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बैंक लोन की गारंटी देने वालों के लिए हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मुख्य कर्जदार से पहले भी गारंटर से हो सकती है वसूली

बैंक लोन की गारंटी देने वालों के लिए हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मुख्य कर्जदार से पहले भी गारंटर से हो सकती है वसूली

       बैंक से ऋण लेने वाले व्यक्ति के साथ यदि कोई दूसरा व्यक्ति गारंटर बनता है, तो उसे यह समझना जरूरी है कि गारंटी देना केवल औपचारिकता नहीं है। कर्ज की अदायगी न होने की स्थिति में बैंक गारंटर के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई कर सकता है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्ज वसूली से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इसी कानूनी स्थिति को दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि सामान्य परिस्थितियों में गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के समान होती है।

न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा ने गारंटरों की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि बैंक या ऋणदाता के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह गारंटर के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने से पहले मुख्य कर्जदार से रकम वसूलने के सभी रास्ते समाप्त कर दे। यदि गारंटी अनुबंध में इसके विपरीत कोई विशेष शर्त नहीं है, तो बैंक अपनी सुविधा और कानूनी अधिकारों के अनुसार मुख्य कर्जदार अथवा गारंटर, दोनों में से किसी के खिलाफ पहले कार्रवाई कर सकता है।

यह फैसला उन लोगों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जो किसी मित्र, रिश्तेदार, कारोबारी साझेदार या परिचित के बैंक लोन में गारंटर बनने से पहले इसकी कानूनी जिम्मेदारी को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया समझते हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला कांगड़ा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक से संबंधित है। बैंक ने वर्ष 2012 में मुख्य कर्जदार मेसर्स अखिल स्टील ट्रेडर्स और उसके गारंटरों के खिलाफ ऋण की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था।

मामले के अनुसार, मुख्य कर्जदार ने वर्ष 2009 में बैंक से लगभग 10 लाख रुपये का ऋण लिया था। इस ऋण के लिए संबंधित व्यक्तियों ने बैंक के पक्ष में गारंटी डीड निष्पादित की थी।

जब ऋण की अदायगी निर्धारित तरीके से नहीं हुई तो बैंक ने बकाया राशि की वसूली के लिए न्यायालय का रुख किया। बैंक की ओर से लगभग 10,99,287 रुपये की वसूली का दावा किया गया था।

मामले की सुनवाई के बाद वरिष्ठ सिविल जज, नादौन, जिला हमीरपुर ने 26 फरवरी 2019 को बैंक के पक्ष में फैसला सुनाया।

निचली अदालत ने मुख्य कर्जदार और गारंटरों को बैंक की बकाया राशि के लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी माना। साथ ही रकम पर 12.50 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश भी दिया गया।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस फैसले को संबंधित पक्षों ने किसी उच्च अदालत में चुनौती नहीं दी। परिणामस्वरूप निचली अदालत का फैसला अंतिम हो गया।

इसके बाद बैंक ने अदालत के फैसले के आधार पर बकाया रकम की वसूली के लिए निष्पादन कार्यवाही शुरू की।

विवाद तब शुरू हुआ जब गारंटरों की संपत्ति की बिक्री का आदेश आया

बैंक की वसूली कार्यवाही आगे बढ़ने के दौरान निचली अदालत ने 28 मार्च 2026 को गारंटरों की संपत्ति की बिक्री के लिए वारंट जारी कर दिया।

यहीं से विवाद हाईकोर्ट पहुंचा।

गारंटरों ने अपनी याचिका में मुख्य रूप से यह दलील दी कि मुख्य कर्जदार के पास पर्याप्त संपत्ति मौजूद है। ऐसे में बैंक को पहले मुख्य कर्जदार की संपत्ति से अपना पैसा वसूल करना चाहिए। गारंटरों का कहना था कि जब मुख्य कर्जदार की संपत्ति से रकम की वसूली संभव है तो उनकी संपत्ति को बेचने की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

दूसरे शब्दों में, गारंटरों ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि गारंटर की जिम्मेदारी तभी सामने आनी चाहिए जब मुख्य कर्जदार से वसूली के सभी उपाय पहले इस्तेमाल किए जा चुके हों।

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने गारंटरों की दलील क्यों खारिज की?

