IndianLawNotes.com

पिता की मर्जी नहीं चली, 26 साल की बेटी ने चुना अपना पति; इलाहाबाद हाईकोर्ट

पिता की मर्जी नहीं चली, 26 साल की बेटी ने चुना अपना पति; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- बालिग को जीवनसाथी चुनने की पूरी आजादी

      इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण फैसले खुद लेने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत के सामने पेश की गई 26 वर्षीय सोनिका चौहान ने कहा कि उसने अपनी इच्छा से अकबर खान से शादी की है और वह अपने पति के साथ रहना चाहती है। पिता की आपत्ति और परिवार के विरोध के बावजूद हाईकोर्ट ने उसकी इच्छा को महत्व देते हुए उसे अपनी पसंद के अनुसार जीवन बिताने की स्वतंत्रता दी।

       विवाह और जीवनसाथी का चुनाव भारतीय समाज में लंबे समय से परिवार की पसंद, सामाजिक परंपराओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच बहस का विषय रहा है। खासकर जब दो अलग-अलग धार्मिक समुदायों के वयस्क व्यक्ति विवाह करते हैं, तो कई बार पारिवारिक विरोध के साथ मामला पुलिस और अदालत तक पहुंच जाता है।

गाजियाबाद से सामने आया सोनिका चौहान और अकबर खान का मामला भी इसी तरह अदालत तक पहुंचा। सोनिका के पिता अपनी बेटी के इस रिश्ते के खिलाफ थे। दूसरी तरफ सोनिका ने अदालत के सामने साफ कहा कि उसने अपनी इच्छा से विवाह किया है और वह अपने पति के साथ रहना चाहती है।

मामले में हाईकोर्ट ने सोनिका को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया। 8 सितंबर 2026 के आदेश के बाद गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने की पुलिस ने उसे अदालत के सामने पेश किया। इसके बाद अदालत ने स्वयं उससे बातचीत कर उसकी इच्छा और परिस्थितियों को समझा।

कोर्ट में पेश हुई 26 वर्षीय सोनिका

सोनिका चौहान की उम्र 26 वर्ष बताई गई। अदालत के सामने पेश होने के बाद उससे यह जानने की कोशिश की गई कि वह अपनी इच्छा से पति के साथ रहना चाहती है या उस पर किसी तरह का दबाव है।

सोनिका ने अदालत के सामने कहा कि उसने 28 अगस्त 2022 को अपनी इच्छा से अकबर खान से विवाह किया था।

उसका कहना था कि शादी के समय उस पर किसी तरह का दबाव नहीं था और उसने अपनी स्वतंत्र इच्छा से यह निर्णय लिया था। उसने यह भी कहा कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है।

सोनिका ने अपने परिवार की ओर से धमकी और दबाव का आरोप भी लगाया। उसके मुताबिक, परिवार उसके वैवाहिक जीवन को स्वीकार नहीं कर रहा था और उस पर पति से अलग होने का दबाव बनाया जा रहा था।

अदालत के सामने पति अकबर खान ने भी अपने वैवाहिक संबंध की पुष्टि की और कहा कि वह अपनी पत्नी के साथ रहना चाहता है।

इस तरह कोर्ट के सामने दोनों वयस्क व्यक्तियों की इच्छा स्पष्ट रूप से सामने आ गई।

पिता ने बेटी की मर्जी पर उठाए सवाल

दूसरी तरफ सोनिका के पिता लक्ष्मण सिंह चौहान ने अपनी बेटी के बयान और विवाह को लेकर अलग रुख अपनाया।

पिता का आरोप था कि उनकी बेटी को ब्लैकमेल किया जा रहा है और वह स्वतंत्र रूप से फैसला नहीं ले रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि बेटी पर किसी तरह का दबाव हो सकता है।

पिता की ओर से विवाह की वैधता को लेकर भी सवाल उठाया गया। उनका कहना था कि सोनिका हिंदू है और अकबर खान मुस्लिम हैं, इसलिए विवाह की कानूनी वैधता का प्रश्न उठता है।

यही वह बिंदु था जहां मामला केवल परिवार के भीतर के विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का सवाल अदालत के सामने आया।

हालांकि अंतरधार्मिक विवाह के संबंध में केवल दोनों व्यक्तियों के अलग-अलग धर्मों में होने से विवाह को स्वतः अवैध मान लेना सही कानूनी निष्कर्ष नहीं है। भारत में ऐसे विवाह के लिए अलग-अलग वैधानिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं और किसी विवाह की वैधता उसके वास्तविक तथ्यों, लागू कानून और विवाह की प्रक्रिया के आधार पर तय होती है।

सार्वजनिक रिपोर्टों में भी यह सामने आया था कि सोनिका और अकबर ने अगस्त 2022 में विवाह किया था और उनके विवाह को लेकर परिवार की आपत्ति बाद में विवाद का कारण बनी।

कोर्ट ने सोनिका से सीधे बात क्यों की?

