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पिता की करोड़ों की संपत्ति, बेटे से मांगा ₹75 हजार महीना; मद्रास हाईकोर्ट

पिता की करोड़ों की संपत्ति, बेटे से मांगा ₹75 हजार महीना; मद्रास हाईकोर्ट ने बताया कब मिलता है बुजुर्ग माता-पिता को भरण-पोषण

      मद्रास हाईकोर्ट ने साफ किया—सिर्फ यह आरोप कि बेटे ने पिता की संपत्ति अपने नाम करा ली और बाद में उनका साथ नहीं दिया, अपने आप में भरण-पोषण दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत को यह भी देखना होगा कि माता-पिता वास्तव में अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं या नहीं।

        बुजुर्ग माता-पिता और उनकी संतान के बीच संपत्ति को लेकर विवाद अक्सर केवल जमीन-जायदाद तक सीमित नहीं रहता। कई मामलों में संपत्ति के बंटवारे, कारोबार में हिस्सेदारी और परिवार के भीतर आर्थिक संबंधों के साथ भरण-पोषण का सवाल भी जुड़ जाता है। लेकिन क्या किसी माता-पिता को केवल इसलिए बेटे से हर महीने भरण-पोषण मिल सकता है क्योंकि बेटा उनकी संपत्ति का लाभ उठा रहा है या उनके बीच पारिवारिक विवाद चल रहा है?

मद्रास हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इस सवाल को महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ दिया है।

Suraj Goyal v. C.M. Goyal @ Chandrakumar M. Goyal, CRL RC No. 97 of 2026 में न्यायमूर्ति सुंदर मोहन ने चेन्नई फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बेटे को अपने पिता को हर महीने ₹75,000 भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने 16 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया।

मामले में पिता की उम्र लगभग 80 वर्ष बताई गई थी। उनका कहना था कि बेटे के साथ विवाद के बाद वह आर्थिक और पारिवारिक कठिनाइयों में आ गए हैं। दूसरी तरफ बेटे ने अदालत के सामने पिता की संपत्ति, किराये की आय, कारोबार और बैंक जमा से संबंधित दस्तावेज रखे।

यहीं से मामला केवल पारिवारिक विवाद नहीं रहा, बल्कि यह सवाल बन गया कि कानून की नजर में पिता वास्तव में भरण-पोषण के लिए आर्थिक रूप से असमर्थ थे या नहीं।

पिता और बेटे के बीच विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, पिता सी.एम. गोयल ने बताया कि उन्होंने कम उम्र से अपना कारोबार शुरू किया था और अपनी मेहनत तथा कारोबारी आय से संपत्तियां खरीदी थीं। उनका कारोबार घरेलू सामान और अन्य उत्पादों से जुड़ा था।

बाद में उनके बेटे सूरज गोयल ने कारोबार में प्रवेश किया। पिता के अनुसार उन्होंने बेटे को कारोबार में 50 प्रतिशत हिस्सा भी दिया। इसके बाद परिवार के भीतर संबंध खराब होने लगे।

पिता का आरोप था कि उन्हें एक सेटलमेंट डीड यानी समझौता/हस्तांतरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार किया गया और बाद में संपत्ति तथा कारोबार को लेकर परिस्थितियां उनके खिलाफ हो गईं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बेटे ने उनके साथ पर्याप्त आर्थिक सहयोग नहीं किया और जिस अपार्टमेंट में वह रह रहे थे, उसके बिजली बिल, मेंटेनेंस और प्रॉपर्टी टैक्स जैसे खर्चों को लेकर भी समस्या पैदा हुई।

पिता ने फैमिली कोर्ट का रुख किया और दावा किया कि वह स्वयं अपना खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं।

फैमिली कोर्ट ने उनकी मांग स्वीकार करते हुए बेटे को ₹75,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। यह आदेश 15 अक्टूबर 2025 को पारित हुआ था। इसके खिलाफ बेटे ने मद्रास हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।

बेटे ने कोर्ट में क्या कहा?

