गलत काम देखकर आखिर क्यों टूटती है चुप्पी? सरकारी कर्मचारियों पर रिसर्च ने बताया आवाज उठाने के पीछे छिपा असली कारण
दफ्तर में किसी सहकर्मी को गलत काम करते हुए देखना और उसके खिलाफ आवाज उठाना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। किसी कर्मचारी को यह पता हो सकता है कि उसके सामने जो हो रहा है वह नियमों के खिलाफ है, गलत है या संस्था के हित में नहीं है, फिर भी वह शिकायत करने का फैसला नहीं लेता। कई बार नौकरी का डर, वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव, सहकर्मियों से संबंध खराब होने की आशंका और भविष्य में बदले की कार्रवाई का डर कर्मचारी को चुप रहने के लिए मजबूर कर देता है।
खासकर सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में यह स्थिति और जटिल हो सकती है। यहां किसी अनियमितता या गलत काम के खिलाफ शिकायत करने वाले कर्मचारी को यह चिंता सताती रहती है कि कहीं उसका नाम सामने न आ जाए, उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई न शुरू हो जाए या कार्यालय में उसका काम करना मुश्किल न हो जाए।
लेकिन आखिर ऐसी कौन-सी चीज है जो किसी कर्मचारी को इस डर के बावजूद आवाज उठाने के लिए प्रेरित करती है?
ट्रिपल आईटी नवा रायपुर के प्रोफेसर डॉ. अमित कुमार अग्रवाल और छात्रा ऋषिका बघेल ने इसी सवाल को समझने की कोशिश की है। भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के 243 सरकारी कर्मचारियों पर किए गए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह जानने का प्रयास किया कि किसी कर्मचारी के भीतर गलत काम के खिलाफ शिकायत करने या आवाज उठाने की इच्छा कैसे पैदा होती है।
शोध में सामने आया कि केवल यह जान लेना कि कोई सहकर्मी गलत काम कर रहा है, कर्मचारी को शिकायत करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित नहीं करता। इसके पीछे एक गहरी भावनात्मक प्रक्रिया काम करती है। जब गलत काम देखने वाले व्यक्ति के भीतर बेचैनी, असहजता और आत्मग्लानि पैदा होने लगती है, तब उसके चुप रहने की क्षमता कमजोर पड़ने लगती है।
यानी गलत काम के खिलाफ आवाज उठाने की शुरुआत कई बार नियमों की किताब से नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर चल रही नैतिक और भावनात्मक उथल-पुथल से होती है।
243 सरकारी कर्मचारियों पर किया गया अध्ययन
इस शोध में भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के 243 कर्मचारियों को शामिल किया गया। इनमें 131 पुरुष और 112 महिलाएं थीं। पुरुषों की हिस्सेदारी 53.9 प्रतिशत और महिलाओं की 46.1 प्रतिशत रही।
अध्ययन में अलग-अलग आयु वर्ग के कर्मचारियों को शामिल किया गया था। सबसे बड़ा समूह 26 से 35 वर्ष की उम्र वाले कर्मचारियों का था। इस आयुवर्ग में 113 कर्मचारी, यानी 46.5 प्रतिशत प्रतिभागी शामिल थे।
इसके अलावा 18 से 25 वर्ष की उम्र के 50 कर्मचारी अध्ययन का हिस्सा बने, जिनकी हिस्सेदारी 20.6 प्रतिशत थी। 36 से 45 वर्ष की उम्र वाले कर्मचारियों की संख्या 42 यानी 17.3 प्रतिशत रही।
46 से 55 वर्ष की उम्र के 29 कर्मचारी, यानी 11.9 प्रतिशत प्रतिभागी शामिल हुए, जबकि 56 वर्ष से अधिक उम्र के 9 कर्मचारी अध्ययन में शामिल थे। इस अंतिम समूह की हिस्सेदारी 3.7 प्रतिशत थी।
इस तरह शोध में अलग-अलग आयु वर्ग और दोनों लिंगों के कर्मचारियों को शामिल कर यह समझने की कोशिश की गई कि कार्यस्थल पर गलत व्यवहार या अनियमितता देखने के बाद व्यक्ति के भीतर किस तरह की मानसिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा होती है।
गलत काम पता होना और शिकायत करना एक बात नहीं
अक्सर यह माना जाता है कि अगर किसी कर्मचारी को पता है कि उसके सामने गलत काम हो रहा है तो वह इसकी शिकायत जरूर करेगा। लेकिन शोध इस धारणा को पूरी तरह सरल नहीं मानता।
किसी गलत काम को पहचान लेना पहला चरण है। कर्मचारी यह समझ सकता है कि किसी नियम का उल्लंघन हो रहा है या संस्था के हितों के खिलाफ कोई गतिविधि की जा रही है। लेकिन इसके बाद सवाल आता है कि वह इसके खिलाफ कुछ करेगा या नहीं।
यहीं से व्यक्ति के भीतर कई तरह के सवाल पैदा होते हैं।
अगर मैंने शिकायत की तो क्या होगा?
