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मुस्लिम महिलाओं के विरासत अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई, केंद्र से जवाब तलब

मुस्लिम महिलाओं के विरासत अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई, केंद्र से जवाब तलब; क्या लैंगिक असमानता वाले उत्तराधिकार नियमों की होगी संवैधानिक जांच?

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत और उत्तराधिकार के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक चुनौती सामने आई है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को उस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा, जिसमें मुस्लिमों के बीच निर्वसीयत उत्तराधिकार (intestate succession) से जुड़े असंहिताबद्ध नियमों और उनकी कानूनी मान्यता को लैंगिक समानता के संवैधानिक प्रावधानों की कसौटी पर परखने की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मौजूदा व्यवस्था कई परिस्थितियों में पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति के अधिकारों में अंतर पैदा करती है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इम्तियाजहुसैन शाहाबुद्दीन मुल्ला की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्र के कानून एवं न्याय मंत्रालय तथा युवा मामले एवं खेल मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि बुधवार की कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। फिलहाल अदालत ने याचिका पर केंद्र का पक्ष जानने की प्रक्रिया शुरू की है।

याचिका में आखिर चुनौती किस बात को दी गई है?

याचिका का मुख्य केंद्र मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बिना वसीयत मृत्यु होने की स्थिति में संपत्ति के बंटवारे से जुड़े नियम हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन नियमों के लागू होने से कुछ परिस्थितियों में समान स्तर के पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों को संपत्ति में समान हिस्सा नहीं मिलता।

याचिका में विशेष रूप से यह दावा किया गया है कि कई परिस्थितियों में महिला उत्तराधिकारी को पुरुष उत्तराधिकारी की तुलना में कम हिस्सा प्राप्त होता है। याचिकाकर्ता ने इसे केवल धार्मिक या व्यक्तिगत कानून का प्रश्न न मानकर मौलिक अधिकारों से जुड़ा संवैधानिक मुद्दा बताया है।

याचिका के अनुसार, जब किसी कानूनी व्यवस्था का प्रत्यक्ष प्रभाव नागरिकों के संपत्ति अधिकारों पर पड़ता है, तो यह सवाल उठ सकता है कि उस व्यवस्था को संविधान के समानता संबंधी प्रावधानों के अनुरूप किस प्रकार परखा जाए।

यही वजह है कि मामला केवल उत्तराधिकार कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न है—क्या ऐसे व्यक्तिगत कानून संबंधी नियम, जिन्हें कानून द्वारा मान्यता या संरक्षण प्राप्त है, मौलिक अधिकारों की कसौटी पर न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकते हैं?

अनुच्छेद 14, 15 और 21 का हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं एम. सिंह और अनिल सी. निशानी ने दलील दी कि यदि समान स्थिति वाले पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के साथ केवल लिंग के आधार पर अलग-अलग व्यवहार किया जाता है, तो इसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा सकता है।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 21 का उल्लेख किया गया है।

अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। वहीं अनुच्छेद 15 राज्य द्वारा धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव के संबंध में संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण से संबंधित है।

याचिका में इन प्रावधानों को साथ पढ़ते हुए यह तर्क रखा गया है कि संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकारों में केवल लिंग के आधार पर असमान परिणाम पैदा करने वाले नियमों की संवैधानिक समीक्षा की जानी चाहिए।

हालांकि, इन दलीलों को अभी याचिकाकर्ता का पक्ष समझना जरूरी है। केंद्र सरकार का जवाब और आगे सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।

1937 का शरियत एक्ट क्यों है महत्वपूर्ण?

इस मामले में Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

याचिका में इसकी धारा 2 का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रावधान मुसलमानों के बीच कुछ व्यक्तिगत कानून संबंधी मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ को लागू करने के लिए वैधानिक आधार प्रदान करता है। इनमें निर्वसीयत उत्तराधिकार भी शामिल है।

याचिकाकर्ता की आपत्ति यह है कि 1937 का कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ को लागू करने के लिए वैधानिक मान्यता तो देता है, लेकिन उत्तराधिकार के कई मूल नियम आज भी व्यापक रूप से असंहिताबद्ध (uncodified) स्वरूप में हैं।

यहीं से संवैधानिक प्रश्न और जटिल हो जाता है।

यदि कोई नियम सीधे किसी व्यक्ति के संपत्ति अधिकार को प्रभावित करता है और उसका न्यायालयों द्वारा उपयोग किया जाता है, तो क्या वह संविधान के मौलिक अधिकारों की कसौटी से बाहर रह सकता है? याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इसी प्रश्न पर विचार करने का आग्रह किया गया है।

निर्वसीयत उत्तराधिकार क्या होता है?

