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पति की मौत के बाद मिली अनुकंपा नौकरी, सास को देना होगा वेतन का 25%: राजस्थान हाईकोर्ट

पति की मौत के बाद मिली अनुकंपा नौकरी, सास को देना होगा वेतन का 25%: राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

        राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा आदेश दिया है, जिसने सरकारी नौकरी पाने वाले आश्रित व्यक्ति की जिम्मेदारियों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। अदालत ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड यानी AVVNL को निर्देश दिया है कि पति की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली महिला के नियमित मासिक वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा उसकी बुजुर्ग सास के बैंक खाते में सीधे जमा कराया जाए। यह व्यवस्था सास के जीवित रहने तक जारी रखने का आदेश दिया गया है।

इसके साथ ही अदालत ने दिवंगत कर्मचारी से जुड़े टर्मिनल और अन्य अंतिम सेवा लाभों को भी सास और बहू के बीच बराबर बांटने का निर्देश दिया है। इन लाभों को जारी करने के लिए निगम को 30 दिन की समयसीमा दी गई है।

यह फैसला 17 सितंबर 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में न्यायमूर्ति आनंद शर्मा की एकलपीठ ने सुनाया। मामला वर्ष 2018 से अदालत के सामने लंबित था। इस दौरान याचिकाकर्ता ससुर की भी मृत्यु हो गई और इसके बाद सास ही मामले में मुख्य याचिकाकर्ता रह गईं।

आखिर पूरा मामला क्या था?

मामला अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में टेक्निकल हेल्पर के पद पर कार्यरत रहे एक कर्मचारी की मृत्यु से जुड़ा है। न्यायालय के सामने रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार कर्मचारी सुभाष चंद वर्मा की 24 मार्च 2017 को मृत्यु हो गई थी। वह परिवार के प्रमुख कमाने वाले सदस्य थे।

कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। सास-ससुर ने इसके लिए अनापत्ति दी और इसके बाद महिला को 30 अगस्त 2017 को निगम में कनिष्ठ लिपिक यानी LDC के पद पर अनुकंपा नियुक्ति दी गई।

मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि नौकरी हासिल करने के दौरान महिला ने एक शपथपत्र भी दिया था। इसमें उसने दिवंगत कर्मचारी के परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल और उनका भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी स्वीकार की थी।

यही शपथपत्र बाद में पूरे विवाद का महत्वपूर्ण आधार बन गया।

नौकरी मिलने के बाद बदल गए पारिवारिक हालात

सास-ससुर की ओर से अदालत में आरोप लगाया गया कि अनुकंपा नियुक्ति मिलने के कुछ समय बाद बहू ने ससुराल छोड़ दिया। बाद में उसने दूसरी शादी भी कर ली और बुजुर्ग सास-ससुर को आर्थिक सहायता देना बंद कर दिया।

परिवार के लिए स्थिति इसलिए भी गंभीर थी क्योंकि जिस कर्मचारी की मृत्यु हुई थी, वह परिवार का प्रमुख कमाने वाला सदस्य था। उसकी मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को अचानक पैदा हुए आर्थिक संकट से बाहर निकालना था।

सास-ससुर ने आरोप लगाया कि बहू ने नौकरी प्राप्त करने के लिए परिवार की देखभाल करने का जो आश्वासन दिया था, नौकरी मिलने के बाद उसका पालन नहीं किया।

इसी विवाद को लेकर वर्ष 2018 में दोनों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले ससुर की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी ने मामले को आगे बढ़ाया।

बहू की ओर से क्या दलील दी गई?

मामले में बहू की ओर से भी कई महत्वपूर्ण तर्क अदालत के सामने रखे गए।

उसकी ओर से कहा गया कि उसने किन्हीं पारिवारिक परिस्थितियों और दुर्व्यवहार के कारण ससुराल छोड़ा था। इसलिए केवल इस आधार पर उससे सास के लिए जीवनभर आर्थिक योगदान देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

दूसरी दलील यह थी कि सास के दो अन्य बेटे भी हैं। इसलिए उनकी देखभाल की जिम्मेदारी केवल उसी महिला पर नहीं डाली जानी चाहिए।