क्या वरिष्ठ अधिकारी मेरा साथ देंगे?
क्या शिकायत करने के बाद मेरे सहकर्मी मुझसे नाराज हो जाएंगे?
क्या मेरे खिलाफ कोई कार्रवाई की जा सकती है?
क्या मुझे भविष्य में इसका नुकसान उठाना पड़ेगा?
इन सवालों के कारण कई कर्मचारी गलत काम देखने के बावजूद चुप रहना पसंद करते हैं।
शोध के अनुसार केवल नैतिक रूप से गलत काम को पहचान लेना शिकायत करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे व्यक्ति की भावनात्मक प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जब अंदर की बेचैनी बढ़ने लगती है
मान लीजिए किसी कर्मचारी को पता चलता है कि उसके सामने कोई नियम तोड़ा जा रहा है। पहली प्रतिक्रिया हो सकती है कि वह इसे गलत माने। लेकिन अगर वह इस घटना को नजरअंदाज कर देता है और रोजमर्रा की तरह काम करता रहता है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे एक असहजता पैदा हो सकती है।
वह खुद से सवाल कर सकता है कि उसने कुछ किया क्यों नहीं।
यहीं से नैतिक असहजता या आत्मग्लानि जैसी भावना जन्म ले सकती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार यही भावनात्मक दबाव कई बार कर्मचारी को चुप्पी तोड़ने की दिशा में ले जाता है। जब व्यक्ति के लिए अपने व्यवहार और अपने नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना मुश्किल होने लगता है, तो वह उस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता खोजता है।
ऐसे में शिकायत करना या गलत काम के खिलाफ आवाज उठाना उस व्यक्ति के लिए केवल दूसरे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं रह जाता, बल्कि अपने भीतर के तनाव को कम करने का एक तरीका भी बन सकता है।
मोरल सेल्फ-रेगुलेशन थ्योरी से समझी गई प्रक्रिया
प्रोफेसर अमित अग्रवाल के अनुसार यह शोध मोरल सेल्फ-रेगुलेशन थ्योरी पर आधारित है।
सरल भाषा में समझें तो इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति अपने नैतिक मूल्यों और अपने व्यवहार के बीच एक संतुलन बनाए रखना चाहता है।
हर व्यक्ति अपने बारे में एक धारणा रखता है। वह खुद को ईमानदार, जिम्मेदार या नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति समझ सकता है। ऐसे में जब वह अपने आसपास किसी गलत काम को देखता है, तो उसके सामने एक नैतिक स्थिति पैदा होती है।
एक तरफ वह जानता है कि जो हो रहा है वह गलत है। दूसरी तरफ वह किसी डर, दबाव या व्यक्तिगत कारण से उसके खिलाफ कदम नहीं उठाता।
यहीं से अंदरूनी खींचतान शुरू होती है।
व्यक्ति के सामने दो अलग-अलग स्थितियां होती हैं। पहली, उसका दिमाग यह पहचान रहा है कि गलत काम हो रहा है। दूसरी, उसका व्यवहार उसे चुप रहने के लिए मजबूर कर रहा है।
यह अंतर जितना बढ़ता है, मानसिक दबाव भी उतना ही बढ़ सकता है।
दिमाग कहता है गलत है, लेकिन व्यवहार चुप रहने को मजबूर करता है
शोध की सबसे दिलचस्प बात इसी विरोधाभास से जुड़ी है।
एक कर्मचारी किसी अनियमितता को देखकर मन ही मन कह सकता है कि यह गलत है। लेकिन उसी समय वह यह भी सोच सकता है कि इसमें हस्तक्षेप करना उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
