पीढ़ियों पुराना विवाद होना जरूरी नहीं, एक ही पीढ़ी का पारिवारिक विवाद भी ‘Family Feud’: बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला
परिवारों के बीच होने वाले विवाद कई बार लंबे समय तक चलते हैं और कभी-कभी यही विवाद गंभीर आपराधिक घटनाओं की वजह भी बन जाते हैं। लेकिन क्या किसी मामले को ‘पारिवारिक झगड़ा’ (Family Feud) तभी माना जाएगा, जब वह कई पीढ़ियों से चला आ रहा हो? बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या की है।
अदालत ने कहा कि पारिवारिक झगड़ा होने के लिए यह जरूरी नहीं है कि विवाद पीढ़ियों से चला आ रहा हो। एक ही पीढ़ी के परिवार के सदस्यों के बीच पहले हुआ विवाद भी, यदि बाद में होने वाले अपराध का कारण बनता है, तो उसे पारिवारिक झगड़ा माना जा सकता है।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें एक दोषी ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा उसे समय से पहले रिहाई के लिए लागू की गई श्रेणी को चुनौती दी थी। उसका कहना था कि उसके मामले में अपराध पारिवारिक विवाद के कारण हुआ था और इसमें ऐसी ‘असाधारण हिंसा’ नहीं थी, जिसके आधार पर उसे अपेक्षाकृत कठोर श्रेणी में रखा जाए।
बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव और जस्टिस संदीपकुमार सी. मोरे शामिल थे, ने मामले के तथ्यों और ‘Family Feud’ शब्द के अर्थ पर विस्तार से विचार किया।
अदालत ने अंततः याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया कि उसे वर्ष 2010 की सरकारी गाइडलाइंस की कैटेगरी 3(b) के तहत माना जाए। इस श्रेणी में समय से पहले रिहाई पर विचार के लिए 22 साल की सजा, जिसमें पात्र छूट (Remission) का लाभ भी शामिल है, का प्रावधान था। इसके मुकाबले कैटेगरी 2(c) में 26 साल की सजा का प्रावधान था।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला Devidas v. State of Maharashtra, Criminal Writ Petition No. 364 of 2026 से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता एक दोषी था, जिसे महाराष्ट्र सरकार ने 15 मार्च 2010 को जारी सरकारी आदेश में निर्धारित श्रेणियों में से कैटेगरी 2(c) के अंतर्गत रखा था।
इस वर्गीकरण का सीधा असर उसकी समय से पहले रिहाई पर पड़ता था। कैटेगरी 2(c) के तहत उसे छूट सहित कुल 26 साल की सजा पूरी करनी थी, जबकि कैटेगरी 3(b) में यह अवधि 22 साल थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने अपनी दलील रखी कि उसके मामले में अपराध की पृष्ठभूमि को सही तरीके से नहीं समझा गया। उसके अनुसार, अपराध का संबंध एक पारिवारिक विवाद से था और घटना में ऐसी असाधारण हिंसा शामिल नहीं थी, जिसके कारण उसे कठोर श्रेणी में रखा जाए।
इसी आधार पर उसने राज्य सरकार के वर्गीकरण को चुनौती दी और मांग की कि उसे कैटेगरी 3(b) में रखा जाए।
कैटेगरी 2(c) और 3(b) में क्या अंतर था?
