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पति के कर्ज के लिए पत्नी की FD से 19.90 लाख काटना SBI को पड़ा भारी,

पति के कर्ज के लिए पत्नी की FD से 19.90 लाख काटना SBI को पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रकम लौटाने के साथ लगाया 1 लाख रुपये मुआवजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: बैंक पत्नी की निजी जमा राशि से पति का व्यक्तिगत कर्ज मनमाने तरीके से नहीं वसूल सकता

        किसी व्यक्ति द्वारा लिया गया व्यक्तिगत बैंक ऋण उसकी मृत्यु के बाद किस हद तक उसके परिवार के सदस्यों से वसूला जा सकता है, यह सवाल कई बार विवाद का विषय बनता रहा है। खासकर तब, जब मृतक की पत्नी स्वयं उस ऋण की सह-ऋणी, गारंटर या जमानतदार न रही हो। ऐसे ही एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए विधवा महिला के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

हाईकोर्ट ने SBI को निर्देश दिया है कि वह विधवा की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) से पति के व्यक्तिगत ऋण की वसूली के लिए काटी गई 19,90,693 रुपये की पूरी रकम वापस करे। इसके अलावा बैंक को महिला को 1 लाख रुपये का मुआवजा भी देना होगा। वापस की जाने वाली रकम पर संबंधित FD पर लागू ब्याज दर के अनुसार ब्याज भी देना होगा। कोर्ट ने दोनों भुगतान चार सप्ताह के भीतर करने का निर्देश दिया है।

यह फैसला जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने 10 सितंबर 2026 को सुनाया। मामला नेहा मिश्रा बनाम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एवं अन्य से संबंधित है।

पत्नी न सह-ऋणी थीं, न गारंटर

मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मृतक व्यक्ति की पत्नी का उस व्यक्तिगत ऋण से कोई प्रत्यक्ष संविदात्मक संबंध नहीं था। अदालत के अनुसार, याचिकाकर्ता न तो ऋण की co-applicant थीं, न co-borrower, न guarantor, न surety, न indemnifier और न ही ऋण लेनदेन में उनकी कोई ऐसी भूमिका थी जिसके आधार पर बैंक सीधे उनकी निजी जमा रकम से ऋण की वसूली कर सके।

यानी जिस ऋण को लेकर बैंक ने कार्रवाई की, वह मृतक पति का व्यक्तिगत ऋण था और पत्नी ने बैंक के साथ उस ऋण को चुकाने का कोई स्वतंत्र दायित्व स्वीकार नहीं किया था।

यही तथ्य हाईकोर्ट के फैसले में बेहद महत्वपूर्ण रहा।

2020 में लिया था 15 लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति लखनऊ के एक अस्पताल में Assistant Professor के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने 3 नवंबर 2020 को भारतीय स्टेट बैंक से लगभग 15 लाख रुपये का Personal Loan लिया था।

बाद में 6 मई 2021 को कोविड-19 संक्रमण के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

पति की मृत्यु के बाद बैंक के सामने ऋण की बकाया राशि की वसूली का सवाल था। लेकिन हाईकोर्ट के सामने विवाद यह था कि क्या बैंक मृतक के ऋण की वसूली के लिए उसकी पत्नी की अपनी संपत्ति और बैंक खाते में जमा धन को सीधे काट सकता है?

हाईकोर्ट ने इस सवाल का जवाब स्पष्ट रूप से बैंक के खिलाफ दिया।

पति की मृत्यु के बाद पत्नी पर भुगतान का दबाव

मृतक की मृत्यु के काफी समय बाद बैंक ने उसकी पत्नी से ऋण की बकाया राशि चुकाने की मांग शुरू की।

23 सितंबर 2025 को बैंक की ओर से महिला को कानूनी नोटिस भेजा गया। नोटिस में लगभग 13,87,382 रुपये की बकाया ऋण राशि और ब्याज का उल्लेख किया गया था। बैंक ने राशि का भुगतान नहीं करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी थी।

इसके पहले 12 सितंबर 2025 को बैंक ने महिला के वेतन खाते को भी रोक दिया था। महिला ने इस कार्रवाई के खिलाफ RBI Ombudsman का रुख किया। इसके बाद वेतन खाते पर लगाई गई रोक हटा दी गई।

इसके बाद दोनों पक्षों के बीच ऋण की रकम को लेकर बातचीत चल रही थी। इसी दौरान विवाद ने नया मोड़ ले लिया।

पहले FD को दूसरी शाखा में भेजा, फिर रकम काटी

महिला ने वर्ष 2025 में SBI की आशियाना शाखा में अपनी FD खोली थी। यह FD उनके नाम पर थी।

अदालत के समक्ष सामने आया कि बाद में इस FD खाते को SBI की जंकिपुरम शाखा में स्थानांतरित किया गया। इसी शाखा से मृतक पति ने अपना व्यक्तिगत ऋण लिया था।