अदालत ने गारंटी के कानूनी स्वरूप पर ध्यान देते हुए कहा कि सामान्य स्थिति में गारंटर की जिम्मेदारी मुख्य कर्जदार की देनदारी के साथ जुड़ी होती है।

यदि गारंटी अनुबंध में ऐसी कोई विशेष शर्त नहीं है जो गारंटर की देनदारी को सीमित करती हो, तो गारंटर बैंक से यह नहीं कह सकता कि पहले मुख्य कर्जदार से पूरी रकम वसूल की जाए और उसके बाद ही उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

यानी बैंक के सामने केवल एक ही रास्ता नहीं है कि वह पहले मुख्य कर्जदार की संपत्ति जब्त करे और उसके बाद गारंटर के खिलाफ जाए।

बैंक उपलब्ध कानूनी उपायों के अनुसार यह तय कर सकता है कि वसूली की कार्यवाही किसके खिलाफ और किस क्रम में आगे बढ़ाई जाए।

यही इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बात है।

गारंटर होना केवल नाम देने की प्रक्रिया नहीं

अक्सर लोग किसी परिचित के बैंक लोन में गारंटर बनने को एक सामान्य औपचारिकता मान लेते हैं। बैंक द्वारा दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए जाने के बाद कई लोग यह मान लेते हैं कि वास्तविक जिम्मेदारी केवल उस व्यक्ति की होगी जिसने ऋण लिया है।

लेकिन गारंटी अनुबंध का उद्देश्य ही यही है कि यदि मुख्य कर्जदार अपने दायित्व को पूरा नहीं करता है तो ऋणदाता के हितों की सुरक्षा के लिए गारंटर की जिम्मेदारी सामने आ सके।

इसलिए किसी बैंक लोन में गारंटर बनने से पहले यह समझना जरूरी है कि हस्ताक्षर किए गए दस्तावेज केवल औपचारिक कागज नहीं हैं। उनमें दर्ज शर्तें भविष्य में गारंटर की आर्थिक जिम्मेदारी निर्धारित कर सकती हैं।

विशेष रूप से यदि गारंटी बिना किसी सीमा के दी गई है, तो बैंक की वसूली कार्रवाई गारंटर के लिए गंभीर वित्तीय परिणाम पैदा कर सकती है।

क्या बैंक हमेशा गारंटर से ही पैसा वसूल सकता है?

हाईकोर्ट के फैसले को इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि बैंक हर मामले में मनमाने ढंग से गारंटर की संपत्ति बेच सकता है।

सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि गारंटी अनुबंध में क्या शर्तें हैं। यदि अनुबंध में गारंटर की जिम्मेदारी को लेकर कोई विशेष सीमा या शर्त निर्धारित है, तो उस अनुबंध का प्रभाव पड़ेगा।

इसके अलावा ऋण की वास्तविक स्थिति, अदालत का डिक्री, निष्पादन कार्यवाही और अन्य संबंधित कानूनी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होंगी।

वर्तमान मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि निचली अदालत पहले ही मुख्य कर्जदार और गारंटरों को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहरा चुकी थी और उस फैसले को चुनौती नहीं दी गई थी।

इसलिए डिक्री अंतिम हो चुकी थी और बैंक उसके निष्पादन के लिए आगे बढ़ रहा था।

संयुक्त जिम्मेदारी का क्या मतलब है?

इस मामले को समझने के लिए “संयुक्त रूप से उत्तरदायी” होने का अर्थ समझना भी जरूरी है।

यदि अदालत किसी डिक्री में मुख्य कर्जदार और गारंटरों को संयुक्त रूप से रकम के लिए जिम्मेदार ठहराती है, तो केवल यह तथ्य कि मूल ऋण किसी दूसरे व्यक्ति ने लिया था, गारंटर को स्वतः वसूली से बाहर नहीं कर देता।

गारंटर की भूमिका ऋणदाता के लिए सुरक्षा उपलब्ध कराने की होती है। जब मुख्य कर्जदार भुगतान करने में असफल होता है और अदालत की डिक्री भी ऋणदाता के पक्ष में होती है, तब गारंटी की शर्तों के अनुसार गारंटर के खिलाफ भी वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

इसी कारण हाईकोर्ट ने यह स्वीकार नहीं किया कि बैंक को पहले मुख्य कर्जदार की पूरी संपत्ति समाप्त होने तक इंतजार करना चाहिए।

गारंटर बैंक के सामने कौन-सी शर्त नहीं रख सकता?

