मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और विवाह की स्वतंत्रता पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: 15 वर्ष की उम्र के बाद पसंद से निकाह के अधिकार पर क्या कहा अदालत ने?
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए विवाह की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत पसंद और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के प्रश्न पर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुसार यौवन प्राप्त कर चुका मुस्लिम लड़का या लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने के लिए स्वतंत्र है। मुस्लिम कानून के संदर्भ में यौवन प्राप्त करने की आयु सामान्यतः 15 वर्ष मानी जाती है, जब तक इसके विपरीत कोई प्रमाण उपलब्ध न हो।
हालांकि इस आदेश को समझते समय एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना जरूरी है। हाईकोर्ट ने संबंधित युवक और युवती के बीच हुए निकाह को इस मामले में अंतिम रूप से वैध घोषित नहीं किया। अदालत के सामने मुख्य प्रश्न विवाह की वैधता तय करना नहीं, बल्कि परिवार की ओर से कथित खतरे के बीच दोनों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा था। अदालत ने इसी सीमित उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए लुधियाना ग्रामीण के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को सुरक्षा संबंधी शिकायत पर कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला लुधियाना का है और इसमें एक 26 वर्षीय युवक तथा 17 वर्ष 8 माह की युवती ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दोनों मुस्लिम हैं। याचिका में कहा गया कि दोनों एक-दूसरे को कुछ समय से जानते थे और उनके बीच आपसी समझ एवं पसंद विकसित हुई थी। दोनों ने अपनी इच्छा से विवाह करने का निर्णय लिया था।
युवती के पिता इस रिश्ते के पक्ष में नहीं थे। याचिका के अनुसार, परिवार की असहमति के बाद युवती ने 22 अगस्त 2026 को अपना पैतृक घर छोड़ दिया। इसके बाद उसी दिन उसने युवक के साथ मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार निकाह किया। बाद में परिवार की ओर से कथित विरोध और खतरे की आशंका के चलते दोनों ने पुलिस से सुरक्षा की मांग की।
दोनों ने 30 अगस्त 2026 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लुधियाना ग्रामीण के समक्ष एक प्रतिनिधित्व देकर अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की। उनका आरोप था कि परिवार के कुछ सदस्यों की ओर से उन्हें खतरा हो सकता है। जब उनकी शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया।
याचिका में अदालत से मांग की गई कि पुलिस प्रशासन को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया जाए और परिवार के सदस्यों को उनके जीवन एवं स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने से रोका जाए।
हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न क्या था?
मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में विवाह की क्षमता से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह की क्षमता के संदर्भ में यौवन प्राप्त करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने Sir Dinshah Fardunji Mulla की ‘Principles of Mohammedan Law’ के Article 195 का हवाला दिया। इस प्रावधान के अनुसार, मुस्लिम कानून के अंतर्गत स्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति जिसने यौवन प्राप्त कर लिया है, विवाह के अनुबंध में प्रवेश कर सकता है। इसी संदर्भ में यह भी माना जाता है कि यदि विपरीत प्रमाण न हो तो 15 वर्ष की आयु पूरी होने पर यौवन प्राप्त होने की धारणा बनाई जाती है।
इसी कानूनी आधार पर याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क रखा गया कि 17 वर्ष 8 माह की युवती मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुसार अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने की स्थिति में थी।
अदालत ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के बारे में क्या कहा?
जस्टिस विक्रम अग्रवाल ने मामले की सुनवाई करते हुए मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के उक्त सिद्धांत पर विचार किया। अदालत ने कहा कि याचिका में शामिल युवती की उम्र 17 वर्ष 8 माह है, लेकिन दोनों पक्ष मुस्लिम हैं और उन पर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून लागू होता है।
अदालत ने मुस्लिम कानून के संदर्भ में यह टिप्पणी की कि यौवन प्राप्त कर चुका मुस्लिम लड़का या लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर सकता है और इस संदर्भ में यौवन की आयु 15 वर्ष मानी जाती है, जब तक इसके विपरीत कोई प्रमाण न हो।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय न्यायालयों के सामने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और विवाह की क्षमता से जुड़े ऐसे मामले पहले भी आते रहे हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व के कुछ मामलों में भी मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत यौवन प्राप्त कर चुके व्यक्ति की विवाह संबंधी क्षमता पर विचार किया है। उदाहरण के लिए, Farjaad v. State of Haryana मामले में अदालत ने Article 195 के संदर्भ में 17 वर्षीय मुस्लिम युवती को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने में सक्षम माना था और यह भी स्पष्ट किया था कि उस याचिका में मुख्य मुद्दा विवाह की वैधता के बजाय जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा था।
क्या इसका मतलब है कि 15 वर्ष की उम्र में हर मुस्लिम लड़की या लड़का विवाह कर सकता है?
