प्रयागराज की NLU में जातिगत भेदभाव के आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, न्यायिक जांच के आदेश; छात्र की कॉपियां भी दोबारा जांची जाएंगी
प्रयागराज की डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ कथित जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के आरोपों ने अब न्यायिक जांच का रूप ले लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपों को गंभीर मानते हुए दो न्यायिक अधिकारियों को मामले की स्वतंत्र जांच करने का निर्देश दिया है। साथ ही, एक छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं का स्वतंत्र रूप से दोबारा मूल्यांकन कराने का भी आदेश दिया गया है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि उसने अभी आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
विश्वविद्यालय वह जगह होती है जहां छात्र अपने करियर और भविष्य की नींव तैयार करते हैं। खासतौर पर राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने वाले छात्र कई वर्षों की मेहनत के बाद वहां पहुंचते हैं। ऐसे में यदि किसी छात्र को यह महसूस हो कि उसकी जाति या आरक्षण के कारण उसके साथ शैक्षणिक या प्रशासनिक स्तर पर भेदभाव किया जा रहा है, तो शिकायत का असर केवल एक परीक्षा या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
प्रयागराज स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (RPNLU) से जुड़ा ऐसा ही मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने है।
हाईकोर्ट ने 16 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ में सुनवाई के दौरान स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और इसी कारण निष्पक्ष एजेंसी से उनकी जांच जरूरी है।
दो छात्रों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया
यह मामला दो छात्रों की याचिका से सामने आया। याचिकाकर्ताओं में एक पीएचडी शोधार्थी हैं, जबकि दूसरे याचिकाकर्ता बीए एलएलबी (ऑनर्स) के पांचवें सेमेस्टर के छात्र हैं और विश्वविद्यालय के बॉयज हॉस्टल में रहते हैं। मामले में विश्वविद्यालय के विधि विभाग के प्रमुख और बॉयज हॉस्टल के वार्डन डॉ. दीपक शर्मा को प्रतिवादी संख्या 6 के रूप में संबोधित किया गया है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि संबंधित अधिकारी ने अपनी शैक्षणिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का इस्तेमाल छात्र को कथित रूप से जातिगत आधार पर अपमानित करने और परेशान करने के लिए किया।
छात्र का दावा था कि उसकी जाति और आरक्षण से जुड़े लाभों को लेकर टिप्पणियां की गईं। इसके अलावा उसने यह आशंका भी जताई कि उसकी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन उसकी जाति के कारण अधिक सख्ती से किया गया।
ये सभी फिलहाल आरोप हैं, जिन्हें जांच के बाद ही सत्य या असत्य के रूप में स्थापित किया जा सकेगा।
शिकायत पहले विश्वविद्यालय के कुलपति से की गई थी
याचिका में कहा गया कि छात्र ने पहले विश्वविद्यालय के कुलपति के सामने अपनी शिकायत रखी थी।
रिपोर्टों के मुताबिक, छात्र ने 20 अगस्त 2026 को शिकायत की थी। शिकायत में उसने कथित जातिगत टिप्पणियों के साथ-साथ अपनी उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन को लेकर भी चिंता व्यक्त की थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि शिकायत के बाद भी संबंधित अधिकारी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई और बार-बार याद दिलाने के बावजूद स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आया।
छात्र की शिकायत में कथित तौर पर यह भी कहा गया कि उसने एक परीक्षा, विशेष रूप से संविधान कानून से जुड़े पेपर में अच्छे अंक हासिल किए थे, लेकिन इसके बाद उसके प्रति व्यवहार और मूल्यांकन को लेकर उसे आपत्ति होने लगी।
उसने आरोप लगाया कि बाद की उत्तर पुस्तिकाओं को अधिक सख्ती से जांचा गया।
हालांकि यह महत्वपूर्ण है कि किसी उत्तर पुस्तिका का कम अंक मिलना अपने आप में जातिगत भेदभाव का प्रमाण नहीं है। इसी वजह से अदालत ने आरोपों की सत्यता निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र जांच और अलग से उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन की व्यवस्था की है।
हाईकोर्ट ने कहा—आरोप गंभीर हैं, इसलिए निष्पक्ष जांच जरूरी