बहू की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अनुकंपा नियुक्ति मिलने के बाद उसे जो वेतन मिल रहा है, वह उसकी अपनी नौकरी का वेतन है। यह उसके दिवंगत पति की संपत्ति या सेवा लाभ नहीं है। इसलिए उसकी नियमित सैलरी का एक हिस्सा सास को देने का निर्देश उचित नहीं माना जाना चाहिए।

इसी तरह दिवंगत कर्मचारी के सेवा संबंधी अंतिम लाभों में भी बराबर हिस्सा देने की मांग का विरोध किया गया।

लेकिन हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और विशेष रूप से अनुकंपा नियुक्ति के समय दिए गए शपथपत्र को देखते हुए इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को कैसे देखा?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अनुकंपा नियुक्ति की प्रकृति को लेकर अदालत की टिप्पणी है।

अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति किसी व्यक्ति को सामान्य भर्ती प्रक्रिया की तरह केवल रोजगार देने की व्यवस्था नहीं है। इसका मूल उद्देश्य उस परिवार को तत्काल आर्थिक राहत देना है, जिसने अपने कमाने वाले सदस्य को अचानक खो दिया है।

दूसरे शब्दों में, अनुकंपा नियुक्ति का संबंध केवल उस व्यक्ति से नहीं देखा जा सकता जिसे नौकरी मिलती है। इसके पीछे वह पारिवारिक परिस्थिति भी होती है जिसके कारण नियुक्ति की जरूरत पैदा हुई।

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित महिला ने नियुक्ति हासिल करते समय स्वयं शपथपत्र देकर परिवार के दूसरे सदस्यों की देखभाल करने की जिम्मेदारी स्वीकार की थी।

इसलिए अदालत के सामने सवाल केवल यह नहीं था कि महिला को नौकरी मिली या नहीं, बल्कि यह भी था कि जिस आधार पर उसने वह नौकरी प्राप्त की, उससे जुड़ी जिम्मेदारी को बाद में पूरी तरह छोड़ा जा सकता है या नहीं।

“नौकरी मिली तो जिम्मेदारी भी जुड़ी”—फैसले का मूल संदेश

हाईकोर्ट की टिप्पणी का सार यह है कि अनुकंपा नियुक्ति को केवल व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के रूप में नहीं देखा जा सकता, खासकर तब जब नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति ने स्वयं परिवार के अन्य सदस्यों के भरण-पोषण का लिखित आश्वासन दिया हो।

अदालत ने अपने फैसले में पहले के एक राजस्थान हाईकोर्ट निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति पर परिवार के दूसरे आश्रित सदस्यों की देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारी को रेखांकित किया गया था।

वर्तमान मामले में अदालत ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए माना कि नियुक्ति पाने के बाद परिवार के बुजुर्ग आश्रित को पूरी तरह छोड़ देना उस व्यवस्था की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।

सैलरी का 25 प्रतिशत क्यों?

यह सवाल भी स्वाभाविक है कि अदालत ने 25 प्रतिशत राशि ही क्यों तय की।

फैसले में अदालत ने संबंधित महिला के पूरे वेतन को सास को देने का आदेश नहीं दिया। केवल उसके नियमित मासिक वेतन का एक चौथाई हिस्सा सास के खाते में जमा कराने का निर्देश दिया गया।

इसका अर्थ यह है कि महिला अपनी नौकरी और वेतन का बड़ा हिस्सा स्वयं प्राप्त करती रहेगी, लेकिन उसके वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा बुजुर्ग सास के भरण-पोषण के लिए निर्धारित रहेगा।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह राशि सास को सीधे हाथ में देने के बजाय निगम को उनके बैंक खाते में जमा करने का निर्देश दिया गया है। इससे भुगतान की नियमितता और रिकॉर्ड दोनों बनाए रखने की व्यवस्था होती है।

यह आदेश सास के जीवनकाल तक जारी रहेगा।

क्या इसका मतलब हर अनुकंपा कर्मचारी को 25% वेतन देना होगा?

