भोपाल गैस त्रासदी मामला: डाउ केमिकल पर भारतीय अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस, 9 अक्टूबर को अगली सुनवाई
दिसंबर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े आपराधिक मामले में डाउ केमिकल कंपनी के खिलाफ भारतीय अदालत के अधिकार क्षेत्र का सवाल अभी भी कानूनी बहस के केंद्र में बना हुआ है। भोपाल जिला न्यायालय में गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान गैस पीड़ितों के संगठन की ओर से डाउ केमिकल और यूनियन कार्बाइड के बीच विलय तथा कंपनी के एकीकरण से संबंधित दस्तावेज अदालत के सामने पेश किए जाने की मांग की गई।
मामले की सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी हेमलता अहिरवार की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान यह प्रश्न महत्वपूर्ण रहा कि क्या अमेरिका की कंपनी डाउ केमिकल पर भारतीय अदालत का अधिकार क्षेत्र लागू किया जा सकता है और यदि हां, तो किन कानूनी आधारों पर उसे भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में जवाबदेह बनाया जा सकता है।
भोपाल गैस त्रासदी को चार दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उससे जुड़े कानूनी विवाद अभी भी अदालतों में अलग-अलग स्तर पर जारी हैं। वर्तमान कार्यवाही में मुख्य ध्यान इस बात पर है कि यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन की उत्तराधिकारी कंपनी के रूप में डाउ केमिकल की कानूनी स्थिति क्या है और भारतीय अदालत में उसकी उपस्थिति किस प्रकार सुनिश्चित की जा सकती है।
सीबीआई ने पहले पूरी की अपनी दलील
पिछली सुनवाई में केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई की ओर से अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर अपनी दलीलें पूरी की जा चुकी हैं। जांच एजेंसी ने दंड प्रक्रिया संहिता यानी CrPC की धारा 177 का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा था।
धारा 177 का मूल सिद्धांत यह है कि सामान्य तौर पर किसी अपराध की जांच और सुनवाई उस क्षेत्र की अदालत में की जाती है, जहां अपराध किया गया हो। भोपाल गैस त्रासदी का मुख्य घटनास्थल भोपाल था। इसलिए सीबीआई का तर्क है कि मामले की सुनवाई के लिए भारतीय अदालत, विशेष रूप से भोपाल की अदालत, के अधिकार क्षेत्र को केवल इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता कि संबंधित कंपनी विदेश में स्थित है।
यहां मामला केवल किसी कंपनी की भौगोलिक स्थिति तक सीमित नहीं है। अदालत के सामने यह भी सवाल है कि जिस कंपनी के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात हो रही है, उसके साथ यूनियन कार्बाइड के कॉरपोरेट संबंध किस प्रकृति के हैं और उसका भारतीय कानून के तहत क्या दायित्व बनता है।
डाउ केमिकल को लेकर क्यों उठ रहा है अधिकार क्षेत्र का सवाल?
भोपाल गैस त्रासदी की घटना 2-3 दिसंबर 1984 की रात यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के भोपाल स्थित संयंत्र से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव के बाद हुई थी। इस हादसे में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और हजारों लोग प्रभावित हुए।
समय के साथ यूनियन कार्बाइड की कॉरपोरेट संरचना में बड़े बदलाव हुए। डाउ केमिकल और यूनियन कार्बाइड के बीच कॉरपोरेट संबंधों के कारण यह सवाल अदालत के सामने आया कि क्या वर्तमान में डाउ केमिकल को यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन की उत्तराधिकारी कंपनी के तौर पर भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है।
यही कारण है कि वर्तमान सुनवाई में कॉरपोरेट विलय और एकीकरण से जुड़े दस्तावेजों का महत्व बढ़ गया है। अदालत को यह समझने के लिए कि दोनों कंपनियों के बीच वास्तविक कानूनी और कॉरपोरेट संबंध क्या रहे हैं, संबंधित दस्तावेजों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
पीड़ित संगठन ने मांगे विलय से जुड़े दस्तावेज
गुरुवार की सुनवाई में गैस पीड़ितों के संगठन भोपाल ग्रुप फॉर इन्फार्मेशन एंड एक्शन की ओर से महत्वपूर्ण दलीलें रखी गईं। संगठन के अधिवक्ता ने अदालत से मांग की कि डाउ केमिकल को यूनियन कार्बाइड के साथ हुए विलय और कंपनी के एकीकरण से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए।
