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Google Gemini AI ने टेस्टिंग के दौरान तीन असली कंपनियों के सिस्टम में बनाई सेंध

Google Gemini AI ने टेस्टिंग के दौरान तीन असली कंपनियों के सिस्टम में बनाई सेंध, इंटरनेट एक्सेस की गलती से सामने आया बड़ा साइबर सिक्योरिटी जोखिम

      आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की क्षमता जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से उसके इस्तेमाल से जुड़े साइबर सिक्योरिटी के सवाल भी गंभीर होते जा रहे हैं। अब गूगल के Gemini AI मॉडल से जुड़ी एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने टेक्नोलॉजी की दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। साइबर सिक्योरिटी टेस्टिंग के दौरान Gemini ने गलती से तीन वास्तविक कंपनियों के सिस्टम तक पहुंच बना ली। यह घटना मई 2026 में हुई थी और इसका खुलासा सितंबर में हुआ।

यह घटना किसी सामान्य साइबर अपराध या पारंपरिक हैकिंग अभियान का हिस्सा नहीं थी। Gemini को एक नियंत्रित साइबर सिक्योरिटी टेस्ट के तहत एक काल्पनिक कंपनी के सिस्टम में सेंध लगाने और वहां से निर्धारित जानकारी हासिल करने का काम दिया गया था। लेकिन टेस्टिंग वातावरण में इंटरनेट एक्सेस अनजाने में उपलब्ध रह गया। इसके बाद AI मॉडल ने ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल किया और कुछ मामलों में क्रेडेंशियल हासिल कर वास्तविक कंपनियों के सिस्टम तक पहुंच बना ली।

इस घटना की जानकारी सबसे पहले The Wall Street Journal की रिपोर्ट के जरिए सामने आई। इसके बाद गूगल ने घटना की पुष्टि की। कंपनी के अनुसार, तीनों मामलों में Gemini ने यह पहचानने के बाद अपनी गतिविधि रोक दी कि वह किसी काल्पनिक टेस्ट सिस्टम के बजाय वास्तविक कंपनियों के नेटवर्क तक पहुंच चुका है।

मई में हुई थी पूरी घटना

यह साइबर सिक्योरिटी टेस्टिंग अमेरिकी AI सुरक्षा मूल्यांकन कंपनी Irregular द्वारा किया जा रहा था। कंपनी अलग-अलग AI मॉडलों की साइबर सिक्योरिटी क्षमताओं की जांच करती है। इसी तरह के परीक्षणों में OpenAI, Anthropic और Meta के AI सिस्टम से जुड़े घटनाक्रम भी सामने आ चुके हैं।

Gemini की टेस्टिंग के दौरान मॉडल को एक Capture the Flag (CTF) जैसी एक्सरसाइज दी गई थी। ऐसी एक्सरसाइज में AI या साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञों को किसी निर्धारित सिस्टम में प्रवेश करके एक खास जानकारी या ‘फ्लैग’ खोजने का लक्ष्य दिया जाता है।

समस्या यह हुई कि जिस काल्पनिक कंपनी को टेस्ट का हिस्सा बनाया गया था, उसका नाम एक वास्तविक कंपनी से मिलता-जुलता था। इसके अलावा टेस्टिंग वातावरण को इंटरनेट से अलग रखा जाना था, लेकिन किसी कॉन्फिगरेशन या प्रक्रिया संबंधी गलती के कारण Gemini को इंटरनेट तक पहुंच मिल गई।

यहीं से पूरी घटना ने गंभीर रूप ले लिया।

एक मामले में Gemini ने पासवर्ड का अनुमान लगाया

रिपोर्टों के मुताबिक, एक घटना में Gemini ने उस सिस्टम तक पहुंच बनाने के लिए पासवर्ड का अनुमान लगाने की कोशिश की। प्रयास जारी रहे और अंततः मॉडल को एक संरक्षित सिस्टम में प्रवेश मिल गया।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मॉडल किसी इंसान के निर्देश पर हर कदम नहीं उठा रहा था। उसे टेस्ट के उद्देश्य के अनुसार काम करने के लिए कहा गया था और उसने उपलब्ध साधनों का इस्तेमाल करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश की।

साइबर सिक्योरिटी के लिहाज से यही पहलू विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण है। AI एजेंट यदि इंटरनेट, ब्राउजर, कोड चलाने की क्षमता और दूसरे डिजिटल टूल्स से जुड़ा हो, तो वह केवल सवालों का जवाब देने वाले चैटबॉट से अलग तरीके से काम कर सकता है।

