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हाईकोर्ट बेंच की मांग फिर तेज: मेरठ बार का बड़ा फैसला, 22 जिलों में कार्य बहिष्कार और ‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ का ऐलान

हाईकोर्ट बेंच की मांग फिर तेज: मेरठ बार का बड़ा फैसला, 22 जिलों में कार्य बहिष्कार और ‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ का ऐलान

       पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की अलग पीठ यानी हाईकोर्ट बेंच की लंबे समय से चली आ रही मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। मेरठ बार एसोसिएशन ने मंगलवार को नानकचंद सभागार में आयोजित आमसभा में आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। इनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में अधिवक्ताओं द्वारा न्यायिक कार्य से विरत रहने का निर्णय, कचहरी परिसर में ‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ के बैनर लगाने की घोषणा और भाजपा से जुड़े जनप्रतिनिधियों के कचहरी परिसर में प्रवेश का विरोध शामिल है।

अधिवक्ताओं का यह रुख मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हुई मुलाकात के बाद सामने आया है। बार पदाधिकारियों के अनुसार सोमवार को मुख्यमंत्री से हुई बातचीत में उन्हें बताया गया कि राज्य सरकार अपने स्तर पर हाईकोर्ट बेंच स्थापित नहीं कर सकती और इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दी गई। मुख्यमंत्री के इस कथित जवाब से अधिवक्ता संगठन नाराज हैं। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री की ओर से सामने आए इस रुख को लेकर उपलब्ध रिपोर्टें मुख्य रूप से अधिवक्ताओं के प्रतिनिधिमंडल के बयान पर आधारित हैं।

अब इस पूरे विवाद ने कानूनी मांग के साथ-साथ राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का रूप भी ले लिया है। खासकर 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस मुद्दे को लेकर अधिवक्ता संगठन अपनी गतिविधियां तेज करने की तैयारी में हैं।

22 जिलों में अधिवक्ता न्यायिक कार्य से रहेंगे विरत

मेरठ बार एसोसिएशन की आमसभा में तय किया गया कि बुधवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी 22 जिलों के अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत रहेंगे। इसका उद्देश्य हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर सरकार और संबंधित संस्थाओं तक अपना संदेश पहुंचाना बताया गया है।

यह आंदोलन नया नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की अलग पीठ की मांग कई दशकों से चली आ रही है। अधिवक्ता संगठनों की ओर से लंबे समय से शनिवार को न्यायिक कार्य से विरत रहने जैसी परंपरा भी रही है। मई 2026 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति की बैठक में भी 22 जिलों के अधिवक्ताओं की भागीदारी और आंदोलन को और प्रभावी बनाने की रणनीति पर चर्चा हुई थी।

हाल के दिनों में यह आंदोलन फिर से ज्यादा मुखर हुआ है। 20 सितंबर को भी मेरठ में अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत रहे और कचहरी परिसर में ‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ के नारे लगाए गए थे।

‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ के बैनर लगाने का फैसला

मंगलवार की आमसभा में आंदोलन को सार्वजनिक स्तर पर और व्यापक बनाने के लिए कचहरी परिसर के प्रवेश द्वारों पर ‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ लिखे बैनर और पोस्टर लगाने का फैसला लिया गया।

यह नारा अधिवक्ता संगठन की ओर से अपनाई गई राजनीतिक अभिव्यक्ति है। इसका उद्देश्य आगामी चुनावी माहौल में हाईकोर्ट बेंच की मांग को सार्वजनिक बहस का विषय बनाना बताया गया है।

इससे पहले भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट बेंच केंद्रीय संघर्ष समिति की ओर से वाहनों पर इसी तरह के स्टीकर लगाने की योजना सामने आई थी। मई में समिति के पदाधिकारियों ने बताया था कि 22 जिलों में इस अभियान को चलाने की तैयारी की जा रही है।

हालांकि चुनाव में कोई मतदाता किसे वोट देता है, यह व्यक्तिगत संवैधानिक और लोकतांत्रिक निर्णय है। किसी संगठन का चुनावी नारा अपने आप में यह निर्धारित नहीं करता कि मतदाता वास्तव में किस प्रकार मतदान करेंगे।

