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लाड़ली बहना योजना पर हाईकोर्ट में जनहित याचिका, ₹1500 की किस्त को लेकर बढ़ी कानूनी हलचल; सरकार से 4 हफ्ते में जवाब

लाड़ली बहना योजना पर हाईकोर्ट में जनहित याचिका, ₹1500 की किस्त को लेकर बढ़ी कानूनी हलचल; सरकार से 4 हफ्ते में जवाब

        मध्य प्रदेश की चर्चित मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना अब एक नई वजह से चर्चा में है। योजना के तहत प्रदेश की बड़ी संख्या में महिलाओं को दी जा रही मासिक आर्थिक सहायता को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में योजना को बंद करने और महिलाओं को दी जा रही ₹1500 की मासिक सहायता पर रोक लगाने की मांग की गई है।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने फिलहाल ₹1500 की किस्त रोकने या योजना बंद करने का कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है और मामले की आगे की सुनवाई सरकार के जवाब के बाद होगी। इसलिए फिलहाल केवल याचिका दाखिल होने के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि लाड़ली बहना योजना बंद होने जा रही है या अगली किस्त रुक गई है।

याचिका में योजना की वित्तीय व्यवस्था, सरकारी खजाने पर पड़ने वाले भार और महिलाओं को सीधे नकद सहायता देने के बजाय रोजगार, कौशल विकास तथा स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।

ग्वालियर हाईकोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?

लाड़ली बहना योजना को लेकर यह जनहित याचिका ग्वालियर के थाटीपुर क्षेत्र की निवासी और पूर्व पार्षद सुधा दुबे की ओर से दाखिल की गई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ का रुख किया है।

याचिका में राज्य सरकार की इस योजना की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि महिलाओं को हर महीने एक निश्चित रकम सीधे बैंक खाते में देने के बजाय सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल ऐसे उपायों पर किया जाना चाहिए, जिनसे महिलाओं को लंबे समय तक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद मिले।

इसमें रोजगार, स्वरोजगार, कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसे विकल्पों पर जोर देने की बात कही गई है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये याचिकाकर्ता की दलीलें हैं। इन दलीलों पर हाईकोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।

करीब 1.25 करोड़ महिलाओं को मिल रही है सहायता

मध्य प्रदेश सरकार की आधिकारिक लाड़ली बहना योजना वेबसाइट पर वर्तमान में 1,25,22,542 पात्र आवेदकों का आंकड़ा प्रदर्शित हो रहा है। यानी योजना से जुड़ी महिलाओं की संख्या सवा करोड़ से अधिक है। आधिकारिक पोर्टल पर योजना के तहत मासिक सहायता राशि को ₹1000 से बढ़ाकर ₹1250 और फिर ₹1500 किए जाने से संबंधित आदेश भी उपलब्ध हैं।

यही बड़ी संख्या इस मामले को महत्वपूर्ण बनाती है। यदि भविष्य में अदालत योजना के संबंध में कोई महत्वपूर्ण आदेश देती है, तो उसका असर बड़ी संख्या में लाभार्थियों पर पड़ सकता है। लेकिन वर्तमान स्थिति में ऐसा कोई अंतिम न्यायिक आदेश सामने नहीं आया है, जिससे लाभार्थियों को मिलने वाली ₹1500 की सहायता बंद हो गई हो।

याचिका में नकद सहायता की जगह रोजगार की बात

याचिकाकर्ता की ओर से सबसे प्रमुख तर्क महिलाओं को सीधे नकद सहायता देने की व्यवस्था से जुड़ा है।

याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि सरकार यदि महिलाओं के खाते में हर महीने राशि भेजने के बजाय उसी संसाधन का उपयोग रोजगार और कौशल विकास से जुड़े कार्यक्रमों में करे तो महिलाओं को दीर्घकालिक आर्थिक अवसर मिल सकते हैं।

याचिका के मुताबिक महिलाओं को केवल नियमित आर्थिक सहायता देने के बजाय उन्हें ऐसे प्रशिक्षण दिए जाने चाहिए, जिनके आधार पर वे नौकरी, स्वरोजगार या अपना छोटा व्यवसाय शुरू कर सकें।

इस तर्क के पीछे मूल विचार यह है कि नियमित नकद सहायता तत्काल आर्थिक मदद दे सकती है, जबकि रोजगार और कौशल से जुड़ी व्यवस्था महिला की आय के दूसरे स्थायी स्रोत तैयार करने में मदद कर सकती है।

हालांकि, यह एक नीतिगत और आर्थिक बहस का विषय है। अदालत में दाखिल याचिका में उठाए गए इस विचार को फिलहाल न्यायालय का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