हाईकोर्ट की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि गारंटर बैंक के सामने सामान्य तौर पर यह शर्त नहीं रख सकता कि—

“पहले मुख्य कर्जदार से वसूली करो, उसके बाद मेरे खिलाफ आना।”

यदि गारंटी अनुबंध में ऐसी कोई विशेष व्यवस्था नहीं है, तो केवल गारंटर होने के आधार पर बैंक की वसूली कार्रवाई को इस क्रम से बांधा नहीं जा सकता।

बैंक के लिए मुख्य कर्जदार और गारंटर दोनों की कानूनी स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसका उद्देश्य बैंक को अनावश्यक रूप से लंबी वसूली प्रक्रिया में फंसने से बचाना भी है। यदि बैंक को हर मामले में पहले मुख्य कर्जदार की सभी संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई पूरी करनी पड़े और उसके बाद ही गारंटर से संपर्क करने की अनुमति हो, तो गारंटी व्यवस्था की व्यावहारिक उपयोगिता कम हो सकती है।

गारंटी देने से पहले किन बातों का ध्यान रखें?

यह मामला आम लोगों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। किसी व्यक्ति के लोन का गारंटर बनने से पहले कुछ बातों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

सबसे पहले यह देखना चाहिए कि बैंक के दस्तावेज में गारंटी की सीमा क्या है। क्या गारंटी पूरे ऋण की है या किसी निश्चित रकम तक सीमित है? ब्याज और अन्य खर्चों के संबंध में क्या शर्त है? गारंटी कितने समय के लिए है? डिफॉल्ट होने पर बैंक को क्या अधिकार दिए गए हैं?

इन सवालों को समझे बिना केवल व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर गारंटर बनना बाद में आर्थिक विवाद का कारण बन सकता है।

कई बार लोग यह सोचकर गारंटर बन जाते हैं कि कर्ज लेने वाला उनका करीबी व्यक्ति है और वह समय पर भुगतान कर देगा। लेकिन यदि कारोबार में नुकसान हो जाए, नौकरी चली जाए, बीमारी या किसी अन्य कारण से भुगतान रुक जाए, तो बैंक के सामने गारंटी की कानूनी जिम्मेदारी सक्रिय हो सकती है।

क्या गारंटर की संपत्ति भी नीलाम हो सकती है?

यदि अदालत की डिक्री गारंटर के खिलाफ लागू है और निष्पादन कार्यवाही में उसकी संपत्ति से रकम की वसूली कानून के अनुसार की जा सकती है, तो परिस्थितियों के अनुसार उसकी संपत्ति की बिक्री का आदेश भी दिया जा सकता है।

वर्तमान मामले में निचली अदालत ने गारंटरों की संपत्ति की बिक्री के लिए वारंट जारी किया था। गारंटरों ने इसी कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

लेकिन हाईकोर्ट ने उनके इस आधार को स्वीकार नहीं किया कि मुख्य कर्जदार के पास पर्याप्त संपत्ति मौजूद होने के कारण पहले उसी की संपत्ति से वसूली की जानी चाहिए।

इस प्रकार केवल मुख्य कर्जदार के पास संपत्ति होने का तथ्य गारंटर के खिलाफ निष्पादन कार्यवाही को अपने आप अवैध नहीं बनाता।

पुराने फैसले को चुनौती न देने का भी पड़ा असर

इस मामले का एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक पहलू यह भी है कि वर्ष 2019 में निचली अदालत ने बैंक के पक्ष में फैसला सुनाया था।

उस फैसले में सभी प्रतिवादियों को रकम और ब्याज के भुगतान के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। लेकिन उस फैसले को किसी उच्च अदालत में चुनौती नहीं दी गई।

इसका मतलब यह हुआ कि डिक्री अंतिम हो गई।

जब किसी अदालत की डिक्री अंतिम हो जाती है, तो बाद की निष्पादन कार्यवाही में उस डिक्री के मूल आधार को आसानी से फिर से चुनौती देना संभव नहीं होता।

वर्तमान मामले में भी हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह नहीं था कि वर्ष 2009 का ऋण सही था या नहीं, बल्कि यह था कि अंतिम डिक्री के बाद गारंटरों की संपत्ति के खिलाफ निष्पादन कार्रवाई किस सीमा तक की जा सकती है।

बैंक और गारंटर के संबंध में क्या स्पष्ट हुआ?

