महिला की सलवार उतारने की कोशिश और छाती दबाने को रेप का प्रयास न मानने वाले पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, स्वतः संज्ञान लेकर आरोपी को नोटिस
महिला के कपड़े उतारने की कोशिश और उसके साथ कथित शारीरिक छेड़छाड़ को बलात्कार के प्रयास का अपराध नहीं मानने वाले पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया और मामले को अपने सामने लिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के फैसले को आरोपी को सुने बिना सीधे रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एस.डी. संजय से कहा कि स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी को नोटिस की तामील सुनिश्चित की जाए।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ऐसे समय सामने आया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता, भाषा और “preparation” तथा “attempt” के बीच अंतर को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कर चुका है।
हालांकि, मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह नहीं कहा है कि पटना हाईकोर्ट का फैसला अंतिम रूप से गलत है या आरोपी दोषी है। फिलहाल अदालत ने मामले का संज्ञान लेकर संबंधित आरोपी को सुनवाई का अवसर देने की प्रक्रिया शुरू की है।
आखिर क्या था पटना हाईकोर्ट का फैसला?
मामला Himanshu Kr. Pathak v. State of Bihar से संबंधित है। पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2026 को आपराधिक अपील पर फैसला सुनाया था।
मामले के आरोपों के अनुसार, पीड़िता अपने पिता के साथ आरोपी के स्टूडियो में गई थी। आरोप था कि आरोपी ने पीड़िता के पिता को कंप्यूटर पर तस्वीरें देखने के लिए बाहर भेज दिया और स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
इसके बाद आरोपी ने कथित तौर पर महिला की सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर शारीरिक रूप से छेड़छाड़ की। महिला ने शोर मचाया, जिसके बाद उसके पिता ने दरवाजा खुलवाया और आरोपी के वहां से भाग जाने की बात सामने आई।
मामले में निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 सहपठित धारा 511 के तहत दोषी ठहराया था। इसके खिलाफ आरोपी ने पटना हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों की समीक्षा करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि धारा 376/511 के तहत बलात्कार के प्रयास का अपराध सिद्ध करने के लिए आवश्यक तत्व इस मामले में पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं होते।
हाईकोर्ट ने ‘Attempt to Rape’ क्यों नहीं माना?
पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बलात्कार के प्रयास और महिला की गरिमा भंग करने वाले अपराध के बीच कानूनी अंतर पर विचार किया।
अदालत ने कहा कि केवल सलवार उतारने की कोशिश और छाती दबाने के आरोप, अपने आप में, बलात्कार के प्रयास के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, जब तक कि ऐसे अतिरिक्त कृत्य या परिस्थितियां सामने न हों जो बलात्कार करने के स्पष्ट इरादे और उस अपराध की ओर बढ़ चुके प्रयास को स्थापित करें।
हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि मामले में penetration का कोई साक्ष्य नहीं था और ऐसा कोई overt act भी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया जिससे बलात्कार करने का इरादा और उसके प्रयास की कानूनी सीमा स्थापित हो सके। अदालत ने मेडिकल corroboration की अनुपस्थिति का भी उल्लेख किया।
इसके बावजूद हाईकोर्ट ने यह माना कि आरोपी द्वारा महिला को कमरे में बंद करना, उसकी सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाना ऐसे कृत्य हैं जिनसे महिला की मर्यादा भंग करने के लिए आपराधिक बल के इस्तेमाल के तत्व सामने आते हैं।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने इन कृत्यों को IPC की धारा 354 के दायरे में माना और धारा 376/511 के तहत दोषसिद्धि को टिकाऊ नहीं माना।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान क्यों लिया?
