पीएम मोदी की डिग्री से जुड़ी RTI पर केजरीवाल की अपील: गुजरात हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित, ₹25 हजार जुर्माने का मामला भी चुनौती में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री से संबंधित जानकारी के खुलासे को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में गुजरात हाईकोर्ट ने गुरुवार, 24 सितंबर 2026 को अरविंद केजरीवाल की अपील पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह अपील मार्च 2023 में एकल पीठ द्वारा दिए गए उस फैसले के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस निर्देश को रद्द कर दिया गया था, जिसके तहत गुजरात यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कहा गया था।
इस मामले की सुनवाई गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने संक्षिप्त आदेश में कहा कि सुनवाई पूरी हो गई है और फैसला सुरक्षित रखा जाता है। अब इस अपील में अगला महत्वपूर्ण चरण हाईकोर्ट का निर्णय होगा।
मामला आखिर शुरू कैसे हुआ?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी का यह विवाद मूल रूप से RTI Act, 2005 के तहत सामने आया था। वर्ष 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग के तत्कालीन आदेश के बाद प्रधानमंत्री की डिग्रियों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने का मुद्दा उठा था।
CIC ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम से वर्ष 1978 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक और वर्ष 1983 में गुजरात यूनिवर्सिटी से पोस्ट-ग्रेजुएशन से संबंधित रिकॉर्ड तलाशने और उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। CIC के आदेश के बाद गुजरात यूनिवर्सिटी ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया और आयोग के निर्देश को चुनौती दी।
यहीं से यह मामला एक व्यापक कानूनी विवाद में बदल गया। सवाल केवल किसी व्यक्ति की शैक्षणिक डिग्री की जानकारी उपलब्ध कराने का नहीं था, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण था कि RTI Act के तहत किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की शैक्षणिक जानकारी किस सीमा तक सार्वजनिक की जा सकती है।
2023 में एकल पीठ ने क्या फैसला दिया था?
गुजरात हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायमूर्ति बीरेन वैष्णव ने 31 मार्च 2023 को गुजरात यूनिवर्सिटी की याचिका स्वीकार करते हुए CIC के 2016 के आदेश को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्रियों से संबंधित जानकारी को RTI Act की धारा 8(1)(e) और 8(1)(j) के तहत प्रकटीकरण से छूट प्राप्त है, जब तक कि ऐसी जानकारी के खुलासे के लिए कोई बड़ा सार्वजनिक हित स्थापित न हो।
अदालत ने यह भी कहा था कि जिस डिग्री की जानकारी मांगी जा रही थी, वह गुजरात यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर उपलब्ध थी। इसी संदर्भ में अदालत ने अरविंद केजरीवाल पर ₹25,000 की लागत (cost) लगाने का निर्देश दिया था। यह राशि गुजरात स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी में जमा करने के लिए कही गई थी।
इस प्रकार 2023 के फैसले में दो प्रमुख बातें सामने आईं—पहली, CIC का सूचना उपलब्ध कराने वाला आदेश रद्द किया गया और दूसरी, केजरीवाल पर ₹25,000 की लागत लगाई गई।
RTI Act की धारा 8(1)(e) और 8(1)(j) क्यों महत्वपूर्ण हैं?
इस विवाद में Right to Information Act की धारा 8 केंद्रीय भूमिका में है। RTI कानून सामान्य तौर पर नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास उपलब्ध सूचना प्राप्त करने का अधिकार देता है। हालांकि कानून में कुछ ऐसी सूचनाओं को प्रकटीकरण से छूट दी गई है, जिनका खुलासा निर्धारित परिस्थितियों में नहीं किया जा सकता।
धारा 8(1)(e) ऐसी सूचना से संबंधित है जो किसी व्यक्ति या संस्था के पास fiduciary relationship यानी विश्वास-आधारित संबंध में उपलब्ध हो। वहीं धारा 8(1)(j) व्यक्तिगत सूचना से संबंधित है, जिसके प्रकटीकरण पर निजता और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।
2023 में एकल पीठ ने इन्हीं प्रावधानों को आधार बनाकर माना था कि प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्रियों से संबंधित जानकारी का खुलासा स्वतः आवश्यक नहीं है। अदालत ने विशेष रूप से यह देखा कि क्या इस जानकारी के खुलासे के लिए ऐसा larger public interest मौजूद है, जो RTI Act में दी गई छूट को पार कर सके।
केजरीवाल की अपील में मुख्य मुद्दा क्या है?
