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गैंगस्टर्स एक्ट में बिना विवेक के गैंग चार्ट मंजूर करना पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसपी-डीएम को लगाई कड़ी फटकार;

गैंगस्टर्स एक्ट में बिना विवेक के गैंग चार्ट मंजूर करना पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसपी-डीएम को लगाई कड़ी फटकार; पूरी कार्रवाई रद्द

        उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने बहराइच जिले में एक व्यक्ति के खिलाफ गैंगस्टर्स अधिनियम के तहत तैयार किए गए गैंग चार्ट को मंजूरी देने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाते हुए पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि गैंग चार्ट को महज एक औपचारिक प्रक्रिया समझकर मंजूरी नहीं दी जा सकती। किसी व्यक्ति के खिलाफ इस कानून के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले संबंधित अधिकारियों को तथ्यों की जांच करनी होगी और अपने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करना होगा।

न्यायमूर्ति मनीष माथुर की लखनऊ पीठ ने यह टिप्पणी बब्बू शाह की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने बहराइच के पायागपुर थाने में अपने खिलाफ गैंगस्टर्स अधिनियम के तहत शुरू की गई कार्रवाई को चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि गैंग चार्ट को मंजूरी देने से पहले न तो पुलिस अधीक्षक और न ही जिलाधिकारी की ओर से याचिकाकर्ता की आपराधिक पृष्ठभूमि की समुचित जांच किए जाने का उल्लेख किया गया था। अदालत ने इस बात को विशेष रूप से गंभीर माना कि वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी संतुष्टि दर्ज करने और स्वतंत्र रूप से मामले पर विचार करने की जिम्मेदारी का उचित तरीके से निर्वहन नहीं किया।

अदालत ने अंततः 15 नवंबर 2021 के गैंग चार्ट, 19 फरवरी 2022 की चार्जशीट, 7 दिसंबर 2022 के संज्ञान एवं समन आदेश समेत मामले से जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

गैंग चार्ट को लेकर हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

गैंगस्टर्स एक्ट के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में गैंग चार्ट की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पुलिस की ओर से तैयार किए जाने वाले इस दस्तावेज में आरोपी के कथित आपराधिक इतिहास, उसके खिलाफ दर्ज मामलों और संगठित अपराध से संबंधित आरोपों का उल्लेख किया जाता है।

गैंग चार्ट तैयार होने के बाद इसे संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष रखा जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ गैंगस्टर्स एक्ट जैसी कठोर कार्रवाई केवल पुलिस की प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर यांत्रिक तरीके से न शुरू कर दी जाए।

यही कारण है कि हाईकोर्ट ने गैंग चार्ट की मंजूरी को केवल प्रशासनिक औपचारिकता मानने से इनकार किया। कोर्ट के अनुसार, जिस कार्रवाई के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति को गंभीर आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है, उसमें सक्षम प्राधिकारी का स्वतंत्र और निष्पक्ष विचार आवश्यक है।

एसपी ने 11 नवंबर को दी मंजूरी, डीएम ने 15 नवंबर को किया स्वीकार

मामले में अदालत के सामने यह तथ्य आया कि बहराइच के पुलिस अधीक्षक ने 11 नवंबर 2021 को गैंग चार्ट को मंजूरी दी थी। इसके बाद जिलाधिकारी ने 15 नवंबर 2021 को इसे स्वीकार किया।

अदालत ने इन दोनों आदेशों के क्रम और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री पर विचार करते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों अधिकारियों के बीच आवश्यक परामर्श और स्वतंत्र विचार की प्रक्रिया ठीक तरीके से नहीं हुई।

कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी का अर्थ केवल दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर देना नहीं है। मंजूरी देने वाले अधिकारी को उपलब्ध सामग्री को देखना चाहिए, आरोपी की पृष्ठभूमि की जांच करनी चाहिए और उसके बाद यह संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए कि गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

अदालत ने अधिकारियों की भूमिका को इसलिए महत्वपूर्ण माना क्योंकि गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई किसी व्यक्ति के लिए सामान्य आपराधिक मुकदमे से अलग और गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।

अदालत ने कहा- अधिकारियों को स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करना होगा

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि गैंग चार्ट को मंजूरी देने वाले अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे मामले के तथ्यों पर स्वतंत्र रूप से अपना दिमाग लगाएं

यदि पुलिस की ओर से कोई प्रस्ताव वरिष्ठ अधिकारी के सामने आता है तो अधिकारी का कर्तव्य केवल उस प्रस्ताव को स्वीकार करना नहीं है। उसे यह देखना होता है कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री कानून की आवश्यकताओं को पूरा करती है या नहीं।

विशेष रूप से यह जांचना जरूरी है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ गैंगस्टर्स एक्ट लगाने की सिफारिश की जा रही है, उसकी आपराधिक गतिविधियां वास्तव में उस कानून के दायरे में आती हैं या नहीं।

कोर्ट ने माना कि यदि सक्षम अधिकारी बिना किसी स्वतंत्र जांच और विचार के गैंग चार्ट को मंजूरी देता है तो ऐसी मंजूरी कानून की उस भावना के अनुरूप नहीं होगी, जिसके तहत वरिष्ठ अधिकारी से निष्पक्ष निर्णय की अपेक्षा की जाती है।

आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच क्यों जरूरी?