नहीं। इस फैसले को सामान्य नियम के रूप में समझना सही नहीं होगा।

अदालत का आदेश इस विशेष मामले के तथ्यों पर आधारित है। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली महिला ने स्वयं परिवार के अन्य सदस्यों का भरण-पोषण करने का शपथपत्र दिया था।

इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में हर कर्मचारी जिसे अनुकंपा नियुक्ति मिलेगी, उसकी सैलरी का स्वतः 25 प्रतिशत माता-पिता या किसी अन्य रिश्तेदार को देना पड़ेगा।

ऐसे मामलों में नियुक्ति के नियम, मृत कर्मचारी के आश्रितों की स्थिति, दिए गए शपथपत्र या undertaking, परिवार की आर्थिक परिस्थितियां और मामले के अन्य तथ्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यही कारण है कि इस फैसले को उसके वास्तविक तथ्यों के साथ समझना जरूरी है।

टर्मिनल बेनिफिट्स भी बराबर बांटने का आदेश

मामले में सिर्फ मासिक वेतन को लेकर आदेश नहीं दिया गया। अदालत ने दिवंगत कर्मचारी से जुड़े अंतिम सेवा लाभों के संबंध में भी महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए।

अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड को निर्देश दिया गया कि दिवंगत कर्मचारी के टर्मिनल बेनिफिट्स को 30 दिनों के भीतर जारी किया जाए।

इन लाभों को सास और बहू के बीच बराबर-बराबर बांटने का निर्देश दिया गया। यानी सास को 50 प्रतिशत और बहू को 50 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। सास के हिस्से की राशि सीधे उनके बैंक खाते में जमा की जानी है।

यह आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने नियमित वेतन और दिवंगत कर्मचारी के अंतिम सेवा लाभों को अलग-अलग आधार पर देखा। मासिक वेतन में 25 प्रतिशत हिस्सा सास के लिए निर्धारित किया गया, जबकि दिवंगत कर्मचारी के टर्मिनल लाभों में बराबर हिस्सेदारी का निर्देश दिया गया।

दूसरी शादी को लेकर क्या असर पड़ा?

मामले में यह तथ्य भी अदालत के सामने था कि अनुकंपा नियुक्ति पाने वाली महिला ने बाद में दूसरी शादी कर ली थी।

लेकिन केवल दूसरी शादी को इस फैसले का आधार मानना सही नहीं होगा।

अदालत के सामने इससे अधिक महत्वपूर्ण परिस्थितियां थीं—नियुक्ति के समय परिवार की देखभाल का दिया गया शपथपत्र, नौकरी प्राप्त करने के बाद सास-ससुर से अलग होना और उनके भरण-पोषण का आरोपित रूप से बंद हो जाना।

अर्थात फैसले का केंद्र केवल पुनर्विवाह नहीं, बल्कि अनुकंपा नियुक्ति के आधार से जुड़ी जिम्मेदारी और आश्रित परिवार के प्रति दायित्व था।

क्या बहू की सैलरी वास्तव में उसकी अपनी नहीं है?

यहां कानूनी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

नौकरी मिलने के बाद कर्मचारी को मिलने वाला मासिक वेतन सामान्यतः उसकी सेवा का पारिश्रमिक होता है। लेकिन वर्तमान मामले में अदालत के सामने विशिष्ट तथ्य यह था कि नौकरी स्वयं उस पारिवारिक परिस्थिति में मिली थी जिसमें कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक संकट में था और नियुक्ति पाने वाली महिला ने परिवार की देखभाल का लिखित आश्वासन दिया था।

इसलिए अदालत ने केवल “यह मेरा व्यक्तिगत वेतन है” वाली दलील के आधार पर मामले को समाप्त नहीं किया।

यह फैसला अपने आप में यह सिद्धांत नहीं बनाता कि किसी कर्मचारी का पूरा वेतन परिवार की संपत्ति बन जाता है। बल्कि यहां अदालत ने नियुक्ति की परिस्थितियों और पूर्व में दिए गए undertaking को विशेष महत्व दिया।

बुजुर्ग माता-पिता के अधिकार पर भी ध्यान

इस फैसले का एक सामाजिक पहलू भी है। अक्सर परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद पीछे रह जाने वाले बुजुर्ग माता-पिता आर्थिक कठिनाइयों में फंस जाते हैं।

यदि मृत कर्मचारी के स्थान पर परिवार के किसी सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति मिलती है, तो विवाद यह पैदा हो सकता है कि उस नियुक्ति का लाभ केवल नियुक्त व्यक्ति का है या उसके पीछे मौजूद पूरे आश्रित परिवार के हित भी जुड़े हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले में दूसरे दृष्टिकोण को महत्व दिया और यह माना कि जब नियुक्ति परिवार को संकट से निकालने के उद्देश्य से दी गई हो तथा नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति ने स्वयं परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी स्वीकार की हो, तब उस जिम्मेदारी की अनदेखी नहीं की जा सकती।

क्या यह फैसला दूसरे मामलों में भी मिसाल बनेगा?

