₹2,700 की दवा पर ₹27,000 MRP! सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मरीजों से यह कैसी वसूली? DPCO और दवा कीमतों पर उठे गंभीर सवाल
जीवनरक्षक और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर 2026 को बेहद गंभीर चिंता जताई। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान उस स्थिति पर सवाल उठाया, जिसमें किसी दवा की Price to Retailer (PTR) करीब ₹2,700 बताई गई, जबकि उसी दवा का Maximum Retail Price (MRP) ₹27,000 तक था। अदालत ने इस दस गुने अंतर को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे मरीजों के साथ “दिनदहाड़े डकैती” जैसा बताया।
मामला केवल एक दवा की कीमत तक सीमित नहीं है। सुनवाई के दौरान दवाओं के मूल्य निर्धारण की पूरी व्यवस्था, विशेषकर Drugs (Prices Control) Order, 2013 (DPCO) के तहत शेड्यूल्ड और नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं के बीच अंतर, जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता, मेडिकल डिवाइसेज की कीमत और अस्पतालों द्वारा दवाओं की खरीद-बिक्री जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आए।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कैंसर और दूसरी गंभीर बीमारियों के इलाज में दवाओं का खर्च परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव डाल सकता है। अदालत ने इसी व्यापक समस्या को ध्यान में रखते हुए मौजूदा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होनी है।
₹2,700 से ₹27,000 तक कैसे पहुंची कीमत?
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने दवा की PTR और MRP के बीच बड़े अंतर का उदाहरण रखा गया। बताया गया कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक आवश्यक दवा रिटेलर को लगभग ₹2,700 में उपलब्ध होती है, लेकिन उस पर ₹27,000 की MRP अंकित है।
अर्थात रिटेलर के स्तर पर बताई गई खरीद कीमत और उपभोक्ता के लिए निर्धारित अधिकतम खुदरा कीमत के बीच लगभग दस गुने का अंतर दिखाई देता है।
जस्टिस संदीप मेहता ने सवाल किया कि यदि निर्माता दवा रिटेलर को ₹2,700 में उपलब्ध करा रहा है तो मरीज से उसी दवा के लिए ₹27,000 तक लेने की स्थिति कैसे स्वीकार्य हो सकती है। अदालत ने इस अंतर को लेकर अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया।
पीठ ने यह भी कहा कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के सामने दवा खरीदना कोई सामान्य बाजार लेन-देन नहीं होता। जब किसी व्यक्ति को जीवन बचाने के लिए दवा की आवश्यकता होती है, तब उसके पास कीमत पर बातचीत करने या दवा खरीदना टालने की व्यावहारिक गुंजाइश बहुत कम होती है।
यही कारण है कि अदालत ने दवा की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था को मरीजों के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
DPCO 2013 और 82 प्रतिशत दवाओं का मुद्दा
सुनवाई में याचिकाकर्ता किशन चंद जैन की ओर से दवाओं की कीमत निर्धारित करने वाली मौजूदा व्यवस्था पर विस्तृत आपत्तियां रखी गईं।
याचिकाकर्ता का कहना था कि DPCO, 2013 के तहत लगभग 82 प्रतिशत दवाएं नॉन-शेड्यूल्ड श्रेणी में आती हैं। उनके अनुसार, अनुसूची में शामिल दवाओं के लिए NPPA द्वारा सीलिंग प्राइस तय करने की व्यवस्था है, लेकिन नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं के लिए बाजार में पहली बार उतारे जाने के समय कीमत निर्धारित करने पर वैसी व्यवस्था नहीं है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि यदि कोई निर्माता किसी नॉन-शेड्यूल्ड दवा को बाजार में लॉन्च करता है तो शुरुआती कीमत निर्धारित करने में काफी स्वतंत्रता रहती है। बाद में कीमत में बढ़ोतरी पर नियम लागू होते हैं, लेकिन प्रारंभिक कीमत ही बहुत अधिक रखी जाए तो उसका प्रभाव आगे की पूरी मूल्य श्रृंखला पर पड़ सकता है।
याचिका में इसी व्यवस्था में बदलाव की मांग की गई है ताकि नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमत भी किसी प्रभावी नियामकीय व्यवस्था के अधीन हो।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 82 प्रतिशत का आंकड़ा सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत किया गया था। इसे अदालत द्वारा अंतिम रूप से स्थापित तथ्य या अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
Rosuvas का उदाहरण और कीमतों की उलटी तस्वीर
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक सामान्य कोलेस्ट्रॉल की दवा का उदाहरण देकर मूल्य निर्धारण व्यवस्था में दिखाई देने वाली विसंगति पर भी सवाल उठाया।