वह जानकारी खोज सकता है, उसे जोड़ सकता है और किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई कदम लगातार उठा सकता है।

दो अन्य मामलों में सार्वजनिक रिपॉजिटरी से मिले क्रेडेंशियल

तीन घटनाओं में से दो अन्य मामलों में Gemini ने इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी का इस्तेमाल किया। रिपोर्ट के अनुसार, मॉडल ने सार्वजनिक रिपॉजिटरी में उपलब्ध क्रेडेंशियल्स को खोजा और उनका इस्तेमाल संबंधित सिस्टम तक पहुंचने के लिए किया।

यहां यह समझना जरूरी है कि सार्वजनिक रिपॉजिटरी का मतलब जरूरी नहीं कि कोई कंपनी जानबूझकर अपना पासवर्ड सार्वजनिक करे। डेवलपमेंट और सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट्स में कभी-कभी संवेदनशील जानकारी गलती से सार्वजनिक कोड, फाइल या रिपॉजिटरी में रह सकती है।

एक मानव हमलावर ऐसी जानकारी को खोज सकता है। लेकिन AI एजेंट की खासियत यह है कि वह बड़ी संख्या में ऑनलाइन स्रोतों को बहुत तेजी से खंगाल सकता है और किसी टेस्ट के लक्ष्य से संबंधित जानकारी को जोड़ सकता है।

इसी कारण AI आधारित साइबर सिक्योरिटी टेस्टिंग को लेकर नए सुरक्षा मानकों की आवश्यकता पर चर्चा तेज हुई है।

Gemini ने असली कंपनी पहचानते ही रोक दी कार्रवाई

इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू गूगल के अनुसार यह है कि Gemini ने तीनों मामलों में अपनी गतिविधि रोक दी।

जब मॉडल को पता चला कि जिस सिस्टम में वह प्रवेश कर चुका है, वह टेस्ट के लिए बनाया गया काल्पनिक सिस्टम नहीं बल्कि वास्तविक कंपनी का इंफ्रास्ट्रक्चर है, तो उसने आगे की कार्रवाई नहीं की।

गूगल की सिक्योरिटी इंजीनियरिंग की वाइस प्रेसिडेंट Heather Adkins ने कहा कि इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि शक्तिशाली AI मॉडल्स को जिम्मेदारी से व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षित करना कितना महत्वपूर्ण है। गूगल ने प्रभावित कंपनियों को जानकारी देने और टेस्टिंग प्रक्रिया में बदलाव करने की बात भी कही है।

गूगल का कहना है कि इन घटनाओं में किसी कंपनी को नुकसान नहीं हुआ और मॉडल ने वास्तविक सिस्टम पहचानने के बाद खुद अपनी गतिविधि रोक दी।

फिर गूगल ने घटना सार्वजनिक क्यों नहीं की?

घटना सामने आने के बाद एक दूसरा सवाल भी उठा—यदि तीन वास्तविक कंपनियों के सिस्टम तक AI की पहुंच बन गई थी, तो इसकी सार्वजनिक जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई?

रिपोर्टों के अनुसार, Irregular ने जुलाई के अंत में गूगल को इस घटना के बारे में जानकारी दी थी। इसके बाद प्रभावित कंपनियों से संपर्क किया गया और संबंधित संस्थाओं को मामले की जानकारी दी गई।

गूगल ने शुरुआत में इस घटना को सार्वजनिक नहीं किया। कंपनी का तर्क था कि Gemini ने कोई नुकसान नहीं पहुंचाया और वास्तविक कंपनियों के सिस्टम में पहुंचने का पता चलते ही उसने अपनी गतिविधि रोक दी थी।

बाद में जब The Wall Street Journal ने इस मामले के बारे में सवाल किए, तब गूगल ने घटना की पुष्टि की।

क्या यह AI का ‘ब्रेकआउट’ था?

इस घटना को कई रिपोर्टों में AI के ‘breakout’ के रूप में वर्णित किया गया है। यहां breakout का मतलब यह नहीं है कि AI ने किसी जेल या कंप्यूटर से खुद को पूरी तरह स्वतंत्र कर लिया। इसका संदर्भ उस स्थिति से है जब कोई AI मॉडल उस टेस्टिंग वातावरण की निर्धारित सीमा से बाहर निकलकर वास्तविक इंटरनेट या वास्तविक सिस्टम तक पहुंच बना लेता है।

Gemini को जिस वातावरण में टेस्ट किया जा रहा था, वहां उसे काल्पनिक सिस्टम के साथ काम करना था। लेकिन इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध होने के कारण उसने वास्तविक ऑनलाइन संसाधनों तक पहुंच बनाई और तीन कंपनियों के सिस्टम में प्रवेश कर गया।