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने सीधे उसी दिन नहीं आया था। जुलाई 2026 में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ का ध्यान पटना हाईकोर्ट के इस फैसले की ओर आकर्षित किया था।
उस समय सुप्रीम कोर्ट एक अलग suo motu कार्यवाही पर सुनवाई कर रहा था। वह कार्यवाही इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से संबंधित थी, जिसमें नाबालिग लड़की के साथ किए गए कुछ यौन कृत्यों को बलात्कार के प्रयास के बजाय केवल तैयारी के स्तर पर माना गया था।
पटना हाईकोर्ट के फैसले में भी attempt to rape और preparation के बीच अंतर पर चर्चा की गई थी। इसी समानता के कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने इस फैसले का मुद्दा उठाया गया।
23 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का औपचारिक रूप से स्वतः संज्ञान लिया।
CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एस.डी. संजय से कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां हैं।
हालांकि, अदालत ने उसी समय फैसले को रद्द करने का आदेश नहीं दिया।
CJI ने स्पष्ट किया कि आरोपी को सुने बिना उसके खिलाफ प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया जा सकता। उन्होंने बिहार के एडवोकेट जनरल से कहा कि स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी को नोटिस की तामील कराई जाए।
यह प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत से भी जुड़ी है। यदि किसी व्यक्ति के पक्ष में हाईकोर्ट का फैसला है और सुप्रीम कोर्ट उस फैसले की स्वतः समीक्षा कर रहा है, तो संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर देना आवश्यक है।
इसलिए मौजूदा चरण में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को नोटिस जारी करने की दिशा में कदम उठाया है, न कि आरोपी को दोषी घोषित किया है।
‘Preparation’ और ‘Attempt’ में क्या अंतर है?
यह पूरा विवाद आपराधिक कानून के एक पुराने और महत्वपूर्ण सिद्धांत से जुड़ा है—तैयारी (Preparation) और प्रयास (Attempt) के बीच अंतर।
किसी अपराध के लिए केवल मन में इरादा पैदा होना सामान्यतः अपराध का प्रयास नहीं माना जाता। अपराध की योजना बनाना या तैयारी करना भी हर स्थिति में attempt नहीं होता।
लेकिन जब आरोपी अपराध करने की मंशा के साथ तैयारी से आगे बढ़कर ऐसे कृत्य करने लगता है जो सीधे अपराध के निष्पादन की दिशा में होते हैं, तो मामला attempt के स्तर तक पहुंच सकता है।
इस अंतर को निर्धारित करना हमेशा केवल एक कृत्य देखकर संभव नहीं होता। अदालत को पूरे घटनाक्रम, आरोपी के आचरण, परिस्थितियों, उसके कथित इरादे और इस बात को देखना पड़ता है कि अपराध की दिशा में वास्तविक कदम कितना आगे बढ़ चुका था।
यही प्रश्न पटना हाईकोर्ट के फैसले में भी महत्वपूर्ण था और अब सुप्रीम कोर्ट के सामने भी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
पटना मामले पर सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान कार्यवाही को समझने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़े पिछले मामले को समझना भी जरूरी है।
उस मामले में आरोप था कि एक नाबालिग लड़की के स्तन पकड़े गए, उसके पायजामे की डोरी तोड़ी गई और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस समय इन कृत्यों को बलात्कार के प्रयास के बजाय तैयारी के स्तर पर माना था और अपेक्षाकृत कम गंभीर प्रावधानों के तहत कार्यवाही की दिशा में आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में उस हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध आरोपों और घटनाक्रम को देखते हुए यह कहना उचित नहीं था कि मामला केवल तैयारी के चरण में रुका था। अदालत ने इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिया कि आरोपों के अनुसार आरोपी तीसरे व्यक्तियों के हस्तक्षेप के कारण आगे अपराध नहीं कर पाए थे।
इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मूल summoning order को बहाल किया और कहा कि मामले में attempt के प्रावधान लागू करने का prima facie आधार था।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘इरादे’ और ‘कृत्य’ को कैसे देखा?
इलाहाबाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने preparation और attempt के बीच अंतर को समझाते हुए इस बात पर जोर दिया कि आरोपी की mens rea यानी अपराध करने की मानसिक मंशा केवल मन में मौजूद नहीं थी, बल्कि कथित कृत्यों के माध्यम से उसे आगे बढ़ाया जा चुका था।
अदालत ने माना कि यदि आरोपी अपराध करने के इरादे से वास्तविक कृत्य कर रहा था और उसे बाहरी हस्तक्षेप के कारण रोका गया, तो इसे केवल तैयारी कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक यौन छेड़छाड़ की घटना स्वतः attempt to rape बन जाएगी।
हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। अपराध के आवश्यक तत्व, आरोपी की मंशा, उसके द्वारा किए गए कृत्य और उपलब्ध साक्ष्यों का अलग-अलग मूल्यांकन करना पड़ता है।
यही कानूनी बारीकी पटना मामले में भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों की सुनवाई को लेकर क्या कदम उठाए?
इलाहाबाद मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केवल उस विशेष फैसले को रद्द करने तक मामला सीमित नहीं रखा।
फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने National Judicial Academy को यौन अपराधों से जुड़े मामलों की न्यायिक सुनवाई में संवेदनशीलता और करुणा से संबंधित व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।
अदालत ने इस बात पर ध्यान दिया कि महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में न्यायिक भाषा और दृष्टिकोण ऐसा होना चाहिए जिसमें पीड़ित के प्रति गरिमा और संवेदनशीलता बनी रहे।
बाद में विशेषज्ञ समिति की ओर से भी ऐसे दिशानिर्देश तैयार किए गए जिनमें victim-shaming, gender stereotypes और असंवेदनशील भाषा से बचने पर जोर दिया गया।
इस पृष्ठभूमि में पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया है?
नहीं।
यह इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात है।
23 सितंबर 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केवल यह कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां हैं और मामले पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने आरोपी को नोटिस देने का निर्देश दिया है।
CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को सुने बिना हाईकोर्ट के फैसले को रद्द नहीं किया जा सकता।
इसलिए अभी यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट का फैसला गलत घोषित कर दिया है, कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।
क्या केवल कपड़े उतारने की कोशिश को हमेशा रेप का प्रयास माना जाएगा?
यह प्रश्न भी इस मामले में सीधे-सीधे उठ सकता है, लेकिन इसका उत्तर केवल एक सामान्य नियम से नहीं दिया जा सकता।
आपराधिक कानून में attempt निर्धारित करने के लिए अदालत को पूरे घटनाक्रम की समीक्षा करनी होती है।
यदि किसी मामले में आरोपी का आचरण स्पष्ट रूप से यौन अपराध को अंजाम देने की दिशा में आगे बढ़ चुका है, तो परिस्थितियों के अनुसार attempt का अपराध बन सकता है। दूसरी ओर, यदि अभियोजन आवश्यक तत्वों को संदेह से परे स्थापित नहीं कर पाता, तो अदालत को संबंधित अपराध के कानूनी तत्वों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट की आने वाली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह पटना मामले के विशिष्ट तथ्यों और हाईकोर्ट द्वारा अपनाई गई कानूनी कसौटी को किस प्रकार देखता है।
इस मामले में धारा 354 की भूमिका क्या है?
पटना हाईकोर्ट ने धारा 376/511 के तहत दोषसिद्धि को हटाते हुए यह माना था कि उपलब्ध कृत्य IPC की धारा 354 के तत्वों के अंतर्गत आते हैं।
धारा 354 का संबंध महिला पर आपराधिक बल या हमला करने से है, जब उसका उद्देश्य या ज्ञान महिला की मर्यादा भंग करने से जुड़ा हो।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि महिला को कमरे में बंद करना, उसकी सलवार उतारने का प्रयास करना और उसकी छाती दबाना ऐसे कृत्य थे जिनसे धारा 354 के आवश्यक तत्व सामने आते हैं।
इसलिए हाईकोर्ट का फैसला यह नहीं कहता कि आरोपी का आचरण कानूनी रूप से अपराधरहित था। अदालत ने अपराध की कानूनी श्रेणी को लेकर अलग निष्कर्ष निकाला था।
यही अंतर इस मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सवाल हैं?