ऐसे मामलों में अदालत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि संबंधित वयस्क व्यक्ति वास्तव में क्या चाहता है।

यदि कोई बालिग महिला अदालत के सामने यह कहती है कि वह अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है, तो अदालत केवल माता-पिता की इच्छा के आधार पर उसे परिवार के पास वापस भेजने का आदेश नहीं दे सकती।

इसी कारण सोनिका को अदालत के सामने पेश कराया गया।

अदालत ने उसके बयान को महत्व दिया और यह देखने की कोशिश की कि क्या उसके ऊपर किसी तरह का दबाव, धमकी, लालच या जबरदस्ती तो नहीं है।

हाईकोर्ट के अनुसार सोनिका के बयान से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि वह किसी दबाव में अपना निर्णय बता रही थी।

यानी अदालत के सामने उसका निर्णय स्वतंत्र दिखाई दिया।

अनुच्छेद 21 ने बदला फैसले का आधार

इस मामले में संविधान का अनुच्छेद 21 महत्वपूर्ण हो जाता है।

अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह सिद्धांत विकसित हुआ है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में उसकी निजी पसंद और जीवन के महत्वपूर्ण फैसले भी शामिल हो सकते हैं।

जीवनसाथी चुनना व्यक्ति के जीवन का अत्यंत निजी निर्णय है।

सुप्रीम कोर्ट ने Shafin Jahan v. Asokan K.M. और Lata Singh v. State of U.P. जैसे मामलों में भी वयस्क व्यक्ति की पसंद और विवाह से जुड़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया है।

इसी संवैधानिक दृष्टिकोण के तहत अदालतें सामान्यतः यह देखती हैं कि संबंधित व्यक्ति बालिग है या नहीं और वह अपनी इच्छा से क्या चाहता है।

माता-पिता को अपनी बेटी के लिए चिंता हो सकती है। परिवार को विवाह पसंद नहीं हो सकता। सामाजिक या धार्मिक मतभेद भी हो सकते हैं। लेकिन यदि व्यक्ति बालिग है और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम है, तो केवल पारिवारिक असहमति अपने आप में उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त नहीं करती।

“माता-पिता की पसंद” और “बालिग की पसंद” में किसे महत्व?

भारतीय परिवार व्यवस्था में माता-पिता अक्सर अपने बच्चों के विवाह को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कई परिवारों में विवाह से पहले जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति, परिवार की पृष्ठभूमि और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसे पहलुओं को देखा जाता है।

लेकिन कानूनी स्थिति में बालिग व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा का भी अपना महत्व है।

यदि कोई बालिग महिला यह तय करती है कि वह किसके साथ विवाह करना चाहती है या किसके साथ रहना चाहती है, तो केवल माता-पिता की असहमति उसके निर्णय को स्वतः अवैध नहीं बनाती।

यही कारण है कि ऐसे मामलों में अदालत पहले व्यक्ति की इच्छा जानने की कोशिश करती है।

सोनिका के मामले में भी अदालत के सामने उसका व्यक्तिगत बयान महत्वपूर्ण रहा।

पिता ने ब्लैकमेल और दबाव का आरोप लगाया

पिता का पक्ष पूरी तरह अलग था।

उनका कहना था कि उनकी बेटी को ब्लैकमेल किया जा रहा है। इसलिए वह जो कुछ कह रही है, वह स्वतंत्र निर्णय नहीं हो सकता।

ऐसे आरोपों को अदालत नजरअंदाज नहीं करती। यदि किसी व्यक्ति को जबरन रोका गया हो, धमकाया गया हो, उसका अपहरण किया गया हो या उसे विवाह के लिए मजबूर किया गया हो, तो मामला पूरी तरह अलग हो जाता है।