इसे सरल भाषा में समझें तो जब किसी व्यक्ति की मृत्यु वसीयत किए बिना हो जाती है, तब उसकी संपत्ति किसे और कितनी मिलेगी, यह उत्तराधिकार के लागू नियमों से तय होता है।

याचिका इसी स्थिति से जुड़े मुस्लिम पर्सनल लॉ के नियमों को चुनौती देती है।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराधिकार किसी परिवार की संपत्ति के वास्तविक बंटवारे से सीधे जुड़ा होता है। पिता या पति की मृत्यु के बाद संपत्ति में किस उत्तराधिकारी का कितना हिस्सा होगा, इसका निर्धारण परिवार के सदस्यों के आर्थिक अधिकारों पर सीधा असर डाल सकता है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि इस बंटवारे में समान स्तर के पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के लिए अलग-अलग हिस्से निर्धारित होते हैं, तो इसकी संवैधानिक वैधता की जांच होनी चाहिए।

क्या मुस्लिम कानून में महिलाओं को विरासत का अधिकार नहीं है?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है।

यह कहना सही नहीं होगा कि मुस्लिम कानून में महिलाओं को विरासत का कोई अधिकार नहीं है। मुस्लिम उत्तराधिकार कानून में महिला उत्तराधिकारियों के लिए भी हिस्से निर्धारित हैं। विवाद का केंद्र यह है कि कुछ परिस्थितियों में पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के हिस्से समान नहीं होते।

हाल के न्यायिक निर्णयों में भी अदालतों ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की कुछ विशिष्ट विशेषताओं को रेखांकित किया है। उदाहरण के लिए, मुस्लिम कानून में हिंदू मिताक्षरा कानून जैसी जन्मसिद्ध सहदायिकता (coparcenary by birth) की अवधारणा नहीं है। उत्तराधिकार का अधिकार सामान्यतः संपत्ति के मालिक की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारियों में खुलता है।

इसलिए मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की तुलना हिंदू संयुक्त परिवार और सहदायिकता की पारंपरिक अवधारणा से करते समय दोनों व्यवस्थाओं की मूल संरचना को ध्यान में रखना आवश्यक है।

हिंदू उत्तराधिकार कानून से तुलना क्यों की गई?

याचिका में Hindu Succession Act, 1956 और विशेष रूप से उसके 2005 के संशोधन का भी उल्लेख किया गया है।

2005 के संशोधन ने हिंदू मिताक्षरा संयुक्त परिवार की संपत्ति में बेटियों के सहदायिक अधिकारों को महत्वपूर्ण वैधानिक मान्यता दी। इसके बाद बेटी को बेटे के समान सहदायिक अधिकार प्राप्त हुए और जन्म से उससे जुड़े अधिकारों के संबंध में कानून में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

याचिकाकर्ता ने इसी उदाहरण के आधार पर सवाल उठाया है कि जब एक व्यक्तिगत कानून व्यवस्था में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को समान बनाने के लिए विधायी सुधार किए जा सकते हैं, तो मुस्लिम उत्तराधिकार व्यवस्था में मौजूद कथित असमानताओं की संवैधानिक समीक्षा क्यों न की जाए।

लेकिन यहां भी दोनों कानून व्यवस्थाओं के बीच सीधी तुलना करते समय सावधानी जरूरी है। मुस्लिम कानून में coparcenary, joint family और survivorship जैसी अवधारणाएं हिंदू मिताक्षरा व्यवस्था के समान नहीं हैं। हाल के न्यायिक निर्णयों में भी इस अंतर को स्पष्ट किया गया है।

शायरा बानो मामले का भी दिया गया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के चर्चित शायरा बानो मामले का भी हवाला दिया गया।

शायरा बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तीन तलाक यानी talaq-e-biddat की संवैधानिक वैधता पर विचार किया था। याचिकाकर्ता वर्तमान मामले में इस निर्णय को इस व्यापक तर्क के समर्थन में इस्तेमाल करना चाहता है कि व्यक्तिगत कानून से जुड़े किसी नियम या प्रथा को केवल “personal law” कहकर संवैधानिक जांच से स्वतः बाहर नहीं रखा जा सकता।

हालांकि, व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा का प्रश्न स्वयं एक जटिल और लंबे समय से बहस का विषय रहा है। इसलिए शायरा बानो का हवाला देना अपने आप में वर्तमान याचिका के सफल होने का निष्कर्ष नहीं है।

पहले भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है यह सवाल

मुस्लिम पर्सनल लॉ और संवैधानिक अधिकारों के बीच संबंध का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट के सामने पहले भी आता रहा है।

2026 में एक अन्य मामले में Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 की धारा 2 को चुनौती देते हुए भी यह सवाल उठाया गया कि मुस्लिम उत्तराधिकार के नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 सहित मौलिक अधिकारों के अनुरूप हैं या नहीं। उस मामले में अदालत ने यह भी विचार किया कि यदि मौजूदा व्यवस्था को अमान्य घोषित किया जाता है तो उसके बाद उत्तराधिकार के लिए वैकल्पिक कानूनी ढांचा क्या होगा।

