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ब्रिक्स से UPI तक, UCC से मोदी के जन्मदिन तक: सितंबर में राजनीति, कूटनीति और मीडिया की बदलती तस्वीर

ब्रिक्स से UPI तक, UCC से मोदी के जन्मदिन तक: सितंबर में राजनीति, कूटनीति और मीडिया की बदलती तस्वीर

      सितंबर 2026 की भारतीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श को अगर कुछ शब्दों में समझने की कोशिश की जाए तो तस्वीर काफी दिलचस्प दिखाई देती है। एक तरफ नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकातों की तस्वीरें चर्चा में रहीं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर समान नागरिक संहिता यानी UCC, UPI पर प्रस्तावित मर्चेंट शुल्क, फिल्मों, विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रधानमंत्री के जन्मदिन से जुड़े आयोजनों ने राजनीतिक बहस को गर्म रखा।

एक मुद्दा खत्म होता नहीं कि दूसरा सामने आ जाता है। टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक विषय बदलते रहे, लेकिन बहस का तापमान लगातार ऊंचा बना रहा।

इस पूरे दौर को केवल सत्ता और विपक्ष की बयानबाजी के रूप में देखना भी अधूरा होगा। इसमें भारत की विदेश नीति, बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, डिजिटल भुगतान, व्यक्तिगत कानून, सिनेमा, विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता और राजनीतिक संचार—सभी एक साथ दिखाई देते हैं।

ब्रिक्स में भारत की मेजबानी और मोदी की कूटनीतिक तस्वीर

12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। भारत ने 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता की और सम्मेलन की थीम थी—“Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” यानी सक्षमता, नवाचार, सहयोग और सतत विकास का निर्माण। आधिकारिक घोषणा के मुताबिक सम्मेलन में विस्तारित ब्रिक्स के राजनीतिक-सुरक्षा, आर्थिक-वित्तीय और सांस्कृतिक-जनसंपर्क सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

सम्मेलन के दौरान मोदी-पुतिन और मोदी-जिनपिंग मुलाकातों की तस्वीरों ने विशेष ध्यान खींचा। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक में दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखने की बात कही और यह दोहराया कि मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए। सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता को दोनों देशों के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।

राष्ट्रपति पुतिन के साथ मुलाकात में ऊर्जा, व्यापार, रक्षा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में भारत-रूस संबंधों पर चर्चा हुई। मोदी ने संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को रास्ता बताया।

यही वजह रही कि सम्मेलन की तस्वीरों को भारतीय मीडिया में विदेश नीति की सक्रियता के प्रतीक के तौर पर खूब दिखाया गया।

आतंकवाद पर ब्रिक्स का संदेश

ब्रिक्स घोषणा-पत्र में आतंकवाद को लेकर स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया। सदस्य देशों ने सभी प्रकार के आतंकवाद की निंदा की और 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमले का भी उल्लेख किया, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई थी।

घोषणा में आतंकवाद के सीमा-पार आवागमन, आतंकवाद की फंडिंग और सुरक्षित पनाहगाहों के खिलाफ सहयोग की बात कही गई। साथ ही यह भी कहा गया कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

भारत के लिए यह मुद्दा स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। सम्मेलन के बाद राजनीतिक विमर्श में इसे भारत की लंबे समय से चली आ रही आतंकवाद के खिलाफ नीति से जोड़कर देखा गया।

हालांकि ब्रिक्स का घोषणा-पत्र केवल आतंकवाद तक सीमित नहीं था। उसमें वैश्विक संस्थाओं में सुधार, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी, व्यापार, ऊर्जा, जलवायु, वित्त और डिजिटल तकनीक जैसे कई विषय शामिल थे।

डॉलर से दूरी की चर्चा कितनी आगे बढ़ी?

ब्रिक्स सम्मेलन की एक बड़ी आर्थिक चर्चा डॉलर पर निर्भरता और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को लेकर रही।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। ब्रिक्स की नई दिल्ली घोषणा में किसी नई साझा ब्रिक्स मुद्रा को तत्काल लागू करने का फैसला नहीं हुआ है। इसके बजाय घोषणा में सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को बेहतर बनाने और ब्रिक्स देशों की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान तथा निवेश की संभावनाओं पर चर्चा जारी रखने की बात कही गई है।

ब्रिक्स Payment Task Force को ऐसे भुगतान तंत्र पर काम आगे बढ़ाने के लिए कहा गया है जो तेज, कम लागत वाला, अधिक सुलभ, पारदर्शी और सुरक्षित हो।

