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13 साल बाद जिया उल हक हत्याकांड में बड़ा फैसला: राजा भैया समेत पांच आरोपियों के खिलाफ केस बंद,

13 साल बाद जिया उल हक हत्याकांड में बड़ा फैसला: राजा भैया समेत पांच आरोपियों के खिलाफ केस बंद, शहीद अफसर के माता-पिता का छलका दर्द

      उत्तर प्रदेश के चर्चित सीओ जिया उल हक हत्याकांड में करीब 13 साल बाद अदालत ने नामजद आरोपियों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत ने कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया समेत पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली। अदालत के आदेश के बाद इन पांचों के खिलाफ इस मामले में चल रही कार्यवाही समाप्त हो गई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने माना कि दोबारा की गई जांच के बाद भी आरोपियों के खिलाफ आगे कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार सामने नहीं आया।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब इस मामले में पहले ही 10 अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। यही वजह है कि जिया उल हक के परिवार के लिए अदालत का ताजा फैसला भावनात्मक रूप से बेहद भारी रहा। देवरिया स्थित उनके पैतृक गांव जुआफर में शहीद अधिकारी के बुजुर्ग माता-पिता ने बेटे की हत्या के 13 साल बाद भी अपने मन में मौजूद सवालों और अधूरे न्याय की पीड़ा को सामने रखा। उनके पिता शमशुल हक ने कहा कि जिन लोगों पर उन्हें बेटे की हत्या के पीछे साजिश रचने का संदेह था, वे अब मामले से बाहर हो गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जिन 10 लोगों को अदालत ने दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा दी, उससे परिवार को कुछ संतोष जरूर मिला है।

2 मार्च 2013 की वह घटना, जिसने पूरे प्रदेश को हिला दिया था

जिया उल हक की हत्या 2 मार्च 2013 को प्रतापगढ़ जिले के कुंडा क्षेत्र के बलीपुर गांव में हुई थी। उस समय जिया उल हक कुंडा सर्किल में क्षेत्राधिकारी यानी सीओ के पद पर तैनात थे।

बलीपुर गांव में उस दिन ग्राम प्रधान नन्हें यादव की हत्या के बाद तनाव फैल गया था। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस टीम मौके पर पहुंची थी। इसी दौरान वहां हिंसक स्थिति पैदा हुई और जिया उल हक भीड़ के बीच घिर गए। घटना के दौरान उनकी हत्या कर दी गई। उसी घटनाक्रम में नन्हें यादव के भाई सुरेश यादव की भी मौत हुई थी। बाद में यह मामला उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल हो गया।

जिया उल हक की हत्या की खबर सामने आने के बाद पुलिस प्रशासन से लेकर तत्कालीन राज्य सरकार तक पर सवाल उठे। मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बेहद संवेदनशील बन गया। तत्कालीन सरकार ने जांच सीबीआई को सौंप दी थी। इस घटना के बाद रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने तत्कालीन मंत्रिमंडल से इस्तीफा भी दिया था।

पत्नी ने दर्ज कराई थी एफआईआर

जिया उल हक की पत्नी परवीन आजाद ने पति की हत्या के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इस मामले में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के अलावा गुलशन यादव, हरिओम श्रीवास्तव, रोहित सिंह और संजय सिंह उर्फ गुड्डू समेत पांच लोगों को नामजद किया गया था। आरोप लगाया गया था कि इन लोगों की भूमिका हत्या की साजिश में रही।

इसके बाद जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंप दी गई। जांच एजेंसी ने मामले के अलग-अलग पहलुओं की जांच की और नामजद आरोपियों की भूमिका की भी पड़ताल की।

सीबीआई की शुरुआती जांच में राजा भैया और उनके करीबियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात सामने आई और एजेंसी ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। लेकिन यहीं से मामला समाप्त नहीं हुआ। जिया उल हक की पत्नी परवीन आजाद ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया और अदालत में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की।

क्लोजर रिपोर्ट पर उठे सवाल

परवीन आजाद की ओर से क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किए जाने के बाद मामला अदालतों में आगे बढ़ा। ट्रायल कोर्ट ने एक चरण में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और जांच जारी रखने का आदेश दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा।

बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किया था। इस आदेश के खिलाफ परवीन आजाद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2023 में मामले में सीबीआई को दोबारा जांच करने का निर्देश दिया। अदालत ने विशेष रूप से राजा भैया की कथित भूमिका की भी जांच करने को कहा था। इसके बाद सीबीआई की टीम ने मामले की नए सिरे से जांच शुरू की और बलीपुर गांव जाकर घटनास्थल का निरीक्षण भी किया।