यह पहलू मौजूदा याचिका में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

किसी कानून या नियम को असंवैधानिक घोषित करने के बाद उत्पन्न होने वाला कानूनी शून्य (legal vacuum) अदालत के लिए व्यावहारिक चिंता का विषय हो सकता है। खासकर उत्तराधिकार जैसे क्षेत्र में, जहां हर दिन संपत्ति के अधिकारों का निर्धारण होता है।

अदालत के सामने केवल समानता नहीं, आगे का रास्ता भी महत्वपूर्ण होगा

इस मामले में यदि आगे संवैधानिक सवालों पर विस्तृत सुनवाई होती है तो अदालत के सामने केवल यह प्रश्न नहीं होगा कि किसी विशेष नियम में असमानता है या नहीं।

एक दूसरा प्रश्न यह भी हो सकता है कि यदि किसी नियम को संविधान के अनुरूप नहीं माना जाता, तो उसके स्थान पर लागू होने वाली व्यवस्था क्या होगी।

उत्तराधिकार कानून परिवार की संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़ा हुआ है। इसलिए किसी नियम को हटाने मात्र से समस्या का समाधान नहीं होता। उसके बाद संपत्ति का बंटवारा किस कानून के अनुसार होगा, यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है।

इसी तरह धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानून से जुड़े संवैधानिक प्रश्न भी सामने आ सकते हैं। इसलिए आने वाली सुनवाई में अनुच्छेद 14, 15, 21 और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों पर बहस महत्वपूर्ण हो सकती है।

क्या सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम महिलाओं को समान विरासत का अधिकार देने का आदेश देगा?

फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।

23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केवल याचिका पर नोटिस जारी कर केंद्र से जवाब मांगा है। अदालत ने अभी यह घोषित नहीं किया है कि मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के मौजूदा नियम असंवैधानिक हैं।

इसी तरह यह भी अभी तय नहीं हुआ है कि मुस्लिम महिला और पुरुष उत्तराधिकारियों के हिस्से हर परिस्थिति में समान होने चाहिए या नहीं। यह याचिका का दावा और मांग है, न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष नहीं।

आगे केंद्र सरकार का जवाब, अन्य पक्षों की दलीलें और सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाने वाली विस्तृत संवैधानिक व्याख्या महत्वपूर्ण होगी।

आगे क्या हो सकता है?

अब मामले में केंद्र सरकार को नोटिस का जवाब देना होगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय कर सकता है कि याचिका में उठाए गए संवैधानिक प्रश्नों पर विस्तृत सुनवाई किस प्रकार की जाए।

आगे की कार्यवाही में मुख्य रूप से ये प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकते हैं—

  1. क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत निर्वसीयत उत्तराधिकार के असंहिताबद्ध नियम संवैधानिक समीक्षा के अधीन हैं?
  2. 1937 के शरियत एक्ट की धारा 2 की संवैधानिक स्थिति क्या है?
  3. क्या पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के अलग-अलग हिस्से अनुच्छेद 14 और 15 की कसौटी पर टिकते हैं?
  4. व्यक्तिगत कानून और मौलिक अधिकारों के बीच टकराव होने पर न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या होगी?
  5. यदि किसी नियम को अमान्य किया जाता है, तो उसके स्थान पर उत्तराधिकार का वैकल्पिक कानूनी ढांचा क्या होगा?
  6. क्या इस विषय में व्यापक विधायी सुधार की आवश्यकता है या अदालत मौजूदा कानून की संवैधानिक व्याख्या के माध्यम से कोई समाधान दे सकती है?

इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले चरणों में सामने आएंगे।

निष्कर्ष

मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत और उत्तराधिकार से जुड़े नियमों को चुनौती देने वाली यह याचिका भारत में व्यक्तिगत कानून, लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संबंध पर एक महत्वपूर्ण बहस को सामने लाती है।

याचिकाकर्ता का दावा है कि मौजूदा उत्तराधिकार व्यवस्था कई परिस्थितियों में पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति के अधिकारों में अंतर करती है और इस अंतर की संवैधानिक समीक्षा आवश्यक है। इसके समर्थन में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 तथा शायरा बानो जैसे फैसलों का सहारा लिया गया है।

दूसरी ओर, यह मामला केवल हिस्से की गणना का नहीं है। इसमें व्यक्तिगत कानून की प्रकृति, 1937 के शरियत एक्ट की वैधानिक भूमिका, धार्मिक स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों की न्यायिक समीक्षा और संभावित वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था जैसे कई संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। बुधवार को अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा है। इसलिए फिलहाल यह कहना अधिक सटीक होगा कि शीर्ष अदालत ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून में कथित लैंगिक असमानता से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों को सुनवाई के लिए आगे बढ़ाया है। अब केंद्र के जवाब और आगामी सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि अदालत इस चुनौती की संवैधानिक सीमा और संभावित समाधान को किस तरह देखती है।

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संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।