इसलिए ‘डॉलर खत्म करने’ जैसी सीधी व्याख्या की तुलना में यह कहना अधिक सटीक होगा कि ब्रिक्स देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भुगतान के विकल्पों और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने पर काम कर रहे हैं।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉलर की जगह किसी दूसरी मुद्रा को स्थापित करना केवल राजनीतिक घोषणा से संभव नहीं है। इसके लिए वित्तीय बाजार, व्यापार का आकार, मुद्रा की विश्वसनीयता, भुगतान नेटवर्क और केंद्रीय बैंकों की व्यवस्था जैसे कई कारक जरूरी होते हैं।

फिर चर्चा भारत के भीतर लौट आई

ब्रिक्स की कूटनीतिक तस्वीरों के बाद घरेलू राजनीति ने फिर रफ्तार पकड़ी। इस बार मुद्दा था समान नागरिक संहिता यानी UCC

13 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भाजपा-एनडीए शासित 21 राज्यों में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले UCC लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में इसकी दिशा में काम शुरू हो चुका है।

इस बयान के बाद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस तेज हुई।

UCC का मूल विचार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और अन्य व्यक्तिगत नागरिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग नियमों की जगह समान कानूनी व्यवस्था बनाने से जुड़ा है।

सरकार और भाजपा इसे समान नागरिक अधिकारों और एक समान कानूनी व्यवस्था से जोड़ती रही हैं। दूसरी ओर विपक्ष और कुछ सामाजिक समूहों की ओर से यह सवाल उठाया जाता रहा है कि भारत जैसे विविध देश में व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव से पहले व्यापक सामाजिक और विधायी चर्चा जरूरी है।

इस बहस का एक संवैधानिक पहलू भी है। वर्तमान में UCC को लेकर केंद्र की ओर से कोई एक राष्ट्रीय कानून संसद से पारित नहीं किया गया है। कुछ राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर कानून या प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। उत्तराखंड इसका प्रमुख उदाहरण है, जबकि अन्य राज्यों में भी अलग-अलग चरणों में काम चल रहा है।

इसलिए आने वाले समय में यह मुद्दा केवल राजनीतिक नारा नहीं रहेगा, बल्कि कानून, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक प्रथाओं और संघीय ढांचे से जुड़े सवाल भी सामने लाएगा।

UPI पर MDR ने छेड़ी नई बहस

UCC की बहस के बीच एक ऐसा मुद्दा सामने आया जिसका सीधा संबंध आम ग्राहक और दुकानदार से है—UPI पर MDR

15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के पात्र Person-to-Merchant UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होने की घोषणा की गई है। इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन रखी गई है। Person-to-Person भुगतान इस व्यवस्था के दायरे में नहीं है।

यानी यदि कोई ग्राहक दुकान पर 10,000 रुपये का भुगतान करता है और वह पात्र लेनदेन है, तो 0.4 प्रतिशत के हिसाब से 40 रुपये MDR बनता है। 50,000 रुपये पर यह 200 रुपये और 75,000 रुपये पर 300 रुपये होगा। 75,000 रुपये से ऊपर भी अधिकतम सीमा 300 रुपये रहेगी।

सरकार और भुगतान व्यवस्था की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि MDR व्यापारी पक्ष से संबंधित शुल्क है।

लेकिन व्यापारियों की चिंता अलग है।

उनका कहना है कि अगर उनके कारोबार में बड़ी संख्या में 2,000 रुपये से अधिक के UPI भुगतान होते हैं तो कुल भुगतान लागत बढ़ सकती है। इसी वजह से कुछ शहरों में व्यापारियों ने बड़े UPI भुगतान के बजाय नकद भुगतान की अपील शुरू कर दी है। गाजियाबाद में दुकानों के बाहर ऐसे नोटिस लगाए जाने की खबर भी सामने आई है।

यहां भी राजनीतिक बहस शुरू हो गई। विपक्षी नेताओं ने शुल्क को लेकर सरकार की आलोचना की, जबकि सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि छोटे भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान पर कोई MDR नहीं लगाया गया है।

इस बहस में एक और सवाल महत्वपूर्ण है—क्या व्यापारी MDR का बोझ ग्राहक पर डालेंगे? नियम के अनुसार शुल्क व्यापारी पक्ष पर है, लेकिन बाजार में कीमत तय करने की प्रक्रिया अलग होती है। इसलिए इसका वास्तविक असर कारोबार और ग्राहक व्यवहार पर आने वाले महीनों में ज्यादा स्पष्ट होगा।

सिनेमा ने भी बदली बहस की दिशा

राजनीतिक खबरों के बीच फिल्म ‘हनुमान अंश’ की सफलता ने भी लोगों का ध्यान खींचा।

नीम करौली बाबा के जीवन और शिक्षाओं से प्रेरित इस फिल्म के बारे में मीडिया रिपोर्टों में लगभग 2 करोड़ रुपये के बजट और 200 करोड़ रुपये से अधिक की बॉक्स ऑफिस कमाई का उल्लेख किया गया। फिल्म ने शुरुआत में अपेक्षाकृत धीमी शुरुआत की, लेकिन बाद में दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया के कारण इसकी कमाई में बड़ा उछाल आया।

फिल्म की सफलता ने एक पुरानी बहस को फिर जन्म दिया—क्या बड़े सितारे और बहुत बड़ा बजट ही सफलता की गारंटी हैं?