मामले में दोनों श्रेणियों का अंतर बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसका सीधा संबंध दोषी की समय से पहले रिहाई पर विचार किए जाने की अवधि से था।
सरकार ने याचिकाकर्ता को कैटेगरी 2(c) में रखा था। इस श्रेणी में समय से पहले रिहाई पर विचार के लिए छूट समेत 26 साल की सजा पूरी करने का प्रावधान था।
दूसरी ओर, कैटेगरी 3(b) में यही अवधि 22 साल थी।
यानी दोनों श्रेणियों के बीच चार साल का अंतर था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके मामले के तथ्यों को देखते हुए उसे 3(b) के अंतर्गत रखा जाना चाहिए था। उसके अनुसार, अगर अपराध पारिवारिक झगड़े की पृष्ठभूमि में हुआ था और मामले में असाधारण हिंसा की श्रेणी लागू नहीं होती, तो उसके लिए अधिक कठोर श्रेणी लागू करना उचित नहीं था।
यही विवाद हाईकोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न बन गया।
‘Family Feud’ का मतलब क्या है?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ‘Feud’ और ‘Family Feud’ शब्दों के अर्थ को भी देखा।
अदालत ने अलग-अलग शब्दकोशों में उपलब्ध परिभाषाओं का अध्ययन किया। इन परिभाषाओं से सामान्य तौर पर यह संकेत मिलता है कि ‘Feud’ किसी लंबे समय तक चलने वाले विवाद या रंजिश को कहा जा सकता है, जबकि ‘Family Feud’ परिवार के सदस्यों के बीच उत्पन्न विवाद या टकराव से संबंधित होता है।
लेकिन अदालत ने इस शब्द की व्याख्या को केवल कई पीढ़ियों तक चलने वाली दुश्मनी तक सीमित नहीं रखा।
अदालत ने माना कि परिवार शब्द का दायरा व्यापक है। परिवार केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है जो सीधे खून के रिश्ते में हों। रिश्तेदारी और कानून के माध्यम से जुड़े संबंध भी परिवार की व्यापक अवधारणा का हिस्सा हो सकते हैं।
इस दृष्टिकोण से अदालत ने यह भी माना कि पारिवारिक विवाद का अस्तित्व साबित करने के लिए पीढ़ियों पुराना विवाद होना अनिवार्य शर्त नहीं है।
एक ही पीढ़ी के लोगों का विवाद भी Family Feud
फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात इसी बिंदु से जुड़ी है।
अदालत ने कहा कि यदि एक ही पीढ़ी के परिवार के सदस्यों के बीच पहले से विवाद या रंजिश रही हो और वही बाद में हुए अपराध का कारण बनी हो, तो उस टकराव को भी ‘Family Feud’ माना जा सकता है।
इसका अर्थ यह हुआ कि ‘Family Feud’ की अवधारणा को केवल ऐसी पारिवारिक दुश्मनी तक सीमित नहीं किया जा सकता जो दादा-परदादा के समय से चली आ रही हो।
उदाहरण के लिए, एक ही पीढ़ी के दो परिवारों या रिश्तेदारों के बीच किसी घटना को लेकर विवाद पैदा होता है। विवाद के कारण दोनों पक्षों में रंजिश बढ़ती है और बाद में उसी रंजिश के चलते कोई अपराध हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में केवल इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह पारिवारिक झगड़ा नहीं था क्योंकि विवाद कई पीढ़ियों से नहीं चला आ रहा था।
यही व्याख्या इस मामले में याचिकाकर्ता के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।
मामले में रंजिश कैसे पैदा हुई?
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर भी गौर किया।
अदालत के सामने यह तथ्य आया कि याचिकाकर्ता और उसके बेटे के मन में शिकायतकर्ता तथा उसकी बेटी के प्रति रंजिश पैदा हुई थी। इसकी पृष्ठभूमि में एक हत्या का मामला था।
शिकायतकर्ता और उसकी बेटी याचिकाकर्ता और उसके बेटे के खिलाफ चल रहे हत्या के मामले में गवाह थे।
अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए यह माना कि दोनों पक्षों के बीच उत्पन्न रंजिश को पारिवारिक विवाद की पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है।
यानी अपराध को किसी बिल्कुल अलग और असंबंधित घटना के रूप में देखने के बजाय अदालत ने उसके पीछे मौजूद पारिवारिक संबंध और पहले से पैदा हुए विवाद को भी महत्व दिया।
क्या हर पारिवारिक विवाद Family Feud बन जाएगा?
इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि परिवार के सदस्यों के बीच होने वाला हर विवाद स्वतः ‘Family Feud’ की श्रेणी में आ जाएगा।
मामले के तथ्यों का महत्व यहां भी बना रहता है। अदालत ने इस विशेष मामले में देखा कि संबंधित पक्षों के बीच पारिवारिक संबंध थे, पहले से विवाद और रंजिश मौजूद थी तथा वही पृष्ठभूमि बाद में हुए अपराध से जुड़ी थी।
इसलिए किसी दूसरे मामले में केवल यह तथ्य कि आरोपी और पीड़ित एक ही परिवार से संबंधित हैं, अपने आप पर्याप्त नहीं होगा।
यह देखना होगा कि अपराध और पारिवारिक विवाद के बीच वास्तविक संबंध क्या था और क्या उपलब्ध रिकॉर्ड उस संबंध को स्थापित करते हैं।
दोषी के लिए अधिक लाभ वाली कैटेगरी लागू करने पर जोर
फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समय से पहले रिहाई की गाइडलाइंस से जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने पुराने न्यायिक मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी मामले के तथ्य एक ही सरकारी गाइडलाइन के तहत एक से अधिक श्रेणियों में आते हों, तो दोषी के लिए अधिक लाभ वाली श्रेणी पर विचार किया जाना चाहिए और उपयुक्त स्थिति में वही श्रेणी लागू की जानी चाहिए।
यह सिद्धांत इस मामले में सीधे तौर पर महत्वपूर्ण था।
याचिकाकर्ता का मामला कैटेगरी 2(c) और 3(b) के बीच वर्गीकरण से जुड़ा था। एक में 26 साल और दूसरी में 22 साल की अवधि निर्धारित थी।
यदि उसके मामले के तथ्य कैटेगरी 3(b) के अनुरूप आते हैं, तो उसे केवल इसलिए अधिक कठोर कैटेगरी में रखना उचित नहीं होगा कि दोनों श्रेणियों के बीच व्याख्या में कोई अस्पष्टता या ओवरलैप मौजूद है।
चार साल का अंतर क्यों महत्वपूर्ण है?
