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राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला: पुलिस पर कार्रवाई में टालमटोल का आरोप,

राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला: पुलिस पर कार्रवाई में टालमटोल का आरोप, अब अदालत पहुंची बार एसोसिएशन की अर्जी

        अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी और कथित गबन के मामले ने अब एक और कानूनी मोड़ ले लिया है। पुलिस के स्तर पर मुकदमा दर्ज न होने से असंतुष्ट अधिवक्ताओं ने अब न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। बार एसोसिएशन की ओर से दी गई अर्जी में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपतराय, पूर्व ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र, गोपाल राव, कृष्णमोहन और कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच कराए जाने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट पीयूष त्रिपाठी ने अर्जी पर संज्ञान लेते हुए 26 सितंबर को संबंधित थाने से आख्या तलब की है। अदालत की इस कार्रवाई के बाद अब पूरे मामले की निगाह पुलिस की रिपोर्ट और उसके आधार पर आगे होने वाली न्यायिक कार्यवाही पर टिक गई है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि मंदिर के चढ़ावे की चोरी से संबंधित मूल प्रकरण में पुलिस पहले ही कई लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। वहीं, बार एसोसिएशन लंबे समय से यह सवाल उठाता रहा है कि जांच का दायरा उन लोगों तक क्यों नहीं पहुंचा, जिनके नाम उसने अपनी शिकायत में लिए हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति का शिकायत में नाम आना या उसके खिलाफ जांच की मांग किया जाना अपने आप में अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं है। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही निकल सकता है।

दो जुलाई को थाने में दी गई थी तहरीर

राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण में अयोध्या बार एसोसिएशन ने दो जुलाई को श्रीराम जन्मभूमि थाने में तहरीर देकर ट्रस्ट से जुड़े चार पदाधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की थी। उस समय पुलिस ने तहरीर को जनरल डायरी में दर्ज किया था, लेकिन तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी। उस समय बार एसोसिएशन की ओर से यह कहा गया था कि यदि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती है तो न्यायालय की शरण ली जाएगी।

शिकायत में चंपतराय, डॉ. अनिल मिश्र, गोपाल राव और कृष्णमोहन के नाम सामने आए थे। अधिवक्ताओं का आरोप था कि चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच करते समय इन लोगों की भूमिका की भी गंभीरता से पड़ताल होनी चाहिए।

इसके बाद पुलिस स्तर पर कार्रवाई को लेकर अधिवक्ताओं और पुलिस के बीच खींचतान बढ़ती गई। बार एसोसिएशन की ओर से इस मुद्दे को लेकर आंदोलन भी किया गया। बाद में पुलिस की ओर से दिए गए आश्वासन के बाद आंदोलन को कुछ समय के लिए स्थगित किया गया था।

अब जब पुलिस स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई न होने का आरोप लगाते हुए न्यायालय में अर्जी पहुंची है, तो यह मामला केवल जांच की दिशा का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस की कार्रवाई और न्यायिक निगरानी का विषय भी बन गया है।

अदालत ने 26 सितंबर को मांगी पुलिस से आख्या

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की ओर से 26 सितंबर को पुलिस से आख्या तलब किए जाने का अर्थ यह है कि अब अदालत के सामने पुलिस को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। पुलिस को यह बताना होगा कि बार एसोसिएशन की ओर से दी गई शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई, किन तथ्यों की जांच की गई और यदि मुकदमा दर्ज नहीं किया गया तो उसके पीछे क्या कारण रहे।

ऐसे मामलों में अदालत के समक्ष पुलिस की रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो जाती है। रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकता है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के संबंध में प्रारंभिक जांच में क्या तथ्य सामने आए हैं और क्या आगे आपराधिक जांच की आवश्यकता बनती है।

यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत द्वारा पुलिस से आख्या मांगना स्वयं किसी आरोपी के खिलाफ आरोप सिद्ध होना नहीं है। यह न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें शिकायतकर्ता की मांग और पुलिस की कार्रवाई—दोनों को रिकॉर्ड पर देखा जाता है।

17 सितंबर को दस अधिवक्ताओं के बयान भी दर्ज

बार एसोसिएशन की ओर से लगाए जा रहे आरोपों के बीच जांच की प्रक्रिया पूरी तरह रुकी हुई थी, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 17 सितंबर को दस अधिवक्ताओं के बयान विवेचनाधिकारी के सामने दर्ज किए गए थे।

अधिवक्ताओं का कहना है कि उनके बयान दर्ज होने के बावजूद मामले में जिस तेजी से कार्रवाई की अपेक्षा थी, वह दिखाई नहीं दी। उनका आरोप है कि पुलिस जांच को आगे बढ़ाने के बजाय मामले में टालमटोल कर रही है।