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया कि अदालत इस स्तर पर आरोपों को सही नहीं मान रही है।
अदालत का दृष्टिकोण यह था कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और इसलिए उनकी जांच निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। जिस व्यक्ति पर आरोप लगाए गए हैं, उसे भी अपना पक्ष रखने और सुनवाई का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
यह अंतर कानूनी रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।
अदालत द्वारा जांच का आदेश देना और किसी व्यक्ति को दोषी ठहरा देना दो अलग-अलग बातें हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने स्वयं कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला है कि जातिगत भेदभाव हुआ था या नहीं।
अदालत ने केवल यह तय किया है कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उनकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
दो न्यायिक अधिकारियों को सौंपी गई जांच
हाईकोर्ट ने मामले की जांच के लिए प्रयागराज के दो न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया।
इनमें अर्चना सिंह-I, जज, स्मॉल कॉज कोर्ट, जिला न्यायालय, प्रयागराज और अरुण कुमार यादव, स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, प्रयागराज शामिल हैं।
जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित छात्रों को प्रतिवादी संख्या 6 या विश्वविद्यालय में कार्यरत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जाति के आधार पर अपमान, भेदभाव या अन्य अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ा।
इसके साथ यह भी देखा जाना है कि यदि ऐसे मामलों में छात्रों ने शिकायत की थी, तो विश्वविद्यालय ने लागू नियमों और विनियमों के अनुसार उन शिकायतों पर क्या कार्रवाई की।
यानी जांच केवल एक छात्र के व्यक्तिगत आरोप तक सीमित नहीं रखी गई है।
जांच समिति किन सवालों पर ध्यान देगी?
जांच के दौरान मुख्य रूप से कुछ महत्वपूर्ण सवाल सामने होंगे।
पहला सवाल यह होगा कि क्या वास्तव में SC/ST छात्रों के साथ जाति के आधार पर अपमानजनक या भेदभावपूर्ण व्यवहार हुआ।
दूसरा, यदि ऐसा व्यवहार हुआ तो उसमें संबंधित अधिकारी या विश्वविद्यालय से जुड़े किसी अन्य व्यक्ति की क्या भूमिका थी।
तीसरा, क्या छात्रों ने पहले विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने शिकायतें रखी थीं।
चौथा, यदि शिकायतें की गई थीं तो विश्वविद्यालय ने उन पर अपने नियमों के अनुसार उचित प्रक्रिया अपनाई या नहीं।
और पांचवां, क्या आरोपों के समर्थन या विरोध में स्वतंत्र गवाह, दस्तावेज, संदेश, रिकॉर्ड या अन्य सामग्री उपलब्ध है।
अदालत ने जांच अधिकारियों को संबंधित व्यक्तियों को अपना पक्ष रखने का अवसर देने को भी कहा है। यानी जांच एकतरफा तरीके से नहीं होनी है।
छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं का दोबारा मूल्यांकन भी होगा
इस मामले में हाईकोर्ट का एक और महत्वपूर्ण निर्देश उत्तर पुस्तिकाओं की स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़ा है।
अदालत ने विश्वविद्यालय के कुलपति को एक स्वतंत्र समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो संबंधित छात्र की उन विषयों की उत्तर पुस्तिकाओं का दोबारा मूल्यांकन करेगी जिन्हें आरोपी अधिकारी ने पढ़ाया या मूल्यांकित किया था। छात्र की ओर से बताए गए अन्य संबंधित विषय भी इस प्रक्रिया में शामिल किए जा सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस व्यक्ति पर मूल्यांकन में पक्षपात का आरोप लगाया गया है, उसे इस पुनर्मूल्यांकन समिति का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा।
इसके अलावा मूल्यांकन को masked evaluation के तरीके से करने का निर्देश दिया गया है।
इसका उद्देश्य यह है कि उत्तर पुस्तिका देखने वाले नए परीक्षक को छात्र की पहचान या पहले दिए गए अंकों की जानकारी न हो। इससे पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र रखने का प्रयास किया जा सकेगा।
समिति को अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर कुलपति को देने और उसके बाद रिपोर्ट हाईकोर्ट के सामने रखने का निर्देश दिया गया है।
आरोपी अधिकारी को प्रशासनिक जिम्मेदारियों से हटाया गया
हाईकोर्ट ने जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारी को विश्वविद्यालय की सभी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से अलग रखने का आदेश दिया है।