इसका कोई सीधा उत्तर नहीं है। लेकिन ‘हनुमान अंश’ के कारोबार ने यह जरूर दिखाया कि कम बजट की फिल्म भी दर्शकों की प्रतिक्रिया के दम पर बड़े स्तर तक पहुंच सकती है।

फिल्म के निर्देशक और निर्माता इसे दर्शकों से बने जुड़ाव से जोड़ते हैं, जबकि मीडिया विश्लेषण में धार्मिक और आध्यात्मिक विषय की लोकप्रियता को भी सफलता के कारणों में गिना गया है।

उमर खालिद की डॉक्यूमेंट्री और अभिव्यक्ति की बहस

इसी समय उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘Prisoner No. 626710 is Present’ की स्क्रीनिंग को लेकर विवाद सामने आया।

बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में प्रस्तावित स्क्रीनिंग को सुरक्षा और व्यवस्थागत कारणों से टाले जाने की खबर सामने आई। विश्वविद्यालय ने कहा कि निर्णय किसी दबाव में नहीं लिया गया।

इसके बाद हैदराबाद के IIIT में प्रस्तावित स्क्रीनिंग को लेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी CBFC की ओर से प्रमाणन संबंधी आपत्ति सामने आई। बाद में संस्थान ने कार्यक्रम से दूरी स्पष्ट की।

यह मामला केवल एक डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग का नहीं रह गया। इसके साथ विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक विषयों पर चर्चा, फिल्म प्रमाणन और कैंपस में सुरक्षा जैसे सवाल जुड़ गए।

यही लोकतांत्रिक विमर्श की जटिलता है—एक पक्ष इसे चर्चा की स्वतंत्रता से जोड़ता है तो दूसरा कानून और संस्थागत जिम्मेदारियों की बात करता है।

मोदी का 76वां जन्मदिन और ‘ब्रांड मोदी’

17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 वर्ष के हुए। उनके जन्मदिन के मौके पर देश के अलग-अलग हिस्सों में राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।

गुजरात में दीये जलाने, पौधरोपण और बाइक यात्रा जैसे कार्यक्रम हुए। वडनगर से वाराणसी और वाराणसी से वडनगर तक ‘सेवा संकल्प बाइक यात्रा’ भी आयोजित की गई।

उज्जैन में 33 लाख से अधिक दीये जलाए जाने और मध्य प्रदेश में कुल 3.55 करोड़ दीये जलाए जाने की खबर सामने आई।

‘आशीर्वाद का दीया’ जैसे आयोजनों को प्रधानमंत्री के जन्मदिन और सेवा-संकल्प अभियान से जोड़ा गया। अलग-अलग राज्यों में कार्यक्रमों का आकार अलग रहा।

इन आयोजनों के बीच टीवी चैनलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने ‘ब्रांड मोदी’ पर भी चर्चा की। यह सवाल उठाया गया कि इतने लंबे राजनीतिक जीवन के बाद भी प्रधानमंत्री का राजनीतिक संचार लगातार नए माध्यमों और नई पीढ़ियों तक कैसे पहुंच रहा है।

Gen-Z और राजनीतिक संचार का नया दौर

आज की राजनीति केवल रैलियों, पोस्टरों और भाषणों तक सीमित नहीं है। Instagram, YouTube, X और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीतिक संवाद के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं।

जुलाई 2026 में परीक्षा सुधारों को लेकर युवाओं के बीच हुए विरोध के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने Instagram के माध्यम से Gen-Z तक पहुंच बनाने की कोशिश की। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने युवाओं से जुड़े मुद्दों पर वीडियो संदेशों के जरिए संवाद किया।

यही वजह है कि राजनीतिक संचार के विशेषज्ञ अब नेताओं की डिजिटल उपस्थिति को भी उनकी सार्वजनिक छवि का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।

‘ब्रांड मोदी’ पर बहस करने वाले विश्लेषकों में कुछ इसे समय के अनुसार संचार शैली बदलने की क्षमता के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर आलोचक इस तरह के राजनीतिक ब्रांडिंग मॉडल को सत्ता और संचार के बीच बढ़ती निकटता के संदर्भ में देखते हैं।

