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अविवाहित बहन को भी अनुकंपा नौकरी का अधिकार, झारखंड हाई कोर्ट ने CCL के आदेश रद्द कर छह सप्ताह में नियुक्ति का दिया निर्देश

अविवाहित बहन को भी अनुकंपा नौकरी का अधिकार, झारखंड हाई कोर्ट ने CCL के आदेश रद्द कर छह सप्ताह में नियुक्ति का दिया निर्देश

      अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में आश्रित की परिभाषा को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो गई हो और बाद में संबंधित सेवा नियमों में संशोधन कर अविवाहित बहन को भी आश्रित की श्रेणी में शामिल कर दिया गया हो, तो केवल इस आधार पर नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी की मृत्यु संशोधन लागू होने से पहले हो गई थी।

यह मामला सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड यानी CCL से जुड़ा है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने अनिता देवी और उनकी बेटी स्मृति कुमारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए CCL द्वारा पारित 22 मई 2024, 22 अगस्त 2024 और 19 मार्च 2025 के आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह स्मृति कुमारी को छह सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करे।

फैसले की खास बात यह है कि अदालत ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में उस समय लागू नियम को महत्व दिया, जब पात्रता के आधार पर आवेदन पर विचार किया जा रहा था। यानी कर्मचारी की मृत्यु की तारीख और संशोधित प्रावधान के प्रभावी होने की तारीख के बीच के अंतर को अकेले नियुक्ति से इनकार का आधार नहीं माना जा सकता, बशर्ते आवेदन निर्धारित समय-सीमा के भीतर किया गया हो और बाकी शर्तें पूरी होती हों।

क्या है पूरा मामला?

मामला CCL कर्मचारी अंशु उरांव की मृत्यु से जुड़ा है। अंशु उरांव की सेवा के दौरान 3 अगस्त 2023 को मृत्यु हो गई थी। उनके परिवार के लिए यह केवल एक कर्मचारी को खोने की घटना नहीं थी, बल्कि आय के प्रमुख साधन के समाप्त हो जाने का भी संकट था।

अंशु उरांव की मां अनिता देवी ने अपने बेटे की मृत्यु के बाद उनकी बेटी और अपनी पुत्री स्मृति कुमारी के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया। यह आवेदन 20 दिसंबर 2023 को किया गया था।

आवेदन National Coal Wage Agreement-XI यानी NCWA-XI के क्लॉज 9.3.0 के तहत किया गया था। परिवार का पक्ष था कि स्मृति कुमारी को मृत कर्मचारी की आश्रित के रूप में अनुकंपा नियुक्ति दी जानी चाहिए।

लेकिन उस समय CCL ने आवेदन स्वीकार नहीं किया। कंपनी का तर्क था कि उस समय लागू प्रावधान में अविवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आश्रित की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया था।

यहीं से इस मामले में नियम और उसकी व्याख्या का सवाल महत्वपूर्ण बन गया।

बाद में बदली आश्रित की परिभाषा

मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 11 जून 2024 को Joint Bipartite Committee for the Coal Industry यानी JBCCI की Standardisation Committee ने आश्रित की परिभाषा से जुड़े प्रावधान में संशोधन किया।

इस संशोधन के बाद अविवाहित बहन को भी संबंधित श्रेणी में शामिल किया गया।

यानी जिस श्रेणी में पहले अविवाहित बहन को स्पष्ट रूप से स्थान नहीं मिला था, संशोधन के बाद उसका दायरा बढ़ गया।

इसके बाद स्मृति कुमारी की ओर से 18 जून 2024 को दोबारा आवेदन किया गया। परिवार को उम्मीद थी कि अब संशोधित प्रावधान के आधार पर उनके मामले पर विचार किया जाएगा।

लेकिन CCL ने इस आवेदन को भी स्वीकार नहीं किया।

कंपनी की ओर से मूल रूप से यह आधार लिया गया कि अंशु उरांव की मृत्यु 3 अगस्त 2023 को हुई थी, जबकि अविवाहित बहन को आश्रित की श्रेणी में शामिल करने वाला संशोधन 11 जून 2024 से प्रभावी हुआ।

इस प्रकार कंपनी ने कर्मचारी की मृत्यु की तारीख को पात्रता का निर्णायक आधार माना।

हाई कोर्ट के सामने मुख्य सवाल क्या था?

इस मामले में अदालत के सामने मूल प्रश्न यह था कि यदि कर्मचारी की मृत्यु उस समय हुई थी जब अविवाहित बहन को आश्रित की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया था, लेकिन परिवार ने निर्धारित अवधि के भीतर आवेदन किया और बाद में नियम में संशोधन हो गया, तो क्या संशोधित प्रावधान के आधार पर उस आवेदन पर विचार किया जा सकता है?

