सरकारी मेडिकल-नर्सिंग कॉलेजों में संविदा और तदर्थ नियुक्तियों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, 2026 की सेवा नियमावली तत्काल अधिसूचित करने का आदेश
उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में नियमित नियुक्तियों के स्थान पर लंबे समय तक संविदा और तदर्थ व्यवस्था के सहारे शिक्षण एवं प्रशासनिक कामकाज चलाए जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि अस्थायी व्यवस्था को अनिश्चितकाल तक जारी रखना न्याय के हित में नहीं है। इससे न केवल संस्थानों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, बल्कि लंबे समय तक संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों के शोषण की आशंका भी बनी रहती है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ ने श्रीनिवासन गांधी की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि नर्सिंग कॉलेज शिक्षक सेवा नियमावली-2026 के प्रारूप को प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी देकर तत्काल अधिसूचित किया जाए। कोर्ट ने इस मामले में चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशक द्वारा दाखिल हलफनामे को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की और अगली सुनवाई पर विस्तृत व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को होगी।
500 से अधिक पद संविदा पर भरे जाने पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में शिक्षकों एवं अन्य पदों पर नियुक्तियों की स्थिति का ब्यौरा रखा गया। महानिदेशक, चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण की ओर से दाखिल हलफनामे के अनुलग्नक-3 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पाया कि प्रदेश में 500 से अधिक पद संविदा के आधार पर भरे गए हैं।
इसके विपरीत नियमित नियुक्तियों की संख्या बेहद कम बताई गई। कोर्ट के समक्ष रखी गई स्थिति के अनुसार नियमित पदों पर नियुक्तियां कुल पदों की तुलना में लगभग दो से तीन प्रतिशत के आसपास ही हैं।
यह स्थिति अदालत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण बनी क्योंकि सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेज सीधे तौर पर चिकित्सा शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े संस्थान हैं। ऐसे संस्थानों में शिक्षकों की नियमित उपलब्धता केवल प्रशासनिक विषय नहीं है, बल्कि शिक्षा की निरंतरता, अकादमिक गुणवत्ता और संस्थानों की मान्यता जैसे पहलुओं से भी इसका संबंध हो सकता है।
कोर्ट ने इसी व्यापक संदर्भ में संविदा और तदर्थ नियुक्तियों को लेकर अपनी चिंता दर्ज की।
करीब 25 प्रतिशत पदों पर कार्यवाहक प्राचार्य
मामले की सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में लगभग 25 प्रतिशत पदों पर कार्यवाहक प्राचार्य तैनात हैं।
प्राचार्य किसी मेडिकल कॉलेज के प्रशासनिक और अकादमिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे पदों पर लंबे समय तक नियमित नियुक्ति के बजाय कार्यवाहक व्यवस्था चलने को लेकर कोर्ट ने संबंधित विभाग से विस्तृत जानकारी मांगी है।
अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि जिन पदों पर कार्यवाहक प्राचार्य काम कर रहे हैं, क्या उनके लिए नियमित नियुक्ति हेतु विज्ञापन जारी किया गया है। यदि विज्ञापन नहीं निकाला गया है तो उसके पीछे क्या कारण है, इसकी जानकारी भी अगली सुनवाई पर देनी होगी।
इससे स्पष्ट है कि कोर्ट केवल संविदा शिक्षकों की नियुक्ति तक मामले को सीमित नहीं रख रही है, बल्कि मेडिकल कॉलेजों के पूरे प्रशासनिक और शिक्षण ढांचे में नियमित पदों की स्थिति को भी जांच के दायरे में रख रही है।
विभागाध्यक्षों की नियुक्ति पर भी मांगा पूरा ब्योरा
कोर्ट ने प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में विभागाध्यक्षों की स्थिति पर भी जानकारी मांगी है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद विभागाध्यक्षों का पूरा ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया गया।