बेटे की ओर से मुख्य तर्क यह था कि पिता के पास स्वयं पर्याप्त आर्थिक साधन मौजूद हैं। इसलिए उन्हें इस आधार पर ₹75,000 प्रतिमाह देने का आदेश नहीं दिया जा सकता कि बेटा उनके साथ नहीं रह रहा या उनके बीच संपत्ति को लेकर विवाद है।

बेटे ने अदालत के सामने पिता की संपत्तियों, उनसे मिलने वाले किराये, कारोबार से होने वाली आय और फिक्स्ड डिपॉजिट से संबंधित रिकॉर्ड का उल्लेख किया।

मामले में पिता की ओर से दाखिल वित्तीय हलफनामों को लेकर भी सवाल उठे। अदालत ने अलग-अलग दस्तावेजों में बताई गई आय की तुलना की।

हाईकोर्ट के सामने इसलिए केवल यह सवाल नहीं था कि पिता और बेटे के बीच विवाद हुआ था या नहीं। असली कानूनी सवाल था—

क्या पिता के पास स्वयं अपना जीवन चलाने के पर्याप्त साधन थे?

किराये की आय और बैंक रिकॉर्ड क्यों बने महत्वपूर्ण?

हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध दस्तावेजों का विस्तार से परीक्षण किया। रिकॉर्ड में पिता की कमर्शियल प्रॉपर्टी से मिलने वाली किराये की आय का भी उल्लेख था।

कुछ किराये के समझौतों में लगभग ₹82,000 प्रतिमाह तक की किराये की आय दिखाई गई थी। अदालत ने यह भी देखा कि अलग-अलग हलफनामों में संपत्ति और आय की जानकारी एक जैसी नहीं थी।

उदाहरण के तौर पर, एक कमर्शियल प्रॉपर्टी के किराये के समझौते में ₹30,000 प्रतिमाह किराया दर्ज था, जबकि संबंधित हलफनामे में कम राशि बताई गई थी।

इसके अलावा बैंक रिकॉर्ड और दूसरी संपत्तियों से प्राप्त किराये की रकम पर भी अदालत ने ध्यान दिया।

पिता की ओर से बाद में दाखिल दस्तावेजों में कुछ किराये की आय और ₹1.50 लाख की चार फिक्स्ड डिपॉजिट का उल्लेख भी सामने आया। अदालत ने इन दस्तावेजों को अन्य रिकॉर्ड के साथ मिलाकर देखा।

अदालत के लिए ये दस्तावेज इसलिए महत्वपूर्ण थे क्योंकि भरण-पोषण के दावे में आवेदक की वास्तविक आर्थिक स्थिति एक महत्वपूर्ण तथ्य बन जाती है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का क्या महत्व रहा?

मद्रास हाईकोर्ट ने Chaturbhuj v. Sita Bai में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रखे गए सिद्धांतों पर भी भरोसा किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 27 नवंबर 2007 के इस फैसले में धारा 125 CrPC के उद्देश्य को सामाजिक न्याय से जुड़ा बताया था। अदालत ने कहा था कि इस प्रावधान का उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को सहायता देना है जो स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी बात समझना जरूरी है। 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू हो चुके हैं। भरण-पोषण से संबंधित पुराने CrPC प्रावधानों का वर्तमान समान प्रावधान BNSS की धारा 144 में है। लेकिन जिस मामले में कार्यवाही पुराने कानून के तहत शुरू हुई, उसमें अदालत ने उसी वैधानिक ढांचे और लागू न्यायिक सिद्धांतों के संदर्भ में फैसला किया।

इसलिए इस फैसले को यह कहकर नहीं समझना चाहिए कि अब हर बुजुर्ग माता-पिता का भरण-पोषण दावा खत्म हो गया है। ऐसा बिल्कुल नहीं है।

क्या माता-पिता को पूरी तरह दरिद्र होना जरूरी है?

यहां सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यही है।

मद्रास हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि बुजुर्ग माता-पिता के पास एक भी रुपया नहीं होना चाहिए तभी उन्हें भरण-पोषण मिल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sita Bai फैसले में भी यह स्पष्ट किया गया था कि किसी व्यक्ति का बिल्कुल दरिद्र या भिखारी होना ही एकमात्र कसौटी नहीं है। वास्तविक सवाल यह है कि उपलब्ध साधनों से वह व्यक्ति अपने जीवन का आवश्यक खर्च उठा सकता है या नहीं।

इसी सिद्धांत को माता-पिता के दावे के संदर्भ में देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने उपलब्ध वित्तीय रिकॉर्ड का परीक्षण किया।

इस मामले में अदालत को पिता की संपत्तियों, किराये की आय, कारोबार से आय और अन्य आर्थिक साधनों से यह निष्कर्ष निकालने का आधार मिला कि वह ऐसी स्थिति में नहीं थे कि अपना भरण-पोषण बिल्कुल नहीं कर सकते।

संपत्ति का विवाद और भरण-पोषण—दो अलग कानूनी सवाल

इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि संपत्ति का विवाद और भरण-पोषण का अधिकार एक ही कानूनी प्रश्न नहीं हैं।

