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झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: अर्ध-न्यायिक अधिकारी की कानूनी गलती को कदाचार नहीं माना जा सकता,

झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: अर्ध-न्यायिक अधिकारी की कानूनी गलती को कदाचार नहीं माना जा सकता, बाहरी प्रभाव या गलत मंशा का आरोप जरूरी

       झारखंड हाईकोर्ट ने अर्ध-न्यायिक अधिकारियों की स्वतंत्रता और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी अधिकारी द्वारा अपने वैध अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए कानून की गलत व्याख्या कर देना या कानून को समझने में गलती कर देना अपने आप में कदाचार (Misconduct) नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि यदि कोई अर्ध-न्यायिक अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर किसी मामले में आदेश पारित करता है और बाद में उस आदेश की कानूनी व्याख्या गलत पाई जाती है, तो केवल इसी आधार पर उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती। विभागीय कार्रवाई के लिए आरोपों में ऐसे अतिरिक्त तत्व दिखाई देने चाहिए, जिनसे यह संकेत मिले कि अधिकारी ने बाहरी प्रभाव में आकर, अनुचित उद्देश्य से, गलत मंशा के साथ या किसी अन्य ऐसे कारण से निर्णय लिया, जो सामान्य कानूनी भूल से आगे जाकर कदाचार की श्रेणी में आता हो।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। EPFO ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी CAT के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके जरिए सहायक भविष्य निधि आयुक्त के खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को रद्द कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के निष्कर्ष से सहमति जताई और EPFO की याचिका खारिज कर दी।

कटिहार मेडिकल कॉलेज से जुड़ा था मामला

यह पूरा विवाद कटिहार मेडिकल कॉलेज से संबंधित भविष्य निधि की कार्यवाही से जुड़ा था। संबंधित अधिकारी उस समय सहायक भविष्य निधि आयुक्त (Assistant Provident Fund Commissioner) के पद पर कार्यरत थे।

अधिकारी ने कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 यानी Employees’ Provident Funds and Miscellaneous Provisions Act, 1952 की धारा 7C के तहत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मामले की सुनवाई और कार्यवाही की थी।

धारा 7C के तहत सक्षम अधिकारी को भविष्य निधि से संबंधित कुछ परिस्थितियों में बकाया राशि का निर्धारण करने का अधिकार प्राप्त है। इस मामले में भी अधिकारी ने अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र के तहत कार्यवाही आगे बढ़ाई।

बाद में मामले से संबंधित आदेश के खिलाफ अपीलीय स्तर पर कार्यवाही हुई और EPF Appellate Tribunal ने मामले को वापस संबंधित अधिकारी के पास भेज दिया।

इसके बाद अधिकारी ने 4 नवंबर 2010 को कार्यवाही बंद करने का आदेश पारित कर दिया।

यहीं से विवाद ने एक अलग रूप ले लिया।

आदेश के बाद अधिकारी पर शुरू हुई विभागीय कार्रवाई

कार्यवाही बंद करने के आदेश के बाद संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई। उनके ऊपर आरोप लगाया गया कि उन्होंने मामले की जांच और कार्यवाही के दौरान पर्याप्त सावधानी नहीं बरती और जल्दबाजी में निर्णय लिया।

विभागीय कार्यवाही में यह सवाल उठाया गया कि अधिकारी ने मामले से संबंधित तथ्यों और रिकॉर्ड का उचित तरीके से परीक्षण नहीं किया तथा उनके निर्णय में आवश्यक सावधानी का अभाव था।

विभागीय जांच आगे बढ़ी और अंततः अधिकारी को दंडित किया गया। उन्हें उनकी पेंशन में पांच वर्ष की अवधि के लिए 30 प्रतिशत कटौती की सजा दी गई।

अधिकारी ने इस कार्रवाई को चुनौती दी। मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के सामने पहुंचा।

CAT ने विभागीय कार्रवाई को कर दिया था रद्द

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने मामले पर विचार करने के बाद विभागीय कार्रवाई को रद्द कर दिया।