दोनों दृष्टिकोणों को समझने के लिए जरूरी है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता को स्वतः राजनीतिक समर्थन का प्रमाण न माना जाए। डिजिटल पहुंच और चुनावी समर्थन दो अलग-अलग चीजें हैं।

अमेरिका और रूस के तेल पर नया दबाव

सितंबर के तीसरे सप्ताह में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 20 सितंबर 2026 को रूस और ईरान से जुड़े नए प्रतिबंध कानून पर हस्ताक्षर किए। इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर परिस्थितियों के अनुसार 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी प्रशासन को मिलती है। हालांकि कानून के तहत किसी देश पर स्वतः 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हो जाता; आगे प्रशासन के फैसले महत्वपूर्ण होंगे।

भारत के लिए यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में रहा है।

रॉयटर्स के अनुसार नई अमेरिकी व्यवस्था भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात—दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत ने अपनी ओर से ऊर्जा सुरक्षा और स्रोतों के विविधीकरण पर जोर दिया है।

भारतीय राजनीतिक बहस में इसे कुछ लोग अमेरिकी दबाव के रूप में देख रहे हैं, जबकि अमेरिकी पक्ष का मूल तर्क रूस की ऊर्जा आय पर दबाव डालकर यूक्रेन युद्ध की आर्थिक क्षमता को प्रभावित करने से जुड़ा है।

इस मुद्दे पर आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी प्रशासन वास्तव में किन देशों पर और किस स्तर के शुल्क लागू करता है।

सितंबर की राजनीति में एक साथ कई भारत

इन सभी घटनाओं को एक साथ देखें तो सितंबर 2026 का भारत एक ही समय में कई स्तरों पर दिखाई देता है।

एक भारत ब्रिक्स में वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने की बात कर रहा है।

दूसरा भारत UCC को लेकर व्यक्तिगत कानून और समान नागरिक संहिता पर बहस कर रहा है।

तीसरा भारत UPI जैसे डिजिटल भुगतान माध्यम में लागत और व्यापारी हितों का हिसाब लगा रहा है।

चौथा भारत सिनेमा के जरिए धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को पर्दे पर देख रहा है।

पांचवां भारत विश्वविद्यालयों में राजनीतिक विषयों पर फिल्म दिखाने की स्वतंत्रता और कानूनी सीमाओं पर बहस कर रहा है।

और छठा भारत सोशल मीडिया के दौर में राजनीति के नए संचार मॉडल को देख रहा है।

इन सभी घटनाओं में एक चीज समान है—राजनीति अब केवल संसद या चुनावी रैलियों तक सीमित नहीं रह गई है।

विदेश नीति से लेकर QR कोड तक, सिनेमा से लेकर विश्वविद्यालय तक और Instagram से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक, राजनीति और सार्वजनिक नीति का प्रभाव रोजमर्रा की जिंदगी के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई देता है।

आगे की असली परीक्षा

BRICS की घोषणाएं कितनी व्यावहारिक बनती हैं, UCC कितने राज्यों में किस रूप में लागू होता है, UPI MDR का व्यापार पर वास्तविक असर कितना पड़ता है और रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका कितने और किस प्रकार के शुल्क लगाता है—इन सभी सवालों के उत्तर आने वाले महीनों में सामने आएंगे।

इसी तरह ‘ब्रांड मोदी’ की डिजिटल रणनीति कितनी प्रभावी रहती है, यह भी केवल सोशल मीडिया पोस्ट या जन्मदिन के आयोजनों से तय नहीं होगा। इसका आकलन व्यापक राजनीतिक और सामाजिक संकेतकों के आधार पर ही किया जा सकता है।

फिलहाल सितंबर 2026 की तस्वीर यही है कि भारत के सार्वजनिक विमर्श में विदेश नीति, अर्थव्यवस्था, कानून, डिजिटल तकनीक, संस्कृति और राजनीति एक-दूसरे से तेजी से जुड़ रहे हैं।

BRICS में स्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान की चर्चा हो या UPI में व्यापारी शुल्क की बहस, UCC हो या किसी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग—हर मुद्दा अपने साथ एक बड़ा सवाल लेकर आ रहा है।

और शायद यही इस पूरे दौर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।

भारत की राजनीति अब केवल ‘कौन सत्ता में है’ का सवाल नहीं रह गई है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है कि सरकारें किस तरह कानून बनाती हैं, दुनिया से कैसे संबंध रखती हैं, तकनीक का इस्तेमाल कैसे होता है, नागरिकों तक संदेश कैसे पहुंचता है और समाज इन फैसलों पर किस तरह प्रतिक्रिया देता है।

सितंबर 2026 की घटनाएं इसी बदलती राजनीतिक और सामाजिक तस्वीर की अलग-अलग झलकियां हैं।