इसके साथ यह भी कहा गया कि उन्हें याचिकाकर्ता छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में कोई भूमिका नहीं दी जाएगी।
वह दोनों याचिकाकर्ताओं से जुड़े अनुशासनात्मक मामलों और हॉस्टल संबंधी मामलों में भी भूमिका नहीं निभाएंगे।
यह आदेश जांच की निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने संबंधित अधिकारी को दोषी मान लिया है।
बल्कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ उसके ही प्रशासनिक अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर शिकायत हो, तब जांच पूरी होने तक उन अधिकारों से उसे अलग रखना संभावित हित-संघर्ष को कम करने का एक अंतरिम उपाय हो सकता है।
गवाह छात्रों की पहचान सुरक्षित रखने का निर्देश
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू छात्रों की पहचान और सुरक्षा से संबंधित है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि जांच के दौरान बयान देने वाले छात्रों की पहचान को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।
यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र के लिए अपने ही शिक्षक या प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ शिकायत करना आसान नहीं होता।
यदि कोई छात्र जांच में गवाही देता है, तो उसे बाद में शैक्षणिक या प्रशासनिक प्रतिकूल कार्रवाई का डर हो सकता है।
इसीलिए अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने या जांच में कोई बयान देने के कारण दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई प्रतिकूल शैक्षणिक या प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की जाए।
जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में देनी होगी
हाईकोर्ट ने जांच के लिए स्पष्ट समयसीमा भी तय की है।
न्यायिक अधिकारियों को अपनी जांच पूरी करके रिपोर्ट 24 सितंबर 2026 की अगली सुनवाई से पहले अदालत के सामने सीलबंद लिफाफे में पेश करनी है।
इससे स्पष्ट है कि अदालत इस मामले को फिलहाल लंबी अवधि तक लंबित रखने के बजाय आरोपों की प्राथमिक जांच जल्दी पूरी कराना चाहती है।
अगली सुनवाई में अदालत जांच रिपोर्ट और उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन से संबंधित स्थिति पर आगे आदेश दे सकती है।
विश्वविद्यालय की व्यवस्था भी जांच के दायरे में
रिपोर्टों के अनुसार हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय से यह जानकारी भी मांगी है कि क्या वहां Equal Opportunity Cell और SC/ST छात्रों की शिकायतों के लिए Grievance Redressal Committee जैसी व्यवस्था लागू है।
यह पहलू केवल आरोपित व्यक्ति की भूमिका तक सीमित नहीं है।
यदि किसी संस्थान में भेदभाव संबंधी शिकायतें आती हैं, तो संस्थान द्वारा शिकायतों को प्राप्त करने, जांचने और उनका समाधान करने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए अदालत यह देखना चाहती है कि विश्वविद्यालय में ऐसी शिकायतों से निपटने के लिए लागू नियमों के अनुरूप संस्थागत व्यवस्था मौजूद थी या नहीं और शिकायत मिलने पर उसका इस्तेमाल किया गया या नहीं।
संविधान के तहत जातिगत भेदभाव का कानूनी पहलू
जाति आधारित भेदभाव भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में गंभीर विषय है।
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का सिद्धांत स्थापित करता है।
अनुच्छेद 15 राज्य को धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव से रोकता है और कुछ परिस्थितियों में सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है।
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप में व्यवहार को निषिद्ध करता है।
इसके अतिरिक्त, संसद ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ कुछ प्रकार के अत्याचार और अपमानजनक व्यवहार को दंडित करने के लिए SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 बनाया है।
हालांकि इस विशेष मामले में किसी खास आपराधिक धारा के लागू होने पर हाईकोर्ट ने अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। इसलिए केवल आरोपों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ SC/ST Act की कोई विशेष धारा सिद्ध हो चुकी है।
क्या हाईकोर्ट ने जातिगत भेदभाव साबित मान लिया है?
