इंदौर में पोर्नोग्राफी की लत के मामले पांच गुना बढ़े, बुजुर्ग भी हो रहे शिकार; हर महीने सामने आ रहे 10 से 12 नए मामले
इंटरनेट और स्मार्टफोन ने जिंदगी को आसान जरूर बनाया है, लेकिन इसके साथ कई ऐसी समस्याएं भी सामने आई हैं, जिन पर पहले समाज में खुलकर चर्चा तक नहीं होती थी। इंटरनेट पर अश्लील सामग्री यानी पोर्नोग्राफी देखने की आदत भी अब केवल युवाओं तक सीमित नहीं रह गई है। इंदौर में सामने आ रहे मामलों से पता चलता है कि पोर्नोग्राफी की अनियंत्रित आदत धीरे-धीरे एक गंभीर मानसिक और सामाजिक समस्या का रूप ले रही है।
मनोचिकित्सकों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो पोर्नोग्राफी देखने की आदत पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं और इसका असर उनके पारिवारिक जीवन, वैवाहिक संबंधों, कामकाज और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। चिंता की बात यह भी है कि इस समस्या से जूझने वाले लोगों में 50 से 60 वर्ष की उम्र के लोग भी शामिल हैं।
इंदौर में काम कर रहे कुछ मनोचिकित्सकों के क्लीनिकल अनुभव के मुताबिक, जहां पहले महीने में इस तरह की समस्या लेकर एक-दो लोग ही पहुंचते थे, वहीं अब हर महीने करीब 10 से 12 नए मामले सामने आ रहे हैं। हालांकि, ये आंकड़े किसी शहरव्यापी सरकारी सर्वेक्षण के नहीं, बल्कि संबंधित चिकित्सकों के क्लीनिक में सामने आए मामलों पर आधारित हैं। इसलिए इन्हें पूरे शहर की वास्तविक स्थिति का आधिकारिक आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
दो साल में करीब पांच गुना बढ़े मामले
इंदौर के मनोचिकित्सक डॉ. राहुल माथुर के अनुसार, पोर्नोग्राफी की लत से संबंधित मामलों में पिछले दो वर्षों के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। उनके क्लीनिक के अनुभव में पहले महीने में मुश्किल से एक या दो लोग इस समस्या को लेकर सलाह लेने पहुंचते थे। अब यह संख्या बढ़कर लगभग 10 से 12 नए मरीजों तक पहुंच गई है।
इस बदलाव को केवल इंटरनेट की आसान उपलब्धता से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। विशेषज्ञों के अनुसार, अकेलापन, रिश्तों में तनाव, पारिवारिक दूरी, खाली समय और लगातार स्मार्टफोन के संपर्क में रहना भी किसी व्यक्ति को इंटरनेट पर अश्लील सामग्री की ओर धकेल सकता है।
कई बार शुरुआत केवल जिज्ञासा से होती है। व्यक्ति कुछ वीडियो या तस्वीरें देखता है और फिर धीरे-धीरे यह आदत रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगती है। समस्या उस समय गंभीर होती है जब व्यक्ति खुद इस व्यवहार को रोकना चाहता है, लेकिन बार-बार असफल रहता है।
कब आदत समस्या बन जाती है?