इस आदेश को केवल एक पंक्ति में पढ़कर ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि भारत में 15 वर्ष की उम्र के बाद हर परिस्थिति में विवाह स्वतः वैध हो जाता है।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट का आदेश एक विशिष्ट संरक्षण याचिका के संदर्भ में था। अदालत ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में यौवन की धारणा का उल्लेख किया, लेकिन साथ ही संबंधित निकाह की वैधता पर कोई अंतिम निर्णय देने से साफ तौर पर परहेज किया।
यानी अदालत के सामने तत्काल सवाल यह था कि यदि दो व्यक्ति यह कहते हुए अदालत के सामने आते हैं कि उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरा है, तो केवल इस कारण उनकी सुरक्षा की मांग को नजरअंदाज किया जा सकता है या नहीं कि उन्होंने परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह किया है।
अदालत ने इस सवाल को विवाह की वैधता से अलग रखा।
अनुच्छेद 21 का महत्व
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। अदालतों के सामने जब किसी व्यक्ति या दंपति की ओर से जान-माल के खतरे की शिकायत आती है, तो सुरक्षा संबंधी याचिकाओं में यही संवैधानिक अधिकार महत्वपूर्ण हो जाता है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व के फैसलों में भी यह सिद्धांत सामने आया है कि परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह करने मात्र से किसी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। Gulam Deen v. State of Punjab जैसे मामलों में अदालत ने विवाह की वैधता के प्रश्न और जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा के प्रश्न को अलग-अलग माना था।
इस मामले में भी अदालत का ध्यान इसी संवैधानिक सुरक्षा पर केंद्रित रहा।
परिवार की असहमति और व्यक्ति की स्वतंत्रता
भारतीय समाज में विवाह को लेकर परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से अलग समुदाय, धर्म या परिवार की पसंद के विपरीत विवाह होने पर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। लेकिन अदालत के समक्ष जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा का प्रश्न आता है, तो कानून के तहत उस शिकायत पर विचार करना आवश्यक है।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं का कहना था कि परिवार की ओर से विरोध के कारण उन्हें खतरे की आशंका है। इसलिए उन्होंने पुलिस के सामने शिकायत दी थी।
हाईकोर्ट ने यह तय करने के बजाय कि परिवार का विरोध उचित था या नहीं, पुलिस को शिकायत पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया। यही इस आदेश का महत्वपूर्ण पहलू है।
हाईकोर्ट ने निकाह को वैध घोषित क्यों नहीं किया?
यह बिंदु इस पूरे मामले को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
अदालत ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत यौवन प्राप्त व्यक्ति की विवाह संबंधी क्षमता पर टिप्पणी जरूर की, लेकिन उसने यह नहीं कहा कि इस विशेष मामले में हुआ निकाह अंतिम रूप से वैध है।
आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अदालत विवाह की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है। हाईकोर्ट का आदेश केवल उस प्रतिनिधित्व पर विचार करने तक सीमित था, जो दोनों ने अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए पुलिस के सामने प्रस्तुत किया था।
इसका अर्थ यह है कि यदि भविष्य में किसी सक्षम अदालत या प्राधिकारी के सामने निकाह की वैधता, आयु, सहमति या किसी अन्य कानूनी प्रश्न को लेकर अलग कार्यवाही होती है, तो इस संरक्षण आदेश को उस प्रश्न पर अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा।
पुलिस को क्या निर्देश दिया गया?