अदालत ने इस प्रश्न का उत्तर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में दिया।

कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात देखी कि अंशु उरांव की मृत्यु के बाद अनिता देवी ने 20 दिसंबर 2023 को ही आवेदन कर दिया था। यानी आवेदन निर्धारित 18 महीने की अवधि के भीतर था।

इसके बाद जब 11 जून 2024 को नियम में संशोधन हुआ, तब स्मृति कुमारी की ओर से 18 जून 2024 को दोबारा आवेदन किया गया।

इसलिए अदालत के सामने ऐसा मामला नहीं था जिसमें परिवार ने वर्षों बाद अचानक अनुकंपा नियुक्ति का दावा पेश किया हो। दावा समय-सीमा के भीतर किया गया था और संशोधन प्रभावी होने के बाद भी परिवार ने अपनी मांग को आगे बढ़ाया।

कोर्ट ने CCL के तर्क को क्यों स्वीकार नहीं किया?

अदालत का दृष्टिकोण यह रहा कि 11 जून 2024 को संशोधन प्रभावी होने के बाद वह NCWA-XI का हिस्सा बन गया। इसलिए उसके बाद जब पात्रता के संबंध में आवेदन पर विचार किया जाए, तो संशोधित प्रावधान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सरल शब्दों में समझें तो कर्मचारी की मृत्यु 2023 में हुई थी, लेकिन संशोधन के बाद आवेदन पर विचार की स्थिति 2024 में बनी। ऐसी परिस्थिति में केवल मृत्यु की पुरानी तारीख को आधार बनाकर संशोधित प्रावधान के लाभ से पूरी तरह बाहर करना उचित नहीं माना गया।

अदालत ने इसी आधार पर CCL के पहले के आदेशों को रद्द कर दिया।

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर भी समझना जरूरी है। कोर्ट का फैसला यह नहीं कहता कि कर्मचारी की मृत्यु से जुड़े हर पुराने मामले में स्वतः संशोधित नियम लागू होगा और हर रिश्तेदार को नौकरी मिल जाएगी। अनुकंपा नियुक्ति के लिए संबंधित योजना की दूसरी शर्तें, आश्रितता, आवेदन की समय-सीमा और अन्य पात्रताएं भी देखी जानी होंगी।

इस मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि आवेदन निर्धारित अवधि में किया गया था और संशोधन प्रभावी होने के बाद संबंधित श्रेणी को नियम में शामिल कर दिया गया था।

छह सप्ताह में नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश

झारखंड हाई कोर्ट ने CCL के तीन आदेशों को रद्द करने के साथ-साथ कंपनी को स्पष्ट समय-सीमा भी दी है।

अदालत ने निर्देश दिया कि स्मृति कुमारी को छह सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी किया जाए।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अदालत ने मामले को केवल दोबारा विचार के लिए कंपनी के पास भेजकर छोड़ नहीं दिया। कोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित की।

हालांकि नियुक्ति पत्र जारी करने से पहले योजना के अनुसार आवश्यक औपचारिकताओं और पात्रता संबंधी शर्तों का पालन किया जाना स्वाभाविक रूप से आवश्यक रहेगा।

अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य क्या है?

अनुकंपा नियुक्ति सामान्य सरकारी भर्ती प्रक्रिया से अलग व्यवस्था है। इसका मूल उद्देश्य किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर उसके परिवार को अचानक पैदा हुए आर्थिक संकट से उबरने में सहायता देना है।

इसी कारण अदालतें कई बार यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि अनुकंपा नियुक्ति कोई सामान्य रोजगार का अधिकार नहीं है। यह एक विशेष परिस्थिति में लागू होने वाली व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से राहत देना है।

दूसरी ओर, इस व्यवस्था में यह भी महत्वपूर्ण है कि संबंधित कर्मचारी के परिवार में कौन व्यक्ति आश्रित माना जाएगा। अलग-अलग सेवाओं और संगठनों की योजनाओं में आश्रित की परिभाषा अलग हो सकती है।

CCL और कोयला उद्योग के मामले में NCWA के प्रावधान इसी कारण महत्वपूर्ण हैं।

अविवाहित बहन को लेकर पहले भी उठा है सवाल

यह मुद्दा झारखंड हाई कोर्ट के सामने पहली बार नहीं आया है। वर्ष 2019 में Madhubala Sinha बनाम Central Coalfields Ltd. मामले में झारखंड हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी NCWA के तहत बहन को आश्रित मानने से जुड़े प्रश्न पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी।

उस मामले में अदालत ने NCWA की आश्रित संबंधी व्यवस्था की व्याख्या करते हुए कहा था कि यदि मृत कर्मचारी का भाई कुछ परिस्थितियों में आश्रित के रूप में विचार योग्य हो सकता है, तो केवल लिंग के आधार पर समान स्थिति वाली बहन को बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने ऐसे भेदभाव को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के संदर्भ में भी देखा था।

इस पुराने न्यायिक दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि में वर्तमान मामले का महत्व और बढ़ जाता है। हालांकि दोनों मामलों के तथ्य अलग-अलग हैं और प्रत्येक मामले में संबंधित समय पर लागू नियम तथा परिस्थितियां अलग से देखी जानी चाहिए।

क्या यह फैसला सभी मामलों पर सीधे लागू होगा?

यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।

इस फैसले को यह समझना ठीक नहीं होगा कि अब CCL या किसी भी कोयला कंपनी में कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी अविवाहित बहन को हर स्थिति में अनुकंपा नियुक्ति मिल जाएगी।

अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में कई शर्तें होती हैं। इनमें आवेदन की समय-सीमा, मृत कर्मचारी के परिवार की स्थिति, आश्रितता, संबंधित योजना के प्रावधान, उपलब्ध पद तथा अन्य निर्धारित पात्रताएं शामिल हो सकती हैं।

इस मामले में अदालत ने जिन तथ्यों पर भरोसा किया, उनमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि परिवार ने समय रहते आवेदन किया था और बाद में नियम में संशोधन होने के बाद भी दावा जारी रखा।

इसलिए भविष्य के मामलों में भी अदालतें संबंधित नियम और प्रत्येक मामले के तथ्य देखकर निर्णय लेंगी।

फैसले से क्या कानूनी संदेश निकलता है?

इस फैसले से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है कि किसी सेवा योजना में संशोधन होने के बाद उसके प्रभाव को केवल संशोधन की तारीख देखकर यांत्रिक तरीके से नहीं समझा जा सकता। यह भी देखना होगा कि संशोधन किस उद्देश्य से किया गया, वह कब प्रभावी हुआ और उस समय संबंधित व्यक्ति का दावा किस स्थिति में था।

यहां परिवार ने कर्मचारी की मृत्यु के कुछ ही महीनों के भीतर आवेदन किया था। बाद में नियम बदला और अविवाहित बहन को आश्रित की श्रेणी में शामिल किया गया। ऐसे में अदालत ने पुराने प्रावधान को आधार बनाकर नए प्रावधान के प्रभाव को पूरी तरह खत्म करने के CCL के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।

इससे सेवा मामलों में एक व्यापक संदेश भी मिलता है कि नियमों में होने वाले संशोधन का प्रभाव उन लंबित दावों पर भी पड़ सकता है, जिनकी परिस्थितियां संशोधित प्रावधान के लागू होने के समय अभी विचाराधीन हों—हालांकि यह पूरी तरह संबंधित नियम की भाषा और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

परिवार के लिए राहत का फैसला

अंशु उरांव की मृत्यु के बाद उनके परिवार के सामने जो स्थिति बनी, उसमें अनुकंपा नियुक्ति की मांग आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी थी। परिवार ने पहले आवेदन किया, फिर नियम बदलने के बाद संशोधित प्रावधान के आधार पर दोबारा दावा रखा।

लगभग इसी बिंदु पर विवाद अदालत तक पहुंचा।

हाई कोर्ट के फैसले के बाद अब CCL को छह सप्ताह के भीतर स्मृति कुमारी को नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश मिला है। इस आदेश से याचिकाकर्ता परिवार को तत्काल कानूनी राहत मिली है।

साथ ही यह फैसला कोयला क्षेत्र में अनुकंपा नियुक्ति की योजनाओं के तहत आश्रित की परिभाषा और बाद में हुए संशोधनों के प्रभाव को समझने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

निष्कर्ष

झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला मूल रूप से इस बात पर केंद्रित है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए समय पर किया गया दावा बाद में नियम में हुए वैध संशोधन से प्रभावित हो सकता है या नहीं।

अदालत ने इस मामले में कर्मचारी की मृत्यु की तारीख को अकेला निर्णायक आधार नहीं माना। कोर्ट ने आवेदन की समय-सीमा, नियम में हुए संशोधन और संशोधन के बाद अविवाहित बहन के आश्रित की श्रेणी में शामिल होने के तथ्य को साथ रखकर मामले को देखा।

अंशु उरांव की मृत्यु 3 अगस्त 2023 को हुई। उनकी मां अनिता देवी ने 20 दिसंबर 2023 को बेटी स्मृति कुमारी के लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया। 11 जून 2024 को आश्रित की परिभाषा में संशोधन हुआ और अविवाहित बहन को भी इसमें शामिल किया गया। इसके बाद 18 जून 2024 को संशोधित प्रावधान के आधार पर फिर आवेदन किया गया।

CCL ने कर्मचारी की मृत्यु संशोधन से पहले होने को आधार बनाकर दावा अस्वीकार किया, लेकिन हाई कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने CCL के 22 मई 2024, 22 अगस्त 2024 और 19 मार्च 2025 के आदेश रद्द कर दिए और छह सप्ताह के भीतर स्मृति कुमारी को नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया।

यह फैसला उन सेवा मामलों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां किसी कर्मचारी की मृत्यु के बाद आश्रित परिवार सदस्य ने समय पर दावा किया हो, लेकिन बाद में संबंधित सेवा नियमों में ऐसा संशोधन हो गया हो जिससे उसकी पात्रता की स्थिति बदल गई हो। ऐसे मामलों में केवल तारीखों को अलग-अलग देखकर फैसला करने के बजाय पूरे घटनाक्रम और लागू प्रावधानों को साथ पढ़ना जरूरी होगा।