पोर्नोग्राफी देखना अपने आप में किसी व्यक्ति को मानसिक रोगी घोषित करने का आधार नहीं है। समस्या तब मानी जाती है जब किसी व्यक्ति का यौन व्यवहार या अश्लील सामग्री का इस्तेमाल उसके नियंत्रण से बाहर होने लगे और उसके जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से प्रभावित होने लगें।
उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति बार-बार काम, पढ़ाई, नींद या पारिवारिक जिम्मेदारियों को छोड़कर घंटों अश्लील सामग्री देखने में बिताता है, इसे रोकने की कोशिश के बावजूद रोक नहीं पाता, या इसके कारण रिश्तों में गंभीर तनाव पैदा होने लगता है, तो उसे पेशेवर मदद की आवश्यकता हो सकती है।
कई मामलों में व्यक्ति अपने व्यवहार को लेकर अपराधबोध और शर्म महसूस करता है। इसी कारण वह परिवार या चिकित्सक से बात करने से बचता रहता है। समस्या छिपाने से स्थिति और जटिल हो सकती है।
बुजुर्गों में भी बढ़ रही इंटरनेट पर निर्भरता
पोर्नोग्राफी से जुड़ी समस्या का एक दूसरा चिंताजनक पहलू उम्रदराज लोगों में इसका सामने आना है। मनोचिकित्सक डॉ. रामगुलाम राजदान के मुताबिक, 50 से 60 वर्ष की उम्र के लोग भी इंटरनेट से जुड़ी इस समस्या के साथ इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
यह जरूरी नहीं कि हर बुजुर्ग व्यक्ति जो इंटरनेट का इस्तेमाल करता है, वह इस तरह की समस्या से जूझ रहा हो। विशेषज्ञों की चिंता उन मामलों को लेकर है, जहां इंटरनेट का इस्तेमाल धीरे-धीरे व्यक्ति की दिनचर्या पर हावी हो जाता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान लंबे समय तक घरों में रहने के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने मोबाइल फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल पहले की तुलना में काफी अधिक किया। बुजुर्गों के लिए भी मोबाइल मनोरंजन और समय बिताने का प्रमुख माध्यम बन गया। महामारी खत्म होने के बाद भी कुछ लोगों में यह आदत बनी रही।
खालीपन, सामाजिक संपर्क में कमी और दिनचर्या में बदलाव के कारण इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ सकती है। यदि इसी दौरान व्यक्ति लगातार उत्तेजक या अश्लील सामग्री देखने लगे और इस व्यवहार को नियंत्रित न कर पाए तो समस्या गंभीर रूप ले सकती है।
जमीन बेचने के बाद मिला पैसा और खाली समय
इंदौर के खुड़ैल क्षेत्र से सामने आया एक मामला इस समस्या के पीछे काम करने वाले सामाजिक कारणों को समझने में मदद करता है। 52 वर्षीय एक व्यक्ति पहले चौकीदार के रूप में काम करते थे। वर्ष 2020 में उन्होंने अपनी जमीन बेच दी। उनके पास बड़ी रकम आई और इसके बाद उन्होंने काम करना छोड़ दिया।
कामकाज बंद होने के साथ उनके पास काफी खाली समय रहने लगा। मोबाइल फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ता गया। धीरे-धीरे उनका ध्यान अश्लील सामग्री की ओर जाने लगा। शुरुआत में यह सामान्य मनोरंजन जैसा लगा, लेकिन समय के साथ आदत इतनी बढ़ गई कि परिवार को हस्तक्षेप करना पड़ा और अंततः उन्हें मनोचिकित्सक के पास ले जाना पड़ा।
यह मामला यह भी दिखाता है कि किसी भी लत के पीछे केवल एक कारण नहीं होता। आर्थिक स्थिति में अचानक बदलाव, काम का खत्म होना, खाली समय, अकेलापन और डिजिटल माध्यमों की आसान उपलब्धता कई बार एक साथ प्रभाव डाल सकते हैं।
