पटना हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: अर्ध-न्यायिक अधिकारी मुकदमेबाज के चरित्र पर टिप्पणी नहीं कर सकते
SC/ST समुदाय को परेशान करने की ‘मानसिकता’ वाली टिप्पणी पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक, DM के आदेश से व्यक्तिगत आरोप हटाए
पटना। किसी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक अधिकारी के सामने जब कोई नागरिक अपनी शिकायत लेकर आता है, तो अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह उपलब्ध रिकॉर्ड, तथ्यों और लागू कानून के आधार पर मामले का फैसला करे। शिकायतकर्ता का व्यक्तिगत चरित्र, उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि या उसके कथित इरादों पर ऐसी टिप्पणी करना, जिसका विवाद के वास्तविक मुद्दे से सीधा संबंध न हो, न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर सकता है।
पटना हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए अर्ध-न्यायिक अधिकारियों को मुकदमेबाजों के खिलाफ व्यक्तिगत, अपमानजनक, अप्रासंगिक या पक्षपाती टिप्पणियां करने से बचने की स्पष्ट हिदायत दी है। कोर्ट ने कहा कि किसी मामले का फैसला तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए और अधिकारी को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किसी व्यक्ति के चरित्र या पृष्ठभूमि पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।
यह मामला Dr. Dev Narayan Jha v. The State of Bihar & Others, सिविल रिट क्षेत्राधिकार मामला संख्या 6198/2024 से संबंधित है। मामले की सुनवाई पटना हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक कुमार ने की। निर्णय 18 सितंबर 2026 को सुनाया गया।
विवाद की शुरुआत एक सरकारी नाली से हुई
मामले की शुरुआत किसी आपराधिक आरोप या व्यक्तिगत विवाद से नहीं, बल्कि एक सरकारी नाली से जुड़ी शिकायत से हुई थी।
याचिकाकर्ता डॉ. देव नारायण झा ने शिकायत की थी कि उनके गांव में सरकारी योजना के तहत बनाई गई नाली में समस्या उत्पन्न हो गई है और वहां से पानी उनकी कृषि भूमि की ओर आ रहा है। उनका कहना था कि नाली से पानी के रिसाव के कारण उनकी खेती प्रभावित हो रही है।
शिकायत बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के तहत संबंधित प्राधिकारी के सामने रखी गई। मामले की जांच के दौरान अधिकारियों की ओर से नाली और पानी के बहाव से संबंधित अलग-अलग रिपोर्ट भी सामने आईं।
सब-डिविजनल लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के स्तर पर मामले की सुनवाई हुई। इसके बाद शिकायतकर्ता ने मामले को आगे चुनौती देते हुए अतिरिक्त कलेक्टर के समक्ष अपील की। वहां से राहत नहीं मिलने पर उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट-सह-द्वितीय अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष दूसरी अपील दाखिल की।
जिला मजिस्ट्रेट के आदेश में आई व्यक्तिगत टिप्पणी
दूसरी अपील पर सुनवाई करते हुए सीतामढ़ी के जिला मजिस्ट्रेट ने शिकायत को खारिज कर दिया। लेकिन आदेश में शिकायत के मूल मुद्दे से आगे जाकर याचिकाकर्ता के बारे में एक व्यक्तिगत टिप्पणी भी दर्ज की गई।
जिला मजिस्ट्रेट के आदेश में कहा गया कि शिकायतकर्ता में पड़ोस में रहने वाले SC/ST समुदाय के लोगों को परेशान करने की मानसिकता प्रतीत होती है। इसके साथ ही संबंधित अधिकारी को मामले की जांच करने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में इसी टिप्पणी को विशेष रूप से चुनौती दी। उनका कहना था कि इस प्रकार की टिप्पणी के पीछे कोई ठोस तथ्य या कानूनी आधार नहीं था और इससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है।
याचिका में यह भी बताया गया कि डॉ. देव नारायण झा संस्कृत के विद्वान हैं और राज्य विश्वविद्यालय में कुलपति के पद पर भी कार्य कर चुके हैं। उनके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि किसी प्रशासनिक आदेश में बिना पर्याप्त आधार के इस प्रकार की व्यक्तिगत और कलंकित करने वाली टिप्पणी करना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने मूल शिकायत और व्यक्तिगत टिप्पणी को अलग-अलग देखा
इस मामले में पटना हाईकोर्ट का रुख विशेष रूप से ध्यान देने योग्य रहा। कोर्ट ने केवल इसलिए पूरी प्रशासनिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया कि जिला मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता के बारे में अनुचित टिप्पणी की थी।
कोर्ट ने पहले नाली और कथित जलभराव से जुड़े वास्तविक विवाद को देखा। बाद में हुई भौतिक जांच में याचिकाकर्ता की भूमि पर जलजमाव नहीं पाया गया था। स्थानीय लोगों से पूछताछ और स्थल निरीक्षण से भी ऐसा कोई लगातार जलस्रोत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि नाली से लगातार पानी उनकी जमीन पर आ रहा था।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने नाली और जलभराव से संबंधित मूल प्रशासनिक आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। यानी कोर्ट ने शिकायत के वास्तविक प्रशासनिक परिणाम को अलग रखा और जिला मजिस्ट्रेट की व्यक्तिगत टिप्पणी को अलग मुद्दे के रूप में देखा।
यही इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता को मूल विवाद में राहत दिए बिना भी यह स्पष्ट किया कि किसी नागरिक के खिलाफ बिना आवश्यक आधार के व्यक्तिगत टिप्पणी करना अलग प्रश्न है और उसे केवल इसलिए उचित नहीं माना जा सकता कि अधिकारी ने शिकायत के मूल विषय पर कोई निर्णय दिया है।
‘अर्ध-न्यायिक अधिकारी’ से कोर्ट की क्या अपेक्षा है?
पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अर्ध-न्यायिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया।
अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी ऐसे प्रशासनिक निकाय या अधिकारी होते हैं जिन्हें किसी विशेष कानून के तहत विवाद सुनने, पक्षों को सुनने और आदेश पारित करने का अधिकार दिया जाता है। हालांकि वे नियमित अदालतें नहीं होते, लेकिन जब वे किसी विवाद का निर्णय करते हैं तो उनसे निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और कानून के अनुरूप कार्य करने की अपेक्षा रहती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे अधिकारियों को अपने सामने मौजूद विवाद को तथ्यों और कानून के आधार पर तय करना चाहिए। किसी मुकदमेबाज के व्यक्तिगत चरित्र, नैतिकता या पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करना, जब उसका विवाद के कानूनी गुण-दोष से संबंध न हो, उनके अधिकार क्षेत्र के उद्देश्य से बाहर जा सकता है।
कोर्ट के अनुसार, व्यक्तिगत टिप्पणियां, अपमानजनक भाषा या पक्षपातपूर्ण टिप्पणियां निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ सुनवाई के मूल सिद्धांत के विपरीत हैं।
आदेश में क्या कहा गया?
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के सामने जो विवाद है, उसका समाधान उसी विवाद तक सीमित रहना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति ने सरकारी नाली, जमीन, राजस्व, प्रशासनिक कार्रवाई या किसी अन्य विषय से संबंधित शिकायत की है, तो अधिकारी को यह देखना होगा कि शिकायत के समर्थन में क्या तथ्य हैं, रिकॉर्ड में क्या सामग्री है और संबंधित कानून क्या कहता है।
इसके विपरीत, यदि आदेश में शिकायतकर्ता के चरित्र, नैतिकता या कथित मानसिकता पर ऐसी टिप्पणी कर दी जाती है, जिसका मामले के निर्णय से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, तो वह टिप्पणी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निर्णय का आवश्यक हिस्सा नहीं बन जाती।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालतों, न्यायाधिकरणों और अर्ध-न्यायिक अधिकारियों से संयमित, संतुलित और सम्मानजनक भाषा के इस्तेमाल की अपेक्षा की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला
पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के A.M. Mathur v. Pramod Kumar Gupta, (1990) 2 SCC 533 के निर्णय का उल्लेख किया।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक संयम और अनुशासन के महत्व पर जोर दिया था। पटना हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को वर्तमान मामले में लागू करते हुए कहा कि निर्णय लेने वाले प्राधिकारी को मामले के गुण-दोष पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचना चाहिए।
इस संदर्भ में अदालत का संदेश केवल न्यायिक अधिकारियों तक सीमित नहीं दिखाई देता। जहां किसी प्रशासनिक अधिकारी को कानून के तहत किसी शिकायत या अपील पर निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है, वहां उसके आदेश में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्रतिष्ठा को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?