पहली नजर में चार साल का अंतर केवल एक संख्या लग सकता है, लेकिन जेल में बंद किसी दोषी के लिए इसका सीधा संबंध उसकी वास्तविक रिहाई के समय से हो सकता है।
कैटेगरी 2(c) के तहत 26 साल की अवधि पूरी करनी थी, जबकि कैटेगरी 3(b) के तहत 22 साल की अवधि थी।
इसलिए यदि किसी दोषी का मामला वास्तव में 3(b) में आता है तो उसे 2(c) में रखने का अर्थ होगा कि वह चार साल तक उस लाभ से वंचित रह सकता है जो संबंधित गाइडलाइन के तहत उसे मिल सकता था।
यही कारण है कि हाईकोर्ट ने कैटेगरी के निर्धारण को केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं माना, बल्कि इसे दोषी के अधिकारों और समय से पहले रिहाई की संभावना से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न माना।
अदालत ने क्या अंतिम आदेश दिया?
मामले के तथ्यों और ‘Family Feud’ की व्याख्या पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की रिट याचिका मंजूर कर ली।
अदालत ने माना कि मामले की परिस्थितियां 2010 की गाइडलाइंस की कैटेगरी 3(b) के अंतर्गत आती हैं।
इसके बाद संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता को कैटेगरी 3(b) के तहत रखा जाए।
इसका परिणाम यह हुआ कि उसके मामले में समय से पहले रिहाई पर विचार के लिए 22 साल वाली श्रेणी लागू होगी, न कि 26 साल वाली कैटेगरी 2(c)।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि कैटेगरी बदलने का अर्थ यह नहीं है कि दोषी को अदालत ने तत्काल या स्वतः रिहा करने का आदेश दे दिया। इसका संबंध उस नीति के तहत पात्रता और समय से पहले रिहाई पर विचार किए जाने वाली श्रेणी से है। संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया और अन्य लागू शर्तें अपनी जगह बनी रहती हैं।
अदालत की व्याख्या क्यों महत्वपूर्ण है?
इस फैसले का महत्व केवल एक दोषी की रिहाई की अवधि से नहीं जुड़ा है। अदालत ने ‘Family Feud’ जैसे शब्द की व्याख्या करते हुए उसके दायरे को स्पष्ट किया है।
कानून में कई बार किसी नीति या सरकारी आदेश में इस्तेमाल किए गए शब्दों का अर्थ पूरे मामले के परिणाम को प्रभावित कर सकता है। यहां भी ‘पारिवारिक झगड़े’ की व्याख्या सीधे इस बात से जुड़ी थी कि दोषी को किस श्रेणी में रखा जाए।
अगर Family Feud का अर्थ केवल पीढ़ियों से चली आ रही दुश्मनी माना जाता, तो याचिकाकर्ता की स्थिति अलग हो सकती थी। लेकिन अदालत ने परिवार और पारिवारिक विवाद की व्यापक अवधारणा को स्वीकार किया।
परिवार का अर्थ केवल खून का रिश्ता नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘परिवार’ शब्द का अर्थ व्यापक है।
परिवार में केवल प्रत्यक्ष रक्त संबंध ही शामिल नहीं होते। विवाह या रिश्तेदारी के माध्यम से जुड़े लोग भी पारिवारिक संबंध की व्यापक अवधारणा में आ सकते हैं।
इससे यह समझने में मदद मिलती है कि अदालत ने Family Feud को केवल दो व्यक्तियों के बीच व्यक्तिगत दुश्मनी के रूप में नहीं देखा। यदि विवाद का आधार पारिवारिक संबंधों से जुड़ा है और उसी से रंजिश पैदा होकर अपराध तक पहुंचती है, तो उसके संदर्भ को ध्यान में रखना जरूरी है।
क्या इसका मतलब दोषी को हमेशा उदारता मिलेगी?