शादी के बाद सामने आई गंभीर समस्या
इंदौर में सामने आया एक दूसरा मामला 26 वर्षीय युवक का है। बताया गया कि युवक को लंबे समय से पोर्नोग्राफी देखने की आदत थी। शादी के बाद इस आदत का असर उसके वैवाहिक जीवन पर दिखाई देने लगा।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब युवक अश्लील सामग्री की तलाश में बच्चों के यौन शोषण से संबंधित अवैध सामग्री तक पहुंच गया। ऐसे कंटेंट का निर्माण, संग्रह, प्रसारण या वितरण कई परिस्थितियों में गंभीर आपराधिक अपराध हो सकता है और बच्चों की सुरक्षा से संबंधित कानून इसे अत्यंत गंभीरता से देखते हैं।
यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि पोर्नोग्राफी की सामान्य आदत और बच्चों के यौन शोषण से संबंधित अवैध सामग्री तक पहुंचना एक ही बात नहीं है। बाद वाला विषय बाल यौन शोषण और गंभीर साइबर अपराध से संबंधित है और इसके लिए अलग कानूनी तथा आपराधिक पहलू लागू हो सकते हैं।
इस युवक की काउंसलिंग किए जाने की बात सामने आई है। उसके मामले से यह सवाल भी उठता है कि इंटरनेट पर किसी व्यक्ति की रुचि किस तरह धीरे-धीरे अधिक गंभीर और खतरनाक सामग्री की तरफ जा सकती है और समय रहते समस्या की पहचान क्यों जरूरी है।
इंटरनेट का विशाल संसार, निगरानी के सामने बड़ी चुनौती
इंटरनेट पर आपत्तिजनक और अवैध सामग्री की निगरानी करना साइबर एजेंसियों के लिए आसान काम नहीं है। स्टेट साइबर सेल के एसपी प्रणय नागवंशी के अनुसार, इंटरनेट पर मौजूद आपत्तिजनक सामग्री का दायरा इतना बड़ा है कि जांच एजेंसियां अपनी पूरी क्षमता के बावजूद कुल सामग्री के एक छोटे हिस्से को ही स्कैन कर पाती हैं।
बताया गया है कि एजेंसियां करीब 10 से 15 प्रतिशत कंटेंट ही स्कैन कर पाती हैं। यह आंकड़ा किस तकनीकी दायरे, प्लेटफॉर्म और अवधि के संदर्भ में है, इसे समझना भी जरूरी है। इंटरनेट पर कंटेंट लगातार बदलता रहता है और अलग-अलग वेबसाइट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मैसेजिंग ऐप और निजी समूहों में सामग्री की निगरानी की अपनी अलग चुनौतियां हैं।
यही कारण है कि केवल किसी एक वेबसाइट या सोशल मीडिया अकाउंट को बंद करना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।
एआई के दौर में और जटिल हुई चुनौती
साइबर सुरक्षा सलाहकार चातक वाजपेयी के अनुसार, सोशल मीडिया से किसी आपत्तिजनक सामग्री को हटाना या किसी एक अकाउंट को ब्लॉक कर देना पर्याप्त नहीं है। इंटरनेट पर नए अकाउंट बनना, सामग्री का दोबारा अपलोड होना और अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर उसका प्रसार जांच एजेंसियों तथा टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए लगातार चुनौती पैदा करता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल ने इस चुनौती को एक नया आयाम दिया है। आज तस्वीरों और वीडियो में बदलाव करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। इससे यह पहचानना कठिन हो सकता है कि कोई सामग्री वास्तविक है, बदली हुई है या पूरी तरह कृत्रिम तरीके से तैयार की गई है।
इसलिए साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ केवल कंटेंट हटाने के बजाय तकनीकी निगरानी, रिपोर्टिंग सिस्टम, डिजिटल साक्षरता और उपयोगकर्ताओं की जागरूकता को भी जरूरी मानते हैं।
परिवार को कैसे पहचाननी चाहिए समस्या?
किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव को परिवार नजरअंदाज न करे। लंबे समय तक मोबाइल में अकेले रहना, रात में लगातार फोन चलाना, परिवार से दूरी बनाना, काम या पढ़ाई में रुचि कम होना, नींद का बिगड़ना और इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर अत्यधिक गोपनीयता जैसे संकेत ध्यान देने योग्य हो सकते हैं।
हालांकि, इनमें से कोई एक संकेत अपने आप में पोर्नोग्राफी की लत साबित नहीं करता। ऐसे व्यवहार के पीछे तनाव, अवसाद, अकेलापन, रिश्तों की समस्या या दूसरी मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं।
इसलिए परिवार को आरोप लगाने या शर्मिंदा करने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए।
इलाज संभव है, लेकिन पहला कदम मदद मांगना है
विशेषज्ञों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति अपने व्यवहार पर नियंत्रण खोने लगे और इसका असर उसके जीवन पर पड़ने लगे, तो मनोचिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
काउंसलिंग में व्यक्ति की दिनचर्या, तनाव, रिश्तों, अकेलेपन और इंटरनेट इस्तेमाल के पैटर्न को समझने की कोशिश की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक दूसरी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की भी जांच कर सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को केवल उसकी आदत के लिए अपमानित या अपराधी की तरह पेश न किया जाए। जहां व्यवहार कानूनी सीमा पार करता है, वहां कानून अपना स्थान रखता है; लेकिन compulsive behaviour यानी नियंत्रण से बाहर हो चुके व्यवहार में मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
बच्चों और किशोरों के मामले में अतिरिक्त सावधानी जरूरी
बच्चों और किशोरों के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल विशेष सावधानी के साथ होना चाहिए। अभिभावकों को केवल फोन छीन लेने के बजाय बच्चों से उम्र के अनुरूप डिजिटल सुरक्षा, निजी जानकारी, संदिग्ध लिंक और अश्लील सामग्री के बारे में खुलकर बातचीत करनी चाहिए।
यदि बच्चा किसी अवैध या शोषणकारी सामग्री के संपर्क में आता है, तो उसे दोषी ठहराने के बजाय सुरक्षित तरीके से सहायता देना अधिक महत्वपूर्ण है। खासकर बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री मिलने पर उसे आगे भेजना या डाउनलोड करके रखना स्थिति को और गंभीर बना सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित कानून और साइबर अपराध रिपोर्टिंग व्यवस्था का सहारा लेना चाहिए।
समस्या केवल इंटरनेट की नहीं, डिजिटल आदतों की भी है
इंदौर से सामने आए ये मामले एक व्यापक सामाजिक बदलाव की तरफ संकेत करते हैं। इंटरनेट ने सूचना और मनोरंजन तक पहुंच को आसान बनाया है, लेकिन इसी सुविधा के साथ डिजिटल आदतों को नियंत्रित रखने की जिम्मेदारी भी बढ़ी है।
पोर्नोग्राफी की अनियंत्रित आदत को केवल नैतिकता के सवाल के रूप में देखने से समस्या के मानसिक और सामाजिक पक्ष छूट सकते हैं। वहीं, इसे सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य का विषय मानकर इसके संभावित कानूनी और साइबर सुरक्षा पहलुओं को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
जरूरत इस बात की है कि परिवार, चिकित्सक, साइबर विशेषज्ञ, स्कूल-कॉलेज और कानून लागू करने वाली एजेंसियां अपनी-अपनी भूमिका समझें। इंटरनेट को पूरी तरह रोक पाना व्यावहारिक समाधान नहीं है। लेकिन सुरक्षित डिजिटल व्यवहार, समय पर काउंसलिंग, बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और अवैध सामग्री के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के जरिए नुकसान को कम किया जा सकता है।
इंदौर के मनोचिकित्सकों के क्लीनिक में बढ़ती संख्या में पहुंच रहे मरीजों का अनुभव कम से कम इतना जरूर बताता है कि इंटरनेट की यह समस्या अब केवल किशोरों या युवाओं तक सीमित मानकर नजरअंदाज नहीं की जा सकती। 50-60 वर्ष के लोगों का इलाज के लिए सामने आना इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
सबसे बड़ी जरूरत शायद यही है कि जिस विषय पर लोग शर्म या संकोच के कारण बात नहीं करते, उस पर तथ्यात्मक और जिम्मेदार तरीके से बातचीत शुरू हो। समस्या को छिपाने के बजाय समय रहते पहचानना, जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना और डिजिटल दुनिया के इस्तेमाल में संतुलन बनाना ही इससे निपटने की दिशा में व्यावहारिक कदम हो सकता है।