एटा में फर्जी मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय का खुलासा! पांच गिरफ्तार, छात्रों को डिग्री-डिप्लोमा दिलाने के नाम पर वसूली का आरोप
उत्तर प्रदेश के एटा जिले में शिक्षा के नाम पर चल रहे कथित फर्जीवाड़े का पुलिस ने खुलासा करने का दावा किया है। थाना मारहरा पुलिस ने कथित रूप से फर्जी मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय संचालित करने, छात्रों को अलग-अलग पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने तथा उनके लिए फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज तैयार कराने के आरोप में पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि यह पूरा नेटवर्क वर्ष 2022 से सक्रिय था और छात्रों तथा उनके अभिभावकों को विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने के नाम पर रकम वसूली जा रही थी।
पुलिस की कार्रवाई के बाद इस मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि बिना मान्यता के संस्थान या पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे थे तो इतने वर्षों तक छात्रों और अभिभावकों से फीस तथा अन्य रकम कैसे ली जाती रही? दूसरा सवाल उन छात्रों के भविष्य को लेकर है, जिन्होंने किसी संस्था पर भरोसा करके अपनी पढ़ाई और पैसा लगाया होगा। अब पुलिस जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस कथित नेटवर्क से कितने छात्र जुड़े थे और उनसे कुल कितनी रकम ली गई।
मामले की शुरुआत हालांकि किसी शिक्षा संस्थान की शिकायत से नहीं, बल्कि एक कथित अपहरण और फिरौती की सूचना से हुई थी।
दो लाख रुपये की फिरौती की सूचना से शुरू हुई जांच
पुलिस के अनुसार, उसे किसी व्यक्ति के अपहरण कर लिए जाने और उसकी रिहाई के बदले दो लाख रुपये की फिरौती मांगे जाने की सूचना मिली थी। सूचना मिलने के बाद थाना मारहरा पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
जांच के दौरान पुलिस को कुछ ऐसे तथ्य मिले, जिनसे मामला केवल कथित अपहरण तक सीमित नहीं रहा। पूछताछ और उपलब्ध जानकारी को आगे बढ़ाने पर पुलिस को कथित शैक्षणिक संस्थान और उससे जुड़े लोगों के बारे में जानकारी मिली।
जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज और रिकॉर्ड बरामद किए, जिनसे अलग-अलग शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में छात्रों को प्रवेश दिलाने और उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड तैयार करने का काम किए जाने का संदेह सामने आया।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉ. इलामारन के अनुसार, जांच अभी जारी है और पुलिस पूरे नेटवर्क की जानकारी जुटा रही है।
डी.फार्मा से बीएससी नर्सिंग तक प्रवेश का दावा
पुलिस के मुताबिक, आरोपी वर्ष 2022 से छात्रों को विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने के नाम पर धनराशि वसूल रहे थे।
इन पाठ्यक्रमों में डी.फार्मा, बी.फार्मा और बीएससी नर्सिंग जैसे कोर्स शामिल बताए गए हैं। इन पाठ्यक्रमों की पढ़ाई के लिए बड़ी संख्या में विद्यार्थी कॉलेज और विश्वविद्यालयों का रुख करते हैं। ऐसे में किसी संस्था के नाम, दस्तावेज या मान्यता को लेकर छात्र और अभिभावक आसानी से भ्रमित हो सकते हैं।
पुलिस का आरोप है कि इसी भरोसे का इस्तेमाल करके छात्रों और उनके परिवारों से रकम ली जाती थी।
आरोपों की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि मामला केवल प्रवेश दिलाने तक सीमित होने की बात नहीं कही जा रही। पुलिस ने ऐसे दस्तावेज बरामद करने का दावा किया है, जिनमें फीस रसीद, प्रवेश संबंधी रिकॉर्ड, परीक्षा पुस्तिकाएं, मार्कशीट और छात्र पहचान पत्र शामिल हैं।
यदि जांच में ये दस्तावेज वास्तव में फर्जी पाए जाते हैं और इनके जरिए छात्रों को शैक्षणिक योग्यता या परीक्षा उत्तीर्ण होने का प्रमाण देने की कोशिश की गई थी, तो मामला केवल फीस वसूली तक सीमित नहीं रहेगा।
पुलिस ने क्या-क्या बरामद किया?