मामले का अंतिम नतीजा यह रहा कि हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण), जिला लुधियाना को निर्देश दिया कि वह 30 अगस्त 2026 को दी गई सुरक्षा संबंधी शिकायत पर विचार करें और मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों के अनुसार कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई करें।
इस तरह अदालत ने खुद सुरक्षा की विस्तृत व्यवस्था तय करने के बजाय संबंधित पुलिस अधिकारी को प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी दी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि अदालत ने इस आदेश के जरिए परिवार के सदस्यों के खिलाफ कोई अंतिम आपराधिक निष्कर्ष नहीं दिया। सुरक्षा संबंधी शिकायत पर पुलिस को कानून के अनुसार तथ्यों की जांच और आवश्यक कार्रवाई करनी थी।
फैसले का व्यापक कानूनी महत्व
इस मामले का महत्व तीन अलग-अलग कानूनी पहलुओं में देखा जा सकता है।
पहला, अदालत ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के उस सिद्धांत को दोहराया जिसके अनुसार यौवन प्राप्त व्यक्ति को विवाह के मामले में अपनी पसंद का अधिकार माना जाता है और सामान्य परिस्थितियों में 15 वर्ष की आयु पर यौवन प्राप्त होने की धारणा की जाती है।
दूसरा, अदालत ने विवाह की वैधता और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के सवाल को अलग-अलग रखा। इसका अर्थ है कि किसी संरक्षण याचिका में अदालत का तत्काल उद्देश्य हमेशा विवाह को वैध या अवैध घोषित करना नहीं होता।
तीसरा, इस आदेश में संविधान के अनुच्छेद 21 की भूमिका भी सामने आती है। परिवार की असहमति अपने आप में किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग को समाप्त नहीं करती।
क्या यह फैसला सभी मामलों पर स्वतः लागू होगा?
किसी भी हाईकोर्ट के आदेश को उसके वास्तविक तथ्यों और कानूनी संदर्भ के साथ पढ़ना आवश्यक होता है। वर्तमान मामले में अदालत ने एक संरक्षण याचिका पर विचार किया और विवाह की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया।
इसलिए इस आदेश को यह कहते हुए प्रस्तुत करना कि हाईकोर्ट ने सामान्य रूप से सभी 15 वर्ष से अधिक उम्र के मुस्लिम व्यक्तियों के विवाह को वैध घोषित कर दिया है, आदेश की वास्तविक सीमा से आगे जाना होगा।
यह मामला विशेष रूप से मुस्लिम व्यक्तिगत कानून, यौवन की कानूनी धारणा, व्यक्तिगत पसंद, परिवार के विरोध और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह आदेश विवाह और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत के दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अदालत ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के संदर्भ में कहा कि यौवन प्राप्त कर चुका मुस्लिम लड़का या लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर सकता है और सामान्यतः 15 वर्ष की आयु पर यौवन प्राप्त होने की धारणा की जाती है, यदि इसके विपरीत कोई प्रमाण न हो।
लेकिन इस आदेश की सबसे महत्वपूर्ण सीमा भी उतनी ही स्पष्ट है—हाईकोर्ट ने इस विशेष निकाह को वैध घोषित नहीं किया। अदालत ने केवल यह सुनिश्चित किया कि दोनों की ओर से जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर की गई शिकायत को पुलिस कानून के अनुसार देखे।
मामले में 26 वर्षीय युवक और 17 वर्ष 8 माह की युवती ने परिवार की इच्छा के विरुद्ध 22 अगस्त 2026 को निकाह किया था। इसके बाद 30 अगस्त को सुरक्षा के लिए पुलिस से संपर्क किया गया और अंततः हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारी को शिकायत पर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
इस आदेश से एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर सामने आता है—किसी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना और किसी विवाह की अंतिम कानूनी वैधता तय करना दो अलग-अलग प्रश्न हो सकते हैं। इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले में सुरक्षा संबंधी पहलू पर निर्देश दिया, जबकि निकाह की वैधता पर अंतिम राय देने से बचा।
मामला: Akbar Khan and another v. State of Punjab and others
केस नंबर: CRWP-10657-2026 (O&M)
न्यायाधीश: जस्टिस विक्रम अग्रवाल
आदेश: 10 सितंबर 2026
न्यूट्रल साइटेशन: 2026:PHHC:128770
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।