अधिकरण का मुख्य विचार यह था कि किसी अर्ध-न्यायिक अधिकारी द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में रहते हुए पारित किए गए आदेश से विभाग का असहमत होना अपने आप में विभागीय कार्रवाई का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता।

यदि अधिकारी ने किसी कानूनी प्रावधान की गलत व्याख्या कर दी है या उसके द्वारा पारित आदेश बाद में कानूनी कसौटी पर सही नहीं पाया जाता, तो उस आदेश को चुनौती देने के लिए अपीलीय या न्यायिक प्रक्रिया उपलब्ध है।

लेकिन केवल आदेश की शुद्धता पर सवाल उठाकर अधिकारी को विभागीय दंड देना अलग विषय है।

CAT के इसी आदेश को EPFO ने झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने भी माना- हर कानूनी गलती कदाचार नहीं

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पूरे मामले की जांच के बाद CAT के निष्कर्ष को सही माना।

पीठ ने स्पष्ट किया कि अर्ध-न्यायिक अधिकारी जब कानून के तहत दिए गए अधिकार क्षेत्र में कार्य करता है, तो उसे किसी विवाद का निर्णय लेते समय कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करनी होती है। ऐसी स्थिति में कानून की व्याख्या में गलती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन कानून की ऐसी गलती को सीधे कदाचार मान लेना उचित नहीं होगा।

अदालत ने मूल रूप से यह अंतर स्पष्ट किया कि कानूनी भूल और कदाचार एक ही चीज नहीं हैं।

यदि किसी अधिकारी ने ईमानदारी से किसी कानूनी प्रावधान की ऐसी व्याख्या की जो बाद में गलत साबित हो गई, तो केवल इस वजह से उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई नहीं की जा सकती।

इसके लिए विभाग को यह दिखाना होगा कि मामला केवल कानूनी गलती तक सीमित नहीं था।

विभागीय कार्रवाई के लिए क्या साबित करना होगा?

हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि यदि किसी अर्ध-न्यायिक अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी है तो आरोप पत्र में ऐसे तथ्य होने चाहिए, जिनसे यह पता चले कि अधिकारी के निर्णय के पीछे कोई अनुचित तत्व मौजूद था।

मसलन, यदि अधिकारी पर बाहरी प्रभाव में काम करने, किसी व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से निर्णय लेने, अनुचित दबाव में आदेश पारित करने या किसी गलत उद्देश्य से अपने अधिकार का इस्तेमाल करने का आरोप हो, तो मामला अलग हो सकता है।

इसी तरह यदि अधिकारी की ईमानदारी पर सवाल उठाने वाला कोई ठोस आरोप हो या उसके आचरण में ऐसी बात सामने आती हो जो सामान्य कानूनी भूल से आगे जाकर कदाचार की ओर संकेत करती हो, तब विभागीय जांच का आधार बन सकता है।

लेकिन यहां ऐसा कोई आरोप नहीं था।

आरोप पत्र में ईमानदारी पर सवाल नहीं था

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ जारी आरोप पत्र में उनकी ईमानदारी, नैतिक अधमता (Moral Turpitude), बाहरी प्रभाव, अनुचित उद्देश्य या किसी गलत मंशा से संबंधित कोई स्पष्ट आरोप नहीं लगाया गया था।

आरोप मुख्य रूप से उनके द्वारा की गई कार्यवाही और पारित आदेश की कानूनी शुद्धता तथा प्रक्रिया से जुड़े थे।

यही बिंदु हाईकोर्ट के सामने महत्वपूर्ण रहा।

यदि विभाग यह आरोप लगाता कि अधिकारी ने जानबूझकर किसी पक्ष को फायदा पहुंचाने के लिए कानून की गलत व्याख्या की, किसी बाहरी व्यक्ति के प्रभाव में निर्णय लिया या किसी अनुचित उद्देश्य से मामले को बंद किया, तो मामला अलग तरह से देखा जा सकता था।

लेकिन केवल यह कहना कि अधिकारी ने मामले में जल्दबाजी की या उनका कानूनी निष्कर्ष सही नहीं था, अपने आप में कदाचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।