सरकारी खजाने पर वित्तीय भार का भी मुद्दा

याचिका में योजना के वित्तीय पक्ष को भी उठाया गया है। जब किसी सरकारी योजना के लाभार्थियों की संख्या करोड़ों में हो और प्रत्येक लाभार्थी को हर महीने निश्चित राशि दी जाए, तो राज्य के बजट पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

इसी संदर्भ में याचिकाकर्ता ने सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं और योजना के लिए उपलब्ध संसाधनों को लेकर सवाल उठाए हैं।

कुछ रिपोर्टों में योजना पर प्रति माह करीब ₹1,878 करोड़ से ₹1,900 करोड़ और सालाना ₹22,500 करोड़ से अधिक के वित्तीय भार से जुड़े आंकड़े याचिका के संदर्भ में प्रकाशित हुए हैं। इन आंकड़ों को फिलहाल याचिका में उठाए गए वित्तीय तर्क के रूप में देखा जाना चाहिए; अंतिम और आधिकारिक वित्तीय स्थिति के लिए सरकार के जवाब तथा बजट/विभागीय रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।

हाईकोर्ट ने सरकार को क्या कहा?

याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।

रिपोर्टों के अनुसार, सरकार से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा गया है। मामले में महिला एवं बाल विकास विभाग से संबंधित जानकारी और रिकॉर्ड भी मांगे गए हैं। लाभार्थियों की बड़ी संख्या को देखते हुए लाभार्थियों से संबंधित विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश भी रिपोर्ट किया गया है।

इसका अर्थ यह है कि अदालत फिलहाल मामले के पक्षों को सुनने और सरकार का पक्ष रिकॉर्ड पर लेने की प्रक्रिया में है।

नोटिस जारी होना अपने आप में याचिका में लगाए गए आरोपों या मांगों को अदालत द्वारा स्वीकार कर लेना नहीं होता। अब राज्य सरकार अपना जवाब दाखिल करेगी और उसके बाद अदालत मामले में आगे विचार करेगी।

क्या हाईकोर्ट ने लाड़ली बहना की किस्त रोक दी है?

यह इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल है।

फिलहाल जवाब है—नहीं।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हाईकोर्ट ने अभी योजना की मासिक ₹1500 की सहायता राशि पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है। न ही केवल याचिका दाखिल होने से योजना स्वतः बंद हुई है।

इसलिए जिन महिलाओं को लाड़ली बहना योजना के तहत सहायता मिल रही है, उन्हें केवल इस खबर के आधार पर यह मानने की जरूरत नहीं है कि उनकी अगली किस्त निश्चित रूप से बंद हो गई है।

मामले की वर्तमान स्थिति यही है कि योजना को लेकर अदालत में चुनौती दी गई है, सरकार से जवाब मांगा गया है और आगे की न्यायिक प्रक्रिया बाकी है।

क्या सरकार के जवाब के बाद तस्वीर बदल सकती है?

हां, मामले की आगे की दिशा काफी हद तक सरकार के जवाब और अदालत के समक्ष रखे जाने वाले रिकॉर्ड पर निर्भर करेगी।

सरकार अपने जवाब में योजना की आवश्यकता, उद्देश्य, लाभार्थियों की संख्या, वित्तीय व्यवस्था, बजटीय प्रावधान और योजना से जुड़े अन्य पहलुओं पर अपना पक्ष रख सकती है।

इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से सरकार के जवाब पर अपनी प्रतिक्रिया दी जा सकती है। अदालत दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद आगे का आदेश देगी।

इसलिए इस समय यह अनुमान लगाना उचित नहीं होगा कि अदालत अंततः योजना को बंद करने का आदेश देगी या याचिका को खारिज कर देगी। अभी मामला न्यायिक प्रक्रिया में है।

लाड़ली बहना योजना कब शुरू हुई थी?

मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना और उनके आर्थिक सशक्तीकरण में सहयोग करना बताया गया था।

योजना की शुरुआत के समय सहायता राशि ₹1000 प्रतिमाह थी। बाद में इसे बढ़ाकर ₹1250 किया गया और फिर ₹1500 प्रतिमाह कर दिया गया। मध्य प्रदेश सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर इन राशि-वृद्धियों से संबंधित आदेश भी उपलब्ध हैं।

योजना के तहत पात्र महिलाओं के बैंक खातों में सीधे राशि भेजने की व्यवस्था की गई है।

योजना का बड़ा लाभार्थी आधार इसे मध्य प्रदेश की महत्वपूर्ण सामाजिक कल्याण योजनाओं में शामिल करता है। यही कारण है कि इसके वित्तीय प्रभाव और भविष्य को लेकर उठने वाला कोई भी कानूनी सवाल व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है।

याचिका और सरकार की नीति—दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी

किसी सरकारी योजना को अदालत में चुनौती दिए जाने और अदालत द्वारा उस योजना को असंवैधानिक घोषित किए जाने में काफी अंतर होता है।

