आपराधिक मामला लंबित होने से पासपोर्ट रोकना सही नहीं, विदेश यात्रा अलग सवाल: इलाहाबाद हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पासपोर्ट जारी करने और विदेश यात्रा की अनुमति के बीच महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होना अपने आप में उसका पासपोर्ट रोकने का पर्याप्त आधार नहीं है। हालांकि, पासपोर्ट मिल जाने का अर्थ यह भी नहीं है कि व्यक्ति को बिना किसी अतिरिक्त अनुमति के विदेश जाने का स्वतः अधिकार मिल गया है।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने यह टिप्पणी मोहम्मद आफताब बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान की। यह मामला रिट-सी संख्या 36603/2026 से संबंधित है और 14 सितंबर 2026 को अदालत ने इस पर अंतरिम आदेश पारित किया। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट रखना और विदेश यात्रा करना दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं। यदि कोई व्यक्ति आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहा है और वास्तव में विदेश जाने की कोशिश करता है, तो संबंधित आपराधिक अदालत उसके विदेश जाने पर रोक लगा सकती है, पासपोर्ट जमा कराने का आदेश दे सकती है या यात्रा की अनुमति कुछ शर्तों के साथ दे सकती है।
इस टिप्पणी का सीधा असर उन मामलों पर पड़ सकता है जहां केवल आपराधिक मुकदमा लंबित होने के कारण पासपोर्ट जारी करने या उसके नवीनीकरण में बाधा पैदा की जाती है।
मामला क्या था?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता मोहम्मद आफताब ने शिकायत की थी कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने के आधार पर उनका पासपोर्ट आवेदन आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि केवल आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के कारण पासपोर्ट जारी करने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता के खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित थे। इनमें से एक मामले में उन्हें जमानत मिल चुकी थी, जबकि दूसरे मामले की कार्यवाही को लेकर हाई कोर्ट के समक्ष भी चुनौती दी गई थी।
मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने इस प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया कि क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होने मात्र से पासपोर्ट अधिकारी पासपोर्ट जारी करने से इनकार कर सकता है?
अदालत ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए पासपोर्ट जारी करने और विदेश यात्रा की अनुमति को अलग-अलग चरण माना।
पासपोर्ट मिलना विदेश जाने की गारंटी नहीं
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। किसी नागरिक के पास वैध पासपोर्ट होने का अर्थ यह नहीं है कि वह दुनिया के किसी भी देश में तत्काल प्रवेश कर सकता है।
विदेश यात्रा के लिए सामान्यतः संबंधित देश का वीजा, प्रवेश की अनुमति और अन्य आवश्यक इमिग्रेशन प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं।
अदालत ने इसी आधार पर कहा कि पासपोर्ट अपने आप में किसी व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने का स्वतः अधिकार नहीं देता। इसलिए पासपोर्ट जारी करने के चरण को विदेश यात्रा की अनुमति के चरण से अलग रखना जरूरी है।
यानी यदि किसी व्यक्ति को पासपोर्ट जारी कर दिया जाता है, तो भी उसके विदेश जाने पर किसी सक्षम अदालत द्वारा लगाई गई रोक प्रभावी रहेगी।
इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि किसी आरोपी को अदालत ने जमानत देते समय भारत से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी है, तो उसके पास वैध पासपोर्ट होने के बावजूद वह उस आदेश का उल्लंघन करके विदेश नहीं जा सकता।
पुलिस या अभियोजन एजेंसी क्या कर सकती है?