लेकिन अदालत के सामने पेश होने के बाद यदि संबंधित बालिग व्यक्ति स्वयं स्पष्ट रूप से कहता है कि वह अपनी इच्छा से अपने साथी के साथ रहना चाहता है और उसके बयान में दबाव या भय का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता, तो अदालत उसकी स्वतंत्र इच्छा को महत्व दे सकती है।

सोनिका के मामले में हाईकोर्ट ने इसी आधार पर उसके व्यक्तिगत निर्णय को स्वीकार किया।

पति अकबर खान ने भी पत्नी के साथ रहने की इच्छा जताई

अदालत के सामने अकबर खान ने भी सोनिका के साथ अपने वैवाहिक संबंध की पुष्टि की।

उसने पत्नी के साथ रहने की इच्छा जताई।

इससे अदालत के सामने स्थिति यह थी कि दोनों पक्ष—पति और पत्नी—एक साथ रहना चाहते थे, जबकि परिवार की ओर से इस संबंध का विरोध किया जा रहा था।

अदालत के लिए यह महत्वपूर्ण अंतर था।

किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध परिवार के पास भेजना और उसकी इच्छा के अनुसार सुरक्षित स्थान पर जाने देना, दोनों बिल्कुल अलग परिस्थितियां हैं।

इसलिए अदालत ने सोनिका की स्वतंत्र इच्छा को प्राथमिक आधार बनाया।

पुलिस को सुरक्षा और सुरक्षित आवागमन का निर्देश

हाईकोर्ट ने केवल सोनिका को पति के साथ जाने की अनुमति देकर मामला खत्म नहीं किया।

अदालत ने पुलिस को दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित आवागमन में सहायता करने के निर्देश भी दिए।

यह निर्देश ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण होता है क्योंकि परिवार के विरोध के कारण दंपती को धमकी या हिंसा का खतरा हो सकता है।

अदालत का उद्देश्य किसी परिवार के पक्ष या विपक्ष में जाना नहीं था। मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि एक बालिग व्यक्ति अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते समय किसी अवैध दबाव या हिंसा का शिकार न हो।

परिवार को वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप से रोका

अदालत ने निजी प्रतिवादियों यानी परिवार के सदस्यों को भी दंपती के वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करने की चेतावनी दी।

इसका मतलब यह है कि परिवार अपनी असहमति व्यक्त कर सकता है, लेकिन यदि दोनों वयस्क कानून के अनुसार साथ रह रहे हैं और उनके खिलाफ कोई वैध कानूनी आधार नहीं है, तो परिवार उन्हें धमकाकर, जबरन अलग करके या हिंसा के माध्यम से अपना निर्णय लागू नहीं कर सकता।

किसी व्यक्ति को विवाह के लिए मजबूर करना और किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के विवाह से रोकना—दोनों ही परिस्थितियां व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न से जुड़ सकती हैं।

क्या हर अंतरधार्मिक विवाह को हाईकोर्ट सुरक्षा देगा?

इस फैसले को यह कहकर नहीं समझना चाहिए कि हर अंतरधार्मिक विवाह के मामले में अदालत स्वतः सुरक्षा का आदेश देगी।

हर मामले के तथ्य अलग होते हैं।

यदि महिला या पुरुष नाबालिग हो, विवाह के संबंध में धोखाधड़ी के गंभीर आरोप हों, जबरदस्ती हो, अपहरण का वास्तविक मामला हो या किसी अन्य अपराध के विश्वसनीय आधार मौजूद हों, तो अदालत अलग तरीके से मामले को देख सकती है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि संबंधित महिला बालिग थी और अदालत के सामने उसने अपनी इच्छा स्पष्ट रूप से बताई।

इसीलिए इस मामले का केंद्र अंतरधार्मिक विवाह से अधिक एक बालिग व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता था।

पहले भी अदालतें दे चुकी हैं ऐसे मामलों में संरक्षण

वयस्क व्यक्तियों की पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट पहले भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि परिवार की सामाजिक या व्यक्तिगत पसंद हमेशा किसी बालिग व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकती।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही अन्य मामलों में भी बालिग जोड़ों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े सवालों पर अदालतों ने अनुच्छेद 21 और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का सहारा लिया है। उदाहरण के लिए, हाईकोर्ट के एक प्रकाशित निर्णय में S. Khushboo v. Kanniammal का उल्लेख करते हुए कहा गया कि दो वयस्कों का साथ रहना अपने आप में अवैध नहीं माना जा सकता।

हालांकि प्रत्येक मामले में सुरक्षा का आदेश उसके अपने तथ्यों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर तय किया जाता है।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात क्या रही?