फैसले में हाईकोर्ट ने व्यक्ति की प्रतिष्ठा के महत्व पर भी जोर दिया। कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि किसी अधिकारी के आदेश में दर्ज की गई प्रतिकूल टिप्पणी सामान्य बातचीत की टिप्पणी नहीं होती। वह सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाती है और उसका प्रभाव संबंधित व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा पर पड़ सकता है।
यही कारण है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप या व्यक्तिगत निष्कर्ष दर्ज करने से पहले उनके पीछे पर्याप्त सामग्री होना जरूरी है।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों को उस विवाद के निपटारे के लिए आवश्यक नहीं माना जा सकता था।
कोर्ट ने इसलिए इन टिप्पणियों को “uncharitable and unwarranted” यानी अनुचित और अनावश्यक माना।
कोर्ट ने टिप्पणी को आदेश से हटाया
हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को पूरी तरह रद्द नहीं किया। उसने विशेष रूप से उस हिस्से को निशाना बनाया जिसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप या आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं।
अदालत ने आदेश दिया कि 25 फरवरी 2023 के जिला मजिस्ट्रेट-सह-द्वितीय अपीलीय प्राधिकारी के आदेश से याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों को हटाया यानी expunge किया जाए।
इस प्रकार प्रशासनिक शिकायत से जुड़े मूल आदेश को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने उस हिस्से को समाप्त कर दिया जिसे उसने व्यक्तिगत और अनुचित टिप्पणी माना।
समीक्षा याचिका भी बनी थी विवाद का हिस्सा
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू था। जिला मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत टिप्पणियों के खिलाफ डिविजनल कमिश्नर के समक्ष समीक्षा याचिका भी दाखिल की थी।
लेकिन समीक्षा याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम के तहत ऐसी समीक्षा का प्रावधान उपलब्ध नहीं था।
इसके बाद डॉ. झा ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड को देखने के बाद मूल जलभराव विवाद में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियों को लेकर न्यायिक समीक्षा की और उन्हें आदेश से हटा दिया।
फैसले का व्यापक प्रशासनिक महत्व
यह फैसला प्रशासनिक व्यवस्था में काम करने वाले उन अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें कानून के तहत शिकायतों, अपीलों या विवादों पर निर्णय लेने की शक्ति दी गई है।
किसी शिकायत को स्वीकार करना या खारिज करना एक बात है, जबकि शिकायतकर्ता के चरित्र या उसके कथित इरादों पर टिप्पणी करना दूसरी बात। दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
एक अधिकारी को यदि लगता है कि शिकायत तथ्यहीन है, तो वह रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर शिकायत को खारिज कर सकता है। वह यह भी बता सकता है कि जांच में शिकायत की पुष्टि नहीं हुई। लेकिन किसी व्यक्ति को किसी समुदाय को परेशान करने की मानसिकता वाला बताने जैसी टिप्पणी के लिए अलग और ठोस आधार की आवश्यकता होगी, खासकर तब जब ऐसी टिप्पणी मूल विवाद के निर्णय के लिए आवश्यक न हो।
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले से यही सिद्धांत सामने आता है कि अर्ध-न्यायिक आदेश किसी व्यक्ति के खिलाफ व्यक्तिगत राय व्यक्त करने का माध्यम नहीं है। आदेश का केंद्र विवाद, साक्ष्य, रिकॉर्ड और कानून होना चाहिए।
फैसला सिर्फ टिप्पणी हटाने तक सीमित क्यों रहा?
इस मामले में कोर्ट का दृष्टिकोण संतुलित और सीमित दायरे वाला रहा। अदालत ने यह नहीं कहा कि याचिकाकर्ता की मूल शिकायत सही थी। उपलब्ध भौतिक सत्यापन रिपोर्ट में उनकी जमीन पर जलजमाव नहीं पाया गया था और इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मूल प्रशासनिक निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं था कि प्रशासनिक अधिकारी को शिकायतकर्ता के व्यक्तिगत चरित्र पर टिप्पणी करने की स्वतंत्रता मिल जाती है।
कोर्ट ने दोनों मुद्दों को अलग रखा—पहला, नाली और जलभराव से जुड़ा तथ्यात्मक विवाद; दूसरा, आदेश में की गई व्यक्तिगत टिप्पणी।
इस तरह अदालत ने केवल उस हिस्से को हटाया जिसे उसने विवाद के निर्णय से असंबंधित और अनुचित माना।
निष्कर्ष
Dr. Dev Narayan Jha v. State of Bihar का फैसला इस मूल सिद्धांत को रेखांकित करता है कि प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल विवाद के समाधान के लिए किया जाना चाहिए, न कि किसी मुकदमेबाज के व्यक्तिगत चरित्र पर टिप्पणी करने के लिए।
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी शिकायतकर्ता की शिकायत स्वीकार या अस्वीकार की जा सकती है, लेकिन निर्णय का आधार रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्य और लागू कानून होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के चरित्र, नैतिकता या सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़ी टिप्पणी मामले के निर्णय के लिए आवश्यक नहीं है और उसके समर्थन में पर्याप्त आधार भी नहीं है, तो ऐसी टिप्पणी आदेश का उचित हिस्सा नहीं मानी जा सकती।
इस मामले में हाईकोर्ट ने जलभराव से संबंधित मूल प्रशासनिक आदेशों में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों को आदेश से हटा दिया। इस तरह याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने अर्ध-न्यायिक अधिकारियों के लिए संयमित और निष्पक्ष भाषा के महत्व को फिर से रेखांकित किया।
फैसले का केंद्रीय संदेश यही है कि किसी अधिकारी की शक्ति जितनी महत्वपूर्ण है, उस शक्ति के इस्तेमाल में निष्पक्षता और संयम भी उतना ही आवश्यक है। किसी विवाद का फैसला करते समय रिकॉर्ड से बाहर की व्यक्तिगत धारणाओं के बजाय तथ्य और कानून ही आदेश का आधार होने चाहिए।
केस: Dr. Dev Narayan Jha v. The State of Bihar & Others
केस नंबर: Civil Writ Jurisdiction Case No. 6198 of 2024
निर्णय की तारीख: 18 सितंबर 2026
पीठ: जस्टिस आलोक कुमार, पटना हाईकोर्ट
मुख्य मुद्दा: अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी द्वारा मुकदमेबाज के खिलाफ व्यक्तिगत और अप्रासंगिक टिप्पणी
नतीजा: मूल प्रशासनिक आदेश में हस्तक्षेप नहीं; लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियों को आदेश से expunge किया गया।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।