यह फैसला निश्चित रूप से अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े विवादों में चर्चा का विषय बन सकता है। लेकिन किसी भी न्यायिक फैसले को दूसरे मामले पर लागू करने से पहले उसके तथ्य और संबंधित सेवा नियमों को देखना जरूरी होता है।

हर मामले में मृत कर्मचारी के परिवार की संरचना अलग हो सकती है। कहीं माता-पिता आश्रित हो सकते हैं, कहीं पति या पत्नी, कहीं बच्चे और कहीं अन्य सदस्य। इसी तरह नियुक्ति के समय दिए गए दस्तावेज और undertakings भी अलग-अलग हो सकते हैं।

इसलिए इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू 25 प्रतिशत की राशि से ज्यादा वह सिद्धांत है जिसमें अदालत ने अनुकंपा नियुक्ति और आश्रित परिवार के प्रति जिम्मेदारी के बीच संबंध पर जोर दिया है।

लंबे समय से चल रहे विवाद को मिला अंत

यह मामला वर्ष 2018 से अदालत में लंबित था। लगभग आठ साल बाद आए फैसले ने बुजुर्ग सास के लिए नियमित आर्थिक सहायता का रास्ता साफ किया है।

अब AVVNL को अदालत के निर्देश के अनुसार नियमित वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा सास के बैंक खाते में जमा कराना होगा। इसके अलावा दिवंगत कर्मचारी के अंतिम सेवा लाभों का भी निर्धारित तरीके से वितरण करना होगा।

इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने अनुकंपा नियुक्ति को केवल “सरकारी नौकरी मिल गई” के रूप में नहीं देखा। अदालत ने उस नियुक्ति के पीछे मौजूद पारिवारिक संकट, मृत कर्मचारी के आश्रितों और नियुक्ति पाने वाली महिला द्वारा दिए गए लिखित आश्वासन को भी महत्व दिया।

फैसले का व्यापक कानूनी अर्थ

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखता है—क्या किसी व्यक्ति को मिली नौकरी को उसके मूल पारिवारिक संदर्भ से पूरी तरह अलग करके देखा जा सकता है?

इस मामले में अदालत का उत्तर परिस्थितियों के आधार पर नकारात्मक रहा।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर अनुकंपा कर्मचारी अपनी पूरी कमाई परिवार के दूसरे सदस्यों को देने के लिए बाध्य होगा। बल्कि वर्तमान आदेश की खास वजह वह undertaking थी जिसे नियुक्ति पाने वाली महिला ने स्वयं दिया था और जिसके आधार पर अदालत ने उसके बाद के आचरण को देखा।

यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

अनुकंपा नियुक्ति सामान्य प्रतिस्पर्धी भर्ती से अलग व्यवस्था है। इसका उद्देश्य उस परिवार को तत्काल सहारा देना है जो अपने कमाने वाले सदस्य को खोने के कारण आर्थिक संकट में आ गया हो। राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में इसी कल्याणकारी उद्देश्य को केंद्र में रखा और बुजुर्ग मां के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए व्यावहारिक व्यवस्था तय की।

अब इस फैसले के बाद अनुकंपा नियुक्ति लेने वाले कर्मचारियों और विभागों के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण रहेगा कि नियुक्ति के समय दिए गए शपथपत्र, परिवार के आश्रित सदस्यों और सेवा नियमों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जाए।

फिलहाल इस मामले में अदालत का स्पष्ट आदेश है—बहू के नियमित वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा सास को उनके जीवनकाल तक मिलेगा और दिवंगत कर्मचारी के अंतिम सेवा लाभों में भी सास और बहू को बराबर हिस्सा दिया जाएगा। यह आदेश एक विशेष मामले के तथ्यों पर आधारित है, लेकिन अनुकंपा नियुक्ति की सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी पर इसकी चर्चा लंबे समय तक होती रहेगी।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।