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति आपराधिक कार्यवाही के दौरान विदेश जाने का प्रयास कर रहा है और पुलिस या अभियोजन पक्ष को आशंका है कि उसके विदेश चले जाने से मुकदमे की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है, तो संबंधित एजेंसी अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है।
अदालत से पासपोर्ट जमा कराने या विदेश जाने से रोकने का अनुरोध किया जा सकता है।
अर्थात पुलिस के पास इस प्रकार की स्थिति में कानूनी रास्ता उपलब्ध है, लेकिन केवल आशंका के आधार पर पासपोर्ट अधिकारी को पासपोर्ट जारी करने से रोक देना और आपराधिक अदालत द्वारा वास्तविक विदेश यात्रा को नियंत्रित करना—दो अलग बातें हैं।
हाई कोर्ट ने कहा कि विदेश यात्रा का प्रश्न उस समय पैदा होता है जब संबंधित व्यक्ति वास्तव में विदेश जाने का प्रयास कर रहा हो। पासपोर्ट जारी करना उससे पहले का चरण है।
हर आरोपी को विदेश जाने से रोकना जरूरी नहीं
अदालत ने यह भी नहीं कहा कि आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे प्रत्येक व्यक्ति को विदेश जाने की अनुमति दे दी जानी चाहिए।
इसके विपरीत, हाई कोर्ट ने साफ किया कि विदेश यात्रा की अनुमति परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
आपराधिक अदालत मामले के तथ्यों को देखते हुए—
- विदेश जाने की अनुमति दे सकती है,
- कुछ निश्चित अवधि के लिए अनुमति दे सकती है,
- यात्रा पर शर्तें लगा सकती है,
- वापस लौटने का आश्वासन या undertaking ले सकती है,
- या परिस्थितियों के आधार पर विदेश जाने की अनुमति से इनकार भी कर सकती है।
इस प्रकार हाई कोर्ट की टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि लंबित आपराधिक मुकदमे वाला व्यक्ति बिना किसी न्यायिक अनुमति के विदेश जा सकता है। अदालत ने मुख्य रूप से पासपोर्ट जारी करने और विदेश यात्रा के बीच अंतर पर जोर दिया है।
पासपोर्ट मूल रूप से एक नागरिक दस्तावेज
हाई कोर्ट ने पासपोर्ट को मूल रूप से नागरिक को मिलने वाला एक civil document बताया।
अदालत के अनुसार, केवल इस आधार पर कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित है, पासपोर्ट प्राधिकारी द्वारा पासपोर्ट जारी करने से इनकार करना उचित नहीं माना जा सकता।
हालांकि, इसका एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है।
यदि कोई व्यक्ति पासपोर्ट आवेदन में अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामले की जानकारी जानबूझकर छिपाता है, तो स्थिति अलग हो सकती है।
अर्थात आवेदक के लिए यह महत्वपूर्ण है कि पासपोर्ट आवेदन में मांगी गई जानकारी सही और पूर्ण रूप से उपलब्ध कराई जाए। लंबित आपराधिक मामले को छिपाना बाद में उसके लिए अलग कानूनी परेशानी पैदा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के महेश कुमार अग्रवाल फैसले का महत्व
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Mahesh Kumar Agarwal v. Union of India पर भरोसा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में इस मामले में पासपोर्ट अधिनियम के तहत लंबित आपराधिक कार्यवाही और पासपोर्ट जारी करने/नवीनीकरण के बीच संबंध पर विस्तार से विचार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वैध पासपोर्ट रखना और विदेश यात्रा करना अलग-अलग विषय हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(f), धारा 10(3)(e) और संबंधित सरकारी अधिसूचना GSR 570(E) की व्याख्या की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि धारा 6(2)(f) को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही लंबित होते ही हर स्थिति में पासपोर्ट जारी या नवीनीकृत करना पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाए।
अदालत ने यह भी समझाया कि संबंधित प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आपराधिक कार्यवाही का सामना कर रहा व्यक्ति अदालत के अधिकार क्षेत्र के अधीन बना रहे।
पासपोर्ट अधिकारी की भूमिका और आपराधिक अदालत की भूमिका अलग
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अलग-अलग सरकारी संस्थाओं की भूमिका स्पष्ट होती है।
पासपोर्ट अधिकारी का काम पासपोर्ट जारी करने या नवीनीकरण से संबंधित वैधानिक नियमों के अनुसार निर्णय लेना है।
वहीं यदि कोई व्यक्ति किसी आपराधिक मुकदमे में आरोपी है और वह विदेश जाना चाहता है, तो उस स्थिति में आपराधिक अदालत उसके विदेश जाने की अनुमति, शर्तों और प्रतिबंधों पर विचार कर सकती है।
इस व्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि पासपोर्ट अधिकारी को केवल संभावित भविष्य की विदेश यात्रा के आधार पर ऐसी शक्ति नहीं मिल जाती कि वह हर लंबित आपराधिक मामले में पासपोर्ट रोक दे।
क्या आपराधिक मामला लंबित होने पर पासपोर्ट कभी रोका जा सकता है?