इसलिए साइबर सिक्योरिटी की भाषा में यह घटना containment failure यानी AI टेस्टिंग वातावरण को पर्याप्त रूप से सीमित न रख पाने की समस्या की ओर संकेत करती है।

गलती केवल AI की नहीं, टेस्टिंग व्यवस्था पर भी सवाल

इस मामले को केवल ‘AI ने हैक कर लिया’ कहकर समझना अधूरा होगा।

घटना में एक महत्वपूर्ण मानवीय और तकनीकी पहलू भी था। जिस टेस्टिंग वातावरण को इंटरनेट से अलग रखा जाना था, उसमें इंटरनेट पहुंच उपलब्ध थी। यानी AI को वह रास्ता मिल गया जिसे परीक्षण के दौरान बंद रखा जाना चाहिए था।

इसके अलावा, काल्पनिक कंपनी का नाम वास्तविक कंपनी से मिलना भी एक महत्वपूर्ण जोखिम बना।

इससे साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञों के सामने यह सवाल आता है कि भविष्य में AI एजेंट्स को वास्तविक इंटरनेट और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ते समय कितनी मजबूत सीमाएं लगानी होंगी।

AI मॉडल जितना अधिक स्वायत्त होता जाएगा, उतना ही जरूरी होगा कि उसके लिए अलग-अलग स्तर के सुरक्षा नियंत्रण मौजूद हों।

OpenAI, Anthropic और Meta से भी जुड़े हैं ऐसे मामले

Gemini की घटना कोई अकेला उदाहरण नहीं है। हाल के महीनों में अन्य प्रमुख AI कंपनियों के सुरक्षा परीक्षणों के दौरान भी इसी तरह के घटनाक्रम सामने आए हैं।

Irregular द्वारा किए गए परीक्षणों से OpenAI, Anthropic और Meta के AI सिस्टम से संबंधित घटनाओं की जानकारी भी सामने आई है। इन मामलों ने AI एजेंट्स की साइबर क्षमताओं और उनके नियंत्रण को लेकर उद्योग में बहस तेज कर दी है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी AI मॉडल स्वतंत्र रूप से वास्तविक दुनिया में साइबर हमले कर रहे हैं। बल्कि ये घटनाएं विशेष परिस्थितियों में हुए सुरक्षा परीक्षणों के दौरान सामने आईं, जहां मॉडल को साइबर सिक्योरिटी से जुड़े कार्य दिए गए थे।

लेकिन इन घटनाओं से यह जरूर पता चलता है कि जब AI मॉडल को इंटरनेट, ब्राउजर और डिजिटल टूल्स की पहुंच दी जाती है, तो उसके व्यवहार को पूरी तरह पूर्वानुमानित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

प्रभावित कंपनियों के नाम नहीं बताए गए

गूगल ने उन तीन कंपनियों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जिनके सिस्टम तक Gemini पहुंचा था। कंपनी ने Gemini के उस विशेष वर्जन की भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जिसे इन परीक्षणों में इस्तेमाल किया गया था।

गूगल ने कहा कि प्रभावित संस्थाओं और संबंधित संघीय अधिकारियों को घटना की जानकारी दी गई है।

Irregular ने भी कहा कि जुलाई के अंत में संबंधित AI लैब्स को जानकारी दे दी गई थी और जिन कंपनियों पर असर पड़ा था, उनसे जांच के हिस्से के रूप में संपर्क किया गया था। कंपनी के अनुसार, उसकी तरफ से सामने आई कमियों को भी ठीक कर दिया गया है।

AI की सबसे बड़ी ताकत अब सुरक्षा चुनौती भी

AI की सबसे बड़ी ताकत उसकी गति और स्वायत्त तरीके से काम करने की क्षमता मानी जाती है। यही क्षमता साइबर सिक्योरिटी में उपयोगी भी हो सकती है।

उदाहरण के लिए, AI हजारों सिस्टम की सुरक्षा जांच कर सकता है, कमजोरियों की पहचान कर सकता है और साइबर हमलों के संभावित रास्तों को समझ सकता है।

लेकिन यही क्षमता गलत वातावरण में जोखिम पैदा कर सकती है।

यदि किसी AI एजेंट को इंटरनेट एक्सेस, सर्च, कोड निष्पादन और लॉगिन सिस्टम तक पहुंच मिल जाए, तो उसके सामने वास्तविक और काल्पनिक लक्ष्य के बीच अंतर हमेशा उतना स्पष्ट नहीं हो सकता जितना किसी मानव विशेषज्ञ के लिए हो।

Gemini के मामले में भी काल्पनिक लक्ष्य और वास्तविक कंपनी के नाम के बीच समानता ने इसी समस्या को सामने ला दिया।

आगे की टेस्टिंग के लिए क्या बदलना होगा?