सोनिका चौहान मामले में अदालत के सामने तीन बातें प्रमुख थीं—

पहली, सोनिका बालिग थी।

दूसरी, उसने अदालत के सामने स्वयं बताया कि उसने अपनी इच्छा से विवाह किया था।

तीसरी, अदालत को उसके बयान में दबाव, डर या प्रलोभन का स्पष्ट संकेत नहीं मिला।

इन परिस्थितियों में अदालत ने उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व दिया।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि अदालत ने माता-पिता की भावनाओं या चिंताओं को अपराध नहीं माना। लेकिन किसी बालिग बेटी की व्यक्तिगत पसंद पर केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर रोक लगाने की अनुमति भी नहीं दी।

सोशल मीडिया और पुलिस कार्रवाई के बीच मामला क्यों चर्चा में आया?

सोनिका और अकबर का विवाद पहले भी सार्वजनिक चर्चा में आ चुका था। 2025 की रिपोर्टों के अनुसार, दोनों के विवाह और परिवार के विरोध के बाद पुलिस कार्रवाई हुई थी। उस समय सोनिका ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है, जबकि उसके परिवार की ओर से अलग आरोप लगाए गए थे।

इससे यह मामला लंबे समय तक विवाद में रहा।

बाद की न्यायिक कार्यवाही में जब सोनिका को अदालत के सामने पेश किया गया, तो अदालत के लिए उसका स्वयं का बयान महत्वपूर्ण बन गया।

कानूनी रूप से इस फैसले का क्या संदेश है?

इस मामले से एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत सामने आता है—बालिग व्यक्ति का जीवनसाथी चुनना उसके व्यक्तिगत जीवन से जुड़ा निर्णय है।

माता-पिता की सहमति सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन हर परिस्थिति में वह कानूनी अनिवार्यता नहीं बन जाती।

वहीं दूसरी ओर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं है कि किसी व्यक्ति को अपराध करने की छूट मिल जाती है। विवाह की वैधता, उम्र, सहमति, विवाह की प्रक्रिया और अन्य कानूनी शर्तें अपने-अपने स्थान पर लागू रहती हैं।

इसलिए अदालत का दृष्टिकोण संतुलित है—बालिग व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा का सम्मान, लेकिन वास्तविक अपराध या जबरदस्ती के आरोप होने पर कानून के अनुसार जांच।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने सोनिका चौहान ने साफ शब्दों में कहा कि वह अपनी पसंद से अकबर खान के साथ रहना चाहती है। उसने अपने विवाह को अपनी इच्छा का परिणाम बताया और परिवार की ओर से दबाव की बात कही। दूसरी तरफ उसके पिता ने बेटी पर दबाव और ब्लैकमेल किए जाने का आरोप लगाया तथा विवाह की वैधता पर सवाल उठाया।

अदालत ने दोनों पक्षों की बातों को ध्यान में रखते हुए सबसे पहले सोनिका की व्यक्तिगत इच्छा को समझा। वह बालिग थी और अदालत के सामने उसने स्वतंत्र रूप से अपने पति के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की। उसके बयान में दबाव, भय या प्रलोभन का स्पष्ट संकेत नहीं मिलने के बाद हाईकोर्ट ने उसे अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता दी।

पुलिस को दंपती की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया। परिवार को भी उनके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप से दूर रहने की चेतावनी दी गई।

इस मामले का व्यापक संवैधानिक संदेश यही है कि बालिग व्यक्ति के जीवन के महत्वपूर्ण निजी फैसलों में उसकी अपनी इच्छा को कानूनी महत्व प्राप्त है। परिवार की असहमति अपने आप में किसी बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त नहीं करती।

साथ ही, किसी भी मामले में विवाह की वैधता और आपराधिक आरोपों का फैसला केवल भावनाओं या पारिवारिक आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि लागू कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

यही वजह है कि सोनिका चौहान का मामला केवल एक परिवार और उसकी बेटी के बीच विवाद नहीं रह जाता, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अनुच्छेद 21, विवाह की पसंद और परिवार की असहमति के बीच कानूनी संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बन जाता है।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।