उसे अपने परिवार की जिम्मेदारियां याद आ सकती हैं। नौकरी की सुरक्षा का सवाल सामने आ सकता है। वरिष्ठ अधिकारी से संबंध खराब होने का डर हो सकता है। साथ काम करने वाले कर्मचारियों के बीच अलग-थलग पड़ने की आशंका भी हो सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारी अपनी जानकारी के बावजूद चुप रह सकता है।
लेकिन अगर भीतर की बेचैनी लगातार बढ़ती रहे तो स्थिति बदल सकती है। वह यह महसूस करने लगता है कि केवल चुप रहना भी उसके लिए आसान नहीं है।
यहीं भावनात्मक असंतुलन आवाज उठाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भावनात्मक असंतुलन का असर ज्यादा गहरा
शोध से जुड़े निष्कर्षों के अनुसार केवल दिमागी स्तर पर यह समझना कि कोई काम गलत है, कर्मचारी को कार्रवाई के लिए प्रेरित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
ऋषिका बघेल के अनुसार भावनात्मक असंतुलन का प्रभाव अधिक गहरा हो सकता है।
जब कर्मचारी यह महसूस करता है कि उसने अपनी आंखों के सामने गलत होते देखा, लेकिन इसके बावजूद वह कुछ नहीं कर पाया, तो उसके भीतर आत्मग्लानि पैदा हो सकती है।
यह भावना धीरे-धीरे उसे परेशान करने लगती है।
वह सोच सकता है कि अगर उसने शिकायत नहीं की तो क्या वह खुद भी उस गलत व्यवस्था का हिस्सा बन रहा है?
यही सवाल कई बार व्यक्ति को चुप्पी तोड़ने की तरफ धकेल सकता है।
इस तरह आवाज उठाना केवल बाहरी दबाव का परिणाम नहीं होता। कई मामलों में व्यक्ति के भीतर चल रही नैतिक लड़ाई भी उसके फैसले को प्रभावित करती है।
सरकारी संस्थानों में स्थिति क्यों ज्यादा जटिल हो सकती है?
सरकारी संस्थानों में पदानुक्रम यानी हायरार्की की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के बीच स्पष्ट प्रशासनिक संबंध होते हैं।
ऐसे माहौल में किसी वरिष्ठ कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ शिकायत करना आसान फैसला नहीं होता।
कर्मचारी के सामने कई व्यावहारिक चिंताएं होती हैं। उसे लग सकता है कि शिकायत करने के बाद उसके काम का माहौल बदल सकता है। उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से हटाया जा सकता है, उसके साथ सहयोग कम हो सकता है या कार्यालय में उसके संबंध खराब हो सकते हैं।
हर मामले में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन शिकायत करने वाले कर्मचारी के मन में इस तरह की आशंकाएं जरूर हो सकती हैं।
यही डर कई बार उस नैतिक बेचैनी के बावजूद कर्मचारी को चुप रहने के लिए मजबूर कर देता है।
सिर्फ नियम बना देने से नहीं बदलेगा माहौल
शोधकर्ताओं का मानना है कि संस्थानों में केवल शिकायत की व्यवस्था बना देना पर्याप्त नहीं है।
यदि कर्मचारी को यह भरोसा नहीं है कि शिकायत करने के बाद उसे सुरक्षा मिलेगी, तो वह व्यवस्था होने के बावजूद उसका इस्तेमाल करने से बच सकता है।
इसलिए संस्थानों को ऐसी प्रणाली विकसित करने की जरूरत है जिसमें कर्मचारी बिना अनावश्यक डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें।
शिकायत की गोपनीयता, निष्पक्ष जांच और शिकायतकर्ता के खिलाफ प्रतिशोध से सुरक्षा जैसे पहलू इसमें महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
