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पति-पत्नी का अलग रहना हर बार मानसिक क्रूरता नहीं, तलाक के लिए ठोस सबूत जरूरी: झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला

पति-पत्नी का अलग रहना हर बार मानसिक क्रूरता नहीं, तलाक के लिए ठोस सबूत जरूरी: झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला

        वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में अक्सर पति-पत्नी के बीच बढ़ती दूरी, अलग-अलग रहना, बातचीत कम होना या ससुराल पक्ष के साथ विवाद को तलाक के आधार के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन क्या पति-पत्नी के बीच ऐसी हर स्थिति को मानसिक क्रूरता माना जा सकता है? झारखंड हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि पत्नी उसी मकान में पति से अलग रह रही है, दोनों के बीच वैवाहिक संबंधों में दूरी है या पति के परिजनों के साथ उसके संबंध खराब हैं, इसे अपने आप मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। तलाक के लिए क्रूरता का आरोप लगाने वाले पक्ष को उसे ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए साबित करना होगा।

हाई कोर्ट ने इसी आधार पर पति की तलाक संबंधी अपील को खारिज कर दिया और रांची फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पति की तलाक की याचिका पहले ही खारिज की जा चुकी थी।

अदालत की टिप्पणी का महत्व इसलिए भी है क्योंकि वैवाहिक जीवन में मतभेद और वास्तविक मानसिक क्रूरता के बीच अंतर करना जरूरी है। पति-पत्नी के बीच होने वाली हर असहमति या घरेलू विवाद को तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक डॉक्टर पति और सहायक प्रोफेसर पत्नी के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति का नाम डॉ. मयंक और पत्नी का नाम रीमा बताया गया है। दोनों का विवाह 28 जुलाई 2011 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुआ था। बाद में दोनों ने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार भी विवाह किया।

विवाह के कुछ समय बाद दोनों के संबंधों में विवाद उत्पन्न होने लगे। पति का आरोप था कि पत्नी का व्यवहार उसके और उसके परिवार के प्रति ठीक नहीं था। धीरे-धीरे पति-पत्नी के बीच दूरी बढ़ती गई और वैवाहिक जीवन सामान्य तरीके से नहीं चल सका।

आखिरकार पति ने विवाह विच्छेद के लिए अदालत का रुख किया। उसने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27(1)(डी) के तहत क्रूरता को तलाक का आधार बनाया।

पति की ओर से कई आरोप लगाए गए। इनमें पत्नी द्वारा पति के वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ कथित दुर्व्यवहार, वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार और पति से अलग रहना जैसे आरोप शामिल थे।

पति ने पत्नी पर क्या आरोप लगाए?

पति की ओर से अदालत में कहा गया कि शादी के बाद पत्नी के व्यवहार के कारण उसे मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा।

पति का दावा था कि वर्ष 2012 के बाद दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं रहा। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी वैवाहिक संबंध बनाने के लिए तैयार नहीं होती थी।

इसके अलावा पति का आरोप था कि पत्नी उसी मकान में रहते हुए उससे अलग चूल्हा-चौका चलाती थी। दोनों के बीच सामान्य बातचीत भी नहीं होती थी।

पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी उसके वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती थी। उसके अनुसार, इन परिस्थितियों ने उसके वैवाहिक जीवन को प्रभावित किया और उसे मानसिक परेशानी से गुजरना पड़ा।

पति की ओर से यह भी कहा गया कि इन घरेलू परिस्थितियों का असर उसकी पढ़ाई और करियर पर पड़ा।

इन तमाम परिस्थितियों को आधार बनाकर पति ने अदालत से विवाह समाप्त करने की मांग की।

फैमिली कोर्ट ने तलाक देने से क्यों किया इनकार?

मामला रांची फैमिली कोर्ट के सामने पहुंचा। वहां दोनों पक्षों की दलीलें और उनके द्वारा पेश किए गए साक्ष्य देखे गए।

फैमिली कोर्ट ने 20 मार्च 2023 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने पति की ओर से लगाए गए आरोपों को तलाक के लिए पर्याप्त नहीं माना। इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी।

हाई कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पति द्वारा बताई गई परिस्थितियां कानूनी रूप से इतनी गंभीर थीं कि उन्हें मानसिक क्रूरता माना जाए और उनके आधार पर विवाह विच्छेद किया जा सके?