अदालत ने विशेष रूप से यह जानकारी मांगी है कि किन-किन विभागों में प्रोफेसर उपलब्ध नहीं होने के कारण एसोसिएट प्रोफेसर या असिस्टेंट प्रोफेसर को विभागाध्यक्ष बनाया गया है।
इसके लिए महानिदेशक को अगली सुनवाई पर एक चार्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। इस चार्ट में यह स्पष्ट करना होगा कि किस मेडिकल कॉलेज में कौन-सा विभाग है, वहां प्रोफेसर का पद उपलब्ध है या नहीं और यदि प्रोफेसर नहीं है तो किस स्तर के शिक्षक को विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है।
इस तरह अदालत ने विभागाध्यक्षों की नियुक्ति को भी पारदर्शी तरीके से रिकॉर्ड पर लाने को कहा है।
नियमावली को लेकर सरकार से सिर्फ मार्गदर्शन मांगना पर्याप्त नहीं
मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक नर्सिंग कॉलेज शिक्षक सेवा नियमावली-2026 है।
अदालत के सामने यह बात आई कि सेवा नियमावली तैयार करने के संबंध में विभाग की ओर से शासन से मार्गदर्शन मांगा गया है। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को लेकर असंतोष व्यक्त किया।
अदालत की टिप्पणी का मूल आशय यह था कि यदि किसी महत्वपूर्ण सेवा व्यवस्था को लागू करने के लिए केवल शासन से मार्गदर्शन मांगने की प्रक्रिया ही चलती रहे और वास्तविक नियम बनाने तथा लागू करने की दिशा में ठोस कदम न उठाए जाएं तो इससे यह धारणा बनती है कि शासन और विभाग स्तर पर केवल औपचारिकता पूरी की जा रही है।
कोर्ट ने इसलिए नियमावली के प्रारूप को प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी दिलाकर तत्काल अधिसूचित करने का अंतरिम आदेश दिया है।
यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सेवा नियमावली किसी भी सरकारी सेवा में नियुक्ति, पदों की संरचना, योग्यता, भर्ती प्रक्रिया और सेवा शर्तों को स्पष्ट करने का आधार प्रदान करती है।
तीन साल से अधिक संविदा नियुक्ति पर शासनादेश का हवाला
अदालत ने अपने आदेश में 15 अप्रैल 2022 के शासनादेश का भी उल्लेख किया।
इस शासनादेश के अनुसार संविदा नियुक्ति को तीन वर्ष से अधिक जारी नहीं रखा जा सकता। हाईकोर्ट ने इसी व्यवस्था के संदर्भ में लंबे समय तक संविदा नियुक्तियों को जारी रखने पर सवाल उठाया है।
यदि किसी पद के लिए नियमित भर्ती की व्यवस्था मौजूद है या नियमित नियुक्ति के लिए पद स्वीकृत हैं, तो लंबे समय तक उसी पद को संविदा व्यवस्था के माध्यम से चलाते रहने का औचित्य अदालत के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है।
अदालत ने अस्थायी नियुक्ति और स्थायी आवश्यकता के बीच अंतर पर ध्यान दिया है। किसी पद पर अस्थायी आवश्यकता के कारण संविदा नियुक्ति की जा सकती है, लेकिन यदि वही व्यवस्था वर्षों तक जारी रहती है तो उसकी प्रकृति पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
अस्थायी व्यवस्था को अनिश्चितकाल तक नहीं खींचा जा सकता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अस्थायी व्यवस्था को अनिश्चितकाल तक खींचना न्याय के हित में नहीं है।
सरकारी संस्थानों में कई बार नियमित भर्ती की प्रक्रिया पूरी होने तक संविदा या तदर्थ कर्मचारियों के माध्यम से काम चलाया जाता है। ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य सामान्यतः तत्काल आवश्यकता पूरी करना होता है।
लेकिन यदि नियमित भर्ती की प्रक्रिया लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ती और कर्मचारी लगातार संविदा या तदर्थ आधार पर काम करते रहते हैं, तो इससे कई कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न पैदा हो सकते हैं।
ऐसे कर्मचारियों को स्थायित्व नहीं मिलता, जबकि उनसे लंबे समय तक नियमित कर्मचारियों के समान कार्य लिया जा सकता है। अदालत ने इसी परिस्थिति में शोषण की आशंका व्यक्त की है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर संविदा नियुक्ति अपने आप अवैध हो जाती है। न्यायिक दृष्टि से संविदा नियुक्ति की वैधता और उसके लंबे समय तक जारी रहने का प्रश्न संबंधित सेवा नियमों, सरकारी आदेशों, पद की प्रकृति और नियुक्ति की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