मारहरा पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों के कब्जे से कई तरह की सामग्री मिली है। पुलिस ने बरामदगी में डेस्कटॉप कंप्यूटर के अलावा विभिन्न कॉलेजों के कथित फर्जी चेक, छात्र पहचान पत्र और प्रवेश संबंधी दस्तावेज शामिल होने की बात कही है।
पुलिस के अनुसार बरामद सामग्री में—
- 16 कथित फर्जी छात्र पहचान पत्र
- आवेदन फार्म
- एडमिशन शीट
- फीस रसीद
- परीक्षा पुस्तिकाएं
- कथित फर्जी मोहर
- पेम्पलेट
- लेटर पैड
- कथित फर्जी मार्कशीट
- एनरोलमेंट नंबर से संबंधित रिकॉर्ड
- रोल नंबर
- अटेंडेंस रिकॉर्ड
- एडमिशन से जुड़े दस्तावेज
शामिल हैं।
इन दस्तावेजों की वास्तविकता की जांच अब पुलिस के लिए महत्वपूर्ण होगी। यह पता लगाना जरूरी होगा कि ये दस्तावेज किस संस्था या विश्वविद्यालय के नाम पर बनाए गए थे, उन्हें तैयार कौन करता था और छात्रों को इनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से कराया जाता था।
पांच लोगों की गिरफ्तारी
पुलिस ने इस मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान सतेन्द्र कुमार (36) निवासी महमूदपुर नगरिया, मारहरा, गौरव अग्रवाल (42) निवासी नदरई गेट, कासगंज, भगवान दास (59) निवासी धरमपुर, मारहरा, नरेन्द्र उर्फ पप्पू (58) निवासी मोहल्ला पैठ, मारहरा और मो. शरीफ कुरैशी (75) निवासी गफूरगंज, मारहरा के रूप में हुई है।
पुलिस का दावा है कि इन लोगों की भूमिका कथित शैक्षणिक नेटवर्क से जुड़ी हुई है।
हालांकि किसी भी आरोपी के संबंध में अंतिम दोषसिद्धि अदालत के निर्णय के बाद ही मानी जाएगी। फिलहाल पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रही है।
सबसे बड़ा सवाल—कितने छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ?
इस पूरे मामले में सबसे संवेदनशील पक्ष उन छात्रों का है, जिन्होंने कथित तौर पर इन संस्थानों या एजेंटों के माध्यम से प्रवेश लिया होगा।
डी.फार्मा, बी.फार्मा और बीएससी नर्सिंग जैसे पाठ्यक्रम केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं होते। इन पाठ्यक्रमों के बाद विद्यार्थियों की आगे की पढ़ाई, नौकरी, पंजीकरण और पेशेवर अवसर संबंधित मान्यता और वैध शैक्षणिक योग्यता से जुड़े होते हैं।
यदि कोई छात्र किसी ऐसे संस्थान में पढ़ रहा हो जिसकी मान्यता ही नहीं है, तो उसे बाद में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। फीस देने के बावजूद उसकी पढ़ाई का रिकॉर्ड मान्य न हो, परीक्षा का परिणाम स्वीकार न किया जाए या प्रमाणपत्र का इस्तेमाल नौकरी अथवा आगे की पढ़ाई के लिए न हो सके—ऐसी स्थिति विद्यार्थी और उसके परिवार के लिए बेहद गंभीर हो सकती है।
इसी वजह से पुलिस की जांच में छात्रों की पहचान और उनकी संख्या का पता लगाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अभिभावकों से भी ली जाती थी रकम
पुलिस के अनुसार, आरोपी केवल छात्रों से ही नहीं, बल्कि उनके अभिभावकों से भी प्रवेश और पाठ्यक्रम के नाम पर धनराशि लेते थे।
ऐसे मामलों में अक्सर परिवार यह मानकर पैसा खर्च करता है कि बच्चा किसी मान्यता प्राप्त संस्थान में पढ़ रहा है और भविष्य में उसे डिग्री या डिप्लोमा मिलेगा। यदि संस्था या उससे जुड़े लोग वास्तविक कॉलेज या विश्वविद्यालय जैसी व्यवस्था दिखाएं तो सामान्य परिवार के लिए तत्काल यह पता लगाना आसान नहीं होता कि संस्था वास्तव में मान्यता प्राप्त है या नहीं।
पुलिस अब इस पहलू की भी जांच कर रही है कि आरोपी छात्रों और उनके अभिभावकों को किस तरह अपने विश्वास में लेते थे।