पीठ ने Rosuvas का उदाहरण दिया। अदालत के सामने बताया गया कि इसका एक स्ट्रिप लगभग ₹214 में उपलब्ध है क्योंकि संबंधित formulation DPCO की नियंत्रित सूची के अंतर्गत नहीं आती। वहीं, जब इसमें aspirin का combination शामिल होता है और वह formulation DPCO के दायरे में आती है, तो इसकी कीमत लगभग ₹70 बताई गई।
सामान्य रूप से उपभोक्ता यह उम्मीद कर सकता है कि किसी दवा में अतिरिक्त salt या combination जुड़ने से उसकी कीमत बढ़ सकती है। लेकिन अदालत के सामने रखे गए इस उदाहरण में इसके विपरीत स्थिति दिखाई गई।
पीठ ने इसी अंतर के आधार पर यह सवाल उठाया कि क्या मौजूदा price-control framework दवाओं की कीमतों में वास्तविक आर्थिक और चिकित्सकीय परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित करता है।
केवल कैंसर की दवाओं का सवाल नहीं
सुप्रीम कोर्ट की चिंता केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं रही। अदालत के सामने व्यापक प्रश्न यह था कि देश में ऐसी दवाओं की कीमत किस तरह निर्धारित होनी चाहिए जिन्हें मरीज अपनी बीमारी के कारण खरीदने के लिए मजबूर होता है।
कैंसर, हृदय रोग, किडनी से संबंधित बीमारियां और दूसरी गंभीर स्थितियों में उपचार लंबे समय तक चल सकता है। ऐसे मामलों में दवाओं की कीमत में छोटी-सी बढ़ोतरी भी कई महीनों में बड़ी आर्थिक राशि में बदल सकती है।
अदालत ने इसी संदर्भ में यह भी टिप्पणी की कि कई परिवार गंभीर बीमारी के इलाज के लिए अपनी संपत्ति या आभूषण तक बेचने को मजबूर होते हैं।
इसलिए विवाद का मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं है कि किसी दवा पर MRP कितनी है, बल्कि यह भी है कि MRP तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और न्यायसंगत होनी चाहिए।
फार्मा कंपनियों की दलील- पूरा मार्जिन निर्माता के पास नहीं जाता
सुनवाई के दौरान Indian Pharmaceutical Alliance (IPA) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी अपना पक्ष रखा।
उन्होंने अदालत के सामने तर्क दिया कि PTR और MRP के बीच दिखाई देने वाला बड़ा अंतर पूरी तरह दवा निर्माता कंपनियों के मुनाफे के रूप में नहीं चला जाता। दवा के वितरण में स्टॉकिस्ट, डिस्ट्रीब्यूटर, रिटेलर और अन्य स्तर शामिल होते हैं।
उनकी ओर से यह सुझाव दिया गया कि यदि कीमतों में अंतर की वास्तविक जांच करनी है तो केवल निर्माता की कीमत और MRP की तुलना पर्याप्त नहीं होगी। यह देखना भी आवश्यक है कि दवा स्टॉकिस्ट को किस कीमत पर और रिटेलर को किस कीमत पर उपलब्ध कराई जाती है।
इससे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। यदि किसी दवा की MRP बहुत अधिक है तो यह पता लगाना आवश्यक है कि उस अतिरिक्त राशि का कितना हिस्सा निर्माता, डिस्ट्रीब्यूटर, स्टॉकिस्ट, रिटेलर या अस्पताल के स्तर पर जुड़ता है।
यानी अदालत के सामने केवल “MRP बनाम PTR” का सवाल नहीं है, बल्कि पूरी supply chain की pricing structure भी महत्वपूर्ण हो गई है।
अस्पतालों और सरकारी योजनाओं पर भी अदालत की नजर
सुप्रीम कोर्ट ने यह मुद्दा भी उठाया कि यदि महंगी दवाओं की कीमत सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के माध्यम से reimburse की जाती है, तो इसका बोझ अंततः सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है।
सुनवाई में Ayushman Bharat जैसी योजनाओं का संदर्भ आया। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि किसी दवा की वास्तविक खरीद कीमत और मरीज या सरकारी योजना से वसूली जाने वाली कीमत में बहुत बड़ा अंतर है तो इसका प्रभाव सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का उद्देश्य मरीज को आर्थिक सुरक्षा देना है। यदि दवाओं की कीमत ही असामान्य रूप से अधिक निर्धारित हो तो योजना के बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, किसी विशेष अस्पताल या कंपनी के खिलाफ अनियमितता का निष्कर्ष इस सुनवाई से स्वतः नहीं निकलता। अदालत फिलहाल व्यापक मूल्य-नियंत्रण व्यवस्था और उसके प्रभावों पर विचार कर रही है।
सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि सरकार सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता को लेकर प्रतिबद्ध है।
उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार मौजूदा व्यवस्था में सुधार की संभावनाओं पर विचार करने के लिए तैयार है। सरकार की ओर से प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) का भी उल्लेख किया गया, जिसके माध्यम से कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।
हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जिन दवाओं की जरूरत मरीज को है, यदि वे जनऔषधि केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हैं तो मरीज के पास क्या विकल्प रहता है।
इस सवाल से साफ है कि केवल सस्ती दवाओं के लिए सरकारी आउटलेट उपलब्ध कराना पर्याप्त है या नहीं, इस पर भी न्यायालय विचार कर रहा है।
जेनेरिक दवाओं को अनिवार्य करने की मांग
मामले में एक महत्वपूर्ण मांग डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक दवाएं लिखे जाने को अनिवार्य करने से जुड़ी है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि समान salt वाली दवा अलग-अलग ब्रांड नाम से काफी अलग कीमत पर उपलब्ध है तो मरीज को कम कीमत वाले विकल्प की जानकारी और उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
हालांकि, अदालत ने सुनवाई के दौरान एक व्यापक विकल्प की ओर भी संकेत किया। यदि सभी दवाओं की कीमतों के लिए प्रभावी price-fixation mechanism तैयार हो जाए तो केवल जेनेरिक दवाओं के अनिवार्य prescription का मुद्दा अलग रूप में देखने की जरूरत पड़ सकती है।
यह फिलहाल अदालत की सुनवाई के दौरान सामने आया विचार है, कोई अंतिम फैसला नहीं।
मेडिकल डिवाइसेज की कीमतों का भी मुद्दा
याचिका में केवल दवाओं की कीमत का सवाल नहीं उठाया गया है। मेडिकल डिवाइसेज की अधिकतम कीमत तय करने की मांग भी मामले का हिस्सा है।
आज कई गंभीर उपचारों में दवाओं के साथ-साथ विभिन्न मेडिकल डिवाइसेज की भी आवश्यकता पड़ती है। यदि इनकी कीमतों में पर्याप्त पारदर्शिता या नियंत्रण न हो तो मरीज के कुल उपचार खर्च पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
इसलिए मामले की सुनवाई आगे बढ़ने पर अदालत के सामने दवाओं के साथ मेडिकल डिवाइसेज के मूल्य नियंत्रण का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
अब 29 सितंबर को क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए मामले को 29 सितंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया है। उस दिन केंद्र सरकार और अन्य पक्षों की दलीलों के आधार पर अदालत दवा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार करेगी।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अदालत अंततः सभी दवाओं को price-control mechanism के तहत लाने, नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने या जेनेरिक prescription को अनिवार्य बनाने के संबंध में क्या आदेश देगी।
लेकिन 22 सितंबर की सुनवाई ने एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक नीति के सवाल को सामने जरूर ला दिया है—जीवन बचाने वाली दवा की कीमत तय करने में बाजार की स्वतंत्रता और मरीज की आर्थिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मरीजों के लिए इस मामले का महत्व
किसी मरीज के लिए दवा की कीमत केवल बाजार मूल्य का प्रश्न नहीं होती। गंभीर बीमारी की स्थिति में दवा अक्सर उपचार की अनिवार्य जरूरत बन जाती है। ऐसे में निर्माता से लेकर स्टॉकिस्ट, रिटेलर और अस्पताल तक पूरी pricing chain में पारदर्शिता महत्वपूर्ण हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई से फिलहाल कोई अंतिम मूल्य-नियमन व्यवस्था लागू नहीं हुई है। लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि PTR और MRP के बीच असामान्य अंतर तथा जीवनरक्षक दवाओं की affordability को गंभीरता से देखा जा रहा है।
अब निगाहें 29 सितंबर की सुनवाई पर रहेंगी। उस दिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार मौजूदा व्यवस्था में सुधार के लिए कौन से ठोस प्रस्ताव सामने रखती है और अदालत दवाओं की शुरुआती कीमत, MRP, नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं और मेडिकल डिवाइसेज के संबंध में किस दिशा में आगे बढ़ती है।
फिलहाल, ₹2,700 की PTR और ₹27,000 की MRP का उदाहरण इस बहस का सबसे प्रमुख बिंदु बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों ने देश में दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था, मरीजों की आर्थिक सुरक्षा और pharmaceutical supply chain में पारदर्शिता पर एक व्यापक बहस को जन्म दिया है।
नोट: यह लेख 22–23 सितंबर 2026 को उपलब्ध न्यायालयीन कार्यवाही और प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। ₹2,700/₹27,000 और लगभग 82% नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं से संबंधित आंकड़े सुनवाई में पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए गए उदाहरण/दावे हैं; इन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।