अर्ध-न्यायिक स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है

हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले में अर्ध-न्यायिक अधिकारियों की स्वतंत्रता के पहलू को भी महत्वपूर्ण माना।

अर्ध-न्यायिक अधिकारी को कानून के आधार पर किसी मामले में अपना निर्णय लेना होता है। उसके सामने आने वाले मामलों में पक्षकारों की दलीलें, रिकॉर्ड और संबंधित कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करनी पड़ती है।

यदि हर गलत कानूनी व्याख्या को विभागीय कदाचार मान लिया जाए तो अधिकारी स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में संकोच कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में अधिकारी यह सोच सकता है कि यदि उसका निर्णय बाद में किसी उच्च अधिकारी, अधिकरण या अदालत द्वारा गलत ठहरा दिया गया तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई हो सकती है।

हाईकोर्ट ने इसी खतरे की ओर ध्यान दिलाते हुए माना कि सामान्य कानूनी भूल को कदाचार की श्रेणी में रखना अर्ध-न्यायिक कार्यप्रणाली की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।

आदेश गलत हो तो अपील का रास्ता मौजूद है

अर्ध-न्यायिक अधिकारी के आदेश से किसी पक्ष को असहमति हो तो कानून ने उसके लिए अपील और न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था की है।

किसी आदेश के कानूनी रूप से गलत होने का सवाल और अधिकारी के व्यक्तिगत आचरण में कदाचार होने का सवाल दो अलग-अलग बातें हैं।

यदि कोई पक्ष मानता है कि अधिकारी ने कानून की गलत व्याख्या की है, तो वह निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत उस आदेश को चुनौती दे सकता है।

अपील करने वाली अदालत या अधिकरण यह देख सकता है कि कानून की व्याख्या सही थी या नहीं, रिकॉर्ड का उचित मूल्यांकन हुआ या नहीं और आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ है या नहीं।

लेकिन विभागीय अनुशासन की प्रक्रिया का उद्देश्य हर गलत न्यायिक या अर्ध-न्यायिक आदेश को दंडित करना नहीं है।

‘गलत फैसला’ और ‘गलत मंशा’ में अंतर

इस फैसले से निकलने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत यह है कि किसी आदेश के गलत होने और आदेश पारित करने वाले अधिकारी की मंशा गलत होने के बीच अंतर किया जाना चाहिए।

मान लीजिए किसी अधिकारी ने कानून की दो संभावित व्याख्याओं में से एक व्याख्या अपनाई और बाद में उच्च न्यायालय ने दूसरी व्याख्या को सही माना। ऐसी स्थिति में केवल इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अधिकारी ने कदाचार किया था।

दूसरी ओर, यदि रिकॉर्ड से यह सामने आए कि अधिकारी ने जानबूझकर कानून की अनदेखी की, किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ देने के लिए निर्णय लिया या किसी बाहरी दबाव अथवा व्यक्तिगत उद्देश्य से अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, तो मामला अलग हो सकता है।

यानी विभागीय कार्रवाई के लिए केवल decision-making error नहीं, बल्कि आरोपों में उससे आगे की सामग्री होना आवश्यक है।

जल्दबाजी का आरोप भी अपने आप पर्याप्त नहीं

इस मामले में अधिकारी पर जांच के दौरान लापरवाही और जल्दबाजी बरतने का आरोप भी लगाया गया था।

लेकिन हाईकोर्ट ने यह देखा कि इन आरोपों को किस तरह कदाचार से जोड़ा गया है। केवल यह कहना कि अधिकारी ने मामले को जल्द निपटा दिया या रिकॉर्ड के किसी पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया, तब तक पर्याप्त नहीं हो सकता जब तक आरोपों से किसी गंभीर अनुचित आचरण का संकेत न मिले।

यदि विभाग किसी अधिकारी पर लापरवाही के आधार पर कार्रवाई करना चाहता है तो उसे यह भी दिखाना होगा कि वह लापरवाही सामान्य निर्णयगत भूल से किस तरह अलग है और उसका स्वरूप कदाचार के स्तर तक कैसे पहुंचता है।