दूसरी ओर, जांच की दृष्टि से किसी भी मामले में केवल शिकायतकर्ता या समर्थकों के बयान पर्याप्त नहीं होते। दस्तावेज, सीसीटीवी फुटेज, लेन-देन का रिकॉर्ड, मंदिर प्रशासन के अभिलेख, चढ़ावे की गणना, भंडारण और उसके बाद की प्रक्रिया जैसे कई पहलुओं की जांच जरूरी होती है। यही कारण है कि पुलिस या जांच एजेंसी को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करना पड़ता है।

मूल चढ़ावा चोरी मामले में आठ लोग गिरफ्तार

राम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण में पुलिस पहले ही आठ लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। इनमें मंदिर व्यवस्था से जुड़े कुछ कर्मचारी और अन्य लोग शामिल हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मूल प्राथमिकी में ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों चंपतराय, डॉ. अनिल मिश्र और गोपाल राव के नाम शामिल नहीं थे।

इसी बिंदु को लेकर बार एसोसिएशन लगातार सवाल उठाता रहा है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि जांच के दौरान किसी व्यक्ति की भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है तो केवल पद या प्रतिष्ठा के आधार पर उसे जांच के दायरे से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।

वहीं, किसी व्यक्ति को जांच में शामिल करने का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करता है। किसी शिकायत या आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी मान लेना कानून की दृष्टि से उचित नहीं होगा। इसलिए आगे की जांच में यह महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस और जांच एजेंसी किन तथ्यों के आधार पर अपनी भूमिका तय करती है।

आठ आरोपियों की जमानत पर भी चल रही है सुनवाई

मामले में गिरफ्तार आठ आरोपियों ने जमानत के लिए अदालत का रुख किया है। सितंबर की शुरुआत में सभी आठ आरोपियों की जमानत अर्जियां दाखिल की गई थीं और विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अदालत ने संबंधित थाने से रिपोर्ट मांगी थी।

21 सितंबर को तीन आरोपियों—रमा शंकर मिश्रा, मनीष कुमार यादव और अविनाश शुक्ला—की जमानत अर्जी अदालत ने खारिज कर दी। रिपोर्टों के अनुसार अदालत में मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए जमानत याचिकाओं पर विचार किया गया।

इससे यह स्पष्ट है कि मूल आपराधिक मामले की न्यायिक प्रक्रिया अलग स्तर पर आगे बढ़ रही है, जबकि बार एसोसिएशन द्वारा लगाए गए अतिरिक्त आरोपों और अन्य व्यक्तियों की भूमिका को लेकर अब एक अलग कानूनी रास्ता अपनाया गया है।

आखिर बार एसोसिएशन किन सवालों के जवाब चाहता है?

बार एसोसिएशन की पूरी आपत्ति को समझने के लिए उसके उठाए गए सवालों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

पहला सवाल यह है कि मंदिर के चढ़ावे की गणना, भंडारण और प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया में किन-किन लोगों की जिम्मेदारी थी?

दूसरा सवाल यह है कि यदि किसी स्तर पर अनियमितता या चोरी की जानकारी पहले सामने आई थी तो उस समय संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की?

तीसरा सवाल यह है कि पुलिस की मूल एफआईआर में कुछ लोगों के नाम नहीं होने के बावजूद क्या जांच के दौरान उनके संभावित संबंधों की स्वतंत्र रूप से पड़ताल की गई?

चौथा सवाल यह है कि बार एसोसिएशन की ओर से दो जुलाई को दी गई तहरीर पर प्राथमिकी दर्ज न करने का कानूनी आधार क्या था?

इन सवालों का उत्तर केवल आरोपों के आधार पर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए पुलिस केस डायरी, जांच रिपोर्ट, बयान, सीसीटीवी फुटेज, मंदिर प्रशासन के दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड जैसे साक्ष्यों की जांच आवश्यक होगी।

एसआईटी पहले ही कर चुकी है पूछताछ

इस पूरे प्रकरण में विशेष जांच दल यानी एसआईटी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। जून में एसआईटी ने मंदिर से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ की थी। रिपोर्टों के अनुसार चंपतराय, डॉ. अनिल मिश्र और गोपाल राव से भी पूछताछ की गई और उनके बयानों का अन्य संबंधित व्यक्तियों के बयानों तथा उपलब्ध सामग्री से मिलान किया गया।