नहीं।
फैसले में जिस सिद्धांत की चर्चा की गई है, वह यह नहीं कहता कि किसी भी अपराध में दोषी को केवल पारिवारिक विवाद का हवाला देकर अधिक लाभ वाली श्रेणी मिल जाएगी।
पहले यह देखना होगा कि मामले के तथ्य वास्तव में संबंधित श्रेणी की शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने तथ्यों की जांच करने के बाद माना कि याचिकाकर्ता और उसके बेटे की शिकायतकर्ता तथा उसकी बेटी के प्रति रंजिश पारिवारिक विवाद की पृष्ठभूमि से जुड़ी थी।
इसलिए कैटेगरी 3(b) लागू की गई।
गाइडलाइंस की व्याख्या में संतुलन जरूरी
सरकारी नीतियों और गाइडलाइंस में अलग-अलग अपराधों तथा परिस्थितियों के लिए अलग-अलग श्रेणियां बनाई जाती हैं। प्रशासन को किसी दोषी को संबंधित श्रेणी में रखने से पहले उसके मामले के वास्तविक तथ्यों को देखना होता है।
यदि किसी मामले के तथ्य दो अलग-अलग श्रेणियों के बीच आते हैं, तो वर्गीकरण का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि यदि तथ्यों के आधार पर एक से अधिक कैटेगरी संभव हों और उनमें से कोई कैटेगरी दोषी के लिए अधिक लाभकारी हो, तो लागू कानूनी सिद्धांतों के अनुसार उस अधिक लाभ वाली कैटेगरी पर विचार किया जाना चाहिए।
यह सिद्धांत प्रशासनिक निर्णय को मनमाना होने से रोकने की दिशा में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
फैसले का व्यापक कानूनी संदेश
Devidas v. State of Maharashtra मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी से दो प्रमुख बातें सामने आती हैं।
पहली, ‘Family Feud’ को केवल पीढ़ियों पुरानी दुश्मनी तक सीमित नहीं किया जा सकता। एक ही पीढ़ी के परिवार के सदस्यों के बीच हुआ पुराना विवाद भी इस अवधारणा के अंतर्गत आ सकता है, यदि वही बाद में अपराध का कारण बना हो।
दूसरी, यदि किसी सरकारी गाइडलाइन के तहत मामले के तथ्य एक से अधिक श्रेणियों में आते हैं, तो दोषी के लिए अधिक लाभ वाली श्रेणी को लागू करने के सिद्धांत पर विचार किया जाना चाहिए।
इस मामले में इन्हीं दोनों पहलुओं को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को कैटेगरी 3(b) के तहत रखने का निर्देश दिया।
निष्कर्ष
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला दिखाता है कि किसी मामले में इस्तेमाल किए गए एक छोटे से शब्द की कानूनी व्याख्या भी दोषी की रिहाई से जुड़े महत्वपूर्ण परिणाम पैदा कर सकती है।
‘Family Feud’ का मतलब हमेशा कई पीढ़ियों से चली आ रही दुश्मनी नहीं होता। यदि एक ही पीढ़ी के परिवार के सदस्यों के बीच पहले से विवाद और रंजिश मौजूद थी और बाद में उसी पृष्ठभूमि में अपराध हुआ, तो परिस्थितियों के आधार पर उसे पारिवारिक झगड़ा माना जा सकता है।
वहीं, समय से पहले रिहाई से जुड़ी सरकारी गाइडलाइंस लागू करते समय प्रशासन को मामले के वास्तविक तथ्यों और संबंधित श्रेणी की शर्तों पर ध्यान देना होगा।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता और उसके बेटे की शिकायतकर्ता तथा उसकी बेटी के प्रति रंजिश की पृष्ठभूमि पारिवारिक विवाद से जुड़ी थी। इसलिए उसका मामला 2010 की गाइडलाइंस की कैटेगरी 3(b) में आता है।
अदालत ने इसी आधार पर रिट याचिका मंजूर करते हुए अधिकारियों को याचिकाकर्ता को कैटेगरी 3(b) के तहत रखने का निर्देश दिया। इस श्रेणी में समय से पहले रिहाई पर विचार के लिए छूट समेत 22 साल की सजा की अवधि लागू होती है, जबकि जिस कैटेगरी में उसे पहले रखा गया था, उसमें यह अवधि 26 साल थी।
इस तरह फैसला केवल ‘पारिवारिक झगड़े’ की परिभाषा स्पष्ट करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस बात को भी रेखांकित करता है कि जब सरकारी गाइडलाइंस की एक से अधिक श्रेणियां किसी मामले के तथ्यों पर लागू हो सकती हों, तो संबंधित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार दोषी के लिए अधिक लाभ वाली श्रेणी पर विचार किया जाना चाहिए।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
यह आलेख केवल शैक्षणिक, विधिक जागरूकता और अध्ययन के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इसे आधिकारिक कानूनी सलाह न माना जाए। किसी भी वास्तविक मामले में संबंधित न्यायालय या विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।