क्या उन्हें किसी वास्तविक कॉलेज या विश्वविद्यालय का नाम बताया जाता था? क्या किसी अन्य संस्थान के दस्तावेज दिखाए जाते थे? क्या प्रवेश के बाद छात्रों को किसी अन्य स्थान पर परीक्षा देने के लिए भेजा जाता था? इन सवालों के जवाब जांच में सामने आना बाकी हैं।
दस्तावेजों की जांच से खुलेगा पूरा नेटवर्क
इस मामले में बरामद दस्तावेज पुलिस जांच की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकते हैं।
एनरोलमेंट नंबर, रोल नंबर, उपस्थिति रजिस्टर, फीस रसीद और परीक्षा पुस्तिकाओं जैसे रिकॉर्ड से यह पता लगाया जा सकता है कि कितने विद्यार्थियों को इस कथित व्यवस्था में शामिल किया गया था।
यदि कंप्यूटर में विद्यार्थियों का डिजिटल रिकॉर्ड मिला है तो पुलिस उससे भी कई जानकारियां निकाल सकती है। इसमें छात्रों के नाम, मोबाइल नंबर, फीस की जानकारी, पाठ्यक्रम, परीक्षा संबंधी रिकॉर्ड और कथित तौर पर जारी किए गए दस्तावेजों की जानकारी शामिल हो सकती है।
इसके अलावा कथित फर्जी मोहर, लेटर पैड और मार्कशीट से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि दस्तावेज किस उद्देश्य से तैयार किए जाते थे।
केवल पांच आरोपी या बड़ा नेटवर्क?
पुलिस ने फिलहाल पांच लोगों की गिरफ्तारी की है, लेकिन जांच यहीं खत्म नहीं हुई है।
एसएसपी डॉ. इलामारन के अनुसार पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क से कितने छात्र जुड़े थे और उनसे कितनी धनराशि वसूली गई।
इसके अलावा जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी होगा कि क्या गिरफ्तार आरोपियों के पीछे कोई और व्यक्ति या संस्था काम कर रही थी।
किसी कथित फर्जी शैक्षणिक नेटवर्क को लंबे समय तक चलाने के लिए छात्रों तक पहुंच, प्रवेश का इंतजाम, दस्तावेज तैयार करने, फीस लेने और परीक्षा संबंधी रिकॉर्ड रखने जैसी कई गतिविधियों की जरूरत होती है। इसलिए पुलिस अब पूरे नेटवर्क की भूमिका और आपसी संबंधों की जांच कर सकती है।
यदि किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है।
छात्रों को दस्तावेजों की जांच करना क्यों जरूरी है?
एटा का यह मामला विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए भी एक सबक है। किसी भी कॉलेज, विश्वविद्यालय या व्यावसायिक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने से पहले उसकी मान्यता और संबद्धता की जानकारी आधिकारिक स्रोत से जांचना बेहद जरूरी है।
विशेष रूप से मेडिकल, फार्मेसी, नर्सिंग, पैरामेडिकल और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों में केवल किसी संस्था के नाम या उसके भवन को देखकर यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि वहां चलने वाला पाठ्यक्रम मान्यता प्राप्त है।
छात्रों को यह देखना चाहिए कि संबंधित पाठ्यक्रम किस नियामक संस्था से मान्यता प्राप्त है, कॉलेज किस विश्वविद्यालय से संबद्ध है और जिस डिग्री या डिप्लोमा का वादा किया जा रहा है, वह वास्तव में वैध है या नहीं।
फीस जमा करने से पहले रसीद लेना और सभी दस्तावेजों की प्रतियां अपने पास रखना भी महत्वपूर्ण है।
पुलिस के सामने अब कई अहम सवाल
पुलिस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, कई सवालों के जवाब सामने आ सकते हैं।
मसलन, कथित संस्थान वास्तव में कहां संचालित हो रहा था? उसके पास किसी तरह की मान्यता थी या नहीं? छात्रों को प्रवेश के बाद पढ़ाई और परीक्षा की क्या व्यवस्था बताई जाती थी? कितने विद्यार्थियों ने फीस जमा की? कितने छात्रों को कथित मार्कशीट या अन्य दस्तावेज दिए गए? क्या किसी छात्र ने इन दस्तावेजों के आधार पर आगे नौकरी या अन्य संस्थान में प्रवेश लिया?