संगठन की ओर से अदालत में यह सवाल उठाया गया कि यदि डाउ केमिकल की ओर से यूनियन कार्बाइड अमेरिका को एक अलग कंपनी बताया जा रहा है, तो उससे संबंधित कॉरपोरेट दस्तावेज अदालत के सामने क्यों नहीं रखे जा रहे हैं।
पीड़ित संगठन का जोर इस बात पर है कि कंपनियों के बीच वास्तविक संबंधों को केवल बयानों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
विलय, अधिग्रहण और कॉरपोरेट एकीकरण से संबंधित दस्तावेजों में यह जानकारी हो सकती है कि किसी कंपनी ने दूसरी कंपनी की परिसंपत्तियों, देनदारियों, अधिकारों या कानूनी दायित्वों को किस सीमा तक स्वीकार किया। इसी वजह से इस तरह के दस्तावेज वर्तमान कानूनी विवाद में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
भारतीय अदालतों में पूर्व उपस्थिति का भी दिया गया हवाला
पीड़ित संगठन की ओर से सुनवाई के दौरान डाउ केमिकल की भारतीय अदालतों में पूर्व में हुई उपस्थिति का भी उल्लेख किया गया।
इस तर्क का कानूनी महत्व इसलिए है क्योंकि किसी विदेशी कंपनी के भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में शामिल होने के तरीके और उसके पूर्व आचरण से संबंधित प्रश्न अधिकार क्षेत्र की बहस में उठ सकते हैं। हालांकि किसी पूर्व न्यायिक कार्यवाही में उपस्थिति अपने आप वर्तमान मामले में अधिकार क्षेत्र का अंतिम निर्धारण नहीं करती। अंतिम निष्कर्ष अदालत संबंधित कानून, तथ्यों और दस्तावेजों को देखकर ही तय करेगी।
इसी कारण मौजूदा सुनवाई में दस्तावेजी रिकॉर्ड को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
1992 से यूनियन कार्बाइड की भारतीय संपत्तियां कुर्क
गैस पीड़ित संगठन की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि यूनियन कार्बाइड के खिलाफ भारतीय कानून के तहत गंभीर धाराओं में आरोप हैं और वर्ष 1992 से उसकी भारतीय संपत्तियां कुर्क हैं।
संपत्ति कुर्की और आपराधिक मामले से जुड़े न्यायिक कदम इस विवाद के लंबे इतिहास को दर्शाते हैं। पीड़ित पक्ष का कहना है कि मामले में भारतीय न्यायिक प्रक्रिया पहले से आगे बढ़ती रही है और कंपनी से संबंधित संपत्तियों पर भी पूर्व में कानूनी कार्रवाई की जा चुकी है।
इस संदर्भ में डाउ केमिकल की वर्तमान कानूनी स्थिति और यूनियन कार्बाइड के साथ उसके संबंधों का प्रश्न अदालत के सामने महत्वपूर्ण बन जाता है।
समन विदेश तक पहुंचाने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
सीबीआई ने अपनी दलीलों के दौरान डाउ केमिकल को समन पहुंचाने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया था। जांच एजेंसी के अनुसार समन गृह मंत्रालय और अमेरिकी न्याय विभाग के माध्यम से पहुंचाए जाने की बात सामने रखी गई है।
किसी विदेशी कंपनी या व्यक्ति को भारतीय अदालत की प्रक्रिया में शामिल करने के लिए समन की सेवा एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक पहलू है। यदि संबंधित पक्ष भारत से बाहर स्थित हो, तो उसे न्यायिक नोटिस या समन पहुंचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया और संबंधित सरकारी माध्यमों का सहारा लिया जा सकता है।
इस मामले में भी अदालत के सामने केवल यह सवाल नहीं है कि डाउ केमिकल पर भारतीय अदालत का अधिकार क्षेत्र है या नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि यदि अदालत प्रक्रिया आगे बढ़ाती है तो उसे कंपनी तक प्रभावी तरीके से कैसे पहुंचाया जाए।
चार दशक बाद भी जारी है कानूनी लड़ाई
भोपाल गैस त्रासदी आधुनिक भारत की सबसे गंभीर औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिनी जाती है। हादसे के बाद से पीड़ितों को न्याय, मुआवजा और जिम्मेदारी तय करने को लेकर विभिन्न स्तरों पर कानूनी लड़ाइयां चलती रही हैं।
इस मामले की खासियत यह है कि घटना के इतने वर्षों बाद भी इससे जुड़े कानूनी प्रश्न समाप्त नहीं हुए हैं। समय के साथ कंपनियों की कॉरपोरेट संरचना में बदलाव हुआ, लेकिन पुराने आपराधिक मामलों और दायित्व से जुड़े प्रश्न अपनी जगह बने रहे।
वर्तमान सुनवाई इसी लंबे कानूनी इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अदालत को अब यह तय करना है कि डाउ केमिकल के संबंध में भारतीय न्यायिक अधिकार क्षेत्र का प्रश्न किस कानूनी आधार पर देखा जाए।
अधिकार क्षेत्र तय होना क्यों जरूरी है?