इस मामले में हाईकोर्ट को आरोप पत्र में ऐसी सामग्री नहीं मिली।

पेंशन में 30 प्रतिशत कटौती का आदेश भी नहीं बचा

विभागीय कार्रवाई के अंत में अधिकारी की पेंशन में पांच साल के लिए 30 प्रतिशत कटौती का दंड लगाया गया था।

चूंकि मूल विभागीय कार्रवाई को ही उचित आधार पर शुरू किया गया नहीं माना गया, इसलिए उस कार्रवाई से जुड़ी सजा भी कायम नहीं रह सकी।

CAT ने पहले ही विभागीय कार्रवाई को रद्द कर दिया था और हाईकोर्ट ने भी उस निष्कर्ष में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई।

इस तरह अधिकारी के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई को चुनौती देने वाली उनकी स्थिति मजबूत रही और EPFO की ओर से दायर याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने EPFO की याचिका की खारिज

झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले के तथ्यों, आरोप पत्र और संबंधित आदेशों पर विचार करने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने पाया कि CAT ने यह निष्कर्ष निकालते समय कोई ऐसी कानूनी गलती नहीं की, जिसके कारण उसके आदेश को रद्द किया जाना आवश्यक हो।

परिणामस्वरूप EPFO की याचिका खारिज कर दी गई।

इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि अर्ध-न्यायिक अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए केवल उसके आदेश की कानूनी शुद्धता को चुनौती देना पर्याप्त नहीं है।

फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला उन अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो कानून के तहत अर्ध-न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे अधिकारी कई बार प्रशासनिक विभागों में रहते हुए भी न्यायिक प्रकृति के कार्य करते हैं और पक्षकारों के अधिकारों तथा देनदारियों से जुड़े मामलों पर निर्णय लेते हैं।

ऐसी स्थिति में उनके निर्णयों की न्यायिक समीक्षा और अपील की व्यवस्था होना जरूरी है। साथ ही, उन्हें बिना किसी अनुचित दबाव के कानून के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने इसी संतुलन को रेखांकित किया है।

अदालत का फैसला यह नहीं कहता कि अर्ध-न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कभी विभागीय कार्रवाई नहीं हो सकती। बल्कि अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि यदि विभागीय कार्रवाई करनी है तो आरोपों में केवल यह नहीं कहा जा सकता कि अधिकारी का आदेश कानूनी रूप से गलत था।

आरोप पत्र में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अधिकारी का आचरण किस प्रकार कदाचार की श्रेणी में आता है।

निष्कर्ष

झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण अंतर को सामने रखता है—कानून की व्याख्या में गलती और कदाचार के बीच अंतर।

अदालत के अनुसार, कोई अर्ध-न्यायिक अधिकारी यदि अपने वैध अधिकार क्षेत्र में रहते हुए किसी कानून की गलत व्याख्या कर देता है या किसी कानूनी प्रश्न पर गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाता है, तो केवल उस आधार पर उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करना उचित नहीं होगा।

विभाग को यह दिखाना होगा कि मामला साधारण कानूनी भूल से आगे बढ़कर किसी अनुचित आचरण से जुड़ा है। बाहरी प्रभाव, अनुचित उद्देश्य, गलत मंशा, ईमानदारी पर ठोस सवाल या ऐसा कोई अन्य तत्व आरोपों में मौजूद होना चाहिए, जिससे कदाचार का आधार बनता हो।

कटिहार मेडिकल कॉलेज से जुड़े भविष्य निधि मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि ऐसे आरोप मौजूद नहीं थे। अधिकारी ने अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र में कार्यवाही की थी और उनके आदेश की कानूनी शुद्धता पर असहमति को ही विभागीय कार्रवाई का आधार बनाया गया था।

इसी कारण अदालत ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के फैसले को बरकरार रखा और EPFO की याचिका खारिज कर दी।

इस फैसले का मूल संदेश यही है कि हर कानूनी गलती कदाचार नहीं होती और अर्ध-न्यायिक अधिकारी के निर्णय की समीक्षा तथा उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई—दोनों को एक ही कसौटी पर नहीं देखा जा सकता।