अदालत के सामने मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू याचिकाकर्ता की आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच से संबंधित था। कोर्ट ने पाया कि एसपी और डीएम के स्तर पर ऐसी जांच किए जाने की बात रिकॉर्ड में पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं थी।

किसी व्यक्ति के खिलाफ गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं माना जा सकता कि उसके खिलाफ कुछ आपराधिक मामले दर्ज हैं। संबंधित अधिकारियों को यह देखना होता है कि उपलब्ध रिकॉर्ड से कानून के तहत आवश्यक परिस्थितियां बनती हैं या नहीं।

यही कारण है कि हाईकोर्ट ने कहा कि गैंग चार्ट तैयार करने और उसे मंजूरी देने की प्रक्रिया में सावधानी बरतना जरूरी है।

यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ सामान्य आपराधिक मामले दर्ज हैं, तो प्रत्येक स्थिति में उसे गैंगस्टर्स एक्ट की कार्रवाई के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता। वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की प्रकृति, आरोपी की भूमिका, उसके आपराधिक रिकॉर्ड और कानून की लागू शर्तों पर विचार करना होगा।

वरिष्ठ अधिकारियों को पुराने न्यायिक फैसलों की जानकारी होनी चाहिए

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि वरिष्ठ अधिकारियों को संवैधानिक अदालतों द्वारा समय-समय पर दिए गए उन फैसलों की जानकारी नहीं थी, जिनमें गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई करते समय विवेक और निष्पक्षता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

अदालत ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि ऐसे मामलों में निर्णय लेने वाले वरिष्ठ अधिकारियों को न्यायालयों द्वारा पहले से स्थापित कानूनी सिद्धांतों का पर्याप्त ज्ञान नहीं दिखाई देता।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का व्यापक महत्व है। इसका सीधा संदेश यह है कि किसी कानून के तहत प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी द्वारा लिया गया निर्णय न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होता। अधिकारियों को कानून के साथ-साथ उससे संबंधित न्यायिक व्याख्याओं का भी ध्यान रखना होता है।

गैंगस्टर्स एक्ट कोई सामान्य औपचारिक कार्रवाई नहीं

अदालत ने गैंग चार्ट तैयार करने और उसकी मंजूरी को महज एक procedural formality मानने से स्पष्ट रूप से इनकार किया।

गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई होने पर संबंधित व्यक्ति को गंभीर आपराधिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में यदि प्रारंभिक स्तर पर ही बिना पर्याप्त विचार के कार्रवाई शुरू कर दी जाए तो व्यक्ति को लंबे समय तक मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है।

इसी वजह से कोर्ट ने कहा कि गैंग चार्ट को मंजूरी देने वाले अधिकारी को रिकॉर्ड पर अपनी संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए।

इस संतुष्टि का अर्थ केवल यह लिख देना नहीं है कि चार्ट सही पाया गया। अधिकारी को उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद यह दिखाना होगा कि उसने मामले को स्वतंत्र रूप से समझा और उसके बाद निर्णय लिया।

एक अधिकारी की मंजूरी दूसरे अधिकारी की जिम्मेदारी खत्म नहीं करती

मामले में एसपी और डीएम द्वारा अलग-अलग तारीखों पर की गई कार्रवाई को भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण माना।

पुलिस अधीक्षक ने 11 नवंबर को गैंग चार्ट को मंजूरी दी और चार दिन बाद जिलाधिकारी ने उसे स्वीकार कर लिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों अधिकारियों के बीच आवश्यक विचार-विमर्श नहीं हुआ।

इससे एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सिद्धांत सामने आता है। जब किसी मामले में कानून वरिष्ठ अधिकारियों से अलग-अलग स्तर पर जांच और संतुष्टि की अपेक्षा करता है, तो बाद में कार्रवाई करने वाला अधिकारी केवल पहले अधिकारी की राय को देखकर अपना निर्णय नहीं कर सकता।

हर सक्षम प्राधिकारी को अपनी जिम्मेदारी के अनुसार मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।