मार्च 2023 के फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल ने एकल पीठ के आदेश को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी। वर्तमान अपील में केवल डिग्री संबंधी जानकारी के मूल प्रश्न पर ही बहस नहीं हुई, बल्कि ₹25,000 की लागत लगाए जाने को भी चुनौती दी गई।
24 सितंबर की सुनवाई में केजरीवाल की ओर से पेश वकील ने विशेष रूप से एकल पीठ के फैसले के पैराग्राफ 40 का उल्लेख किया। इस पैराग्राफ में अदालत ने लागत लगाने का एक कारण यह बताया था कि डिग्री से संबंधित जानकारी यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर उपलब्ध होने के बावजूद केजरीवाल ने मामले को जारी रखा।
केजरीवाल की ओर से दलील दी गई कि उन्हें इस आधार पर मामले को जारी रखने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता। उनके वकील के अनुसार, उन्होंने मूल RTI आवेदन दाखिल नहीं किया था और CIC के समक्ष परिस्थितियों के कारण उन्हें पक्षकार बनाया गया था।
वकील ने क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान केजरीवाल के वकील ने कहा कि यदि गुजरात यूनिवर्सिटी पहले ही अपनी वेबसाइट पर डिग्री से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध करा चुकी थी, तो फिर केजरीवाल की ओर से मामले को जारी रखने का सवाल कैसे उठता है।
उनकी ओर से यह भी कहा गया कि यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री को स्वयं यूनिवर्सिटी ने “record of degree” बताया था, न कि मूल डिग्री। इसलिए दोनों के बीच अंतर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
वकील ने अदालत को यह भी बताया कि केजरीवाल ने लगभग तीन वर्ष तक मामले में कोई जवाब दाखिल नहीं किया था। इसलिए यह कहना कि उन्होंने लगातार मामले को आगे बढ़ाया या उस पर जोर दिया, उचित नहीं माना जा सकता।
उनकी दलील का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि केजरीवाल की मुख्य आपत्ति अब उस टिप्पणी और ₹25,000 की लागत को लेकर है, जिसे 2023 के फैसले में उनके खिलाफ लगाया गया था।
यूनिवर्सिटी की ओर से क्या रुख रखा गया?
गुजरात यूनिवर्सिटी की ओर से इस मामले में यह रुख रखा गया कि RTI प्रक्रिया का उपयोग उस उद्देश्य के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जिसके लिए कानून बनाया गया है। इससे पहले की सुनवाई में यूनिवर्सिटी की ओर से यह भी कहा गया था कि सूचना आयोग और RTI प्रक्रिया का उपयोग करते समय सार्वजनिक प्राधिकरणों के समय और संसाधनों को ध्यान में रखना चाहिए।
पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के CBSE बनाम आदित्य बंदोपाध्याय (2011) फैसले का भी हवाला दिया था। इस फैसले में RTI के तहत अत्यधिक और अव्यावहारिक सूचना मांगों के कारण सार्वजनिक संस्थानों के संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा की गई थी।
अदालत के सामने अब क्या प्रश्न है?
अब खंडपीठ के सामने मुख्य रूप से 2023 के एकल पीठ के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर निर्णय करना है। इसमें CIC के आदेश को रद्द करने के निर्णय और केजरीवाल पर लगाई गई ₹25,000 की लागत से जुड़े पहलुओं पर अदालत का फैसला महत्वपूर्ण होगा।
हालांकि, 24 सितंबर 2026 को खंडपीठ ने कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसलिए इस समय यह कहना उचित नहीं होगा कि अदालत ने अपील स्वीकार कर ली है या खारिज कर दी है।
RTI और निजता के अधिकार के बीच संतुलन
यह मामला RTI कानून के एक व्यापक सिद्धांत को भी सामने लाता है। RTI का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है, लेकिन कानून ने कुछ सूचनाओं को प्रकटीकरण से छूट भी दी है।
किसी व्यक्ति का सार्वजनिक पद पर होना अपने आप में उसकी प्रत्येक व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक करने का आधार नहीं बन जाता। दूसरी ओर, किसी सूचना के सार्वजनिक महत्व का प्रश्न भी परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में अदालत को RTI के पारदर्शिता संबंधी उद्देश्य और कानून में दी गई निजता/विश्वास संबंधी छूट के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
इसी कारण प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री से संबंधित यह विवाद केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें RTI Act, personal information, fiduciary relationship, larger public interest और judicial review जैसे महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे भी जुड़े हुए हैं।
2016 से 2026 तक मामला कैसे आगे बढ़ा?
पूरे विवाद को संक्षेप में देखें तो वर्ष 2016 में CIC के निर्देश से मामला शुरू हुआ। इसके बाद गुजरात यूनिवर्सिटी ने CIC के आदेश को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी। 31 मार्च 2023 को एकल पीठ ने CIC का आदेश रद्द कर दिया और ₹25,000 की लागत लगाई। इसके बाद केजरीवाल ने इस आदेश के खिलाफ अपील की।
अब सितंबर 2026 में इस अपील की सुनवाई खंडपीठ के समक्ष पूरी हुई है। 24 सितंबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
इसलिए फिलहाल इस मामले में अंतिम स्थिति वही है जो अदालत की कार्यवाही में दर्ज हुई है—सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित।
आगे क्या होगा?
अब गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा अपना निर्णय सुनाया जाना बाकी है। फैसले में यह स्पष्ट हो सकता है कि 2023 में एकल पीठ द्वारा CIC के आदेश को रद्द करने और केजरीवाल पर ₹25,000 की लागत लगाने के संबंध में अदालत का क्या निष्कर्ष है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि खंडपीठ किस दिशा में फैसला देगी। अदालत द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 2023 के आदेश में कोई बदलाव किया जाता है या उसे बरकरार रखा जाता है।
कानूनी दृष्टि से यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें RTI Act के तहत सार्वजनिक हित और व्यक्तिगत सूचना की सीमा, विश्वविद्यालयों के पास उपलब्ध शैक्षणिक रिकॉर्ड तथा अदालत द्वारा लागत लगाए जाने के आधार जैसे कई प्रश्न एक साथ जुड़े हुए हैं।
केस का नाम: Arvind Kejriwal v. Gujarat University & Ors.
वर्तमान स्थिति: 24 सितंबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रखा।
नोट: उपरोक्त लेख में 24 सितंबर 2026 तक उपलब्ध न्यायिक कार्यवाही और रिपोर्टेड तथ्यों को आधार बनाया गया है। अंतिम निर्णय आने के बाद मामले की कानूनी स्थिति में बदलाव हो सकता है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।