हाई कोर्ट ने क्रूरता को लेकर क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मतभेद और मानसिक क्रूरता के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना।

अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच होने वाली हर छोटी-बड़ी परेशानी को क्रूरता नहीं कहा जा सकता। वैवाहिक जीवन में स्वभाव अलग होना, विचारों में असहमति होना या किसी मुद्दे पर मतभेद होना असामान्य नहीं है।

यदि पति-पत्नी किसी बात पर सहमत नहीं हैं या उनके बीच दूरी पैदा हो गई है, तो केवल इसी आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एक पक्ष दूसरे के प्रति मानसिक क्रूरता कर रहा है।

अदालत के अनुसार, क्रूरता का स्तर ऐसा होना चाहिए जिससे परिस्थितियों को देखते हुए पति-पत्नी का साथ रहना उचित रूप से असंभव हो जाए।

यानी तलाक मांगने वाले पक्ष को यह दिखाना होगा कि सामने वाले व्यक्ति के व्यवहार का प्रभाव केवल सामान्य वैवाहिक असहमति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह इतना गंभीर था कि वैवाहिक संबंध को जारी रखना मुश्किल हो गया।

एक ही घर में अलग रहना अपने आप में क्रूरता नहीं

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू एक ही घर में रहते हुए पति-पत्नी का अलग-अलग रहना है।

पति का आरोप था कि पत्नी एक ही मकान में रहते हुए अलग चूल्हा-चौका चलाती थी और उससे बातचीत नहीं करती थी।

हाई कोर्ट ने ऐसी परिस्थितियों को अपने आप मानसिक क्रूरता मानने से इनकार किया।

इसका मतलब यह नहीं है कि पति-पत्नी के बीच लंबे समय तक अलगाव या संवादहीनता कभी तलाक का आधार नहीं बन सकती। बल्कि अदालत का जोर इस बात पर था कि ऐसी परिस्थिति को क्रूरता साबित करने के लिए उसके पूरे संदर्भ, कारण और उपलब्ध साक्ष्यों को देखा जाना आवश्यक है।

किसी वैवाहिक विवाद में एक घटना या घरेलू व्यवस्था को अलग करके देखने के बजाय यह देखना जरूरी होता है कि पूरे वैवाहिक जीवन की परिस्थितियां क्या थीं और आरोप किस स्तर तक साबित हुए हैं।

ससुराल वालों से विवाद को लेकर भी अहम टिप्पणी

पति की ओर से पत्नी पर अपने वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार का आरोप भी लगाया गया था।

लेकिन केवल आरोप लगाए जाने से अदालत के सामने क्रूरता सिद्ध नहीं हो जाती। जिस पक्ष की ओर से क्रूरता का आरोप लगाया जाता है, उसी पक्ष को आवश्यक साक्ष्यों के माध्यम से अपने दावे को स्थापित करना होता है।

यही कारण है कि हाई कोर्ट ने मामले में आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ उनके समर्थन में मौजूद साक्ष्यों को भी महत्व दिया।

वैवाहिक मामलों में पति या पत्नी के परिवार के सदस्यों के साथ विवाद होना अपने आप तलाक का आधार नहीं बन जाता। अदालत यह देखती है कि विवाद की प्रकृति क्या थी, व्यवहार कितना गंभीर था और क्या उपलब्ध साक्ष्यों से लगाए गए आरोप विश्वसनीय तरीके से साबित होते हैं।

पत्नी ने आरोपों से किया था इनकार

दूसरी ओर पत्नी ने पति के आरोपों को स्वीकार नहीं किया।

पत्नी की ओर से अलग कहानी अदालत के सामने रखी गई। उसने दावा किया कि विवाह के समय उसके पिता की ओर से 10 लाख रुपये दिए गए थे। इसके बावजूद उस पर पढ़ाई के नाम पर पैसे की मांग किए जाने का आरोप था।

पत्नी ने यह भी दावा किया कि उसने पति की पढ़ाई के लिए ऋण लेने में सहयोग किया था और ससुराल की देखभाल भी की।

