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पत्नी ने पति को सांवला और मोटा कहा, फिर भी तलाक नहीं: हाई कोर्ट ने कहा—मानसिक क्रूरता का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य जरूरी

पत्नी ने पति को सांवला और मोटा कहा, फिर भी तलाक नहीं: हाई कोर्ट ने कहा—मानसिक क्रूरता का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य जरूरी

        छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने विवाह विच्छेद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पति की तलाक की मांग को खारिज कर दिया। पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी उसे सांवला और मोटा कहकर अपमानित करती थी, बार-बार मायके चली जाती थी और उसे झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देती थी। पति ने इन परिस्थितियों को वैवाहिक क्रूरता बताते हुए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत विवाह विच्छेद की मांग की थी।

हाई कोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद कहा कि केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है। जिस पक्ष की ओर से क्रूरता का आरोप लगाया जा रहा है, उसे ऐसे आरोपों को विश्वसनीय और पर्याप्त साक्ष्य से साबित भी करना होगा। कोर्ट ने पाया कि पति अपने आरोपों को उस स्तर तक सिद्ध नहीं कर सका, जिससे वैवाहिक संबंध समाप्त करने के लिए आवश्यक मानसिक क्रूरता स्थापित हो सके।

यह आदेश जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने पारित किया। पीठ ने परिवार न्यायालय के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें पति की तलाक की याचिका पहले ही खारिज कर दी गई थी।

7 मार्च 2019 को हुआ था विवाह

मामले के अनुसार, चांपा निवासी 28 वर्षीय आकाश घोष का विवाह पूजा सीत के साथ 7 मार्च 2019 को हुआ था। विवाह के बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रहे। कुछ समय बाद दोनों के वैवाहिक संबंधों में विवाद उत्पन्न होने लगा।

पति की ओर से अदालत के सामने कहा गया कि विवाह के लगभग दो-तीन महीने बाद ही पत्नी अलग रहने लगी थी। पति का आरोप था कि पत्नी उसके रंग और शरीर को लेकर उसे अपमानित करती थी। वह कथित रूप से उसे सांवला और मोटा कहती थी, जिससे उसे मानसिक परेशानी होती थी।

पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी बार-बार अपने मायके चली जाती थी और वैवाहिक जीवन को सामान्य तरीके से चलाने में सहयोग नहीं करती थी। उसके अनुसार, पत्नी द्वारा उसे झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी भी दी जाती थी।

राजस्थान से लौटने के बाद बिगड़े हालात

मामले में सामने आई परिस्थितियों के अनुसार, पति-पत्नी राजस्थान भी गए थे। इसके बाद जब वे वापस लौटे तो वैवाहिक जीवन से जुड़ी परिस्थितियां और जटिल हो गईं।

पति के अनुसार, इस दौरान पत्नी के गर्भ में जुड़वां बच्चे थे, लेकिन उनका गर्भपात हो गया। इसके बाद उपचार के लिए पत्नी रायगढ़ गई। पति का कहना था कि उपचार के लिए रायगढ़ जाने के बाद पत्नी वापस चांपा नहीं लौटी।

यही घटनाक्रम बाद में दोनों के बीच विवाद का प्रमुख हिस्सा बना। पति ने पत्नी के अलग रहने को भी वैवाहिक संबंधों से दूरी बनाने और उसके प्रति मानसिक क्रूरता के रूप में प्रस्तुत किया।

हालांकि, पत्नी की ओर से पति के आरोपों का विरोध किया गया। मामले में अदालत को यह तय करना था कि पति द्वारा लगाए गए आरोप और उपलब्ध सामग्री वास्तव में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक के लिए आवश्यक cruelty यानी क्रूरता की कानूनी कसौटी को पूरा करते हैं या नहीं।

धारा 13 के तहत मांगा था विवाह विच्छेद

पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत विवाह विच्छेद की मांग की थी। इस प्रावधान में निर्धारित परिस्थितियों के आधार पर पति या पत्नी विवाह विच्छेद के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

वैवाहिक क्रूरता तलाक के लिए महत्वपूर्ण आधारों में से एक है। लेकिन किसी भी वैवाहिक विवाद में प्रत्येक अप्रिय व्यवहार या पति-पत्नी के बीच होने वाला हर विवाद अपने आप में कानूनी अर्थों में cruelty नहीं बन जाता।