इससे यह संकेत मिलता है कि जांच एजेंसियों ने मंदिर प्रशासन से जुड़े वरिष्ठ लोगों से भी जानकारी ली है। हालांकि पूछताछ किया जाना भी किसी व्यक्ति को आरोपी या दोषी साबित नहीं करता। जांच में किसी भी व्यक्ति से जानकारी लेना एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, खासकर तब जब वह व्यक्ति किसी संस्था के प्रशासनिक कामकाज से जुड़ा रहा हो।

यही कारण है कि आगे की न्यायिक प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण सवाल साक्ष्यों का होगा—किस व्यक्ति के खिलाफ क्या सामग्री उपलब्ध है और उस सामग्री का कानूनी महत्व क्या है।

अदालत की निगरानी से बढ़ी अहमियत

बार एसोसिएशन की ओर से न्यायालय में अर्जी दिए जाने के बाद मामले की प्रकृति बदल गई है। अब शिकायतकर्ता पक्ष पुलिस से जवाब मांगने के साथ-साथ अदालत के समक्ष भी अपनी बात रख रहा है।

यदि पुलिस की आख्या में यह बताया जाता है कि शिकायत पर पर्याप्त जांच की गई है और किसी नए मुकदमे की आवश्यकता नहीं है, तो अदालत उस रिपोर्ट पर विचार कर सकती है। दूसरी ओर, यदि न्यायालय को लगता है कि शिकायत के आरोपों पर आगे जांच की आवश्यकता है, तो कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया के निर्देश दिए जा सकते हैं।

यानी 26 सितंबर को पुलिस की आख्या इस मामले में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगी। उस रिपोर्ट से यह पता चल सकता है कि पुलिस बार एसोसिएशन की शिकायत को किस नजरिए से देख रही है और अब तक जांच में क्या सामने आया है।

आरोपों और प्रमाण के बीच अंतर समझना जरूरी

राम मंदिर से जुड़ा होने के कारण यह मामला स्वाभाविक रूप से अत्यंत संवेदनशील है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के चढ़ावे और दान से जुड़े किसी भी आरोप का प्रभाव केवल एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मंदिर प्रशासन की पारदर्शिता और व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

लेकिन कानूनी दृष्टि से आरोप और अपराध सिद्ध होने के बीच स्पष्ट अंतर है। चंपतराय, अनिल मिश्र, गोपाल राव या कृष्णमोहन के खिलाफ बार एसोसिएशन ने जिस भूमिका की जांच की मांग की है, उसका अंतिम निर्धारण जांच और न्यायालय के समक्ष उपलब्ध साक्ष्यों से ही हो सकता है।

इसी तरह मूल मामले में गिरफ्तार आठ आरोपियों के खिलाफ भी न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है। कुछ आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज हो चुकी है, लेकिन जमानत का निर्णय स्वयं अंतिम दोषसिद्धि नहीं होता। मुकदमे में साक्ष्यों का परीक्षण और न्यायिक निर्णय अलग चरण हैं।

अब आगे क्या होगा?

अब सबसे महत्वपूर्ण तारीख 26 सितंबर है। उस दिन पुलिस की ओर से अदालत में आख्या प्रस्तुत की जानी है। इसके बाद अदालत यह देखेगी कि शिकायत पर पुलिस ने क्या कदम उठाए और क्या उसके सामने उपलब्ध सामग्री आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार बनाती है।

दूसरी ओर, बार एसोसिएशन की निगरानी अर्जी और मूल चढ़ावा चोरी मामले की जांच भी अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़ रही है। सितंबर में अधिवक्ता संघ की मॉनिटरिंग अर्जी पर भी अदालत में सुनवाई हुई थी और मामले की प्रगति को लेकर रिपोर्ट तलब की गई थी।

इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि राम जन्मभूमि मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण अब केवल पुलिस जांच तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ मूल मामले में गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही चल रही है, दूसरी तरफ बार एसोसिएशन की शिकायत ने ट्रस्ट से जुड़े कुछ पूर्व पदाधिकारियों की कथित भूमिका को लेकर अलग कानूनी सवाल खड़े किए हैं।

अब इन सवालों का जवाब आंदोलन, आरोप या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं बल्कि जांच के रिकॉर्ड, दस्तावेजी साक्ष्यों और अदालत की प्रक्रिया से सामने आएगा। 26 सितंबर को पुलिस की आख्या इस दिशा में अगला महत्वपूर्ण कदम होगी। उसके बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि बार एसोसिएशन की शिकायत पर अदालत किस दिशा में आगे बढ़ती है और पुलिस की जांच किस निष्कर्ष तक पहुंचती है।

फिलहाल इतना जरूर है कि अयोध्या के इस चर्चित मामले में न्यायालय की भूमिका बढ़ गई है और आने वाले दिनों में पुलिस की रिपोर्ट तथा अदालत की सुनवाई पर सभी की नजर रहेगी।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।