इस घटनाक्रम ने 13 साल पुराने मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया था। परिवार को उम्मीद थी कि नए सिरे से जांच के बाद कोई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकता है।

दोबारा जांच के बाद फिर दाखिल हुई क्लोजर रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सीबीआई ने मामले से जुड़े दस्तावेजों, उपलब्ध साक्ष्यों और पहले की जांच के निष्कर्षों का दोबारा परीक्षण किया। एजेंसी ने नए सिरे से जांच के बाद फिर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की।

इस बार भी सीबीआई का निष्कर्ष यही रहा कि नामजद पांचों आरोपियों के खिलाफ हत्या की साजिश या अन्य आरोपों में आगे कार्रवाई के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। इसके बाद क्लोजर रिपोर्ट पर अदालत में सुनवाई हुई।

परवीन आजाद की ओर से इस रिपोर्ट का विरोध किया गया और अदालत से आगे जांच की मांग की गई। उनका पक्ष था कि मामले में उपलब्ध सामग्री को देखते हुए जांच को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

लेकिन विशेष सीबीआई अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और दोबारा की गई जांच के आधार पर सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली।

राजा भैया समेत पांच के खिलाफ कार्यवाही समाप्त

विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट सीबीआई प्रतिभा सिंह की अदालत के आदेश के बाद इस मामले में राजा भैया समेत पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो गई।

जिन पांच लोगों के नाम मामले में थे, उनमें रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, गुलशन यादव, हरिओम श्रीवास्तव, रोहित सिंह और संजय सिंह उर्फ गुड्डू शामिल बताए गए हैं। अदालत के समक्ष उपलब्ध सामग्री के आधार पर इन आरोपियों के खिलाफ आगे मुकदमा चलाने का पर्याप्त आधार नहीं पाया गया।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अदालत द्वारा क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि इस मामले में इन नामजद आरोपियों के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाई गई। इसे उन आरोपों के तथ्यात्मक रूप से सिद्ध होने का निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए, जिनका परिवार की ओर से पहले आरोप लगाया गया था।

दूसरी ओर 10 आरोपियों को मिल चुकी है उम्रकैद

जिया उल हक हत्याकांड की सुनवाई के दौरान मामले में शामिल अन्य आरोपियों के खिलाफ अलग न्यायिक प्रक्रिया चली। 5 अक्टूबर 2024 को सीबीआई की विशेष अदालत ने इस हत्याकांड से जुड़े 10 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

इस फैसले के बाद भी जिया उल हक के परिवार की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही थी। एक ओर अदालत द्वारा 10 लोगों को दोषी ठहराए जाने से उन्हें कुछ राहत मिली, लेकिन दूसरी ओर उन पांच नामजद लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने का सवाल परिवार के लिए बना रहा।

अब सितंबर 2026 में विशेष सीबीआई अदालत द्वारा क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद इस पहलू पर भी अदालत की कार्यवाही समाप्त हो गई है।

शहीद अधिकारी के पिता ने क्या कहा?

ताजा फैसले के बाद जिया उल हक के पिता शमशुल हक ने अपने दर्द को शब्दों में बयान किया। उन्होंने कहा कि बेटे की हत्या के बाद परिवार लगातार न्याय की उम्मीद लगाए बैठा था। उनके अनुसार, जिन लोगों को वे इस पूरे घटनाक्रम के पीछे मानते थे, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की उम्मीद थी।

उनका कहना था कि अदालत के फैसले के सामने परिवार के पास बहुत कुछ करने की स्थिति नहीं है। हालांकि 10 दोषियों को उम्रकैद की सजा मिलने से उन्हें कुछ संतोष जरूर है।

बुजुर्ग माता-पिता के लिए यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं रहा। 13 साल पहले खोए बेटे की याद और उसके बाद चली लंबी कानूनी प्रक्रिया ने इस परिवार को लगातार प्रभावित किया है। ताजा आदेश ने पुराने जख्म फिर से ताजा कर दिए हैं।

मामला इतना लंबा क्यों चला?