अदालत को यह देखना होता है कि आरोपित व्यवहार की प्रकृति क्या थी, उसका प्रभाव कितना गंभीर था और क्या उपलब्ध साक्ष्य से यह स्थापित होता है कि वैवाहिक जीवन जारी रखना संबंधित पक्ष के लिए कानूनी रूप से असहनीय स्थिति पैदा कर रहा था।

इसी कानूनी कसौटी के आधार पर हाई कोर्ट ने इस मामले में पति द्वारा पेश किए गए आरोपों और साक्ष्यों का परीक्षण किया।

केवल आरोप पर्याप्त नहीं, साक्ष्य भी जरूरी

हाई कोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या पत्नी द्वारा पति को कथित रूप से सांवला और मोटा कहना अपने आप में मानसिक क्रूरता की ऐसी स्थिति बनाता है, जिसके आधार पर विवाह समाप्त किया जा सके।

पीठ ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि पति अपने आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका।

अदालत के सामने किसी आरोप का केवल उल्लेख कर देना और उस आरोप को न्यायिक रूप से साबित करना दो अलग-अलग बातें हैं। वैवाहिक मुकदमे में भी आरोपों को अदालत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही परखती है।

यदि किसी पक्ष का कहना है कि उसे लगातार अपमानित किया गया, धमकाया गया या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, तो अदालत यह देखती है कि उस दावे के समर्थन में कौन-सी सामग्री उपलब्ध है और क्या वह सामग्री आरोप को विश्वसनीय रूप से स्थापित करती है।

इस मामले में हाई कोर्ट को ऐसा पर्याप्त आधार नहीं मिला, जिससे पति के आरोपों को तलाक के लिए आवश्यक मानसिक क्रूरता के स्तर तक माना जा सके।

हर वैवाहिक विवाद को क्रूरता नहीं माना जा सकता

वैवाहिक संबंधों में पति-पत्नी के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है। लेकिन कानून की दृष्टि से तलाक का आधार बनने वाली क्रूरता और सामान्य वैवाहिक विवाद के बीच अंतर किया जाता है।

किसी बात पर नाराजगी, आपसी विवाद, कुछ समय के लिए अलग रहना या एक-दूसरे के व्यवहार से असंतुष्ट होना हर मामले में विवाह विच्छेद का आधार नहीं बन सकता।

इसी तरह, किसी एक घटना को पूरे वैवाहिक संबंध के संदर्भ से अलग करके देखने के बजाय अदालत परिस्थितियों के समग्र स्वरूप पर विचार करती है।

इस मामले में हाई कोर्ट ने कथित रूप से पति को सांवला और मोटा कहे जाने के आरोप को भी पूरे मामले की परिस्थितियों के संदर्भ में देखा। पीठ ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर इसे तलाक के लिए आवश्यक मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

पत्नी के अलग रहने के आरोप पर भी नहीं मिली राहत

पति ने पत्नी के अलग रहने को भी अपने पक्ष में महत्वपूर्ण आधार बताया था। उसका कहना था कि पत्नी विवाह के कुछ ही समय बाद अलग रहने लगी और बाद में उपचार के लिए रायगढ़ जाने के बाद चांपा वापस नहीं लौटी।

लेकिन केवल अलग रहना अपने आप में प्रत्येक मामले में desertion यानी परित्याग का कानूनी निष्कर्ष स्थापित नहीं करता। अदालत को यह देखना होता है कि अलग रहने के पीछे परिस्थितियां क्या थीं और क्या संबंधित पक्ष ने बिना उचित कारण वैवाहिक संबंध से स्थायी रूप से दूरी बनाई थी।

इस मामले में पति द्वारा लगाए गए आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा।

परिवार न्यायालय के फैसले को रखा बरकरार

इस मामले में परिवार न्यायालय ने पहले ही पति की विवाह विच्छेद की मांग को खारिज कर दिया था। पति ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पूरे मामले पर विचार करने के बाद परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।

पीठ ने स्पष्ट रूप से ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया, जिसके कारण निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप किया जाए। परिणामस्वरूप पति की अपील/याचिका खारिज कर दी गई।

हाई कोर्ट ने 18 सितंबर को परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

मानसिक क्रूरता का आरोप साबित करना क्यों महत्वपूर्ण है?