हाई कोर्ट के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि आपराधिक मामला लंबित होने पर पासपोर्ट से संबंधित कोई कार्रवाई कभी नहीं हो सकती।
पासपोर्ट अधिनियम और संबंधित नियमों के तहत कुछ परिस्थितियों में पासपोर्ट जारी करने या नवीनीकरण पर प्रतिबंध लागू हो सकते हैं। इसके अलावा यदि सक्षम आपराधिक अदालत ने कोई आदेश पारित किया है या आवेदक ने आवेदन में महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए हैं, तो स्थिति अलग हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी Mahesh Kumar Agarwal मामले में यह स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट अधिनियम के प्रावधानों और संबंधित अधिसूचना को साथ पढ़ना आवश्यक है। किसी एक प्रावधान को अलग करके स्वतः और पूर्ण प्रतिबंध के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।
इसलिए प्रत्येक मामले में संबंधित तथ्य और अदालत के आदेश देखना आवश्यक होगा।
पहले के इलाहाबाद हाई कोर्ट फैसले से भी जुड़ा मामला
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट के पहले के फैसले Pawan Kumar Rajbhar v. Union of India पर भरोसा किया गया था।
हालांकि वर्तमान पीठ ने माना कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने Mahesh Kumar Agarwal मामले में इस कानूनी स्थिति को अधिक स्पष्ट कर दिया है। इसलिए बाद के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ध्यान में रखते हुए वर्तमान मामले का परीक्षण किया जाना आवश्यक था।
यह न्यायिक व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को भी दर्शाता है—यदि किसी पुराने हाई कोर्ट फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट उसी विषय पर अधिक स्पष्ट कानूनी व्याख्या कर देता है, तो बाद की अदालतों को उस बाध्यकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ध्यान में रखना होता है।
हाई कोर्ट ने पासपोर्ट अधिकारी को क्या निर्देश दिया?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया।
अंतरिम स्तर पर अदालत ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, लखनऊ को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के पासपोर्ट आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट के Mahesh Kumar Agarwal फैसले को ध्यान में रखते हुए विचार करे।
अदालत ने पासपोर्ट अधिकारी को अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल कर यह बताने का अवसर भी दिया कि अदालत का यह अंतरिम निर्देश अंतिम क्यों न कर दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को होगी।
अदालत ने आदेश की सूचना संबंधित अधिकारी तक पहुंचाने के लिए भी अनुपालन संबंधी निर्देश जारी किए थे।
आम नागरिक के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?