हाईकोर्ट ने चार्जशीट तक की कार्रवाई कर दी रद्द

गैंग चार्ट की मंजूरी को कानूनी रूप से उचित नहीं पाए जाने के बाद अदालत ने केवल प्रारंभिक आदेश को ही रद्द नहीं किया। कोर्ट ने उसके आधार पर आगे बढ़ी पूरी आपराधिक प्रक्रिया पर भी प्रभाव डाला।

अदालत ने 15 नवंबर 2021 के गैंग चार्ट को रद्द कर दिया। इसके साथ ही 19 फरवरी 2022 की चार्जशीट और 7 दिसंबर 2022 के संज्ञान एवं समन आदेश को भी निरस्त कर दिया गया।

इसके अलावा बहराइच में इस मामले से संबंधित पूरी आपराधिक कार्यवाही भी रद्द कर दी गई।

इसका कारण यह था कि जब कार्रवाई की मूल आधारभूत प्रक्रिया ही कानून के अनुरूप नहीं पाई गई, तो उसके आधार पर आगे की आपराधिक कार्यवाही को बनाए रखना उचित नहीं माना गया।

कोर्ट की टिप्पणी का प्रशासनिक अधिकारियों पर असर

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल इस मामले तक सीमित नहीं मानी जा सकती। गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई करने वाले पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह आदेश प्रक्रिया में सावधानी बरतने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

वरिष्ठ अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके सामने प्रस्तुत गैंग चार्ट में पर्याप्त सामग्री है और आरोपी के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई के लिए आवश्यक आधार मौजूद हैं।

इसके साथ ही रिकॉर्ड पर यह भी दिखाई देना चाहिए कि अधिकारी ने मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार किया है।

ऐसी स्थिति में केवल पुलिस की रिपोर्ट या अधीनस्थ अधिकारियों की सिफारिश के आधार पर मंजूरी देना पर्याप्त नहीं होगा।

कोर्ट ने निष्पक्षता बनाए रखने पर दिया जोर

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य की कार्रवाई में निष्पक्षता बनाए रखने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता का अर्थ केवल अंतिम सुनवाई के समय निष्पक्ष व्यवहार करना नहीं है। किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कानून की कार्रवाई शुरू करने के शुरुआती चरण में भी निष्पक्ष प्रक्रिया जरूरी है।

यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कठोर कानून लगाया जाता है तो उसके लिए प्रशासनिक स्तर पर लिया गया शुरुआती निर्णय बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए अधिकारी को रिकॉर्ड की जांच करके यह संतुष्टि बनानी होती है कि कानून का इस्तेमाल वास्तविक परिस्थितियों में आवश्यक है।

इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को संवैधानिक अदालतों द्वारा पहले से निर्धारित कानून का पालन करने और सरकारी कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

इस फैसले से क्या समझना जरूरी है?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने गैंगस्टर्स एक्ट के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाई है, बल्कि यह स्पष्ट किया है कि इस कानून के तहत कार्रवाई कानून के मुताबिक और उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए होनी चाहिए।

पुलिस को यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्रवाई प्रस्तावित करनी है तो उसके पीछे पर्याप्त तथ्य और सामग्री होनी चाहिए। इसके बाद सक्षम अधिकारियों को भी अपनी स्वतंत्र भूमिका निभानी होगी।

एसपी और डीएम जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की मंजूरी का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि बिना पर्याप्त आधार के किसी व्यक्ति के खिलाफ कठोर कानून का इस्तेमाल न हो।

आगे के लिए अदालत का स्पष्ट संदेश

बब्बू शाह की याचिका पर आए इस आदेश में हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून के तहत दी गई शक्तियों का प्रयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।

किसी भी गैंग चार्ट को मंजूरी देने से पहले आरोपी की आपराधिक पृष्ठभूमि, उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री और गैंगस्टर्स एक्ट की लागू शर्तों का परीक्षण जरूरी है। अधिकारी को केवल अधीनस्थ स्तर से भेजे गए प्रस्ताव पर निर्भर रहने के बजाय अपने स्तर पर संतुष्टि बनानी होगी।

बहराइच के इस मामले में अदालत ने पाया कि यह प्रक्रिया उस स्तर की सावधानी और स्वतंत्र विचार के साथ नहीं अपनाई गई, जिसकी कानून और न्यायिक फैसलों के तहत अपेक्षा की जाती है। इसी आधार पर गैंग चार्ट से लेकर चार्जशीट, संज्ञान और समन तक की कार्यवाही को रद्द कर दिया गया।

हाईकोर्ट का यह आदेश इस बात को फिर रेखांकित करता है कि किसी कठोर आपराधिक कानून का इस्तेमाल केवल प्रक्रिया पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि कानून में निर्धारित शर्तों और निष्पक्ष न्यायिक सिद्धांतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।