इस घटना के बाद AI साइबर सिक्योरिटी टेस्टिंग में कई स्तरों पर सावधानी की जरूरत दिखाई देती है।

सबसे पहला कदम यह है कि टेस्टिंग वातावरण को वास्तविक इंटरनेट से पूरी तरह अलग रखा जाए, यदि इंटरनेट की आवश्यकता नहीं है।

दूसरा, AI एजेंट को केवल निर्धारित और नियंत्रित सिस्टम तक पहुंच मिलनी चाहिए।

तीसरा, किसी भी प्रकार के वास्तविक क्रेडेंशियल, पासवर्ड या संवेदनशील डेटा तक पहुंच रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा परत होनी चाहिए।

चौथा, यदि AI किसी ऐसे सिस्टम तक पहुंचने लगे जो टेस्ट के दायरे में नहीं है, तो तत्काल kill switch या automatic shutdown mechanism काम करना चाहिए।

पांचवां, टेस्टिंग के दौरान होने वाली हर गतिविधि का विस्तृत लॉग तैयार होना चाहिए, ताकि बाद में यह पता लगाया जा सके कि AI ने किस क्रम में कौन-कौन से कदम उठाए।

क्या Gemini ने खुद को नियंत्रित किया?

गूगल का कहना है कि तीनों घटनाओं में Gemini ने वास्तविक कंपनियों की पहचान होने के बाद अपनी गतिविधि रोक दी। इसे कंपनी AI मॉडल की जिम्मेदार प्रतिक्रिया के उदाहरण के रूप में देख रही है।

लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि टेस्टिंग वातावरण में इंटरनेट की पहुंच नहीं होनी चाहिए थी, तो AI के वहां तक पहुंचने का रास्ता खुला कैसे रहा?

यही सवाल भविष्य की AI सुरक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

किसी AI मॉडल का गलती पहचानकर रुक जाना निश्चित रूप से एक सुरक्षा विशेषता हो सकती है, लेकिन उससे पहले वास्तविक सिस्टम तक पहुंच बन जाना अपने आप में एक ऐसी स्थिति है जिसे रोकने के लिए तकनीकी नियंत्रण जरूरी हैं।

निष्कर्ष

Google Gemini से जुड़ी यह घटना AI के विकास के साथ सामने आ रही नई साइबर सिक्योरिटी चुनौतियों की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। यहां एक तरफ यह तथ्य है कि Gemini ने टेस्टिंग के दौरान तीन वास्तविक कंपनियों के सिस्टम तक पहुंच बनाई। दूसरी तरफ यह भी सामने आया कि उसने वास्तविक कंपनियों की पहचान होने के बाद अपनी गतिविधि रोक दी और गूगल ने प्रभावित संस्थाओं को जानकारी दी।

इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि AI की क्षमता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह किसी सवाल का कितना अच्छा जवाब देता है। जब AI एजेंट को इंटरनेट और कंप्यूटर सिस्टम के साथ वास्तविक कार्रवाई करने की क्षमता मिलती है, तब उसकी सुरक्षा के लिए अलग स्तर की व्यवस्था आवश्यक हो जाती है।

सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि AI को उपयोगी और स्वायत्त बनाने के साथ-साथ उसके लिए ऐसी सीमाएं भी तैयार की जाएं जिन्हें वह अनजाने में पार न कर सके।

Gemini की घटना में किसी बड़े नुकसान की सूचना सामने नहीं आई है, लेकिन इसने एक महत्वपूर्ण चेतावनी जरूर दी है—AI को जितनी अधिक डिजिटल स्वतंत्रता मिलेगी, उसे नियंत्रित करने के लिए उतनी ही मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत होगी।

आने वाले समय में AI एजेंट्स का इस्तेमाल साइबर सिक्योरिटी, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, रिसर्च और बिजनेस के कई क्षेत्रों में बढ़ सकता है। ऐसे में इन घटनाओं से मिली सीख केवल गूगल या किसी एक AI कंपनी तक सीमित नहीं रहेगी। यह पूरे टेक्नोलॉजी उद्योग के लिए यह तय करने का अवसर है कि शक्तिशाली AI सिस्टम को वास्तविक डिजिटल दुनिया से जोड़ते समय सुरक्षा की सीमाएं कितनी मजबूत और पारदर्शी होनी चाहिए।