आगे की सुनवाई में कई कानूनी प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सबसे पहला प्रश्न यह होगा कि क्या पटना हाईकोर्ट ने attempt to rape की कानूनी कसौटी सही ढंग से लागू की थी।
दूसरा प्रश्न यह हो सकता है कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आरोपी का आचरण तैयारी तक सीमित था या अपराध करने के प्रयास के स्तर तक पहुंच चुका था।
तीसरा मुद्दा हाईकोर्ट के फैसले में की गई उन टिप्पणियों से जुड़ा हो सकता है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में आपत्तिजनक बताया है।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट यह भी देख सकता है कि क्या पहले के न्यायिक सिद्धांतों और उसके फरवरी 2026 के फैसले के प्रकाश में पटना हाईकोर्ट द्वारा अपनाई गई reasoning उचित थी।
आरोपी को नोटिस देना क्यों जरूरी है?
यह पहलू कानूनी प्रक्रिया की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
यदि सुप्रीम कोर्ट किसी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने या स्वतः समीक्षा करने के बाद उसे बदलने या रद्द करने पर विचार करता है, तो जिस पक्ष के अधिकार प्रभावित होंगे उसे सुनवाई का अवसर मिलना जरूरी है।
इसी कारण CJI सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल से आरोपी को नोटिस की तामील सुनिश्चित करने को कहा।
यह आदेश इस बात को दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट मामले में आगे बढ़ते हुए natural justice के सिद्धांत का पालन करना चाहता है।
यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक भाषा का महत्व
इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू केवल आरोप या सजा नहीं, बल्कि अदालतों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा भी है।
यौन अपराधों के मामलों में पीड़ित की गरिमा बनाए रखना और ऐसी भाषा से बचना महत्वपूर्ण है जो पीड़ित को ही सवालों के घेरे में खड़ा करे या लैंगिक रूढ़ियों को मजबूत करे।
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में इसी व्यापक मुद्दे पर National Judicial Academy के माध्यम से दिशानिर्देश तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी। बाद की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया कि न्यायिक भाषा केवल शैली का विषय नहीं है, बल्कि निष्पक्षता, गरिमा और न्याय तक पहुंच से जुड़ी हुई है।
इसी पृष्ठभूमि में पटना हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियों की सुप्रीम कोर्ट द्वारा समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है।
निष्कर्ष
पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना, जिसमें महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसकी छाती दबाने के कृत्यों को IPC की धारा 376/511 के तहत बलात्कार का प्रयास नहीं माना गया था, यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को लेकर चल रही व्यापक बहस का अगला महत्वपूर्ण चरण है।
पटना हाईकोर्ट ने यह माना था कि उपलब्ध साक्ष्य बलात्कार के प्रयास के आवश्यक तत्वों को स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं करते। अदालत ने हालांकि आरोपी के कृत्यों को महिला की मर्यादा भंग करने वाले अपराध के रूप में माना और धारा 354 IPC के तहत उन्हें देखा।
सुप्रीम कोर्ट ने अब इस फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया है और प्रारंभिक सुनवाई में हाईकोर्ट की कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया है। लेकिन अदालत ने अभी फैसला रद्द नहीं किया है। आरोपी को नोटिस देने का निर्देश दिया गया है ताकि उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिल सके।
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अन्य फैसले को रद्द करते हुए स्पष्ट किया था कि परिस्थितियों के आधार पर तैयारी और प्रयास के बीच की सीमा का निर्धारण किया जाना चाहिए। उस मामले में तीसरे व्यक्तियों के हस्तक्षेप के कारण कथित अपराध आगे नहीं बढ़ पाया था और सुप्रीम कोर्ट ने इसे केवल preparation मानने से इनकार किया था।
अब पटना मामले में सुप्रीम कोर्ट किस कानूनी कसौटी को लागू करता है और हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर क्या अंतिम दृष्टिकोण अपनाता है, यह आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना कहना ही उचित है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए न्यायिक समीक्षा शुरू की है, लेकिन अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। आने वाला फैसला attempt to rape और अन्य यौन अपराधों के बीच कानूनी अंतर, न्यायिक भाषा और ऐसे मामलों में संवेदनशील न्यायिक दृष्टिकोण के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।