किसी कर्मचारी को यह भरोसा होना चाहिए कि अगर उसने ईमानदारी से किसी अनियमितता की जानकारी दी है तो उसके खिलाफ सिर्फ इसलिए कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि उसने गलत काम की ओर ध्यान दिलाया।
नैतिक प्रशिक्षण की भी जरूरत
शोध से निकलने वाला एक और महत्वपूर्ण पहलू कर्मचारियों का नैतिक प्रशिक्षण है।
किसी भी संस्थान में नियमों की जानकारी जरूरी है, लेकिन केवल नियम जानना पर्याप्त नहीं है। कर्मचारियों को यह भी समझना जरूरी है कि अनियमितता या गलत व्यवहार सामने आने पर उपलब्ध शिकायत तंत्र का इस्तेमाल कैसे किया जाए।
नैतिक प्रशिक्षण कर्मचारियों को कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने में मदद कर सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी कर्मचारी को किसी अनियमितता का संदेह है तो उसे तुरंत सार्वजनिक आरोप लगाने के बजाय उचित विभागीय प्रक्रिया के माध्यम से शिकायत करने का तरीका पता होना चाहिए।
इससे शिकायत व्यवस्था अधिक व्यवस्थित और प्रभावी हो सकती है।
शिकायत करने वाला कर्मचारी हमेशा नायक जैसा क्यों नहीं दिखता?
बाहर से देखने पर किसी गलत काम के खिलाफ शिकायत करना साहसिक कदम लग सकता है। लेकिन उस कर्मचारी के लिए यह फैसला कई बार बेहद कठिन होता है।
वह उसी कार्यालय में काम करता है। उसे उन्हीं लोगों के साथ रोज मिलना होता है। जिनके खिलाफ शिकायत की है, उनके साथ उसके प्रशासनिक या व्यक्तिगत संबंध हो सकते हैं।
इसलिए शिकायत करने से पहले व्यक्ति केवल यह नहीं सोचता कि गलत क्या है। वह यह भी सोचता है कि शिकायत के बाद उसकी अपनी जिंदगी और नौकरी पर क्या असर पड़ेगा।
यही वजह है कि किसी संस्थान में मजबूत व्हिसलब्लोअर व्यवस्था केवल नियमों से नहीं बनती। इसके लिए भरोसे का माहौल भी जरूरी है।
चुप्पी भी कई बार एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है
गलत काम देखने के बाद चुप रहना हमेशा यह नहीं बताता कि कर्मचारी उस काम का समर्थन करता है।
कई बार चुप्पी डर से पैदा होती है। कभी नौकरी का दबाव कारण बनता है, कभी वरिष्ठों का प्रभाव और कभी यह चिंता कि अकेले आवाज उठाने से कुछ बदलेगा भी या नहीं।
लेकिन अगर यही चुप्पी व्यक्ति के भीतर नैतिक बेचैनी पैदा करने लगे तो स्थिति बदल सकती है।
यही वह बिंदु है जिस पर इस शोध का ध्यान जाता है। गलत काम की पहचान और उसके खिलाफ कार्रवाई के बीच एक भावनात्मक प्रक्रिया काम करती है।
संस्थानों के लिए क्या है सबसे बड़ी सीख?
इस शोध का महत्व केवल यह समझने में नहीं है कि कर्मचारी शिकायत क्यों करते हैं। इससे संस्थानों के लिए भी कई सवाल निकलते हैं।
अगर कोई कर्मचारी गलत काम देखता है और उसके भीतर बेचैनी पैदा होती है, लेकिन फिर भी वह शिकायत नहीं करता, तो समस्या केवल कर्मचारी की नहीं हो सकती।
संस्था को यह देखना होगा कि क्या उसकी शिकायत प्रणाली भरोसेमंद है? क्या कर्मचारी को लगता है कि उसकी बात सुनी जाएगी? क्या जांच निष्पक्ष होगी? क्या शिकायत के बाद उसके साथ भेदभाव नहीं होगा?