पिता का आरोप था कि सेटलमेंट डीड उनके पक्ष में नहीं गई और बेटे ने संपत्ति का लाभ उठाया। लेकिन उस दस्तावेज को रद्द कराने या संपत्ति वापस हासिल करने के लिए अलग कानूनी कार्यवाही उपलब्ध थी।

फैसले में अदालत ने नोट किया कि पिता सेटलमेंट डीड को रद्द कराने की कोशिश कर चुके थे। अदालत के सामने यह बात भी आई कि यदि सेटलमेंट डीड रद्द होकर संपत्ति पिता को वापस मिल जाती है, तो वह भरण-पोषण की मांग भी आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे।

इससे हाईकोर्ट ने यह अंतर स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी संपत्ति गलत तरीके से किसी दूसरे के नाम कर दी गई है, तो उसका समाधान संबंधित संपत्ति कानून और उपलब्ध दीवानी/अन्य कानूनी उपायों के माध्यम से तलाशा जा सकता है।

सिर्फ संपत्ति विवाद होने के कारण भरण-पोषण का आदेश स्वतः नहीं दिया जा सकता।

बेटे का व्यवहार और कानूनी अधिकार अलग-अलग विषय हैं

फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पिता और बेटे के संबंधों से जुड़ी परिस्थितियां परेशान करने वाली थीं। लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कानून के तहत अधिकार तय करते समय केवल भावनात्मक या पारिवारिक परिस्थितियों के आधार पर वैधानिक शर्तों को बदला नहीं जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि वृद्धावस्था में किसी व्यक्ति को परिवार से मिलने वाला नैतिक और पारिवारिक सहयोग महत्वपूर्ण है। लेकिन नैतिक जिम्मेदारी और किसी विशेष वैधानिक प्रावधान के तहत मिलने वाला कानूनी अधिकार एक ही चीज नहीं हैं।

यही इस फैसले का मूल संदेश है।

₹75 हजार प्रतिमाह वाला आदेश क्यों रद्द हुआ?

फैमिली कोर्ट ने पिता की परिस्थितियों को देखते हुए ₹75,000 प्रतिमाह का भरण-पोषण तय किया था।

लेकिन हाईकोर्ट ने मामले के दस्तावेजों को देखने के बाद माना कि पिता की आर्थिक स्थिति को देखते हुए धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण देने का आधार पर्याप्त नहीं था।

अदालत ने विशेष रूप से उनकी आय के स्रोतों, कमर्शियल संपत्तियों से मिलने वाले किराये, बैंक रिकॉर्ड और अन्य आर्थिक साधनों को ध्यान में रखा।

हाईकोर्ट ने इसलिए फैमिली कोर्ट का 15 अक्टूबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया।

हालांकि एक महत्वपूर्ण राहत पिता को भी दी गई। अदालत ने कहा कि यदि बेटे ने अब तक कोई भरण-पोषण राशि पिता को दे दी है, तो वह रकम वापस नहीं ली जाएगी।

क्या इसका मतलब है कि बुजुर्ग माता-पिता अब बच्चों से भरण-पोषण नहीं मांग सकते?

नहीं।

यह समझना बहुत जरूरी है कि यह फैसला बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण के अधिकार को समाप्त नहीं करता।

कानून माता-पिता के भरण-पोषण के दावे को मान्यता देता है। लेकिन दावा करने वाले व्यक्ति की वास्तविक आर्थिक स्थिति, उसकी जरूरत, उपलब्ध साधन और मामले के दस्तावेजों को देखा जा सकता है।

यदि किसी बुजुर्ग माता-पिता के पास कुछ संपत्ति है लेकिन उससे कोई वास्तविक आय नहीं होती, आय बहुत कम है, चिकित्सा खर्च अत्यधिक है या उनकी आवश्यक जरूरतें उपलब्ध आय से पूरी नहीं होतीं, तो परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।

दूसरे शब्दों में, सिर्फ संपत्ति का मालिक होना और उस संपत्ति से पर्याप्त आर्थिक लाभ प्राप्त करना दोनों अलग बातें हैं।

इसी तरह केवल यह कहना कि माता-पिता के पास बैंक में कुछ पैसा है, अपने आप में हर मामले में भरण-पोषण के दावे को समाप्त नहीं करता। अदालत को पूरे वित्तीय रिकॉर्ड और वास्तविक परिस्थितियों को देखना होता है।

माता-पिता के लिए क्या है इस फैसले की सीख?