नहीं।
यह इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपों की सत्यता पर इस स्तर पर कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया जा रहा है।
अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और इसलिए निष्पक्ष जांच आवश्यक है। आरोपी व्यक्ति को भी पूरा अवसर देकर उसका पक्ष सुना जाना है।
इसका मतलब है कि फिलहाल कानूनी स्थिति यह है—
आरोप लगाए गए हैं → अदालत ने उन्हें गंभीर माना है → स्वतंत्र जांच का आदेश दिया गया है → आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं।
यही अंतर किसी न्यायिक आदेश को सही ढंग से समझने के लिए जरूरी है।
अब आगे क्या होगा?
अब दो समानांतर प्रक्रियाएं आगे बढ़ेंगी।
पहली प्रक्रिया न्यायिक जांच की है। अर्चना सिंह-I और अरुण कुमार यादव आरोपों, शिकायतों, संबंधित पक्षों और उपलब्ध सामग्री की जांच करेंगे और रिपोर्ट हाईकोर्ट को देंगे।
दूसरी प्रक्रिया छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन की है। विश्वविद्यालय द्वारा गठित स्वतंत्र समिति यह देखेगी कि आरोपी शिक्षक के मूल्यांकन से जुड़े पेपरों में पुनर्मूल्यांकन के बाद क्या स्थिति सामने आती है।
इसके बाद हाईकोर्ट के सामने यह रिपोर्ट होगी कि आरोपों के संबंध में जांच से क्या तथ्य सामने आए और विश्वविद्यालय ने शिकायतों पर किस प्रकार कार्रवाई की।
मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर 2026 को निर्धारित है।
इस मामले का विश्वविद्यालयों के लिए क्या महत्व है?
यह मामला केवल एक छात्र की शिकायत तक सीमित नहीं है। इसके जरिए उच्च शिक्षण संस्थानों में शिकायत निवारण, निष्पक्ष मूल्यांकन और छात्रों के साथ समान व्यवहार की संस्थागत जिम्मेदारी का सवाल भी सामने आता है।
यदि कोई छात्र यह आरोप लगाता है कि उसके साथ जाति के कारण भेदभाव हुआ है, तो शिकायत की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है।
इसी तरह यदि परीक्षा के मूल्यांकन में पक्षपात का आरोप लगाया जाता है, तो स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन विवाद को वस्तुनिष्ठ तरीके से देखने का एक तरीका हो सकता है।
लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी शिक्षक या अधिकारी को दोषी घोषित करना भी उचित नहीं होगा।
इसी संतुलन को हाईकोर्ट के आदेश में देखा जा सकता है—एक तरफ आरोपों की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र जांच और पुनर्मूल्यांकन कराया गया है, वहीं दूसरी तरफ संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया गया है।
निष्कर्ष
प्रयागराज की डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से जुड़े इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जातिगत भेदभाव के आरोपों को लेकर महत्वपूर्ण अंतरिम कदम उठाया है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने दो न्यायिक अधिकारियों—अर्चना सिंह-I और अरुण कुमार यादव—को स्वतंत्र जांच करने का निर्देश दिया है। साथ ही, एक छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं का स्वतंत्र और पहचान छिपाकर पुनर्मूल्यांकन कराने का आदेश भी दिया गया है।
संबंधित विधि विभागाध्यक्ष एवं हॉस्टल वार्डन को जांच पूरी होने तक प्रशासनिक जिम्मेदारियों से अलग रखा गया है और दोनों याचिकाकर्ताओं से जुड़े मूल्यांकन, अनुशासनात्मक तथा हॉस्टल मामलों में उनकी भूमिका पर रोक लगाई गई है।
लेकिन इन अंतरिम आदेशों को किसी व्यक्ति के खिलाफ दोष सिद्ध होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से आरोपों की सत्यता पर अभी कोई निष्कर्ष नहीं दिया है।
अब वास्तविक तस्वीर जांच रिपोर्ट और स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन के बाद ही सामने आएगी। 24 सितंबर 2026 की अगली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि तब अदालत के सामने जांच की प्रगति और संबंधित रिपोर्टें होंगी।
फिलहाल इस मामले की कानूनी स्थिति को सबसे सटीक रूप में यही कहा जा सकता है कि प्रयागराज की लॉ यूनिवर्सिटी में जातिगत भेदभाव के आरोपों की न्यायिक जांच शुरू हो चुकी है, लेकिन आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।