किसी भी आपराधिक मामले में अधिकार क्षेत्र प्रारंभिक लेकिन बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न होता है। यदि अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर ही विवाद हो, तो मामले की आगे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
भारतीय आपराधिक कानून की सामान्य व्यवस्था में अपराध के स्थान का विशेष महत्व है। CrPC की धारा 177 इसी सामान्य सिद्धांत को स्थापित करती थी कि प्रत्येक अपराध की जांच और सुनवाई सामान्यतः उस अदालत द्वारा की जाएगी, जिसके स्थानीय क्षेत्र में अपराध हुआ है।
भोपाल गैस त्रासदी के संदर्भ में सीबीआई इसी सिद्धांत का सहारा ले रही है। दूसरी ओर, डाउ केमिकल की कॉरपोरेट स्थिति, यूनियन कार्बाइड से उसके संबंध और भारत में उसके खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया लागू किए जाने से जुड़े सवाल अलग कानूनी पहलुओं को जन्म देते हैं।
इसलिए अदालत के सामने पूरा विवाद केवल कंपनी के अमेरिका में स्थित होने तक सीमित नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह भी है कि कॉरपोरेट उत्तराधिकार, भारतीय न्यायिक प्रक्रिया और अपराध के स्थान से जुड़े कानूनी सिद्धांत इस मामले पर किस प्रकार लागू होते हैं।
अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को
गुरुवार की सुनवाई के बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 9 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की है। उस दिन गैस पीड़ित संगठनों की ओर से बाकी दलीलें जारी रहने की बात कही गई है।
इसके साथ ही सीबीआई की ओर से लिखित प्रस्तुति दाखिल की जाएगी। इससे मामले में दोनों पक्षों के मौखिक तर्कों के साथ-साथ लिखित कानूनी आधार भी अदालत के रिकॉर्ड पर आएंगे।
अगली सुनवाई में खास तौर पर उन दस्तावेजों और कानूनी तर्कों पर ध्यान रह सकता है, जिनके आधार पर डाउ केमिकल और यूनियन कार्बाइड के बीच कॉरपोरेट संबंधों की प्रकृति तथा भारतीय अदालत के अधिकार क्षेत्र के प्रश्न को समझने की कोशिश की जाएगी।
अदालत के सामने अब कौन-कौन से प्रमुख सवाल?
मौजूदा कार्यवाही को देखते हुए मामले में कुछ प्रमुख कानूनी प्रश्न सामने आते हैं—
पहला, क्या भोपाल में हुए अपराध के आधार पर भारतीय अदालत को इस मामले में अधिकार क्षेत्र प्राप्त है?
दूसरा, डाउ केमिकल और यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के बीच विलय या कॉरपोरेट एकीकरण की वास्तविक कानूनी प्रकृति क्या रही?
तीसरा, क्या उपलब्ध कॉरपोरेट दस्तावेज डाउ केमिकल की वर्तमान कानूनी स्थिति को निर्धारित करने में सहायक हो सकते हैं?
चौथा, विदेश में स्थित कंपनी तक भारतीय अदालत का समन किस प्रक्रिया के तहत प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सकता है?
पांचवां, यूनियन कार्बाइड से जुड़े पुराने आपराधिक आरोपों और भारतीय संपत्तियों की कुर्की का वर्तमान कार्यवाही पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ता है?
इन सभी प्रश्नों पर अदालत में पक्षकारों की दलीलें और दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल अदालत ने अधिकार क्षेत्र के प्रश्न पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
पीड़ितों की नजर भी अगली सुनवाई पर
भोपाल गैस त्रासदी से प्रभावित लोगों और उनके संगठनों के लिए यह मामला केवल कंपनियों के बीच कॉरपोरेट संबंधों का विवाद नहीं है। उनके लिए यह लंबे समय से चल रही जवाबदेही और न्याय की प्रक्रिया का हिस्सा है।
इसी कारण पीड़ित संगठन अदालत के सामने कंपनी के कॉरपोरेट ढांचे और उसके कानूनी संबंधों से जुड़े दस्तावेज रखने पर जोर दे रहे हैं। दूसरी ओर, सीबीआई अपने लिखित पक्ष के माध्यम से अधिकार क्षेत्र के संबंध में अपने कानूनी तर्कों को रिकॉर्ड पर रखने की तैयारी में है।
अब सभी की नजर 9 अक्टूबर की सुनवाई पर है। उस दिन पीड़ित संगठनों की शेष दलीलों के साथ सीबीआई की लिखित प्रस्तुति भी महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि डाउ केमिकल पर भारतीय अदालत के अधिकार क्षेत्र का अंतिम निर्धारण अदालत द्वारा सभी पक्षों की दलीलें, दस्तावेज और लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद ही किया जाएगा।