वैवाहिक विवादों में cruelty का आरोप अक्सर तलाक की कार्यवाही का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। लेकिन अदालत के सामने यह साबित करना जरूरी होता है कि कथित व्यवहार केवल सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं था, बल्कि उसकी प्रकृति और परिस्थितियां ऐसी थीं जिन्हें कानून मानसिक क्रूरता के रूप में स्वीकार करता है।

इसके लिए अदालत मामले के अलग-अलग पहलुओं को देख सकती है—जैसे कथित व्यवहार की निरंतरता, उसकी गंभीरता, दोनों पक्षों के बीच संबंधों पर उसका प्रभाव, उपलब्ध दस्तावेज, गवाहों के बयान और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य।

इस मामले में पति ने पत्नी के व्यवहार को मानसिक क्रूरता बताया, लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य उन आरोपों को उस स्तर पर स्थापित नहीं करते, जो विवाह विच्छेद के लिए जरूरी था।

अदालत का संदेश: आरोप और प्रमाण में अंतर

इस फैसले से वैवाहिक मुकदमों में एक महत्वपूर्ण कानूनी बात सामने आती है कि आरोप और प्रमाण एक ही चीज नहीं हैं।

यदि कोई पति या पत्नी अदालत के सामने दूसरे पक्ष पर क्रूरता का आरोप लगाता है, तो अदालत केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर विवाह समाप्त नहीं करती। आरोप के समर्थन में उपलब्ध साक्ष्यों की विश्वसनीयता और मामले की पूरी परिस्थितियों का परीक्षण किया जाता है।

आकाश घोष के मामले में भी हाई कोर्ट ने इसी दृष्टिकोण को अपनाया। पति द्वारा पत्नी पर लगाए गए अपमान, धमकी और अलग रहने के आरोपों को अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर परखा और यह निष्कर्ष निकाला कि वे विवाह विच्छेद के लिए आवश्यक मानसिक क्रूरता को पर्याप्त रूप से साबित नहीं करते।

क्या पत्नी का अपमानजनक व्यवहार हमेशा क्रूरता हो सकता है?

इस मामले को यह सामान्य नियम नहीं माना जाना चाहिए कि पति या पत्नी द्वारा अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कभी भी मानसिक क्रूरता नहीं बन सकता। प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं।

यदि किसी मामले में लगातार गंभीर अपमान, धमकी, उत्पीड़न या ऐसा व्यवहार साबित हो जाए जिसका वैवाहिक जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ा हो, तो अदालत उसकी प्रकृति और परिस्थितियों के अनुसार कानूनी निष्कर्ष निकाल सकती है।

लेकिन इस मामले में हाई कोर्ट के सामने उपलब्ध साक्ष्य उस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं पाए गए।

यही कारण है कि अदालत ने पति की व्यक्तिगत शिकायतों और कानूनी रूप से सिद्ध मानसिक क्रूरता के बीच अंतर किया।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह मामला बताता है कि विवाह विच्छेद की कार्यवाही में केवल वैवाहिक संबंधों में विवाद या दूसरे पक्ष के कथित अपमानजनक व्यवहार का उल्लेख पर्याप्त नहीं होता। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की मांग करने वाले पक्ष को अपने आधार को विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से स्थापित करना पड़ता है।

आकाश घोष ने पत्नी पर उसे सांवला और मोटा कहकर अपमानित करने, धमकी देने, बार-बार मायके जाने तथा अलग रहने जैसे आरोप लगाए थे। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि पति इन आरोपों को पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य से उस स्तर तक सिद्ध नहीं कर सका, जिससे मानसिक क्रूरता का कानूनी आधार स्थापित हो सके।

इसलिए जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने परिवार न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए पति की याचिका खारिज कर दी।

यह फैसला एक बार फिर रेखांकित करता है कि वैवाहिक विवाद में किसी व्यवहार को कानूनी रूप से cruelty मानने के लिए उसके तथ्य, गंभीरता, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण होते हैं। केवल आरोप लगाए जाने से विवाह विच्छेद का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं हो जाता।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।