इसके साथ ही पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि कथित फर्जी दस्तावेज तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटर और अन्य सामग्री का संचालन कौन करता था।
इन सवालों के जवाब इस बात को स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि मामला स्थानीय स्तर पर चल रहे एक सीमित फर्जीवाड़े का था या इसके पीछे व्यापक नेटवर्क काम कर रहा था।
अपहरण की शिकायत से शिक्षा घोटाले तक पहुंची पुलिस
इस मामले की एक अलग बात यह है कि पुलिस को शुरुआती सूचना शिक्षा संबंधी फर्जीवाड़े की नहीं मिली थी। जांच एक कथित अपहरण और दो लाख रुपये की फिरौती मांगने की सूचना से शुरू हुई।
लेकिन जांच के दौरान पुलिस को कथित फर्जी शैक्षणिक गतिविधियों का पता चला।
कई बार किसी मामले की जांच के दौरान ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो प्रारंभिक शिकायत से बिल्कुल अलग दिशा में जांच को ले जाते हैं। एटा के इस मामले में भी पुलिस के अनुसार ऐसा ही हुआ।
अब जांच का दायरा बढ़ गया है और पुलिस केवल शुरुआती सूचना की जांच तक सीमित नहीं है। कथित फर्जी शैक्षणिक संस्थान, प्रवेश प्रक्रिया, छात्रों से वसूली गई रकम और दस्तावेजों के नेटवर्क की जांच भी की जा रही है।
छात्रों के भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता
अगर पुलिस के आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो इस मामले का सबसे बड़ा असर उन विद्यार्थियों पर पड़ सकता है जिन्होंने अपने भविष्य की उम्मीद में इन संस्थानों से जुड़कर पढ़ाई की होगी।
किसी छात्र के लिए एक-दो वर्ष की पढ़ाई और हजारों या लाखों रुपये की फीस गंवाना केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता। उसके करियर का समय भी प्रभावित हो सकता है।
इसलिए जांच एजेंसियों के सामने यह चुनौती होगी कि केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक कार्रवाई सीमित न रहे, बल्कि कथित नेटवर्क से जुड़े विद्यार्थियों की पहचान भी की जाए और यह पता लगाया जाए कि उनके पास मौजूद शैक्षणिक दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति क्या है।
निष्कर्ष
एटा के मारहरा क्षेत्र में पुलिस द्वारा कथित फर्जी मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय से जुड़े मामले का खुलासा कई स्तरों पर गंभीर है। पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया है और बड़ी संख्या में कथित फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज, छात्र पहचान पत्र, फीस रसीद, परीक्षा पुस्तिकाएं, मोहर और प्रवेश संबंधी रिकॉर्ड बरामद करने का दावा किया है।
पुलिस के अनुसार यह नेटवर्क वर्ष 2022 से छात्रों को डी.फार्मा, बी.फार्मा और बीएससी नर्सिंग सहित विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिलाने के नाम पर रकम वसूल रहा था। हालांकि इस दावे की पूरी पुष्टि जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होगी।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल उन छात्रों का है, जिन्होंने कथित तौर पर इस नेटवर्क पर भरोसा किया। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि कितने छात्र इससे जुड़े थे और उनसे कितनी रकम ली गई।
मामले की जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित फर्जी संस्थान का संचालन किस स्तर तक फैला था, किन-किन लोगों की भूमिका थी और छात्रों को दिए गए दस्तावेजों की वास्तविकता क्या थी।
यह मामला एक बार फिर बताता है कि किसी भी पेशेवर पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने से पहले संस्था की मान्यता, विश्वविद्यालय से संबद्धता और संबंधित नियामक संस्था की स्वीकृति की आधिकारिक स्तर पर जांच करना कितना जरूरी है। शिक्षा से जुड़ी किसी भी संस्था पर भरोसा करने से पहले केवल उसके नाम, विज्ञापन या चमकदार दावों के बजाय उसके आधिकारिक रिकॉर्ड को देखना छात्रों और अभिभावकों दोनों के हित में है।