इस मामले में अभी केवल एक जनहित याचिका अदालत के सामने है। याचिकाकर्ता ने अपनी मांग और उसके समर्थन में तर्क रखे हैं। हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है।

जब तक अदालत अंतिम आदेश नहीं देती, तब तक याचिका में लगाए गए आरोप या मांगी गई राहत को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

इसी तरह, सरकार का जवाब आने के बाद भी अदालत मामले के सभी पहलुओं पर विचार कर सकती है। अंतिम स्थिति न्यायालय के आदेश से ही स्पष्ट होगी।

महिलाओं के लिए रोजगार बनाम नकद सहायता की बहस

इस मामले ने एक व्यापक नीति संबंधी सवाल भी सामने ला दिया है—क्या महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए सीधे नकद सहायता अधिक प्रभावी है या रोजगार और कौशल विकास के अवसर?

नकद सहायता का एक फायदा यह है कि पात्र महिला को सीधे आर्थिक मदद मिलती है और वह अपनी तत्काल जरूरतों के लिए उसका उपयोग कर सकती है। दूसरी ओर, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़ी योजनाएं आय का अलग स्रोत तैयार करने में मदद कर सकती हैं।

लेकिन दोनों व्यवस्थाओं की अपनी-अपनी चुनौतियां भी हैं। प्रशिक्षण मिलने के बाद रोजगार या बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी होता है। वहीं नकद सहायता की योजना में सरकार पर लगातार वित्तीय व्यय बना रहता है।

यही वजह है कि इस विषय पर अदालत में उठाए गए तर्क को केवल एक राजनीतिक बहस के रूप में देखने के बजाय इसके कानूनी, वित्तीय और सामाजिक पहलुओं को अलग-अलग समझना महत्वपूर्ण है।

अभी लाभार्थियों को क्या करना चाहिए?

फिलहाल लाड़ली बहना योजना की लाभार्थी महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ हाईकोर्ट में याचिका दायर होने का अर्थ योजना की किस्त बंद होना नहीं है।

मध्य प्रदेश सरकार का आधिकारिक पोर्टल अभी भी योजना के आवेदन, भुगतान की स्थिति और अन्य सेवाओं के लिए उपलब्ध है। पोर्टल पर योजना के पात्र आवेदकों और राशि से संबंधित जानकारी भी प्रदर्शित की जा रही है।

इसलिए किसी सोशल मीडिया पोस्ट या अपुष्ट संदेश के आधार पर यह मान लेना कि ₹1500 की अगली किस्त बंद हो गई है, उचित नहीं होगा।

यदि भविष्य में अदालत की ओर से कोई अंतरिम या अंतिम आदेश आता है, तभी योजना की कानूनी स्थिति में बदलाव के बारे में निश्चित रूप से कहा जा सकेगा।

आगे क्या होगा?

अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण मध्य प्रदेश सरकार का जवाब है। हाईकोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। सरकार योजना के उद्देश्य, लाभार्थियों की संख्या, वित्तीय प्रावधान और याचिका में उठाए गए अन्य सवालों पर अपना पक्ष रख सकती है।

इसके बाद अदालत मामले की आगे सुनवाई करेगी।

फिलहाल तीन बातें स्पष्ट हैं—पहली, लाड़ली बहना योजना को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दाखिल हुई है। दूसरी, याचिका में करीब 1.25 करोड़ महिलाओं को दी जा रही ₹1500 की मासिक सहायता रोकने और योजना पर पुनर्विचार की मांग की गई है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात, अभी ₹1500 की किस्त रोकने का कोई अंतरिम आदेश सामने नहीं आया है।

इसलिए इस समय लाभार्थियों के बीच चल रही उन चर्चाओं से सावधान रहना जरूरी है जिनमें यह दावा किया जा रहा है कि हाईकोर्ट ने योजना की किस्त बंद कर दी है। अदालत में मामला विचाराधीन है और आगे की तस्वीर सरकार के जवाब तथा न्यायिक आदेशों के बाद ही स्पष्ट होगी।

निष्कर्ष यही है कि लाड़ली बहना योजना फिलहाल जारी है और केवल जनहित याचिका दाखिल होने से ₹1500 की मासिक सहायता स्वतः बंद नहीं हुई है। अब सबकी नजर सरकार के जवाब और हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर रहेगी।

संपादकीय एवं कानूनी समीक्षा

एडवोकेट पी.के. निगम (Adv. P.K. Nigam)

वरिष्ठ विधिक शोधकर्ता एवं मुख्य कानूनी संपादक • Indian Law Notes

भारतीय कानून (BNS, BNSS, BSA, IPC, CrPC), सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का सरल हिंदी में प्रामाणिक विधिक विश्लेषण।