यदि इन सवालों का जवाब सकारात्मक है तो कर्मचारियों के लिए गलत काम के खिलाफ आवाज उठाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
सुरक्षित माहौल से मजबूत हो सकती है शिकायत व्यवस्था
किसी सरकारी या सार्वजनिक संस्थान में पारदर्शी वातावरण केवल भ्रष्टाचार या अनियमितता रोकने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। यह कर्मचारियों के मनोबल के लिए भी जरूरी है।
जब कर्मचारी यह जानते हैं कि गलत काम की शिकायत करने पर उनकी पहचान और अधिकारों की रक्षा की जाएगी, तो उनके भीतर कार्रवाई करने का भरोसा बढ़ सकता है।
इसके विपरीत यदि शिकायत करने वाले कर्मचारी को ही परेशानी का सामना करना पड़े तो बाकी कर्मचारी भी भविष्य में चुप रहना पसंद कर सकते हैं।
इसलिए संस्थागत व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें ईमानदार शिकायत को खतरे के रूप में नहीं बल्कि सुधार के अवसर के रूप में देखा जाए।
आखिर क्यों टूटती है चुप्पी?
243 कर्मचारियों पर आधारित इस अध्ययन से सामने आने वाली तस्वीर को सरल शब्दों में समझें तो किसी गलत काम को देखकर कर्मचारी के भीतर कई चरणों में प्रतिक्रिया विकसित हो सकती है।
पहले वह गलत काम को पहचानता है। फिर वह अपने विकल्पों पर विचार करता है। नौकरी और संबंधों से जुड़े जोखिमों को तौलता है। कई बार वह चुप रह जाता है।
लेकिन अगर भीतर यह भावना मजबूत होती जाती है कि उसने गलत होते देखकर कुछ नहीं किया, तो नैतिक और भावनात्मक दबाव बढ़ सकता है। आत्मग्लानि और बेचैनी उसे कार्रवाई की ओर धकेल सकती है।
यानी किसी कर्मचारी का व्हिसलब्लोअर बनना केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसे गलत और सही का ज्ञान है। उसके भीतर उस ज्ञान से पैदा होने वाली भावनात्मक प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
निष्कर्ष
कार्यस्थल पर गलत काम के खिलाफ आवाज उठाना केवल नियमों और प्रक्रियाओं का विषय नहीं है। इसके पीछे इंसान की सोच, उसका नैतिक दृष्टिकोण, डर, जिम्मेदारी और भावनाएं भी काम करती हैं।
ट्रिपल आईटी नवा रायपुर के प्रोफेसर डॉ. अमित कुमार अग्रवाल और ऋषिका बघेल के अध्ययन ने इसी प्रक्रिया को समझने की कोशिश की है। 243 सरकारी कर्मचारियों पर आधारित शोध में यह सामने आया कि गलत काम की जानकारी होना अपने आप शिकायत करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
जब व्यक्ति के भीतर गलत और सही के बीच पैदा हुआ अंतर भावनात्मक बेचैनी और आत्मग्लानि का रूप लेने लगता है, तब चुप्पी टूटने की संभावना बढ़ती है।
लेकिन यहां संस्थानों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कर्मचारी को यह भरोसा ही न हो कि आवाज उठाने के बाद उसकी सुरक्षा होगी, तो उसकी नैतिक बेचैनी भी उसे कार्रवाई के लिए प्रेरित नहीं कर पाएगी।
इसलिए किसी भी सरकारी या सार्वजनिक संस्था के लिए सबसे जरूरी बात केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि ऐसा कार्य वातावरण तैयार करना है जहां कर्मचारी गलत को गलत कह सके और शिकायत करने पर खुद को असुरक्षित महसूस न करे।
आखिरकार, किसी संस्थान में ईमानदारी केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितने नियम लिखे गए हैं। असली परीक्षा तब होती है जब कोई कर्मचारी उन नियमों के उल्लंघन को अपनी आंखों से देखता है—और उसे यह भरोसा होता है कि सच बोलने की कीमत उसे अकेले नहीं चुकानी पड़ेगी।
एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)
वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes
भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।
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