इस फैसले से बैंकिंग और गारंटी कानून से जुड़ा एक व्यावहारिक सिद्धांत सामने आता है—गारंटर को केवल “दूसरा व्यक्ति” मानकर उसकी जिम्मेदारी को हल्का नहीं समझा जा सकता।

जिस व्यक्ति ने बैंक के साथ गारंटी अनुबंध किया है, उसे उस अनुबंध की शर्तों के अनुसार ऋण की अदायगी की जिम्मेदारी का सामना करना पड़ सकता है।

बैंक की दृष्टि से गारंटी का उद्देश्य ही यही है कि मुख्य कर्जदार द्वारा भुगतान न करने की स्थिति में ऋणदाता के हित सुरक्षित रहें।

इसलिए गारंटर बनने वाला व्यक्ति यह मानकर हस्ताक्षर नहीं कर सकता कि बैंक केवल मुख्य कर्जदार के पीछे जाएगा और उसके खिलाफ तभी कार्रवाई करेगा जब मुख्य कर्जदार से कुछ भी वसूल न हो पाए।

यह फैसला किन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है?

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो—

  • किसी मित्र या रिश्तेदार के बैंक लोन में गारंटर बनने जा रहे हैं;
  • कारोबारी ऋण में गारंटी देने पर विचार कर रहे हैं;
  • पहले से किसी बैंक ऋण के गारंटर हैं;
  • बैंक की वसूली कार्यवाही का सामना कर रहे हैं;
  • या अपनी संपत्ति को गारंटी के कारण होने वाली संभावित कार्रवाई से संबंधित कानूनी स्थिति समझना चाहते हैं।

हालांकि प्रत्येक मामले में गारंटी डीड और अदालत की डिक्री की शर्तें अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी एक फैसले को हर मामले पर उसी तरह लागू करना उचित नहीं होगा।

निष्कर्ष

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला बैंक ऋण के गारंटरों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी संदेश देता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सामान्य परिस्थितियों में गारंटर की जिम्मेदारी को केवल इसलिए पीछे नहीं रखा जा सकता कि मुख्य कर्जदार के पास अपनी संपत्ति मौजूद है।

यदि गारंटी अनुबंध में इसके विपरीत कोई विशेष शर्त नहीं है और अदालत ने मुख्य कर्जदार तथा गारंटरों को देनदारी के लिए जिम्मेदार ठहराया है, तो बैंक को पहले मुख्य कर्जदार से वसूली के सभी विकल्प समाप्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

कांगड़ा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के मामले में वर्ष 2019 की डिक्री को चुनौती नहीं दिए जाने के कारण वह अंतिम हो चुकी थी। बाद में जब बैंक ने रकम की वसूली के लिए निष्पादन कार्यवाही शुरू की और गारंटरों की संपत्ति की बिक्री के लिए वारंट जारी हुआ, तब गारंटरों ने यह कहते हुए हाईकोर्ट का रुख किया कि पहले मुख्य कर्जदार की संपत्ति से वसूली की जाए।

हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की और गारंटरों की याचिका खारिज कर दी।

इस फैसले से सबसे महत्वपूर्ण बात यही सामने आती है कि गारंटर बनना केवल किसी परिचित की मदद के लिए दस्तावेज पर हस्ताक्षर करना नहीं है, बल्कि यह संभावित वित्तीय और कानूनी दायित्व स्वीकार करने का निर्णय है। इसलिए किसी भी बैंक ऋण की गारंटी देने से पहले गारंटी डीड की प्रत्येक शर्त को समझना और आवश्यकता होने पर कानूनी सलाह लेना महत्वपूर्ण है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।