सुप्रीम कोर्ट के जग्गो मामले का उल्लेख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम भारत संघ मामले का भी उल्लेख किया है।
इस निर्णय के संदर्भ में अदालत ने उस सिद्धांत की ओर ध्यान आकर्षित किया जिसमें लंबे समय तक अस्थायी या संविदा व्यवस्था के माध्यम से कर्मचारियों को बनाए रखने और उनके साथ असमान व्यवहार के संवैधानिक पहलू पर विचार किया गया था।
अदालत ने ऐसे संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लेख किया। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की संवैधानिक गारंटी देता है।
सरकारी सेवाओं में नियुक्तियों के मामलों में अनुच्छेद 14 का महत्व इसलिए भी है क्योंकि राज्य की कार्रवाई मनमानी नहीं हो सकती। नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तों और कर्मचारियों के साथ व्यवहार में संवैधानिक मानकों का पालन अपेक्षित होता है।
नियमित नियुक्तियों की स्थिति भी होगी स्पष्ट
अदालत ने केवल यह जानने में रुचि नहीं दिखाई कि कितने पद संविदा पर भरे गए हैं। उसने यह भी पूछा है कि नियमित पदों की स्थिति क्या है और उन पदों को भरने के लिए सरकार की ओर से क्या कार्रवाई की गई है।
महानिदेशक को अगली सुनवाई पर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर के रिक्त पदों की संख्या बतानी होगी।
इसके अलावा यह भी बताना होगा कि इन रिक्त पदों को भरने के लिए संबंधित प्राधिकरण को अधियाचन (requisition) भेजा गया है या नहीं।
यदि अधियाचन भेजा गया है तो उसकी तारीख और वर्तमान स्थिति बतानी होगी। इसके बाद यदि पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया है तो उस विज्ञापन की वर्तमान स्थिति भी अदालत के सामने रखनी होगी।
यदि किसी रिक्त पद के लिए अभी तक विज्ञापन जारी नहीं किया गया है तो विभाग को उसका कारण भी स्पष्ट करना होगा।
विज्ञापन की स्थिति पर भी अदालत की नजर
नियमित नियुक्तियों में विज्ञापन महत्वपूर्ण चरण है। इसके माध्यम से पात्र उम्मीदवारों को आवेदन का अवसर मिलता है और चयन प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ती है।
इसी कारण अदालत ने मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर के रिक्त पदों के लिए जारी किए गए विज्ञापनों की वर्तमान स्थिति पूछी है।
अदालत यह जानना चाहती है कि रिक्त पदों की जानकारी सरकार के पास होने के बावजूद उन्हें भरने की प्रक्रिया किस स्तर पर है।
यदि विज्ञापन जारी हो चुका है तो चयन प्रक्रिया कहां तक पहुंची है और यदि विज्ञापन नहीं निकला है तो देरी का कारण क्या है—इन सभी बिंदुओं का विवरण अगले हलफनामे में अपेक्षित है।
कार्यवाहक प्राचार्यों के पदों पर भी जवाब मांगा
हाईकोर्ट ने कार्यवाहक प्राचार्यों से जुड़े पदों को लेकर भी विभाग से स्पष्ट जानकारी मांगी है।
महानिदेशक को यह बताना होगा कि जिन मेडिकल कॉलेजों में कार्यवाहक प्राचार्य तैनात हैं, क्या उन पदों को नियमित नियुक्ति के लिए विज्ञापित किया गया है।
यदि विज्ञापन जारी किया गया है तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है, यह भी बताना होगा। यदि विज्ञापन नहीं निकाला गया है तो उसके कारण अदालत को बताने होंगे।
इससे यह स्पष्ट है कि कोर्ट मेडिकल कॉलेजों में केवल शिक्षक नियुक्तियों की समस्या नहीं देख रही, बल्कि संस्थानों के शीर्ष प्रशासनिक पदों पर लंबे समय से चल रही कार्यवाहक व्यवस्था को भी रिकॉर्ड पर ले रही है।
महानिदेशक को व्यक्तिगत हलफनामा देना होगा
कोर्ट ने इस मामले में महानिदेशक, चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण को अगली सुनवाई पर नया व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह हलफनामा सामान्य विभागीय जवाब के बजाय सीधे महानिदेशक की ओर से दाखिल किया जाना है। इसमें अदालत द्वारा मांगी गई सभी सूचनाएं स्पष्ट और क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करनी होंगी।