इस आदेश से एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति समझी जा सकती है।
यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है, तो केवल इसी तथ्य से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसे पासपोर्ट रखने का अधिकार ही नहीं है।
लेकिन यदि वह व्यक्ति विदेश जाना चाहता है, तो उसे अपने मामले में लागू न्यायिक आदेशों और शर्तों का पालन करना होगा।
विशेष रूप से जमानत आदेश में यदि अदालत ने विदेश यात्रा के संबंध में कोई प्रतिबंध लगाया है, तो उसका पालन आवश्यक होगा। इसी तरह यदि बाद में आपराधिक अदालत पासपोर्ट जमा करने या विदेश जाने पर रोक लगाने का आदेश देती है, तो उस आदेश का प्रभाव बना रहेगा।
इसलिए पासपोर्ट = विदेश जाने की अनुमति मानना कानूनी रूप से सही नहीं है।
पासपोर्ट आवेदन में जानकारी छिपाना पड़ सकता है भारी
इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू पासपोर्ट आवेदन में सही जानकारी देने से जुड़ा है।
यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित है और पासपोर्ट आवेदन में उससे संबंधित जानकारी मांगी गई है, तो उसे सही जानकारी देनी चाहिए।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि लंबित आपराधिक मामले को आवेदन में छिपाया जाता है तो मामला अलग हो सकता है।
इसलिए किसी व्यक्ति को केवल यह सोचकर जानकारी नहीं छिपानी चाहिए कि आपराधिक मुकदमा लंबित होने के कारण पासपोर्ट मिलना मुश्किल हो जाएगा। गलत या अधूरी जानकारी देना बाद में अलग विवाद का कारण बन सकता है।
क्या यह फैसला विदेश यात्रा का अधिकार देता है?
नहीं। यही इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण सीमा है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह नहीं कहा कि आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहा हर व्यक्ति विदेश जा सकता है।
अदालत ने केवल यह अंतर स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट जारी करना और विदेश यात्रा की अनुमति दो अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।
यदि किसी व्यक्ति को विदेश जाना है तो उसे अपने मामले में लागू अदालत के आदेशों की जांच करनी होगी। जहां अनुमति आवश्यक है, वहां सक्षम अदालत से अनुमति लेनी पड़ सकती है।
पुलिस या अभियोजन पक्ष को भी यदि वास्तविक रूप से यह आशंका हो कि आरोपी विदेश जाकर न्यायिक प्रक्रिया से बच सकता है, तो वे संबंधित अदालत के सामने उचित आवेदन कर सकते हैं।
30 सितंबर की सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण होगी?
मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को तय है। तब तक संबंधित पक्ष अपना जवाब दाखिल कर सकते हैं।
इसके बाद अदालत यह तय कर सकती है कि याचिकाकर्ता के पासपोर्ट आवेदन पर अंतिम रूप से क्या निर्देश दिए जाएं।
इस मामले की आगे की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि इससे यह और स्पष्ट हो सकता है कि लंबित आपराधिक कार्यवाही की स्थिति में पासपोर्ट अधिकारी किस सीमा तक कार्रवाई कर सकता है और किस बिंदु पर मामला आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र में चला जाता है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट की इस टिप्पणी का मूल संदेश यह है कि किसी व्यक्ति के पास पासपोर्ट होना और उसका विदेश जाना—दो अलग-अलग कानूनी विषय हैं।
केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर पासपोर्ट जारी करने से इनकार करना हर मामले में उचित नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, पासपोर्ट जारी हो जाने से आरोपी को विदेश जाने का स्वतः अधिकार भी नहीं मिल जाता।
यदि आरोपी वास्तव में विदेश जाना चाहता है, तो संबंधित आपराधिक अदालत उसके मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अनुमति दे सकती है, शर्तें लगा सकती है या यात्रा पर रोक लगा सकती है। पुलिस या अभियोजन एजेंसी भी आवश्यक होने पर अदालत के सामने पासपोर्ट जमा कराने अथवा विदेश यात्रा रोकने की मांग कर सकती है।
मोहम्मद आफताब के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फिलहाल क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, लखनऊ को सुप्रीम कोर्ट के Mahesh Kumar Agarwal फैसले को ध्यान में रखते हुए पासपोर्ट आवेदन पर विचार करने का अंतरिम निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर को होगी।
इसलिए इस आदेश को यह कहने के लिए इस्तेमाल करना सही नहीं होगा कि “आपराधिक मामला होने के बावजूद हर व्यक्ति को विदेश जाने की स्वतंत्र अनुमति है।” अदालत ने इससे अधिक सीमित लेकिन महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किया है—**पासपोर्ट का अधिकार और विदेश यात्रा की अनुमति अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।**
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।