उसकी ओर से पति के खिलाफ प्रताड़ना के आरोप भी लगाए गए और इस संबंध में बरियातू थाने में मामला दर्ज कराने की बात कही गई।

इस तरह अदालत के सामने दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ अलग-अलग आरोप और दावे रखे गए।

पत्नी ने कहा—वह आज भी पति के साथ रहना चाहती है

मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह था कि पत्नी ने अदालत के सामने यह बात कही कि वह अभी भी अपने पति के साथ रहना चाहती है।

उसका कहना था कि वह वैवाहिक संबंध को समाप्त नहीं करना चाहती और पति के साथ रहने के लिए तैयार है।

ऐसी स्थिति में अदालत के सामने यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या उपलब्ध साक्ष्य इतने गंभीर हैं कि विवाह को समाप्त करने का कानूनी आधार बन जाए।

हाई कोर्ट ने अंततः पति की अपील को स्वीकार नहीं किया और फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

क्रूरता साबित करने की जिम्मेदारी किसकी है?

अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत पर भी जोर दिया—जो व्यक्ति क्रूरता का आरोप लगाकर तलाक मांग रहा है, उसे उस आरोप को साबित करना होगा।

सिर्फ आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है।

उदाहरण के लिए यदि कोई पति यह कहता है कि पत्नी मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थी, तो उसे ऐसी परिस्थितियां और साक्ष्य अदालत के सामने रखने होंगे, जिनसे आरोप की गंभीरता और वास्तविकता स्थापित हो सके।

इसी तरह पत्नी भी यदि पति पर क्रूरता का आरोप लगाती है तो उसे भी अपने आरोपों को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होगा।

अदालत केवल आरोपों की संख्या या भाषा की गंभीरता देखकर विवाह समाप्त नहीं करती। न्यायालय पूरे मामले के तथ्यों और साक्ष्यों को देखता है।

हर वैवाहिक मतभेद को तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता

आज के समय में पति-पत्नी के बीच मतभेद होना कोई असामान्य बात नहीं है। अलग-अलग पारिवारिक पृष्ठभूमि, नौकरी, आर्थिक परिस्थितियां, रहने की व्यवस्था और व्यक्तिगत सोच के कारण वैवाहिक जीवन में असहमति हो सकती है।

लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि हर मतभेद को मानसिक क्रूरता की श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

यदि पति-पत्नी कुछ समय के लिए अलग कमरे में रहते हैं, बातचीत कम हो जाती है या घरेलू जिम्मेदारियों को लेकर विवाद होता है, तो इन परिस्थितियों को उनके पूरे संदर्भ में देखना जरूरी है।

तलाक के लिए लगाए गए क्रूरता के आरोप की गंभीरता इस बात से तय होगी कि उसका वास्तविक प्रभाव क्या था और क्या वह कानूनी मानक को पूरा करता है।

मानसिक क्रूरता का मतलब केवल शारीरिक हिंसा नहीं

यह भी समझना जरूरी है कि मानसिक क्रूरता का अर्थ केवल मारपीट या शारीरिक हिंसा नहीं है। किसी व्यक्ति के गंभीर मानसिक उत्पीड़न, अपमान या ऐसे व्यवहार की परिस्थितियां भी कानून के तहत महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

लेकिन दूसरी ओर, मानसिक क्रूरता का आरोप भी केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वैवाहिक संबंध तनावपूर्ण हैं।

यही संतुलन इस मामले में हाई कोर्ट की टिप्पणी में दिखाई देता है। अदालत ने एक तरफ गंभीर क्रूरता की संभावना को नकारा नहीं, लेकिन दूसरी तरफ सामान्य वैवाहिक मतभेद को स्वतः मानसिक क्रूरता मानने से भी इनकार किया।

हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज की

पूरे मामले पर विचार करने के बाद झारखंड हाई कोर्ट ने पति की तलाक संबंधी अपील को खारिज कर दिया।

इसका परिणाम यह रहा कि रांची फैमिली कोर्ट का 20 मार्च 2023 का फैसला बरकरार रहा। यानी फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक की याचिका खारिज किए जाने का आदेश प्रभावी बना रहा।

अदालत के फैसले का व्यापक संदेश यही है कि विवाह विच्छेद के लिए क्रूरता का आधार इस्तेमाल करने वाले पक्ष को अपने आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों के साथ साबित करना होगा।

फैसले का आम वैवाहिक मामलों पर क्या असर?