भाजपा जनप्रतिनिधियों के कचहरी प्रवेश को लेकर भी फैसला

मेरठ बार एसोसिएशन की आमसभा में भाजपा से जुड़े जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों के कचहरी परिसर में प्रवेश का विरोध करने का निर्णय भी लिया गया है।

रिपोर्टों के अनुसार संगठन ने कहा है कि कचहरी परिसर में ऐसे जनप्रतिनिधियों के प्रवेश को रोका जाएगा और इस संबंध में बैनर तथा पोस्टर लगाए जाएंगे। इसके साथ ही भाजपा से जुड़े उन सदस्यों को नोटिस देकर जवाब मांगे जाने और जवाब के आधार पर बार की सदस्यता समाप्त करने की कार्रवाई पर भी विचार किया गया है।

यह फैसला मेरठ बार एसोसिएशन के संगठनात्मक निर्णय के रूप में सामने आया है। इसका वास्तविक क्रियान्वयन बार के नियमों, सदस्यता प्रावधानों और संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार ही होगा।

लक्ष्मीकांत वाजपेयी को दिया वकालतनामा वापस लेने का फैसला

आंदोलन से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण निर्णय राज्यसभा सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी से संबंधित है।

अधिवक्ता संगठन ने पहले हाईकोर्ट बेंच की स्थापना के लिए पैरवी के उद्देश्य से उन्हें वकालतनामा दिया था। मंगलवार की आमसभा में इसे वापस लेने का निर्णय लिया गया।

बार पदाधिकारियों के मुताबिक संगठन ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि उनका मानना है कि बेंच की मांग पर जनप्रतिनिधियों की ओर से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि वकालतनामा वापस लेना किसी राजनीतिक दल के खिलाफ कोई न्यायिक आदेश नहीं है, बल्कि संबंधित बार संगठन का अपने स्तर पर लिया गया निर्णय है।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद क्यों बढ़ा विवाद?

पूरे घटनाक्रम की शुरुआत सोमवार को हुई मुख्यमंत्री से मुलाकात से जोड़कर देखी जा रही है।

हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति और मेरठ बार से जुड़े प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी। अधिवक्ताओं के मुताबिक मुलाकात लगभग 20 मिनट चली।

प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को इलाहाबाद हाईकोर्ट तक जाने में होने वाली दूरी और उससे जुड़ी परेशानियों का मुद्दा उठाया।

अधिवक्ताओं के अनुसार मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हाईकोर्ट बेंच स्थापित करना नहीं है और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जाना चाहिए। इसी कथित जवाब के बाद बार संगठनों में नाराजगी बढ़ी।

हालांकि इस बातचीत का पूरा आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए मुख्यमंत्री के कथित बयान से संबंधित विवरण को अधिवक्ताओं के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

क्या हाईकोर्ट बेंच केवल राज्य सरकार बना सकती है?

यही इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

हाईकोर्ट की स्थायी पीठ की स्थापना की प्रक्रिया सामान्य प्रशासनिक आदेश जैसी सरल प्रक्रिया नहीं है। केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय ने 2023 में राज्यसभा में दिए एक आधिकारिक उत्तर में बताया था कि संविधान का अनुच्छेद 214 प्रत्येक राज्य के लिए हाईकोर्ट का प्रावधान करता है। साथ ही अलग-अलग परिस्थितियों में हाईकोर्ट की स्थायी पीठ स्थापित करने के लिए संवैधानिक और वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं।

उसी सरकारी उत्तर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की मांग का ऐतिहासिक संदर्भ भी दर्ज है। सरकार ने बताया था कि 1981 में न्यायमूर्ति जसवंत सिंह की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग गठित किया गया था, जिसका एक संदर्भ पश्चिमी जिलों के लिए हाईकोर्ट बेंच की मांग से संबंधित था।

इससे साफ है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की मांग कोई हालिया राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई दशकों का आंदोलन और सरकारी स्तर पर पहले किए गए अध्ययन भी मौजूद हैं।

हाईकोर्ट बेंच की मांग आखिर क्यों है?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं का मुख्य तर्क है कि इलाहाबाद स्थित हाईकोर्ट की दूरी पश्चिमी जिलों के लोगों के लिए बड़ी समस्या है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बुलंदशहर और आसपास के जिलों से मुकदमों के लिए इलाहाबाद तक यात्रा करनी पड़ती है।