इसके बाद महिला की FD से 19,90,693 रुपये काटकर मृतक पति के ऋण खाते में जमा कर दिए गए।

इतना ही नहीं, रकम काटे जाने के बाद खाता फिर से आशियाना शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया।

यही पूरी प्रक्रिया हाईकोर्ट की नाराजगी का प्रमुख कारण बनी।

अदालत ने बैंक द्वारा एक शाखा से दूसरी शाखा में FD स्थानांतरित करने, फिर रकम काटकर पति के ऋण में समायोजित करने और उसके बाद खाते को वापस पुरानी शाखा में भेजने की प्रक्रिया को गंभीरता से देखा।

हाईकोर्ट ने बैंक की कार्रवाई पर जताई कड़ी नाराजगी

खंडपीठ ने बैंक की कार्रवाई को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की। अदालत के अनुसार, जिस तरीके से महिला की FD को एक शाखा से दूसरी शाखा में स्थानांतरित किया गया और फिर रकम काटी गई, उससे बैंक की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को “abominable” यानी अत्यंत अनुचित बताया और कहा कि यह स्थापित बैंकिंग प्रथा के अनुरूप नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया प्रथम दृष्टया ऐसी प्रतीत होती है कि बैंक ने अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए एक तरह से छिपे हुए तरीके का सहारा लिया।

अदालत ने बैंक की कार्रवाई को किसी भी तरीके से उचित नहीं माना।

बैंक के पास पत्नी की FD काटने का कानूनी आधार नहीं था

हाईकोर्ट के सामने बैंक की ओर से अपनी कार्रवाई को सही ठहराने का प्रयास किया गया। बैंक ने ऋण लेते समय मृतक पति द्वारा दी गई standing instruction का भी सहारा लिया।

बैंक की दलील थी कि ऋण लेने के समय दी गई कुछ अनुमति के आधार पर ऋण की वसूली से संबंधित रकम को समायोजित किया जा सकता था। बैंक ने कुछ पूर्व न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख किया, जिनमें ऋण की वसूली और retiral benefits से जुड़े प्रश्नों पर विचार हुआ था।

लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि ऐसी कोई वैधानिक व्यवस्था अदालत के सामने नहीं रखी जा सकी, जिसके आधार पर पत्नी की स्वतंत्र FD से उसके पति का व्यक्तिगत ऋण सीधे वसूल किया जा सके।

यहां पत्नी स्वयं ऋण समझौते की पक्षकार नहीं थीं।

बैंक केवल रकम का संरक्षक था

हाईकोर्ट ने बैंक और खाताधारक के बीच भरोसे के संबंध को भी महत्वपूर्ण माना।

अदालत ने कहा कि बैंक खाताधारक के पैसे का केवल संरक्षक है। ग्राहक अपनी रकम बैंक में इसलिए रखता है क्योंकि उसे बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा होता है कि उसकी राशि को उसकी अनुमति और कानून के अनुसार ही इस्तेमाल किया जाएगा।

ऐसे में किसी ग्राहक के खाते से उसकी अनुमति अथवा वैध कानूनी अधिकार के बिना रकम काटकर किसी दूसरे व्यक्ति की देनदारी में जमा करना गंभीर विषय है।

अदालत ने इसे बैंक पर किए गए भरोसे का गंभीर उल्लंघन माना।

पति का कर्ज था तो कानूनी उत्तराधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला

हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि मृतक व्यक्ति का बैंक ऋण समाप्त हो जाता है या बैंक के पास उसकी वसूली का कोई अधिकार नहीं रहता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक को कानून के अनुसार मृतक के legal heirs के खिलाफ उचित कार्रवाई करने और यदि कानूनन देयता बनती है तो बकाया ऋण की वसूली करने का अधिकार हो सकता है।

लेकिन इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।

बैंक स्वयं यह तय नहीं कर सकता कि मृतक की पत्नी की निजी संपत्ति से रकम काटकर उसके पति का ऋण चुका दिया जाए।

यानी ऋण की वसूली का अधिकार और किसी तीसरे व्यक्ति की निजी संपत्ति से मनमाने ढंग से रकम काटने का अधिकार दो अलग-अलग बातें हैं।

यही अंतर इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण आधार बना।

पत्नी से 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग

याचिकाकर्ता ने बैंक की कार्रवाई के कारण मानसिक पीड़ा, भावनात्मक आघात और अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का हवाला देते हुए 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।

हालांकि अदालत ने पूरी 25 लाख रुपये की मांग स्वीकार नहीं की।

खंडपीठ ने बैंक के आचरण को देखते हुए 1 लाख रुपये का exemplary and punitive compensation उचित माना।

इस प्रकार बैंक को 19,90,693 रुपये की काटी गई रकम और उस पर FD की लागू ब्याज दर के अनुसार ब्याज लौटाने के अलावा अलग से 1 लाख रुपये मुआवजा भी देना होगा।