इस फैसले को वैवाहिक विवादों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि हर मामला अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर तय होता है, लेकिन यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि अदालत वैवाहिक संबंधों में सामान्य असहमति और कानूनी अर्थ में क्रूरता के बीच अंतर करती है।

पति-पत्नी के बीच संबंध खराब होने का मतलब यह नहीं कि विवाह अपने आप समाप्त हो जाएगा। तलाक के लिए जिस कानूनी आधार का सहारा लिया जा रहा है, उसके आवश्यक तत्वों को साबित करना होता है।

इस मामले में पति ने पत्नी के अलग रहने, बातचीत नहीं करने, वैवाहिक संबंध से कथित इनकार और माता-पिता के साथ कथित दुर्व्यवहार जैसी परिस्थितियों का हवाला दिया था। लेकिन हाई कोर्ट ने इन्हें उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की समग्र परिस्थितियों के संदर्भ में देखा और फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया।

पति-पत्नी के विवाद में आरोपों से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं साक्ष्य

वैवाहिक मुकदमों में अक्सर दोनों पक्ष एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाते हैं। एक पक्ष खुद को पीड़ित बताता है तो दूसरा पक्ष अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार करता है।

ऐसे मामलों में अदालत के लिए केवल आरोपों को सुनना पर्याप्त नहीं होता। यह देखना पड़ता है कि आरोप किस हद तक प्रमाणित हुए हैं और क्या उपलब्ध साक्ष्य कानूनी मानक को पूरा करते हैं।

झारखंड हाई कोर्ट के इस मामले में भी यही पहलू सामने आया। पति की ओर से लगाए गए आरोपों के बावजूद अदालत ने यह पाया कि तलाक के लिए मानसिक क्रूरता का कानूनी आधार पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुआ।

क्या इस फैसले का मतलब है कि अलग रहना कभी क्रूरता नहीं हो सकता?

नहीं। इस फैसले को इस तरह नहीं समझना चाहिए कि पति-पत्नी का अलग रहना कभी भी मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

अदालत की बात का केंद्र यह है कि सिर्फ अलग रहना, बातचीत कम होना या घरेलू मतभेद अपने आप क्रूरता साबित नहीं करते।

यदि किसी मामले में अलग रहने के पीछे गंभीर परिस्थितियां हों और वे विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित हों, तो अदालत उनका अलग तरीके से मूल्यांकन कर सकती है।

हर वैवाहिक विवाद का फैसला उसके अपने तथ्यों, परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।

निष्कर्ष

झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला वैवाहिक विवादों में एक महत्वपूर्ण बात सामने रखता है—तलाक के लिए क्रूरता का आरोप केवल कह देने से साबित नहीं होता।

पति-पत्नी के बीच मतभेद, अलग रहना, बातचीत में कमी, अलग खाना बनाना या परिवार के सदस्यों के साथ तनाव जैसी परिस्थितियां निश्चित रूप से वैवाहिक जीवन में परेशानी पैदा कर सकती हैं, लेकिन उन्हें मानसिक क्रूरता मानने से पहले अदालत पूरे मामले और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करती है।

इस मामले में पति ने पत्नी पर कई आरोप लगाए, जबकि पत्नी ने भी अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार करते हुए पति और ससुराल पक्ष के संबंध में अपनी शिकायतें सामने रखीं। उसने अदालत के सामने यह भी कहा कि वह अभी पति के साथ रहने की इच्छुक है।

रांची फैमिली कोर्ट ने पहले पति की तलाक याचिका खारिज की थी और झारखंड हाई कोर्ट ने उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

इस फैसले से सामने आने वाली मूल कानूनी बात यही है कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद और कानूनी अर्थ में मानसिक क्रूरता एक ही चीज नहीं हैं। तलाक की मांग करने वाले पक्ष को अपने आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से स्थापित करना होगा। वहीं अदालत हर मामले को उसके विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय करेगी।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।