अधिवक्ता संगठनों का कहना है कि इससे मुकदमेबाजों को यात्रा, रहने और अन्य खर्च उठाने पड़ते हैं। कई मामलों में तारीख पर तारीख पड़ने के कारण बार-बार यात्रा करनी पड़ती है।

उनका तर्क है कि यदि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की पीठ स्थापित होती है तो क्षेत्र के लोगों के लिए उच्च न्यायालय तक पहुंच आसान हो सकती है।

मई 2026 में केंद्रीय संघर्ष समिति की बैठक में भी अधिवक्ताओं ने बेंच की मांग को आम जनता के लिए सस्ता, सुलभ और त्वरित न्याय से जोड़कर प्रस्तुत किया था।

सरकार और अधिवक्ताओं के रुख में मूल अंतर क्या है?

वर्तमान विवाद में मुख्य अंतर इसी बात को लेकर दिखाई देता है कि बेंच स्थापना की प्रक्रिया में राज्य सरकार की भूमिका को किस तरह देखा जाए।

अधिवक्ताओं का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार के सामने प्रभावी तरीके से प्रस्ताव रखना चाहिए और बेंच स्थापना के लिए राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर प्रयास करना चाहिए।

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद अधिवक्ताओं ने जो जानकारी दी, उसके अनुसार उन्हें बताया गया कि राज्य सरकार के स्तर पर सीधे हाईकोर्ट बेंच स्थापित नहीं की जा सकती और इस विषय को सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार के 2023 के संसदीय उत्तर में हाईकोर्ट बेंच स्थापना से जुड़े संवैधानिक और वैधानिक पहलुओं का उल्लेख किया गया था। इसलिए इस मुद्दे को केवल “राज्य सरकार बनाम अधिवक्ता” के रूप में देखना कानूनी प्रक्रिया को अत्यधिक सरल बना देगा। इसमें केंद्र, राज्य, संबंधित हाईकोर्ट और संवैधानिक प्रावधानों की भूमिका अलग-अलग हो सकती है।

केंद्रीय विधि मंत्री से भी मिल चुका है प्रतिनिधिमंडल

यह आंदोलन केवल राज्य सरकार तक सीमित नहीं रहा है।

हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री से भी मुलाकात की थी। रिपोर्ट के अनुसार प्रतिनिधिमंडल ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों की समस्या और बेंच की आवश्यकता का मुद्दा उनके सामने रखा था।

केंद्रीय मंत्री की ओर से कथित तौर पर कहा गया कि हाईकोर्ट में लंबित मामलों के दबाव को देखते हुए बेंच स्थापना के मुद्दे पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नाम प्राथमिकता वाली सूची में है।

हालांकि इस तरह की राजनीतिक या प्रशासनिक चर्चाओं का अंतिम परिणाम किसी औपचारिक निर्णय, अधिसूचना या संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

2027 के चुनाव से पहले आंदोलन का नया चरण

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के मद्देनजर हाईकोर्ट बेंच का मुद्दा अब राजनीतिक चर्चा के दायरे में भी आ गया है।

अधिवक्ता संगठन पहले ही यह कह चुके हैं कि चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में बेंच की मांग को व्यापक जनसंपर्क अभियान के जरिए उठाया जाएगा। मई में समिति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अभियान और वाहनों पर ‘हाईकोर्ट बेंच नहीं तो वोट नहीं’ के स्टीकर लगाने की योजना की जानकारी दी थी।

लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी संगठन की ओर से घोषित अभियान और वास्तविक चुनावी व्यवहार दो अलग बातें हैं। किसी क्षेत्र के मतदाताओं की राय को केवल बार एसोसिएशन के प्रस्ताव के आधार पर निर्धारित नहीं माना जा सकता।

व्यापारिक और सामाजिक संगठनों को भी जोड़ने की तैयारी

मेरठ बार एसोसिएशन ने आंदोलन को केवल अधिवक्ताओं तक सीमित रखने के बजाय दूसरे सामाजिक और व्यापारिक संगठनों तक पहुंचाने की योजना भी बनाई है।

आमसभा में संयुक्त व्यापार संघ और शहर के अन्य संगठनों के पदाधिकारियों से बैठक करने का निर्णय लिया गया। उद्देश्य हाईकोर्ट बेंच की मांग और आंदोलन की रणनीति के बारे में उन्हें जानकारी देना बताया गया है।