चार सप्ताह में रकम वापस करने का आदेश

हाईकोर्ट ने SBI को निर्देश दिया कि वह महिला के खाते से काटी गई 19,90,693 रुपये की पूरी रकम वापस करे।

सिर्फ मूल रकम ही नहीं, बल्कि उस रकम पर वह ब्याज भी देना होगा जो संबंधित FD पर लागू था।

इसके लिए अदालत ने चार सप्ताह की समयसीमा तय की है।

इसके अलावा 1 लाख रुपये का मुआवजा भी इसी अवधि में देने का आदेश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी लिया सहारा

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी संदर्भ आया। इनमें राधेश्याम गुप्ता बनाम पंजाब नेशनल बैंक का निर्णय महत्वपूर्ण था, जिसमें पेंशन, ग्रेच्युटी और भविष्य निधि जैसे retiral benefits की प्रकृति तथा उनकी कुर्की और वसूली से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार किया गया था।

हालांकि मौजूदा विवाद का केंद्र पत्नी की वर्ष 2025 में खोली गई FD थी, इसलिए अदालत ने यह भी देखा कि जिस रकम को बैंक ने काटा, उस पर मृतक पति की ऋण संबंधी अनुमति को किस सीमा तक लागू किया जा सकता है।

अदालत के सामने बैंक ऐसी स्पष्ट कानूनी व्यवस्था प्रस्तुत नहीं कर सका जो पत्नी की स्वतंत्र FD से सीधे पति का ऋण काटने की अनुमति देती हो।

इस फैसले का बैंक ग्राहकों के लिए क्या महत्व है?

यह फैसला केवल एक विधवा महिला और SBI के बीच विवाद तक सीमित नहीं है। इसमें बैंकिंग संबंधों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है।

यदि किसी व्यक्ति ने बैंक से व्यक्तिगत ऋण लिया है और उसका पति या पत्नी उस ऋण में co-borrower, guarantor, surety या अन्य संविदात्मक पक्षकार नहीं है, तो केवल वैवाहिक संबंध के आधार पर उसके स्वतंत्र बैंक खाते या FD से रकम काटना अपने आप वैध नहीं माना जा सकता।

बैंक को अपनी वसूली के लिए कानून में उपलब्ध उचित रास्ते का इस्तेमाल करना होगा।

साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि किसी मृतक व्यक्ति की हर प्रकार की देनदारी स्वतः समाप्त हो जाती है। मृतक की संपत्ति और कानूनी उत्तराधिकारियों के संबंध में लागू कानून के अनुसार बैंक अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है।

लेकिन कानूनी अधिकार का इस्तेमाल भी निर्धारित प्रक्रिया के भीतर ही किया जाना चाहिए।

अदालत का संदेश—बैंकिंग में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण

इस मामले में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि हाईकोर्ट ने केवल रकम वापस करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि बैंक के कार्रवाई करने के तरीके पर भी गंभीर टिप्पणी की।

अदालत ने माना कि बैंकिंग व्यवस्था विश्वास पर आधारित है। खाताधारक अपनी मेहनत की कमाई बैंक में इसलिए रखता है क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि उसकी रकम सुरक्षित रहेगी और उसका इस्तेमाल केवल वैध अधिकार तथा निर्धारित प्रक्रिया के तहत होगा।

यदि बैंक किसी ग्राहक की स्वतंत्र जमा राशि को किसी दूसरे व्यक्ति की देनदारी चुकाने के लिए बिना पर्याप्त कानूनी आधार के इस्तेमाल करता है, तो इससे बैंक और ग्राहक के बीच विश्वास का रिश्ता प्रभावित होता है।

इसी कारण अदालत ने इस मामले में केवल रकम की वापसी को पर्याप्त नहीं माना और बैंक पर 1 लाख रुपये का exemplary तथा punitive compensation भी लगाया।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला बैंकिंग कानून और खाताधारकों के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मृतक व्यक्ति के व्यक्तिगत ऋण की वसूली के लिए उसके परिवार के ऐसे सदस्य की निजी संपत्ति या बैंक जमा को मनमाने तरीके से निशाना नहीं बनाया जा सकता, जो स्वयं ऋण समझौते का पक्षकार नहीं था।

SBI को विधवा की FD से काटे गए 19,90,693 रुपये, उस पर लागू FD ब्याज सहित, चार सप्ताह के भीतर वापस करने होंगे। इसके साथ ही बैंक को 1 लाख रुपये का मुआवजा भी देना होगा।

फैसले का मूल संदेश यही है कि बैंक के पास ऋण वसूली का अधिकार हो सकता है, लेकिन उस अधिकार की सीमा कानून तय करता है। बैंकिंग अधिकारों का इस्तेमाल भी कानून की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है।