। हाईकोर्ट ने इसी उद्देश्य से चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से मामले की जांच करने का निर्देश दिया है।
प्रमुख सचिव करेंगे मामले की व्यक्तिगत जांच
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया है कि वह इस पूरे मामले की व्यक्तिगत रूप से जांच करें।
जांच में मुख्य रूप से यह देखा जाना है कि—
- हाईकोर्ट के 21 सितंबर के आदेश का अस्पताल में किस प्रकार पालन किया गया;
- 22 सितंबर को गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया क्यों सफल नहीं हुई;
- उसके बाद C-Section कराने का निर्णय किसने लिया;
- C-Section कराने के लिए चिकित्सकीय आधार क्या था;
- क्या अदालत के आदेश में किसी प्रकार की गलतफहमी या व्याख्या का प्रश्न था;
- संबंधित डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन की भूमिका क्या रही;
- तथा क्या किसी अधिकारी या चिकित्सक की ओर से न्यायालय के आदेश की अवहेलना अथवा जानबूझकर लापरवाही हुई।
प्रमुख सचिव को दो सप्ताह के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट अदालत में सीलबंद लिफाफे में दाखिल करनी होगी।
इससे साफ है कि हाईकोर्ट ने फिलहाल मामले में अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय स्वतंत्र प्रशासनिक जांच के माध्यम से पूरी स्थिति स्पष्ट कराने का रास्ता अपनाया है।
कोर्ट ने बच्चे की सुरक्षा को लेकर भी दिए निर्देश
C-Section के बाद बच्चे का जन्म हो चुका है। ऐसे में हाईकोर्ट के सामने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न बच्चे की सुरक्षा और देखभाल का था।
अदालत ने निर्देश दिया कि बच्चे को चिल्ड्रन हॉस्पिटल की निगरानी में रखा जाए और कोर्ट की अनुमति के बिना बच्चे को किसी अन्य व्यक्ति को न सौंपा जाए।
इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच और आगे की न्यायिक कार्यवाही के दौरान बच्चे की सुरक्षा बनी रहे और उसके संबंध में कोई ऐसा कदम न उठाया जाए जिससे मामले की स्थिति प्रभावित हो।
अदालत ने अस्पताल को मां और बच्चे दोनों के इलाज का खर्च उठाने का भी निर्देश दिया है।
इस तरह हाईकोर्ट ने केवल आदेश के पालन में हुई कथित लापरवाही पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि नाबालिग मां और नवजात बच्चे दोनों की चिकित्सा एवं सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है।
नाबालिग पीड़िता की स्थिति क्यों महत्वपूर्ण है?
इस मामले की संवेदनशीलता का एक बड़ा कारण पीड़िता की उम्र है। वह केवल 13 वर्ष की है। इसके अलावा गर्भावस्था दुष्कर्म के आरोप से जुड़ी हुई है।
ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय के समक्ष केवल गर्भावस्था की चिकित्सकीय स्थिति ही नहीं, बल्कि नाबालिग की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
किशोरावस्था में गर्भावस्था अपने आप में एक संवेदनशील चिकित्सकीय स्थिति हो सकती है। जब गर्भावस्था किसी अपराध के परिणामस्वरूप हो, तब पीड़िता के हितों की सुरक्षा का प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी कारण हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और पीड़िता की इच्छा सहित मामले की परिस्थितियों पर विचार किया था।
यह मामला यह भी दिखाता है कि न्यायालय द्वारा दिए गए चिकित्सकीय निर्देश को अस्पताल प्रशासन और संबंधित डॉक्टरों द्वारा किस तरह स्पष्ट रूप से लागू किया जाना चाहिए। यदि किसी कारण से आदेश के अनुसार प्रक्रिया संभव न हो, तो उस स्थिति में भी अस्पताल को न्यायालय को उचित जानकारी देने और आवश्यक निर्देश प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
अदालत के आदेश और चिकित्सा निर्णय के बीच तालमेल जरूरी
चिकित्सा क्षेत्र में कई बार मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार की रणनीति बदल सकती है। लेकिन जब किसी मामले में हाईकोर्ट विशेष निर्देश जारी करता है, तब संबंधित संस्थान के लिए उस आदेश का अनुपालन एक महत्वपूर्ण कानूनी दायित्व बन जाता है।
यदि चिकित्सकीय परिस्थितियों में कोई ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसमें अदालत के आदेश के अनुसार आगे बढ़ना संभव नहीं है, तो संबंधित चिकित्सकों को अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड करनी चाहिए और आवश्यक होने पर न्यायालय के सामने उसे रखना चाहिए।
इस मामले में हाईकोर्ट का मुख्य सवाल यही प्रतीत होता है कि मेडिकल टर्मिनेशन की प्रक्रिया सफल नहीं होने के बाद C-Section का निर्णय किस स्तर पर और किस आदेश के आधार पर लिया गया।
डॉक्टर द्वारा अदालत के समक्ष यह स्पष्ट नहीं कर पाना कि C-Section का निर्देश किसने दिया था, न्यायालय की चिंता का
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।