यदि दूसरे संगठन भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं तो आंदोलन का सामाजिक दायरा बढ़ सकता है। हालांकि उनकी स्वतंत्र राय और भागीदारी अलग-अलग संगठनों के अपने निर्णय पर निर्भर करेगी।

सहारनपुर में केंद्रीय संघर्ष समिति की बैठक

आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के लिए सहारनपुर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट बेंच स्थापना केंद्रीय संघर्ष समिति की बैठक प्रस्तावित है।

इस बैठक में 22 जिलों के बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों के शामिल होने की संभावना है। वहां आगे के कार्यक्रम, कार्य बहिष्कार, जनसंपर्क अभियान और अन्य कदमों पर चर्चा की जाएगी।

इससे संकेत मिलता है कि मेरठ बार की मंगलवार की आमसभा को आंदोलन के अगले चरण की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

न्यायिक कार्य से विरत रहने का असर

जब बड़ी संख्या में अधिवक्ता न्यायिक कार्य से विरत रहते हैं तो अदालतों में नियमित सुनवाई प्रभावित हो सकती है। मुकदमों में तारीख लग सकती है और तत्काल सुनवाई वाले मामलों में संबंधित न्यायालयों को अपनी प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार निर्णय लेना पड़ सकता है।

इसलिए कार्य बहिष्कार किसी भी न्यायिक आंदोलन का महत्वपूर्ण लेकिन संवेदनशील हिस्सा होता है।

एक ओर अधिवक्ता संगठन इसे अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने का माध्यम मानते हैं, दूसरी ओर लंबित मुकदमों के पक्षकारों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

यही कारण है कि ऐसे आंदोलनों में अदालतों की कार्यप्रणाली और मुकदमों में शामिल पक्षकारों के हितों को भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होता है।

क्या अब आंदोलन और तेज होगा?

मंगलवार की आमसभा में लिए गए फैसलों से इतना स्पष्ट है कि मेरठ बार एसोसिएशन फिलहाल आंदोलन को समाप्त करने के बजाय उसे आगे बढ़ाने के पक्ष में है।

22 जिलों में कार्य बहिष्कार, कचहरी में बैनर लगाने, जनप्रतिनिधियों के प्रवेश के विरोध और केंद्रीय संघर्ष समिति की बैठक जैसे फैसले आगे की रणनीति का संकेत देते हैं।

इसके अलावा व्यापारिक और सामाजिक संगठनों से संपर्क करने की योजना आंदोलन को व्यापक समर्थन दिलाने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है।

हालांकि आगे सरकार, केंद्र और संबंधित न्यायिक संस्थाओं की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं, यह इस आंदोलन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।

निष्कर्ष

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की मांग एक बार फिर आंदोलन के केंद्र में आ गई है। मेरठ बार एसोसिएशन की मंगलवार की आमसभा में लिए गए फैसलों ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। 23 सितंबर को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में अधिवक्ताओं के न्यायिक कार्य से विरत रहने का फैसला किया गया है। साथ ही कचहरी परिसर में ‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ के बैनर लगाने और भाजपा से जुड़े जनप्रतिनिधियों के प्रवेश का विरोध करने का निर्णय भी सामने आया है।

अधिवक्ताओं की नाराजगी सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हुई मुलाकात के बाद बढ़ी। अधिवक्ताओं के अनुसार मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार हाईकोर्ट बेंच स्थापित नहीं कर सकती और उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दी गई। यह विवरण फिलहाल प्रतिनिधिमंडल के बयान के आधार पर सामने आया है।

कानूनी रूप से हाईकोर्ट बेंच की स्थापना एक बहु-स्तरीय संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया है। केंद्र सरकार ने संसद में दिए उत्तर में अनुच्छेद 214, राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम की संबंधित व्यवस्था और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए 1981 के जसवंत सिंह आयोग का भी उल्लेख किया है।

अब देखना होगा कि 22 जिलों के अधिवक्ताओं के कार्य बहिष्कार और आगे प्रस्तावित केंद्रीय संघर्ष समिति की बैठकों के बाद इस पुराने मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकार की ओर से क्या औपचारिक कदम सामने आते हैं। फिलहाल इतना जरूर है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की मांग ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस में अपनी जगह बना ली है।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।