जिया उल हक हत्याकांड की कानूनी यात्रा कई चरणों से गुजरी। शुरुआत में सीबीआई ने जांच की और नामजद आरोपियों के खिलाफ क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। परिवार ने इसका विरोध किया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा।

एक समय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को लेकर ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में मामले की दोबारा जांच का रास्ता खोल दिया। इसके बाद सीबीआई ने फिर से जांच की।

यही वजह है कि 2013 में शुरू हुआ यह मामला 2026 तक कानूनी प्रक्रिया में बना रहा।

13 साल में बदली कई तस्वीरें

इस मामले की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसके दौरान कई स्तरों पर घटनाक्रम बदला। 2013 में हुई हत्या के बाद तत्कालीन राजनीतिक माहौल में मामला काफी चर्चित हुआ। सीबीआई जांच शुरू हुई। क्लोजर रिपोर्ट आई। परिवार ने उसका विरोध किया। अदालतों में मामला गया। फिर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दोबारा जांच हुई और अंततः 2026 में विशेष सीबीआई अदालत ने संशोधित जांच के आधार पर क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली।

इस पूरी प्रक्रिया में जिया उल हक के परिवार की भूमिका लगातार बनी रही। पत्नी परवीन आजाद ने शुरुआत से ही मामले को आगे बढ़ाया और सीबीआई की जांच तथा क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती दी। उनकी याचिकाओं के कारण मामला कई बार उच्च अदालतों तक पहुंचा।

अदालत के फैसले का मतलब क्या है?

इस फैसले को समझने के लिए तीन अलग-अलग बातों को एक साथ देखना जरूरी है।

पहली बात, जिया उल हक की हत्या के मामले में 10 अन्य आरोपियों को पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।

दूसरी बात, राजा भैया समेत पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ सीबीआई ने दोबारा जांच के बाद भी पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की।

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विशेष सीबीआई अदालत ने अब उस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। इससे इन पांचों के खिलाफ इस मामले में आगे की अदालती कार्यवाही समाप्त हो गई है।

इसलिए पूरे मामले को केवल “13 साल बाद फैसला” कहकर समाप्त करना पर्याप्त नहीं होगा। यह दरअसल उस लंबी कानूनी प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें जांच एजेंसी की शुरुआती रिपोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और दोबारा जांच तक कई चरण शामिल रहे।

परिवार की पीड़ा और कानून की प्रक्रिया

जिया उल हक के माता-पिता की प्रतिक्रिया इस मामले का मानवीय पक्ष सामने लाती है। एक पुलिस अधिकारी की ड्यूटी के दौरान हत्या और उसके बाद वर्षों तक चलती न्यायिक प्रक्रिया ने परिवार को लंबे समय तक इंतजार कराया।

अदालत में किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई के लिए साक्ष्य की कानूनी कसौटी पूरी होना जरूरी है। इसी आधार पर विशेष सीबीआई अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और जांच के निष्कर्षों को देखते हुए क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार की।

लेकिन कानूनी निष्कर्ष और परिवार की भावनात्मक संतुष्टि हमेशा एक जैसी नहीं होती। यही वजह है कि अदालत के फैसले के बाद भी जिया उल हक के माता-पिता के मन में बेटे की हत्या से जुड़े सवाल और दर्द मौजूद हैं।

निष्कर्ष

सीओ जिया उल हक हत्याकांड की कहानी 2 मार्च 2013 से शुरू होकर सितंबर 2026 तक पहुंची है। इस दौरान जांच एजेंसी बदली नहीं, लेकिन जांच के निष्कर्षों को लेकर कई बार न्यायिक स्तर पर सवाल उठे। परिवार ने क्लोजर रिपोर्ट का विरोध किया, मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सीबीआई ने दोबारा जांच की।

अब लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत ने दोबारा दाखिल क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए राजा भैया समेत पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी है।

वहीं, मामले में 10 अन्य आरोपियों को पहले ही उम्रकैद की सजा मिल चुकी है। इस कारण जिया उल हक के परिवार के सामने एक ओर अदालत का यह अंतिम निष्कर्ष है कि नामजद पांच आरोपियों के खिलाफ आगे कार्रवाई के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, जबकि दूसरी ओर बेटे की हत्या की पूरी सच्चाई जानने और न्याय की उनकी व्यक्तिगत उम्मीद अब भी उनके लिए भावनात्मक मुद्दा बनी हुई है।

**13 साल पुराने इस मामले का ताजा फैसला कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पड़ाव जरूर है, लेकिन शहीद अधिकारी के परिवार के लिए यह फैसला उन यादों को भी वापस ले आया है, जिनसे वे 2013 से लगातार जूझते रहे हैं।**

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।