अगर कोई बुजुर्ग माता-पिता भरण-पोषण का दावा कर रहे हैं, तो अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में सही और पूरी जानकारी देना बेहद महत्वपूर्ण है।

उन्हें अपनी—

  • नियमित आय,
  • पेंशन,
  • किराये की आय,
  • बैंक जमा,
  • फिक्स्ड डिपॉजिट,
  • संपत्ति,
  • चिकित्सा खर्च,
  • कर्ज और अन्य वित्तीय दायित्व

से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित रखने चाहिए।

यदि किसी संपत्ति से आय नहीं हो रही है, तो उससे जुड़े तथ्य और दस्तावेज भी सामने रखे जा सकते हैं।

इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि अदालत के सामने दाखिल हलफनामे में आय और संपत्ति की जानकारी में विरोधाभास पैदा होना मामले को प्रभावित कर सकता है।

बच्चों के लिए क्या संदेश है?

बच्चों के लिए भी इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि वे माता-पिता के भरण-पोषण से केवल यह कहकर बच सकते हैं कि माता-पिता के नाम कोई संपत्ति है।

हर मामले में तथ्य अलग होंगे।

यदि माता-पिता वास्तव में अपना खर्च उठाने में असमर्थ हैं और कानून की आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो बच्चे की जिम्मेदारी का प्रश्न उठ सकता है।

लेकिन यदि माता-पिता के पास पर्याप्त आर्थिक साधन हैं और दस्तावेज यह बताते हैं कि वे स्वयं अपना खर्च उठा सकते हैं, तो अदालत उस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करेगी।

इस फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

Suraj Goyal v. C.M. Goyal का महत्व इस बात में है कि इसने एक बार फिर यह रेखांकित किया कि भरण-पोषण की कार्यवाही को केवल पारिवारिक भावनाओं या संपत्ति विवाद के आधार पर नहीं देखा जा सकता।

किसी बेटे पर यह आरोप हो सकता है कि उसने पिता की संपत्ति हासिल कर ली, परिवार में विवाद किया या पिता को पर्याप्त नैतिक सहयोग नहीं दिया। लेकिन अदालत को यह भी देखना होगा कि जिस वैधानिक प्रावधान के तहत भरण-पोषण मांगा गया है, उसकी आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं या नहीं।

मद्रास हाईकोर्ट ने इसी आधार पर फैमिली कोर्ट के ₹75,000 प्रतिमाह वाले आदेश को रद्द किया।

फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि परिवार के भीतर जो हुआ वह मानवीय दृष्टि से दुखद हो सकता है, लेकिन अदालत को कानून के अनुसार निर्णय करना होता है। अदालत ने उम्मीद जताई कि पक्षकार अपने मतभेद दूर करके पिता-पुत्र के संबंध को बनाए रखने का प्रयास करेंगे।

निष्कर्ष

इस पूरे मामले को एक लाइन में समझें तो बात यह है कि माता-पिता की संपत्ति पर बच्चे का अधिकार या कब्जा और माता-पिता का भरण-पोषण पाने का अधिकार दो अलग कानूनी प्रश्न हैं।

यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति को लगता है कि उसकी संपत्ति गलत तरीके से दूसरे के नाम कर दी गई है, तो वह संबंधित कानूनी उपाय अपना सकता है। वहीं यदि वह भरण-पोषण का दावा करता है, तो अदालत उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति और स्वयं अपना खर्च चलाने की क्षमता को भी देख सकती है।

मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले में पिता के पक्ष में पहले दिया गया ₹75,000 प्रतिमाह का आदेश इसलिए रद्द हुआ क्योंकि रिकॉर्ड पर उपलब्ध आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए अदालत को यह आधार नहीं मिला कि वह धारा 125 CrPC के तहत अपने भरण-पोषण के लिए बेटे पर निर्भर होने की कानूनी स्थिति में थे।

यह फैसला Suraj Goyal v. C.M. Goyal @ Chandrakumar M. Goyal, CRL RC No. 97 of 2026, 16 सितंबर 2026 का है।

इसलिए इस फैसले का सही कानूनी सार यह नहीं है कि “बुजुर्ग माता-पिता को बच्चों से भरण-पोषण नहीं मिलेगा”, बल्कि यह है कि भरण-पोषण का दावा करते समय माता-पिता की वास्तविक आर्थिक आवश्यकता और स्वयं अपना भरण-पोषण करने की क्षमता महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य हैं।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।