हलफनामे में मुख्य रूप से निम्न बिंदुओं पर जानकारी देनी होगी—
- प्रोफेसर उपलब्ध न होने के कारण एसोसिएट प्रोफेसर या असिस्टेंट प्रोफेसर को विभागाध्यक्ष बनाए जाने का चार्ट।
- प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर के कुल रिक्त पदों की संख्या।
- रिक्त पदों को भरने के लिए भेजे गए अधियाचन का विवरण।
- जारी किए गए भर्ती विज्ञापनों की वर्तमान स्थिति।
- जिन रिक्त पदों का अभी तक विज्ञापन नहीं हुआ, उसके कारण।
- कार्यवाहक प्राचार्यों वाले पदों पर नियमित नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी हुआ है या नहीं।
- यदि विज्ञापन नहीं निकला है तो उसका कारण।
इस विस्तृत जानकारी के बाद अदालत के सामने प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नियमित और संविदा नियुक्तियों की वास्तविक तस्वीर अधिक स्पष्ट रूप से आ सकेगी।
मेडिकल और नर्सिंग शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा प्रभाव
हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक कर्मचारी या एक नियुक्ति विवाद तक सीमित नहीं है। इसका संबंध प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में मानव संसाधन की पूरी व्यवस्था से है।
मेडिकल शिक्षा में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे पदों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। विभागाध्यक्ष और प्राचार्य जैसे प्रशासनिक पद भी कॉलेज की व्यवस्था को संचालित करते हैं।
यदि बड़ी संख्या में पद लंबे समय तक खाली रहते हैं और उनकी जगह संविदा या कार्यवाहक व्यवस्था जारी रहती है, तो इससे भर्ती नीति, सेवा स्थायित्व और संस्थानों की प्रशासनिक निरंतरता से जुड़े प्रश्न उठते हैं।
इसी कारण कोर्ट ने सरकार से केवल आश्वासन नहीं, बल्कि रिक्तियों, अधियाचन, विज्ञापन और नियुक्ति प्रक्रिया का ठोस रिकॉर्ड मांगा है।
अब 13 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
इस मामले में अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है। उस दिन महानिदेशक का नया व्यक्तिगत हलफनामा अदालत के सामने महत्वपूर्ण होगा।
अदालत द्वारा मांगी गई जानकारी से यह स्पष्ट होगा कि सरकार ने नियमित नियुक्तियों को लेकर क्या कदम उठाए हैं और नर्सिंग कॉलेज शिक्षक सेवा नियमावली-2026 को अधिसूचित करने की प्रक्रिया किस स्थिति में पहुंची है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने सरकार को नियमावली के प्रारूप को प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी दिलाकर तत्काल अधिसूचित करने का अंतरिम निर्देश दिया है। साथ ही संविदा और तदर्थ व्यवस्था को लंबे समय तक जारी रखने पर अपनी चिंता स्पष्ट कर दी है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह कार्यवाही उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में नियमित भर्ती बनाम लंबे समय से चली आ रही संविदा और कार्यवाहक व्यवस्था के प्रश्न को सामने लाती है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि अस्थायी व्यवस्था का उद्देश्य स्थायी व्यवस्था का विकल्प बनना नहीं होना चाहिए।
500 से अधिक संविदा पद, नियमित पदों की बेहद कम संख्या और लगभग एक चौथाई पदों पर कार्यवाहक प्राचार्यों की स्थिति को देखते हुए अदालत ने सरकार से विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। साथ ही नर्सिंग कॉलेज शिक्षक सेवा नियमावली-2026 को प्राथमिकता से अधिसूचित करने का निर्देश देकर भर्ती और सेवा व्यवस्था को स्पष्ट करने की दिशा में कदम उठाया है।
अब 13 अक्टूबर 2026 की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, जब महानिदेशक का व्यक्तिगत हलफनामा और रिक्त पदों, अधियाचन, विज्ञापन तथा कार्यवाहक प्राचार्यों से संबंधित जानकारी अदालत के समक्ष रखी जाएगी। इसके बाद मामले में आगे की न्यायिक दिशा अधिक स्पष्ट होगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।